Sunday, 22 September 2019

खिलौना नहीं इंसान हूं ( दास्तान ए ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया

   खिलौना नहीं इंसान हूं ( दास्तान ए ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया 

  हंसता रहा , मुस्कुराता रहा कभी आंसूं बहाता रहा ,
 जैसे कोई बेजान सामान सबकी दुनिया का मशीन सा। 
 
 चलता गया अजनबी अनजान राहों पर चाहे-अनचाहे ,
 कोई मंज़िल कोई मकसद कोई सपना नहीं था मेरा भी।

 फिर भी बहला नहीं पूरी तरह से किसी अपने बेगाने का ,
 मुझ से खेल कर भी दिल खिलौना टूटने बिखरने तक भी।

 अब तक गया हूं आखिर सदियों लंबे सफर पर चलते हुए ,
 नहीं चला जाता थोड़ा तक कर आराम करना चाहता हूं मैं।

 सभी अनचाहे खुद बना लिए बंधनों से मुक्त होकर अब ,
 बचे हुए कुछ पल जीना चाहता हूं अपनी मर्ज़ी से मैं भी।

 भगदौड़ से दुनिया की तक कर चूर हो कर परेशान होकर ,
 पल दो पल जीना चाहता हूं अपने साथ अपनी ख़ुशी से।

 किस किस को कैसे समझाऊं मैं नहीं बेजान खिलौना कोई ,
 दिल जज़्बात संवेदना और एहसास कुछ खालीपन का है।

 कुछ भी नहीं चाहत कोई गिला शिकवा आपस में नहीं है ,
 बस खुले आसमान में सांस लेना है घुट रहा है दम मेरा।

 नहीं आदत औरों की तरह हाथ जोड़ मांगना कुछ  कभी ,
 इतना चाहता हूं जैसा भी मैं हूं रहने दो मुझे अपनी तरह।

 और नहीं जिया जाता हर किसी को खुश रखने को मुझसे ,
 थोड़ी आरज़ू बची हुई है आखिरी पल चैन से रहना है अब।

 खामोश होकर शायद चिंतन करना चाहता हूं क्या है पास ,
 समझना नहीं सब को न ही किसी से कुछ कहना है अब।

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