Wednesday, 18 September 2019

धर्म की जनसेवा की गलत परिभाषा ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  धर्म की जनसेवा की गलत परिभाषा ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

  हमने अपने विवेक से काम लेना छोड़ दिया है अन्यथा हम ऐसे कर्मों को धार्मिक नहीं मानते कभी। जब भी किसी देश का शासक भले जिस भी व्यवस्था द्वारा सत्ता पर बैठा हुआ हो जनकल्याण का पैसा खुद अपने किसी भी मकसद पर खर्च करता है उसको अच्छा शासक क्या भलामानुष भी नहीं समझा जाना चाहिए। जब किसी राज्य की जनता किसी कुदरती आपदा से कष्ट में हो तब उनकी सहायता करने की बात भूलकर जब कोई अपने किसी तथाकथित धार्मिक आयोजन करने पर सरकारी लोगों को व्यस्त रखने का कार्य करता है तब वह वास्तव में इक अपराध मानवता के खिलाफ कर रहा होता है। और हम देखते हैं हर जगह कोई यही अधर्म कर रहा नज़र आता है। सौ पंडित मिलकर कोई पूजा पाठ करने से किसी का अपने कर्तव्य को भुलाकर अपने खुद के लिए कुछ भी करना कैसे किसी भगवान को खुश कर सकता है। 

   हैरानी हुई जब कुछ लोग धार्मिक आयोजन भी अपनी ताकत शोहरत को साबित करने को आयोजित करने लगे हैं। यहां पर शर्तें लगाई जाने लगी हैं मेरी कमीज़ उजली है उसकी मैली है , लगता है कोई फ़िल्मी नायक किसी डिटर्जेंट का विज्ञापन कर रहा है। आपको अमिताभ बच्चन का डिटर्जेंट भाता है या अक्षय कुमार का मर्ज़ी आपकी है। समझदार दोनों जगह हाज़िरी लगवा आये नासमझ हम किसी भी जगह नहीं जाना उचित लगा धर्म कोई बाज़ार नहीं है ये उपदेश सुनने की ज़रूरत नहीं थी। हद तब हुई जब डंका पीटने का काम किया गया ये बताया गया उनकी लंगर की थाली हज़ार दो हज़ार वाली थी। इतने ही धर्म कर्म वाले हो तो लाखों रुपया शानो शौकत दिखाने पर नहीं कुछ गरीबों का पेट भरने किसी की सहायता करने पर लगाते तो पुण्य का काम होता। 

   हमने एक तरफ आधुनिक विज्ञान और चांद पर जाने की बात की है दूसरी तरफ अभी भी अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं। भला किसी रोगी को कोई दवा ख़ास दिन अपने हाथ से देने पर असर होने की बात कोई खुद को आधुनिक शिक्षा विस्तार  और अंधविश्वास का अंत करने वाली बात कहने वाला किस तरह कह सकता है। मगर आजकल शिक्षा स्वास्थ्य समाज सेवा धर्म सभी का कारोबार है और सफल होने को ये सब करना अनुचित नहीं समझते लोग। लेकिन आप किसी से भी किसी विषय पर चर्चा भी चिंतन की तरह नहीं कर सकते हैं क्योंकि तर्क की कोई बात नहीं समझता और आपके सवाल का जवाब देने की जगह आपको अनाप शनाप बातें और जाने क्या क्या नहीं कहा जा सकता है। 

   जिधर भी नज़र जाती है लोग समाज सेवा का आडंबर करने को कितने एनजीओ बना वास्तव में उनकी आड़ में क्या क्या नहीं करते हैं। समाज सेवा धार्मिक आयोजन दान करने को खुद की कमाई खर्च की जानी चाहिए ऐसा ही सभी धर्म बताते हैं। जब कोई सरकारी धन से अपने गुणगान ही नहीं राजनीतिक मकसद से दिखावा करने पर अनुदान लेकर बर्बाद करता है तो पुण्य नहीं मिल सकता ऐसा कर के। राजनेता अधिकारी ही नहीं बड़े बड़े धार्मिक स्थल दान चढ़ावे की राशि का उपयोग धर्म छोड़ तमाम बाकी कामों पर करते हैं तो खुद ही अपने धर्म और उपदेश को धोखा देते हैं। आपको उल्टी परिभाषा समझाई जा रही है धर्म पुण्य और जनसेवा की बात की जाती है करते जो हैं विपरीत आचरण है।

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