Wednesday, 7 August 2019

कलयुग का राम-राज्य और रामायण ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया ( भाग तीसरा )

  कलयुग का राम-राज्य और रामायण ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                                        ( भाग तीसरा )

   लव-कुश टीवी सीरियल की तीसरी कड़ी 7 अगस्त को दिखाई गई। पिछली बार की तरह आज भी उस युग की बात को आज की देश समाज की दशा राजनीति से जोड़कर समझने की कोशिश करते हैं। इक बात पिछले भाग में कहनी रह गई थी वो ये कि जब राजा राम भाई लक्ष्मण को सीता जी को वन में छोड़ आने का आदेश देते हैं तब लक्ष्मण बताते हैं कि जब भी आपकी संतान को पता चलेगा अपने ऐसे समय अपनी पत्नी को अकेली छोड़ दिया उनकी नज़रों में आपके लिए आदर की नहीं नफरत की भावना होगी। तीसरे दिन के अंक में सीता ऋषि  बाल्मीकि से कहती है कि जैसा उन्होंने कहा उनके आश्रम में उनकी बेटी बनकर रह सकती है मगर इस शर्त पर कि आप आश्रम में रहने वालों को मेरी  वास्तविक पहचान नहीं बताएंगे। कारण पूछते हैं ऋषि बाल्मीकि तो सीता बताती हैं क्योंकि जब यहां रहने वालों को मेरी संतान को लेकर पता होगा कि राजा राम की संतान है तो उसको आदर तो मिलेगा मगर अपनापन नहीं और वो संतान यहां रहकर न तो राजा के महल का आनंद ले सकेगी न ही यहां के सामन्य रहने वालों में रहकर आम उनकी तरह होकर जीने का आनंद ही। जैसे किसी बड़े बरगद के पेड़ की छांव में कोई बीज डालने पर उगता तो है मगर उसकी छाया ही उसको बढ़ने नहीं देती और इसी कारण वो मिट जाता है। ऋषि कहते हैं ये गहराई की बात केवल आप ही सोच सकती हैं और मान जाते हैं। 

      अब आज की देश समाज की वास्तविकता को देखते हैं तो हर कोई अपने जीवन में संघर्ष से बचकर कोई सहारा पाकर ऊंचाई पाना चाहता है। आधुनिक युग में कोई अपनी अलग राह नहीं बनाना चाहता बनी बनाई डगर पर चलना चाहता है। किसी राजनीति की शख्सीयत के निधन पर सोशल मीडिया टीवी अखबार सभी शोक को भी किसी तमाशे की तरह बना देते हैं शायद हम भूल गये हैं दुःख की घड़ी में संवेदना जताने को आडंबर की ज़रूरत नहीं होती है। मुझे याद है 1964 में जब जवाहर लाल नेहरू जी के निधन की खबर रेडियो पर सुनी तो हर किसी की आंख नम थी मगर आजकल हम टीवी चैनल पर एक दिन को किसी की जीवन की निजि बातों से लेकर भाषण तक देखते सुनते हैं सोशल मीडिया पर लिखते हुए लगता ही नहीं कोई संवेदना रही होगी। सच बताओ कोई इक आंसू आपकी पलकों से ढलका भी था। जैसे टीवी की बहस जैसे कोई सीरियल जैसे कोई फिल्म देखते हैं और टीवी बंद होते ही उसको भूल अन्य अपने अपने रोज़ के कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं बस इक घटना पल भर को महत्वपूर्ण थी। पिछले कुछ दिनों में कुछ लोगों को लेकर ये हुआ जो पहले भी होता रहा मगर अब हद से बढ़कर जैसे इक पागलपन छाया हुआ होता है। और हम कहते हैं जानते हैं ऐसा स्वाभाविक है हर किसी को इक दिन अलविदा कहना है। 

    किसी व्यक्ति विशेष की बात नहीं है अक्सर यही होता है जब कोई शोहरत की बुलंदी या सफलता की सीढ़ी चढ़ जाता है भले अभिनय या खेल या राजनीति या किसी कारोबार में यहां तक योग जो किसी की अपनी खोज नहीं केवल उसको बाज़ार में बेचने से मुनाफा कमाने का काम किया हो या फिर किसी चेहरे को आंदोलन का मुखौटा बना कर राजनीति की गई हो और जिस बात का आंदोलन था उसी को छोड़ दिया गया हो। मगर हर कोई मकसद को छोड़ स्वार्थ पाने को महान समझने लगा है। अपने कभी विचार किया है कोई अधिकारी या नेता या कोई भी काम करने वाला जब अपना सामन्य कर्तव्य निभाने का काम करता है तो भी विशेष घटना होने पर सबको जानकारी मिलती है तो जय जयकार करने लगते हैं। अर्थात अपना काम ईमानदारी से करना हम बड़ी बात मानते हैं जबकि हमें करना ये चाहिए कि जब कोई उचित कर्तव्य का निर्वाहन नहीं करता हो तब सामने आकर सवाल करना चाहिए। कितने ऐसे लोग हैं जिनको हम महान क्या भगवान का दर्जा देने की बात करते हैं जबकि उन्होंने अपना सामान्य कर्तव्य निभाया था खेल में अभिनय में या अन्य किसी काम में योगदान देकर। इस बात में जो बात बिना कहे समझी जाती है वो ये कि हर किसी को अपना काम करते रहना कोई ज़रूरी नहीं है। अदालत ने आदेश दिया हम सोचते हैं कमाल किया जबकि ऐसा क्यों करना पड़ा और क्यों कितना अनुचित होता रहा और जिनको कुछ करवाई करनी चाहिए थी की ही नहीं उनको छोड़ देते हैं। तभी ख़ास लोगों को अपराध करने की छूट देने अपराध करने के बाद उनको सहयोग देकर बचाने और जिस किसी से अन्याय हुआ उसको परेशान करने वालों की चिंता नहीं करते और ये बार बार होता रहता है। 
       
           हम लोग भेड़चाल के आदी होकर भीड़ के साथ चलने लगते हैं अपनी कोई सोच नहीं रखते हैं। जिस तरफ अधिक शोर हो हम उधर हो लेते हैं। बहुत अधिक शोर में धीमी आवाज़ दब कर रह जाती है और बहुत अधिक रौशनी आंखों को चुंधिया देती है हम साफ नहीं देख सकते। जो सरकार या जिनको विज्ञापन इश्तिहार से अपनी बात का शोर मचाना आता है उनका पक्ष जानते हैं , हर कहानी में तीन पक्ष होते हैं। हम किसी भी एक का पक्ष जानकर नतीजा नहीं निकाल सकते हैं आपके उनके इलावा कहानी का एक और पक्ष भी हो सकता है या होता है सत्य का इसलिए किसी एक की बात सुनकर तय नहीं करते कि सच क्या है। आजकल जो सच आपको समझाने की कोशिश की जाती है आधा सच भी कई बार नहीं होता है झूठ को सच का लेबल लगाकर लोग मालामाल हो रहे हैं और हम मूर्ख ही नहीं विवेकहीन होकर पागलपन जैसी हरकतें करने लगे हैं। आदमी आदमी बनकर रहे ये भी आसान नहीं है किसी को मसीहा समझोगे तो ठोकर खाओगे और किसी शायर की बात की तरह सोचोगे। 
  

तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला ,

मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला।



                                              
                                                  ( विषय जारी है )

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