Sunday, 4 August 2019

महानता पाने की चाहत ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       महानता पाने की चाहत ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   पढ़ तो इक किताब से इक कहानी रहा था मगर कुछ शब्द पढ़कर सोचने की ज़रूरत महसूस हुई। कहानी में इक किरदार दूसरे को कहता है आपने अमुक धार्मिक किताब तो पढ़ी हुई है। किताब का नाम नहीं बता रहा अन्यथा सुनकर खुद उनको शर्मिन्दगी होगी जिस की जय जयकार करते हैं उसी को लेकर लिखी किताब की बात नहीं समझते। शब्द जो लिखे हुए हैं वो ये हैं , तुम मुझे छोटा बनाने की लाख कोशिश करो तुम्हारा बौनापन कम नहीं होने वाला। ऊंचे सिंघासन पर बैठने से अपने सामने नीचे बैठे लोगों से बड़े नहीं बन जाते और महान तो कदापि नहीं। ताकत से सेना के दम पर आवाम के दिलों को नहीं जीत सकते तुम जंग में किसी को हराकर भी विजयी नहीं होते अगर राज्य की जनता के दिलों में आदर नहीं भय या आतंक है। शासक की सफलता राज्य की सत्ता की ताकत या विस्तार से नहीं राज्य के निवासी लोगों की खुशहाली और राजा पर विश्वास करने से आंकते हैं। इक दोहा याद आता है :-

          बड़े बढ़ाई न करें बड़े न बोलें बोल , रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मेरो मोल। 

बड़बोलापन छोटा साबित करता है बड़ा नहीं बना सकता है। मगर आजकल हर कोई अपनी कीमत खुद ही बताता है। क्या क्या नहीं करते हैं अपनी शोहरत का डंका पीटने को , बात केवल राजनीति की नहीं है। हर लिखने वाला हर खबर देने वाला चैनल अख़बार हर शिक्षा देने का कारोबार करने वाला स्वास्थ्य सेवा का व्यौपार करने वाला योग से लेकर दाल चावल सौंदर्य प्रसाधन बेचने वाले से छोटे से शहर गांव का अधिकारी या चुना हुआ अथवा मनोनीत किया व्यक्ति नेता खुद को किसी से कम नहीं समझता है। हर शायर देश विदेश जाकर पैसा वाह वाह लूट सकता है मगर ग़ालिब मीर नहीं हो सकता है। सत्ता की बुलंदी की शोहरत वैसे भी भरोसा नहीं कब जिस शाख पे बैठे हैं वो टूट भी सकती है इक शायर कहता है। 

मुझे इक जन्म दिन पर किसी अपने ने डायरी दी थी जिस पर लिखा था , अगर शोहरत पाने की ख्वाहिश करते हैं तो वो इक गुनाह की तरह है। शोहरत आपको अपने आप मिलेगी आपके वास्तविक काम से और काबलियत से। शासक को राज्य की जनता की भलाई करने पर ध्यान देना चाहिए और नागरिक की खुशहाली से अच्छे राज को आकंते हैं। इतिहास लिखने वाले कभी हरने वाले के पक्ष की बात को उजागर नहीं करते अन्यथा उनको रामायण में लिखना पड़ता उसने अपनी लंका सोने की कैसे बनाई थी। रावण ने सीता का हरण क्यों किया था उस के साथ राम के अपनी पत्नी जो रानी थी को अग्नि परीक्षा के बाद भी वन क्यों भेजा था। अपनी पत्नी को न्याय नहीं देने उसका बिना अपराध त्याग करने वाले से राज्य की महिअलों को भला कैसा न्याय मिलता होगा। शासक राम नाम की रट लगाते हैं मगर उनकी कही बात को जानते ही नहीं हैं। रावण को हराने के बाद भी राम उनसे सीख लेने को भाई लक्ष्मण को क्यों भेजते हैं। खुद राम चाहते तो ताज पाने के बाद पिता के दिए वचन को निभाने की औपचारिकता निभा सकते थे लाव लश्कर के साथ बनवास को भी अपने लिए अवसर बना सकते थे या सत्ता मिलते अधिकार का उपयोग कर माता से ही वचन के बदले कुछ और मांगने को कह सकते थे। लेकिन उन्होंने परंपरा को निभाया क्योंकि हर शासक को पिछले शासक के दिए वचन संधि को निभाना होता है। लेकिन आजकल अपने से पहले के शासक की कमियां निकालने और उसको बुरा या छोटा साबित करने की बात होती है जो वास्तव में चांद सूरज पर थूकने की बात है।

 हर शासक को विरासत में जो थाती मिलती है उसको सहेजना संभालना संवारना होता है। न्याय का आधार ही सभी बड़े छोटों की समानता है अपने खास लोगों को पद बांटना सत्ता का मनमाना दुरूपयोग करना अनुचित तो है ही नाकाबिल लोगों को अधिकार देकर देश राज्य को विनाश की तरफ ले जाना भी है। शासक की महानता उसके बनवाये महल या सतंभ नहीं होते हैं उसके शासन में नागरिक को मिले अधिकार बताते हैं उनकी वास्तविक पहचान। किसी धोबी के झूठे आरोप लगाने पर अपनी पत्नी का त्याग करना क्या था समय उसकी व्याख्या दोनों पक्ष समझ करेगा। नागरिक की आमजन की राय जनमत को शासकीय न्याय से अधिक महत्व देना भी और उसी के साथ इक नारी को बिना अपराध निष्कासित करने पर सवाल उठना भी। मगर शासक को खुद को महान बनाने को कोई काम या निर्णय नहीं करना होता है उसके निर्णय से देश को भविष्य में क्या मार्गदर्शन मिलेगा इस से तय होता है।

  धार्मिक किताब में लिखा हुआ है कि पूर्वज की अच्छी बातों से सबक लेना चाहिए उनके आधार पर खुद को बदले में कुछ पाने की चाहत नहीं रखनी चाहिए। आपको माता पिता से हुई भूल का सुधार करने का फ़र्ज़ निभाना है और उनकी अच्छी बातों को अपनाना है। अपने पिता या पूर्वज से किसी को मुकाबला नहीं करना चाहिए क्योंकि उनके हालात और समय आपके हालात और समय से अलग हैं। पिछली सरकार की या सत्ताधारी की कमियां गलतियां बताने से आपकी अच्छाई साबित नहीं होती है। इतिहास ने उनको अच्छा नहीं बताया है जो खज़ाना अपने खुद पर खर्च नहीं करते थे बल्कि उनको अच्छा माना जो औरों की सहायता करने नागरिक के दर्द समझने का काम रहम दिली से करते थे। मगर अच्छा कर्म महान कहलाने को नहीं किया जाता है जैसे कई लोग माता पिता के नाम पर दान देने का कार्य करते हैं अपनी शोहरत की खातिर। वास्तविक दान वही होता है जिसका डंका नहीं पीटा जाता चुपके से किया जाता है मानवीय धर्म समझ कर। बदले में कुछ भी चाहना धर्म के खिलाफ है और उसको दान धर्म नहीं व्यौपार समझते हैं। रहीम से सीख ली जा सकती है दो दोहे इस बारे में हैं। गंगभाट कवि थे रहीम जागीर के मालिक बनकर हर किसी को सहायता देते थे मगर गंगभाट ने देखा जिसकी सहायता कर रहे होते हैं उसकी तरफ नहीं नीचे को आंखे झुकाकर दान देते हैं। उन्होंने सवाल किया रहीम से इक दोहा पढ़कर और रहीम ने दोहे से उनको जवाब दिया था दोनों दोहे पढ़ कर फिर समझते हैं अर्थ को।

गंगभाट :-

सिखियो कहां नवाबजू ऐसी देनी दैन , ज्यों ज्यों कर ऊंचो करें त्यों त्यों नीचे नैन। 

अर्थात नवाब साहब ये आपका अजीब तरीका लगता है जब भी किसी को कुछ सहायता देते हैं उसकी तरफ नहीं देखते अपनी नज़रें नीचे को झुकी हुई होती हैं। 

रहीम :-

देनहार कोऊ और है देवत है दिन रैन , लोग भरम मोपे करें याते नीचे नैन। 

अर्थात देने वाला तो कोई और है अर्थात ऊपर वाला मुझे देता है मैं तो उसका दिया आगे सौंपता हूं अमानत की तरह मगर लोग लेने वाले समझते हैं मैं देता हूं इस बात से मेरी नज़र झुकी रहती है। 

अब विचार करें ये राजनेता तो कोई नवाब नहीं विरासत नहीं मिली बाप दादा से कोई। जो भी है देश की जनता का है उसी से मिलता है कर वसूल कर के। खुद जनता के पैसे से शान से रहते हैं कोई उपकार नहीं किया करते जब देते हैं कुछ भी किसी को या कोई भी काम करते हैं अपनी जेब से नहीं देश की मालिक जनता के खज़ाने से। फिर इश्तिहार अपने नाम से हमने क्या क्या किया है , ये बड़ा होना नहीं छोटा बनना है।  
  
  

No comments: