Sunday, 25 August 2019

ऊपरवाले की डायरी से ( उल्टा-सीधा ) डॉ लोक सेतिया

    ऊपरवाले की डायरी से ( उल्टा-सीधा ) डॉ लोक सेतिया 

   ये इक काल्पनिक घटना है और इसका किसी जीवित अथवा मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है। ये वास्तव में हुआ मगर आप इसको सपने की बात कह सकते हैं। घने जंगल से गुज़रते हुए आसमान से इक डायरी गिरती हुई नज़र आई जिस पर बहुत बातें लिखी हुई थीं जिनको समझना कठिन नहीं था मगर आसान भी नहीं था। जाने किस भाषा में लिखा था फिर भी बिना भाषा जाने ही डायरी का पन्ना खोलते ही जैसे कोई आवाज़ सुनाई देती है जो भी लिखा कोई पढ़कर सुनाता लगने लगा जबकि कोई भी आस पास नहीं था। उन सब से पहली बात समझ आई कि डायरी ख़ास वीवीआईपी लोगों को लेकर है। और इसका संबंध ख़ास लोगों की मरने की इच्छा को लेकर है। पहले इक लघुकथा जैसी बात याद आई है उसको सुनना काम आ सकता है। 

इक अधिकारी का कुत्ता मर गया तो उसको दफ़नाने को शहर भर के लोग जमा हुए और हर कोई उस कुत्ते की वफादारी के किस्से सुना रहा था जो अधिकारी ने बता रखे थे। मगर जब अधिकारी सेवानिवृत हो गया तब उसकी माता जी की मौत पर नाम को थोड़े लोग आये थे। ये सच सभी समझते हैं जानते हैं इसलिए नेता और अधिकारी लोग चाहते हैं काश उनकी मौत कुर्सी पर रहते या सत्ता पर होते हो और उनकी मौत का शानदार शोक का आयोजन किया जाये। इस डायरी की गोपनीय बातें जानकर समझ आया जिन ख़ास लोगों की मौत शानदार ढंग से समारोह पूर्वक किसी त्यौहार की तरह मनाई जाती है और समझते हैं ये असमय निधन हुआ है वास्तव में उन लोगों की इच्छा को ऊपरवाले ने स्वीकार किया था। सब जानते हैं हर कोई अनाम बनकर खो गया वक़्त बदलते ही की तरह जीना नहीं चाहता न ही मरना ही चाहता है। किसी की भी मौत पर कोई भी खुश नहीं हो सकता है न ही मरने के बाद कोई खराब बात कहना उचित है मगर इक बात सभी जानते हैं जाना सभी को इक दिन है और कब कौन कैसे उठेगा कोई नहीं जानता , आनंद फिल्म का डायलॉग मशहूर है। ज़िंदगी और मौत तो ऊपरवाले के हाथ है , हम सब तो उसके हाथ की कठपुतलियां हैं कौन कब कैसे उठेगा कोई नहीं जानता है। 

     मौत को लेकर कुछ शेर हैं , मेरी इक ग़ज़ल का भी शेर कुछ अलग तरह का है। पहले उस शेर से शुरुआत करते हैं फिर जाने माने शायरों के भी शेर सुनते हैं। 

मौत तो दरअसल एक सौगात है , हर किसी ने इसे हादिसा कह दिया।  
( डॉ लोक सेतिया तनहा )

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं , और क्या जुर्म है पता ही नहीं। 
ज़िंदगी मौत तेरी मंज़िल है , दूसरा कोई रास्ता ही नहीं।                  
( किशन बिहारी नूर )

यहां हर शख्स हर पल हादिसा होने से डरता है , खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है। 
अजब ये ज़िंदगी की कैद है दुनिया का हर इंसां , रिहाई मांगता है और रिहा होने से डरता है। 
( राजेश रेड्डी ) 

डायरी पढ़कर सुनाने वाले ने आज इतना ही बताया है बाकी बाद में एक एक कर के बताने का वादा किया है। मगर इस पोस्ट पर आपको अपनी इक नज़्म भी सुनाता हूं क्योंकि मैंने भी इक आरज़ू दिल की कब की संजो राखी है। ये रचना तीस साल पुरानी लिखी हुई है। 

( जश्न यारो मेरे मरने का मनाया जाये ) मेरी वसीयत

जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये ,
बा-अदब अपनों परायों को बुलाया जाये।

इस ख़ुशी में कि मुझे मर के मिली ग़म से निजात ,
जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये।

वक़्त ए रुखसत मुझे दुनिया से शिकायत ही नहीं ,
कोई शिकवा न कहीं भूल के लाया जाये।

मुझ में ऐसा न था कुछ , मुझको कोई याद करे ,
मैं भी कोई था , न ये याद दिलाया जाये।

दर्दो ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह तन्हाई ,
ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये।

जो भी चाहे , वही ले ले ये विरासत मेरी ,
इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये।   

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