Sunday, 11 August 2019

नहीं सीखा राग-दरबारी ( बात कहनी है ) डॉ लोक सेतिया

      नहीं सीखा राग-दरबारी ( बात कहनी है ) डॉ लोक सेतिया 

    इक बहुत पुरानी ग़ज़ल से बात शुरू करता हूं। बहुत सीखा समझा जाना मगर यही कभी नहीं आया और न ही कभी आएगा। सीखा भी नहीं सीखना भी नहीं कभी मुझे राग-दरबारी। 

सब से पहले आपकी बारी - लोक सेतिया "तनहा"

सब से पहले आप की बारी ,
हम न लिखेंगे राग दरबारी।

और ही कुछ है आपका रुतबा ,
अपनी तो है बेकसों से यारी।

लोगों के इल्ज़ाम हैं झूठे ,
आंकड़े कहते हैं सरकारी।

फूल सजे हैं गुलदस्तों में ,
किन्तु उदास चमन की क्यारी।

होते सच , काश आपके दावे ,
देखतीं सच खुद नज़रें हमारी।

उनको मुबारिक ख्वाबे जन्नत ,
भाड़ में जाये जनता सारी।

सब को है लाज़िम हक़ जीने का ,
सुख सुविधा के सब अधिकारी।

माना आज न सुनता कोई ,
गूंजेगी कल आवाज़ हमारी।

        देश में कुछ भी आपके सामने होता रहे बेशक आप भी उस सब में शामिल होकर देश की व्यवस्था नियम कानून नैतिकता को ठेंगे पर रखकर अपने स्वार्थ सिद्ध करते रहें जैसे चाहे उचित अनुचित कार्य करते हुए पैसा पद पाने को सब करते रहें मगर साथ में देशभक्त होने का शोर भी करते रहें मुझे नहीं पसंद ऐसी बात। बस इक सवाल जो हर कोई खुद से नहीं करता बाकी सभी से पूछते हैं क्या देशभक्ति का अर्थ समझते हैं। ज़रा अपनी बात को दूसरी तरफ से देखते हैं खुद सच अपने आप से पूछते हैं मैंने अपने देश समाज को दिया क्या है। देश की बदहाली में मैं भी शामिल नहीं कभी अपने स्वार्थ को दरकिनार कर किया है देश समाज को कुछ बेहतर बनाने को हम सभी को किसी एक दिन 15 अगस्त 26 जनवरी को नहीं हर दिन इस पर चिंतन करना चाहिए। आज़ादी का मतलब केवल जश्न मनाना नहीं है आज़ादी का वास्तविक अर्थ देश देशवासियों की एकता भाईचारा और समानता है। औरों को देश भक्त हैं नहीं है का उपदेश देने से नहीं खुद कुछ अच्छा वास्तव में कर दिखाने को देश से प्यार करते हैं समझा जा सकता है।

      देशभक्ति कोई इश्तिहार नहीं है न कोई तमगा है टांग कर दिखाने को ये इक भावना है एहसास है देश की खातिर सर्वस्व अर्पित करने का। हम जब गीतकार प्रदीप जी के शब्द सुनते हैं , जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुर्बानी। लता जी ने गाया था 27 जनवरी 1963 , ऐ मेरे वतन के लोगो , ज़रा आंख में भर लो पानी , तब हर आंख नम थी। ऐसे ही दम निकले इस देश की खातिर बस इतना अरमान है , एक बार इस राह में मरना सौ जन्मों के समान है। देख के वीरों की कुर्बानी अपना दिल भी बोला , मेरा रंग दे बसंती चोला। ऐसे कितने गीत सुनकर हमारी भावनाएं जागती हैं मगर क्या ये भाव स्थाई रहते हैं हर वक़्त पल पल , अगर रहें तो हम बहुत कुछ है जो देश की खातिर करते और ऐसा भी बहुत कुछ होगा जो कभी नहीं करते अपनी खातिर अपने स्वार्थ की खातिर। देशभक्त कहलाने नहीं देशभक्त होने का निश्चय करना चाहिए और देश कोई सरकार नहीं सत्ता नहीं देशवासी हैं और नफरत भेदभाव की की हर बात अनुचित है। आजकल जो लोग इस बेकार की बहस में उलझे रहते हैं कि भूतकाल में किस ने क्या अच्छा बुरा किया क्या उनको आज समझ आता है खुद क्या करते हैं या कोई और क्या करता है। भीड़ बनकर नहीं अकेले खड़े होकर खुद कितना साहस करते हैं देश संविधान न्याय की बात पर अडिग रहने का। सच्ची देशभक्ति लगता है जैसे इतिहास की किताबों देशभक्ति की फिल्मों गीतों नाटकों तक सिमित रह गई है जो सामने दिखाई देता है वो देशभक्त होने का शोर है और कुछ भी नहीं है। शायद चिंतन की ज़रूरत है कि हम किस तरफ जाने को चले था और अब किस दिशा को बढ़ रहे हैं।

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