Monday, 4 February 2019

ईमानदारी नहीं रही ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

          ईमानदारी नहीं रही ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      अख़बार में इश्तिहार छपा है समाचार पक्का है टीवी चैनल वाले भी सबूत के साथ घोषणा करते हैं नहीं बचा सके सोशल मीडिया वाले मिलकर भी उसको। बस इक रस्म निभानी है सपुर्दे ख़ाक करना है कि जलाना है एक जैसी बात है कोई फर्क नहीं पड़ता है। कोई किसी पर इल्ज़ाम नहीं लगा सकता कि उसने मारा है मरने दिया है या बचाया नहीं है। सभी को वो कब से बेकार अनचाहा बोझ लगती थी सब उसको अपने से दूर बाकी लोगों के पास देखना चाहते थे। ईमानदारी के परिवार का कोई बचा नहीं इसलिए उसकी शोक सभा आयोजित कोई नहीं कर सकता। मगर आजकल लोग अवसर की तलाश में रहते हैं कोई जश्न मनाया जाये। ऐसे में सभी बेईमान लोगों ने मिलकर ईमानदारी की याद में सभा आयोजित करने का कार्य किया है। चलो अच्छा है ऐसे अवसर पर विरोध की बात भुलाना दिल में ख़ुशी और सामने संवेदना व्यक्त करना बचा हुआ है। पहले शोक सभा पर रिश्तेदारों को खत लिख बुलावा भेजते थे आजकल अपने पराये का भेद नहीं है और सार्वजनिक सूचना देते हैं और तमाम लोग कुछ मिंट का मौन रखने फूल चढ़ाने आते हैं। किसी के चेहरे पर दुःख की कोई झलक नहीं नज़र आती और जो जितना बड़ा व्यक्ति समझा जाता है जश्न उतना भव्य और शानदार होता है। इक शायर कहता है कि :- बड़े लोगों के घर सोग का दिन भी लगता है त्यौहार सा। उस शायर को लगता था :- इस तरह साथ निभाना है मुश्किल , तू भी तलवार सा मैं भी तलवार सा। 
                      सभा की शुरुआत होने वाली है और देश का हर ख़ास वर्ग इस जश्न में शामिल है। हर टीवी चैनल पर सीधा दिखाया जा रहा है और देश के बड़े बड़े सभी शहरों में एक साथ जश्न मना रहे हैं। इस से पहले कि मंच से भाषण शुरू हों मैं आपको अपनी इक नज़्म सुनाता हूं मौका भी है दस्तूर भी है। 


                        जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये

                        बा-अदब अपनों परायों को बुलाया जाये।

                    इस ख़ुशी में कि मुझे मर के मिली ग़म से निजात

                        जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये।

                    वक़्त ए रुखसत मुझे दुनिया से शिकायत ही नहीं

                       कोई शिकवा न कहीं भूल के लाया जाये।

                    मुझ में ऐसा न था कुछ , मुझको कोई याद करे

                      मैं भी कोई था , न ये याद दिलाया जाये।

                      दर्दो ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह तन्हाई

                       ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये।

                       जो भी चाहे , वही ले ले ये विरासत मेरी

                        इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये। 

            मंच पर सबसे पहले महान लेखक संचालन करने को माइक पर आये हैं , कह रहे हैं आज का दिन बहुत ख़ास इतिहासिक दिन है और शायद हमारी एकता का सबूत भी है जो ईमानदारी के विलुप्त होने पर एकमत हैं और एक साथ मिलकर उसे श्रद्धासुमन भेंट करने वाले हैं। समय के साथ जो भी अनावश्यक समझा जाने लगता है उसका अंत होना स्वाभाविक है और अंत को स्वीकार करना ज़रूरी है। ईमानदारी देखने में जैसी भी थी उसका गुणगान जितना भी किया जाता रहा हो वास्तव में उसका होना सभी को समस्या लगता रहा है। राजनीति और धर्म वालों को इस शब्द ने बहुत परेशान किया है। कारोबार करने वालों को भी यही सब से बड़ा दुश्मन लगती थी और सरकारी कर्मचारी के लिए इस से बड़ी दुविधा कोई नहीं थी। उनकी निष्ठा उनकी ईमानदारी पल पल बदलती रहती थी और किस के लिए ईमानदार रहना है उनकी यही समस्या कोई काम करने नहीं देती थी। कर्तव्य के लिए ईमनादार होने पर नौकरी से हाथ धोने का डर देश समाज के लिए ईमानदारी रोज़ बिस्तर बांध तबादले की तलवार लटकी हुई लगती थी और जनता के लिए ईमानदार होना तो नासमझी का सबूत होती थी। ईमानदारी होती है ये शायद कुछ लिखने वालों का ख्वाब था जो उनकी कविता कहानी उपन्यास निबंध आदि में दिखाई देता था और उनकी रचनाओं में आखिर में ईमनदारी जीत जाती थी सच ज़िंदा रहता था और झूठ का मुंह काला होता था। मगर किसी ने भी उनकी रचनाओं को जीवन में अपनाने का काम किया नहीं और गीता कुरान बाइबल गुरुग्रंथ साहिब को सजावट का सामान समझ सुरक्षित रखा गया बंद कमरों में। कुछ खासियत रही होगी जो ईमानदारी का गुणगान सभी करते रहे मगर किसी ने उसे अपने भीतर जगह नहीं दी। ईमानदारी से प्यार किसी भय की तरह किया है सभी ने इसलिए उसका वास्तव में कोई बाकी रहा ही नहीं। बारी बारी सब अपनी बात कहने को आये हैं और समय की कमी को देखते हुए थोड़े शब्दों में सार की बात कहना उचित होगा , कहकर उन्होंने माइक किसी और को थमा दिया है। 
       नेताजी की आंखों में मगरमच्छ के आंसू हैं , गला भरा हुआ है शब्द निकल नहीं रहे लगता है सबसे करीबी रिश्ता उन्हीं का था। हमने बहुत कोशिश की थी ईमानदारी को न सही उसके कुछ अवशेष ही किसी तरह बचाकर रखने की मगर कोई भी विभाग कामयाब नहीं हुआ बचा पाने में। हम आने वाली नस्लों को दिखला सकते थे कि ईमानदारी का अंजाम क्या से क्या हुआ ताकि उनको सबक मिलता। मगर सब जानते हैं ईमानदारी का बंटाधार खुद ईमानदार समझे जाने वालों ने किया है। गैर लोग इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं। अधिकारी की बारी आई तो उनका कहना था कि ईमानदारी हमेशा हर विभाग के हर दफ्तर में दीवार पर टंगे इश्तिहार जैसी रही है जिस पर जहां रिश्वत देना मना है उसी जगह बिना रिश्वत कोई काम नहीं होता है। कोई भी ईमानदार होने की सज़ा भोगना नहीं चाहता अन्यथा सब ईमानदार ही हैं। ईमानदारी के चर्चे सदा होते रहे हैं बस उसको देखना संभव हुआ नहीं है , जिस के ईमानदार होने का शोर हुआ उसी ने सबसे अधिक घोटाले का इतिहास रचा है। भगवा पहने कारोबारी के कहना है कि उसने असली ईमानदारी को सुरक्षित रखा हुआ है और उसके लेबल लगी बेईमानी को कोई भी ईमानदारी समझ महंगे दाम खरीद सकता है। इस तरह तमाम लोग आते रहे और संवेदना व्यक्त करते रहे। 
                      इधर दूर किसी शहर की गरीबों की बस्ती में इक झौपड़ी में इक महिला ने बच्ची को जन्म दिया है। टीवी चैनल का कैमरा उस पर थम गया है बता रहा है कि महिला के साथ दुष्कर्म किया गया था और अपराधी अभी पकड़ा नहीं गया है। टीवी वालों ने उस को ईमानदारी नाम दे दिया है अर्थात ईमानदारी उस लड़की का नाम है जिस के पिता का कोई अता पता नहीं है और जिसकी मां उसको जन्म देते ही मर गई है। ईमानदारी की शोकसभा मातम मनाना छोड़ उसके जन्म पर जश्न मनाने लगी है।

3 comments:

विश्वमोहन उवाच said...

वाह! अत्यंत दमदार और सटीक रचना!!! बधाई और आभार!!!!

Ranjan Kumar said...

शानदार और जबरदस्त लिखा है सर

Unknown said...

बहुत ही सुंदर, सच की अभिव्यक्ति