Wednesday, 2 January 2019

आपकी भलाई की खातिर ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     आपकी भलाई की खातिर ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

    सरकार सरकार होती है घर की हो या चाहे राज्य की अथवा देश की। हम नासमझ लोग क्या जाने क्या अच्छा है बुरा क्या है सही क्या है गलत क्या है। हम तो सच क्या झूठ क्या भी नहीं समझते मगर सरकार बताती है सच क्या है और उसका सच मानना हमारी विवशता है। हमने अपनी पत्नी को पहली रात बोल दिया था तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे और वादा निभाते हैं निभाएंगे जीवन भर। नेता तो नहीं हैं जो चुनाव जीतने के बाद वादे निभाना याद नहीं रखते हैं। मुद्दा ये है कि पति और जनता कहने को मालिक मगर असल में गुलाम जैसे होते हैं। थोड़ा अंतर है कि नेता खुद को पति और जनता को पत्नी मानते हैं मगर सत्ता जनता के हाथ कभी नहीं होती इसलिए देश की जनता मालिक कहलाती ज़रूर है खुद को मालिक समझने की भूल नहीं करती है। मगर घर पर शादी के बाद बीवी शौहर को घर का मालिक बताती है समझती नौकर से भी गया गुज़रा है जिसको वेतन भी नहीं मिलता और काम भी चौबीस घंटे करता है। घर की सरकार का किरदार देश की सरकार से अलहदा होता है क्योंकि उसका रुतबा स्थाई है देश और राज्य की सरकार का पता नहीं कब तक। पांच साल बाद सांस अटकी रहती लाज़मी है और कई बार अचानक बिना तलाक गठबंधन टूट जाता है , कोई कानून इस पर भी बनाया जाना चाहिए। 
            आपको क्या करना है कभी पिता नाम का कोई तानाशाह फरमान जारी करता है और आपको पढ़ना है कि खानदानी धंधा करना है या फिर पिता का जो सपना खुद उनसे पूरा हुआ नहीं उसका बोझ ढोना है। हां ये निर्णय वही बाप करता है मगर आपकी भलाई की खातिर कहकर। आपकी भलाई चुप रहने में है अन्यथा पिटाई का अधिकार पिता को सदियों से मिला हुआ है जिस पर कोई सवाल नहीं उठा सकता है। सरकार भी जनता की भलाई की आड़ में खुद मलाई खाती है और अपने हिस्से में छाछ भी बच जाती है तो देकर उपकार जतलाती है। औरों की भलाई की कमाई करने वाले समाजसेवी धार्मिक एनजीओ वाले खूब मालामाल होते हैं वास्तव में यही सत्ता के वफादार दलाल होते हैं। इनकी भी निराली शान होती है हर सरकार मेहरबान होती है। आपकी भलाई की खातिर स्कूल कॉलेज की पढ़ाई शिक्षक पढ़ाते हैं मगर किस शिक्षा से क्या हासिल नहीं बताते हैं। असली पढ़ाई दुनिया पढ़वाती है जब आपको कदम कदम ठोकर लगाती है आपकी किताबी शिक्षा तब व्यर्थ साबित हो जाती है। आपकी भलाई की बात बहुत देर बाद समझ आती है। 
                        आपको क्या पहनना है क्या खाना है किस दिशा को जाना है क्या दिखाना क्या छुपाना है ये सब कोई दूसरा आपको निर्देश देता है। आपको नासमझ मूर्ख समझ समझाया जाता है रोज़ कोई पाठ पढ़ाया जाता है। आपकी भलाई आपको छोड़ सबको मालूम रहती है , यही इक गंगा है जो नीचे से ऊपर और कभी ऊपर से फिर नीचे को बहती है। बहती गंगा में जो डुबकी लगाता है वही भवसागर पार जाता है हम तो किनारे बैठ गहराई से डरते हैं खुद अपनी भलाई के नाम पर सितम सहकर अपनी भलाई से डरते हैं। सरकार देश जनता की भलाई की खातिर नोटबंदी का ऐलान करती है और घर पर खाने पीने पर पाबंदी का फरमान करती है। इनकार की मोहलत नहीं होती है , कुछ चीज़ों की कीमत नहीं होती है। रोगियों की भलाई करते करते कितने मालामाल हुए हैं योग सिखाते हुए रोग खत्म नहीं हुए चाहे उनको देखो क्या क्या नहीं साबुन तेल रोटी चावल दाल हुए हैं मगर खुद की खातिर नहीं सब आपकी भलाई की खातिर। 
           कोई किसी की भलाई चाहता नहीं है हर कोई अपना भला करना चाहता है मगर किसी न किसी की भलाई की बात कहना चाहता है। बाप पत्नी क्या बच्चे भी आपकी भलाई की बात करते हैं सब लोग अपनी भलाई की बात सुनकर चिंतन किया करते हैं कि मुझी को नहीं पता मेरी भलाई किस बात में है। पंडित जी बांचते हैं भविष्यवाणी सब अपने हाथ में है। हाथ की रेखाओं से हमने मात खाई है अन्यथा हर किसी ने हमेशा की हमारी ही भलाई है। कश्ती अपनी जब भंवर में आई है तब समझे हैं तैरने में है या फिर डूबने में अपनी भलाई है। दोस्ती दोस्तों ने इस तरह निभाई है हर दिन आग दामन को लगाई है फूलों से घबरा कर कांटों से यारी निभाई है और शोलों पर चलने की रस्म निभाई है। उसने कहा है मिटने में अपनी भलाई है हमने भी जान देकर जान बचाई है।  अल्लाह दुहाई है ये कैसी कैसी भलाई है उधर कुंवां है इधर खाई है।

1 comment:

SANJAY Tanha said...

Bahut sahi...👌👍