Tuesday, 20 November 2018

अपने होने का सबूत नहीं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      अपने होने का सबूत नहीं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    हौसला होता तो कभी सामने आता मेरे , बार बार सपने में आकर अपनी बात कहता है। मैं भी लेखक ठहरा सबकी बात लिखता हूं खुद अपनी भूलकर उसकी भी लिखता रहा कितनी बार। रात फिर आ गया तो मैं पहचान नहीं पाया कितने दिन बाद और कितना बदला बदला सा। कैसे यकीन करता यही भगवान है जो फटेहाल चीथड़े पहने और लहू लुहान बदन पर इतने घाव मगर फिर भी कोई आह नहीं कराहना नहीं बस इक ख़ामोशी लिए हुए। परिचय मांगा तो शिकवा करने लगा तुम आते थे मेरे स्थल तब कभी पूछा था मैंने कौन हो क्यों आते हो। मैंने कहा भाई माफ़ी चाहता हूं भूल गया यादास्त कम हो गई है बता दो बुरा नहीं मानो। मैं हूं दुनिया का बनाने वाला दो जहां का रखवाला सबका मालिक भगवान। मुझे यकीन नहीं आया देख का कहने लगा बदहाल हूं शायद तभी नहीं पहचान रहे हो चलो अपनी पुरानी तस्वीर दिखलाता हूं। और फिर पल भर में भगवान के कितने स्वरूप बदल बदल सामने आता रहा। हर धर्म के हर देवता पयंबर ईश्वर की तरह मगर मुझे फिर भी लगा कि इधर ठग लोग भेस बदलते रहते हैं कैसे यकीन करूं यही असली है। मैंने बताया देखो हमेशा भरोसा करता रहा भगवान है कोई ऊपर वाला मगर लाख कोशिश की मनाने की माना नहीं मुझसे तो जाना छोड़ दिया बाकी सब दिखावे के रिश्ते नातों की तरह। नहीं निभाए जाते झूठे रिश्ते अब और मुझसे। कहने लगा हम कितनी बार बहस करते रहे हैं और बहस करना फज़ूल है चलो तुम खुद बताओ किसे कैसे भगवान मान सकोगे कोई उद्दारहण तो दो। मैंने उसको बताया मुझे मिले हैं जीवन में तमाम लोग जिनसे मेरा कोई नाता रिश्ता संबंध नहीं था फिर भी उन्होंने मुझे वो सब दिया बिना मांगे ही जो तुमसे मांगने पर भी मिलता नहीं किसी को भी। और उन कुछ लोगों की वास्तविक कहानी उसको बताई मैंने।
       बात 1974 की है 44 साल बाद भी याद है। डॉक्टर बनकर अपनी क्लिनिक शुरू की उस शहर में मगर दूर के नाते पहचान वाले दो तीन लोग महीना भर भी नहीं लगा दूर होते। अकेला इक घर किराये पर लिया मगर नाम को चार बर्तन लाया था घर से और खाना बनाना आता नहीं था। तब उस शहर में एक ढाबा था जो इतनी दूर था कि खाना खाने जाओ तो वापस आते आते भूख लगने लगती। ऊपर से अजनबी लोग कोई बात करने को नहीं। कुछ दिन बेहद कठिनाई से बिताए जो लिखना संभव नहीं है। मगर साथ ही मकान मालिक का घर था और मकाम मालकिन ने इक बज़ुर्ग महिला को रखवा दिया जो घर की सफाई कपड़े धोना और खाना बनाकर रख जाना सब काम करती नाम को ही वेतन था 35 रूपये महीना। मगर मैं क्लिनिक चला जाता नाश्ता कर और वो माताजी बाकी सब काम कर चाबी मकान मालकिन को देकर चली जाती। कभी उनके आने से पहले मैं क्लिनिक चला गया होता और ध्यान नहीं होता कि घर की चाबी मकान मालकिन को देकर जाऊं तब वो माताजी छत से ही मकाम मालिक के घर से मेरे घर आती और सब काम करती चली जाती थी। इतना ही नहीं वो इतना ध्यान रखती थी कि मुझे जितना खाना है उतना बनाती और अक्सर रसोई का सामान भी खत्म होने पर गली की दुकान से उधार ले आती ताकि मैं भूखा नहीं रहूं। शायद अपनी मां की तरह से ही ध्यान रखा उन्होंने मेरा कई महीने तक। उस शहर की कड़वी यादें बहुत हैं मगर एक उनकी याद है जो आज भी मन भर आता है। मगर अफ़सोस है कि फिर कभी उस शहर जाना नहीं हुआ और मिल नहीं सका।
       बहुत लोग हैं जिन्होंने मुझे या फिर मुझ जैसे अन्य कितनों के जीवन को संवारने को अपना योगदान दिया। हो सकता है आपको पहली नज़र में ये छोटी सी बात लगे मगर मैं सोचता हूं अगर उन्होंने जो किया वो नहीं करते तो मैं और मुझ जैसे तमाम लोग शायद बहुत चीज़ों से वंचित भी रह सकते थे। आज शुरआत करता हूं गांव के उन मास्टरजी की याद से। मेरा गांव शहर से 15 किलोमीटर दूर था और सड़क से पांच किलोमीटर पैदल चलना होता था। तब कोई अध्यापक गांव आकर सरकारी स्कूल में अध्यापक बन कर शिक्षा देने को मुश्किल से ही तैयार होता था और जिस को सरकार भेजती वो भी गांव में कच्चे मकान में रहने की जगह शहर में रहना चाहते थे। मगर उन्होंने एक अकेले ही पांचवी तक की क्लास तक सभी को शिक्षा देने का कार्य शुरू किया जब तक बाकी अध्यापक नहीं आये। इतना ही नहीं स्कूल के समय के बाद घर पर भी बच्चों को पढ़ाया करते थे ताकि अच्छे नतीजे मिल सकें। उन दिनों कोई ट्यूशन फीस की बात नहीं होती थी। आज सोचता हूं कि हम जितने लोग उनसे पढ़कर डॉक्टर इंजीनीर या बैंक अधिकारी अथवा अन्य बड़े पद पर पहुंचे हैं उनके योगदान को शायद कभी याद भी नहीं किया होगा जबकि हमें हमेशा उनका आभारी होना चाहिए।
     डाकिया था गांव का सबको जनता था पहचानता भी था और सब भरोसा भी करते थे उस पर। चिट्ठियां बांटना लिख भी देना पढ़ कर सुनाना और बदले में हाथ जोड़ नमस्कार करना कुछ भी नहीं लेना न मांगना। घर का सदस्य लगता था जो कभी कभी खुद कह देता माता जी थक गया चाय पीनी है और चाय मिल जाती थी। चौकीदार था एक जो रात भर जागते रहो की आवाज़ लगाता और लोग चैन से सोते थे। उसको हर दिन थोड़ा आटा  मिलता था घर घर जाता कोई काम कहते तो कर देता और सबकी खबर देता लेता भी जैसे कोई हमदर्द हो। उसकी पत्नी हर किसी के बुलाने पर चली आती और सुख दुःख में घर पर महमान आये हों या कोई बीमार हो सब काम करने में सहयोग देती थी। एक तिरखान था जो किसानों ज़मीन वालों के हल कस्सी आदि बनाता था बदले में अनाज मिलता था मगर वो भला आदमी उन बच्चों को भी गिल्ली डंडा खिलौने बना कर देता जिनके घर से उसे कुछ भी मिलता नहीं था। ऐसे लोग हर जगह मिलते रहे जो खुद को महान नहीं समझते थे मगर वास्तव में अच्छे थे और अच्छाई ज़िंदा है इसका सबूत थे। उनकी तरह तेरे होने का कोई सबूत मुझे कभी दिखाई नहीं दिया। सपना खत्म नहीं हुआ मगर नींद खुल गई थी।
         सुबह सुबह बाहर से आवाज़ आ रही है जागते ही धन्यवाद करो भगवान का कि अभी भी ज़िंदा हो। मुझे इसका मतलब नहीं समझ आया तो क्या ये अनहोनी है। क्या मुझे ज़िंदा होना नहीं चाहिए था वास्तव में हालात कुछ जीने लायक हैं तो नहीं। क्यों ज़िंदा हैं सोचते हैं तो जवाब यही मिलता है क्योंकि मरे नहीं अभी। अगर यही जीना है तो जीकर क्या होगा। हर सुबह अपने वजूद को ढूंढना हर बार निराशा को भुलाकर आशा जगाने की नई कोशिश करना। किसी शहर की पहचान थी कि उस के हर चौराहे पर लिखा रहता था मुस्कुराइए कि आप इस शहर में हैं। लोग मिलते हैं तो लगता है बेवजह मुस्कुराने की कोशिश करते हैं। कोई वजह हंसने की रोने की जश्न मनाने की होनी चाहिए अकारण कुछ करना तो पागलों की सी बात है। मगर अब सरकार करोड़ों रूपये इसी पर खर्च करती है फील गुड फैक्टर इसी कहते हैं गंदगी के ढेर पर स्वच्छ भारत अभियान का विज्ञापन। सदिओं से यही परंपरा चली आई है सीता रुपी जनता सोने का हिरण मांगती है पति सरकार की तरह उसको जंगल में भाई पर सुरक्षा करने का कार्य सौंप हिरण तलाश करने चले जाते हैं सत्ता का। छोटा भाई  सीता माता को अकेली जंगल में छोड़ भाई के पीछे चले जाते हैं मगर सरकारी नियम कानून की तरह इक रेखा बना जाते हैं कि उसमें कैद रहते कोई डर नहीं है मगर जनता रुपी सीता उस रेखा से बाहर निकलती है और रावण उसको उठा ले जाता है। आज भी अपहरण करने वाले रेखा से बाहर निकलने की टोह रखते हैं। अपराधी अपराध करने से पहले विचार करते हैं रेखा को हमने नहीं लांघना है। नेता जी यही ब्यान दे रहे हैं कि अधिकतर बलात्कार बलात्कार नहीं होते हैं आज सीता जी होती तो दोष उन पर लगता रेखा से बाहर आई किसलिए। साधु भेस में रावण हैं क्या अभी समझ नहीं आया और सरकार को ऐसे रावणों की कितनी चिंता है वोट पाने को उनकी शरण जाते हैं। मगर सत्ता का आत्मविश्वास फिर भी कायम है जो दावा करते हैं हम लाख बुरे सही और राज्य को कितना बदहाल किया हो तब भी हर गली हर सड़क पर इश्तिहार बताते हैं कि जो भी वास्तविकता है वो सच नहीं है और हमारा झूठ ही सच्चाई है।
     धर्म की बात और भगवान की राजनीति करने वालों के युग में भगवान की दुर्दशा सपने में देख कर मन घबरा रहा है। भगवान की सहायता ऐसे में कौन कर सकता है। भगवान का कोई बस सरकार पर नहीं है खुद भगवान इक कठपुतली बन चुके हैं और कठपुतली करे भी तो क्या नाचना तो पड़ेगा धागे किसी और के हाथ में जो हैं। पिछली सरकार कहते थे कोई कठपुतली बन कर चला रहा है अब मामला और अजीब है भगवान भी कठपुतली बन गये हैं और बेबस हैं। मगर उनके पर कोई सबूत भी नहीं आधार कार्ड की तरह।


No comments: