Wednesday, 10 October 2018

उस एक दिन का असर ( जेपी की बात ) डॉ लोक सेतिया

    उस एक दिन का असर ( जेपी की बात ) डॉ लोक सेतिया 

     हर साल 11 अक्टूबर को मुझे अजीब ही नहीं खराब भी लगता था जब तमाम मीडिया टीवी चैनल वाले अख़बार वाले लोकनायक जय प्रकाश नारायण के जन्म दिन उनको भुलाकर इक फ़िल्मी नायक को महान नायक के संबोधन से सम्मानित कर रहे होते हैं। मगर अब बिल्कुल साफ़ है इन सभी लोगों का भगवान पैसा है और इनका मकसद कारोबारी है देश या समाज को लेकर नहीं है। कल भी यही होगा जनता हूं। मैं आज जो भी जैसा भी हूं शायद नहीं होता अगर उस विशेष दिन मैं उनकी सभा में शामिल नहीं हुआ होता। 25 जून 1975 की वो शाम मेरे जीवन में बेहद महत्वपूर्ण है इतनी अहमियत कि मैं खुद को खुशनसीब समझता हूं उस दिन की गवाही बनने के कारण। उस दिन नहीं मालूम था ये दिन इतिहास में दर्ज होगा और सदियों तक याद किया जायेगा। मगर शायद ऐसा भी कोई कल्पना नहीं कर सकता था कि तब जेपी के संपूर्ण क्रांति अंदोलन में शामिल लोग भी कभी सत्ता में होंगे और फिर लोकतंत्र पर खतरा मंडराता लगेगा। दुष्यंत कुमार को तब अंधेरी कोठरी में इक रौशनदान की तरह कोई बूढ़ा आदमी दिखाई तो देता था आज वो भी नहीं है। 
    आपात्काल की बात अक्सर होती है मगर शायद ही कोई बताता है कि जेपी जी के भाषण को आड़ बनाकर आपत्काल घोषित किस लिए किया गया था। उन शब्दों को दोहराना ज़रूरी है और ये भी कि आज भी कोई उन शब्दों को उपयोग करेगा तो सत्ता को उसी तरह से असहनीय होगा। चलो आपको उन शब्दों की याद दिलाते हैं।  उन्होंने कहा था :-

संविधान सभी को शांति पूर्वक विरोध प्रदर्शन का अधिकार देता है , इसलिए मुझे सुरक्षा बलों से कहना है (जेपी जी का )कि अगर कोई आपको शांतिपूर्वक विरोध करने वालों पर बलप्रयोग करने का आदेश दे तो अपने विवेक का इस्तेमाल कर देश के संविधान की भावना को समझ ऐसा मत करना। 

    क्या आज की सरकार भी इसको अनुचित मानती है। वास्तविकता और भी चिंताजनक है। विरोध की बात क्या अब नेताओं की सभा में काले रंग के कपड़े पहन कर जाने पर रोकते हैं पुलिस वाले। उनको इस से कोई मतलब नहीं है कि ऐसा करना देश के संविधान के खिलाफ है। आप अधिकारी हो या कर्मचारी सरकारी किसी भी विभाग में आपकी निष्ठा देश के लिए होनी चाहिए न कि सत्ताधारी दल या नेता के लिए। आजकल तो आला अधिकारी ये भी भूल गए हैं कि मंत्री विधायक सांसद सरकारी कामकाज में उचित दखल दे सकते हैं अनुचित नहीं , और सत्ताधारी दल के नेता का सरकार सरकारी कामकाज या किसी अधिकारी पर कोई आदेश देने का अधिकार नहीं है। जो लोग सत्ताधारी नेताओं की चाटुकारिता करते हैं वास्तव में खुद अपना और अपने ओहदे का अपमान करते हैं। उस दिन मेरी आयु 24 साल थी आज उसके 43 साल बाद मैं 67 साल का हूं मगर उस दिन जेपी जी की हर बात मेरे भीतर कुछ इस तरह बैठ गई थी जो कभी बिसरी नहीं मुझे। मुझे नहीं मालूम कोई और उन जैसा सार्वजनिक जीवन में ऊंचे आदर्श के मूल्यों पर चलने वाला दूसरा हुआ हो जिसने कितनी बार कितने बड़े बड़े पदों पर चुने जाने या स्थापित किये जाने अथवा मनोनीत किये जाने से साफ इनकार किया हो। बड़े से बड़े पद को ठुकरा कर जनता के बीच जनता की बात करने वाला गांधीवादी कोई और नहीं हुआ है। उनके भरोसे पर 500 डाकू हथियार डाल देते हैं , छात्र देश सेवा और भ्र्ष्टाचार के खिलाफ पढ़ाई छोड़ सड़कों पर निकल पड़ते हैं। मैं इक युवा डॉक्टर अपनी क्लिनिक बंद कर उनका भाषण सुनने बीस किलोमीटर दूर चला जाता है और इक दोस्त अपनी फैक्ट्री बंद कर साथ साथ बस से जाते है और बस को कई किलोमीटर पहले रोकने पर पैदल जाते हैं मगर ऊर्जा के साथ लौटते हैं। ऊर्जा उनके शब्दों से मिली हुई अभी भी कायम है। उस दिन उस सभा में नहीं गया होता तो मैं जो आज हूं नहीं होता। 

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