Tuesday, 9 October 2018

हर कानून से खिलवाड़ , कानून को रहे लताड़ - डॉ लोक सेतिया

   हर कानून से खिलवाड़ , कानून को रहे लताड़ - डॉ लोक सेतिया 

   पहले थोड़ा इनकी पहचान समझना ज़रूरी है। ये अलग अलग हैं जब आपस में मतलब नहीं मिलता तो एक दूसरे को बुरा बताते हैं। जब अवसर आये तब सर्वदल सहमति की तरह एक भी हो जाते हैं। इक इक की वास्तविकता दिखलाते हैं। उनका धंधा है सरकारी विभाग और कर चोरों का समझौता करवाते हैं ईमानदारी से रिश्वत का बराबर हिस्सा पाते हैं। इस बात को छोड़ो क्या कहलाते हैं दलाली करते हैं मगर दलाल नहीं समझे जाते हैं। किसी अनुचित निर्मित इमारत को सस्ते में खरीद कर मिलकर वैध कवराते हैं मगर उसके बाद असलियत पर आते हैं। जिस नक्शे पर विभाग से अनुमति मिली उसे कागज़ों पर समझाते हैं और अपनी मर्ज़ी से कानून को ताक पर रखकर निडरता से कुछ और बनाते हैं। कोई अधिकारी रिश्वत से नहीं मानता तो कई हथकंडे अपनाते हैं अपने होटल में अय्याशी मिलकर करते कराते हैं। हर काम को अपनी जगह किराये पर उठाते हैं लोगों की जान जोखिम में रखकर आग का खेल रचाते हैं। क्या नहीं कर सकते सब कर जाते हैं। विभाग को ठेंगा दिखलाते हैं। विभाग के सरकारी प्लॉट्स पर कब्ज़ा जमाते हैं चोरी करते सीनाज़ोरी दिखाते हैं। मगर धर्म कर्म वाले हैं धर्मध्वजा फहराते हैं। अब इक और से मिलवाते हैं , जो नहीं कल्पना की हमने वो कर दिखलाते हैं। पेड़ लगाने की बात समझाते हैं मगर पेड़ को काटने की इजाज़त नहीं हो तो नई राह खोज लाते हैं। किसी पेड़ की खाल तने से एक फुट गोलाई में छिलवाते हैं , पेड़ की डालियों पत्तों को भोजन नहीं जाता और पेड़ सूख जाते हैं। उसके बाद सूखे पेड़ को कटवाते हैं रास्ता बनाते हैं। नहीं ये अकेला नहीं कितने ढंग उनको आते हैं , ऊंचे पेड़ पर ऊपर से ऐसी दवा छिड़कवाते हैं कि पेड़ खुद ब खुद मर जाते हैं। मेरे शहर में ऐसे रईस बहुत हैं जो अपने साथ लगती गली को कब्ज़ा कर अपना बनाते हैं विभाग वाले उनके घर आते जाते हैं तभी नहीं घबराते हैं। नेता लोग हमेशा खाली सरकारी ज़मीन पर पार्क पर कब्ज़ा जमाते हैं दुकानें मकान जो मर्ज़ी बनाते हैं और किसी दिन कानून बदलवा मलकियत पा जाते हैं। दल की बनते लोग अपनी साहूलियत के कानून बनाते हैं और कुछ साल पटे पर रखने वाले मालिक बन जाते हैं। कई हैं किस किस की बात की जाये करोड़पति हैं चोरी की बिजली से कारखाने चलाते हैं। कुंडी चोर नहीं हैं धरती के भीतर से केबल डलवाते हैं मिल बांट खाते हैं। ऐसे सभी लोग कानून को रंडी समझते हैं उसको तार तार करते जाते हैं। किसी अधिकारी को अपना काम करने देने में अड़ंगे लगाते हैं। खुद नियम नहीं पालन करने वाले कानून की किताब लेकर आते हैं , सच ये है इक बात नहीं समझते हैं। आपके सभी के लिबास कागज़ के हैं और सरकारी विभाग वालों के पास आग के अंबार फाइलों में बंद हैं , चुप रहने वाले खैर मनाते हैं। हम तो इक बात याद दिलवाते हैं जिनके घर शीशे के होते हैं वो भूले से भी किसी पर पत्थर नहीं उठाते हैं। महल शीशे वाले बच नहीं पाते हैं।

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