Sunday, 14 October 2018

हर जान की कीमत जानते हैं ( बेसुरी तान ) डॉ लोक सेतिया

   हर जान की कीमत जानते हैं ( बेसुरी तान ) डॉ लोक सेतिया 

     मुझे आज रात भर नींद नहीं आई , खुद को गुनहगार समझता रहा। जाने उनको कैसे आती होगी नींद जो बेवजह किसी की जान ले लेते हैं। पत्नी ने मना किया है मत लिखना इस विषय पर फिर भी लिख रहा हूं। क्या इसे पानी में रहते मगर से बैर कहते हैं। जो लोग सरकारी विज्ञापन से अपनी ज़ुबान पर ताले लगा लेते हैं शायद समझदार होते हैं। कुछ लोग जो ज़्यादा जानते हैं , इंसान को कम पहचानते हैं , ये पूरब है पूरब वाले हर जान की कीमत जानते हैं। जहां दिल में सफाई रहती है होठों पे सच्चाई रहती है , हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है। ग़ालिब को भी नींद नहीं आती थी , मौत का एक दिन मुअयन है नींद क्यों रात भर नहीं आती , कहते हैं। मुझे तो मौत से डर नहीं लगता है मकतल खुद ही चला जाता हूं , डरता हूं तो रहबरों से। हुआ यूं कि पत्नी ने बताया पूरब की ही बात है उत्तर प्रदेश के सीएम उस महिला के घर गए शोकसभा पर और कई लाख और नौकरी देने की बात कह आये उसकी पत्नी को जिसके पति को सरेराह कोई पुलिस वाला मिल गया था और गोली मार दी थी। हुई होगी शायद इंसाफ की भी बात वहां पर मगर मेरी पत्नी को उस महिला की चिंता थी चलो अच्छा हुआ बेचारी का जीना आसान हो गया। मैंने यूं ही सोचा और कहा भी कि क्या अभी कल ही जिस जज की पत्नी और का कत्ल और बेटे को गोली मार घायल किया उसी जज की सुरक्षा को नियुक्त पुलिस वाले ने क्या उस पति को भी इसी तरह पत्नी की मौत का मुआवज़ा पाकर संतुष्ट किया जा सकता है। पत्नी को गुस्सा आया आप पुरुषों को किसी महिला की भलाई भाती ही नहीं। रात भर लगता रहा मैं ही गुनहगार हूं जिस सरकार और उसकी पुलिस एनकउंटर करती कराती है बड़ी दयालु हैं। जाँनिसार अख्तर का शेर याद आया है। 

      जब मिले ज़ख्म तो क़ातिल को दुआ दी जाये , है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाये। 

      हमने इंसानों के दुःख दर्द का हल ढूंढ लिया , क्या बुरा है जो ये अफवाह उड़ा दी जाये। 

    ये किसी के ज़ख्मों पर मरहम लगाना है जो तमाम जीवन याद रहेगा कि किस के कारण क्या मिला था। बात जिस देश में गंगा बहती है के गीत की थी। गंगा की हालत यही है कि सरकार गंगा का बेटा खुद को बताने वाला चला रहा है और करोड़ों रूपये खर्च करने के बाद गंगा और गंदी हो गई है और कोई नासमझ गंगा की सफाई की खातिर अनशन पर बैठा रहा मगर सरकार पर कोई असर नहीं हुआ और 111 दिन बाद निधन हो गया। शायद उस 85 साल के देवता की भी कीमत सरकार आंक सकती है। कोई नेता जाकर भाषण देकर उनके सपनों को सच करने की घोषणा कर सकता है।  बस 2022 नहीं तो 2050 तक तारीख़ बढ़ती जाएगी गंगा बहती जाएगी। 
       ये खबर आजकल खबर बनती ही नहीं कि कहां कहां पुलिस ने किसे क्या समझ कर मार डाला। लोग अपनी रंजिश निकालने को पुलिस से सहायता लेते हैं , नेता अधिकारी तो अधिकार समझते हैं अपने दुश्मन क्या विपक्षी को भी सबक सिखाने को। सीबीआई का मकसद यही हो गया है , किसी को नकेल डालनी हो तो जांच के नाम पर पर्दे के पीछे सब होता है। ये जाने कब से होता आया मगर हंगामा हुआ था 1984 में जब इंदिरा गांधी को उनके सुरक्षा करने वालों ने कत्ल कर दिया था। उनके बेटे को मुआवज़ा बिना मांगे मिल गया था गद्दी पर बिठाया था किसी ने उपकार का बदला चुकाने को। जाने कितने बेकसूर लोगों को दंगों की आग में जलाया गया और समझाया गया जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है। हम आम लोग तो पेड़ पौधे क्या घास भी नहीं हैं कीड़े मकोड़े की तरह हैं जो मसले जाते हैं कुचले जाते हैं। अभी तक किसी ने भी वास्तविक समस्या पर गहराई से चिंतन ही नहीं किया , जब बचाने वाला मारता है तो ऊपर वाला भी नहीं बचा सकता है। हमने जिनको देश के नागरिकों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सौंपी है जब वही खतरा बन जाएंगे तो कौन किसे बचाएगा। मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है क्या मेरे हक में फैसला देगा। आम नागरिक पर कब कौन सी धारा लगा दी जाये उनकी मर्ज़ी है हम तो धारा  144 से ही डर जाते हैं। जो धारा 144 लगी होने पर भी पंचकूला पहुंच जाते हैं उन पर अदालती बयानबाज़ी भी किसी काम नहीं आती। जान की कीमत नहीं लगाई जा सकती मगर लगाते हैं सत्ता वाले भी और बाकी लोग भी जब पचास लाख करोड़ की बात होती है। आम नागरिक का जीना मरना एक समान है। किसी शायर को तो लगता है कि  " हाथ खाली हैं तेरे शहर से जाते जाते , जान होती तो मेरी जान लुटाते जाते "। हम ज़िंदा कब हैं जो हमें मरोगे। राख के साथ बिखर जाऊंगा मैं दुनिया में तुम जहां खाओगे ठोकर वहीं पाओगे मुझे। आह भरना भी गुनाह है आखिर में :-

       हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम , वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।


No comments: