Tuesday, 2 October 2018

भुला कर तुम्हें हम याद करते हैं ( जयंती ) डॉ लोक सेतिया

  भुला कर तुम्हें हम याद करते हैं ( जयंती ) डॉ लोक सेतिया 

              तेरे नाम को बर्बाद करते हैं , भुला कर तुम्हें हम याद करते हैं। 

    शेर लगता है किसी आशिक़ का कहा हुआ है , नाकाम मुहब्बत की बात है।  मगर दरअसल ये राजनीति की बात है। गांधी जी लालबहादुर जी अभी भी नेताओं को मतलब को याद आते हैं। किसी को मौत भी मार सकती मगर उनके विचारों की अर्थी निकालने वाले जो नहीं कर गुज़रें वही कम है। अगर वास्तव में आत्मा होती है और देखती है अपनी समाधि पर आने वालों को तो गांधी जी को मेरी ग़ज़ल का ये शेर ज़रूर याद आता होगा शायद कहीं पढ़ा सुना हो आत्मा ने ही।  पेश है :-

तू कहीं मेरा ही क़ातिल तो नहीं , मेरी अर्थी को उठाने वाले। 

देशसेवा का लगाए तमगा , फिरते हैं देश को खाने वाले। 

   महात्मा गांधी की अहिंसा और लालबहादुर की जय जवान जय किसान की बात , दोनों आज कहीं छिपती फिरती हैं। कहां गांधी विदेशी सत्ता के खिलाफ सवदेशी अंदोलन चलाते थे और कहां आजकल बुत भी विदेश से बनवाने वाले किसानों को दिल्ली आने की इजाज़त नहीं देने वाले। उनकी राह चलना आता नहीं मगर फूल चढ़ाकर समझते हैं अनुयाई बन गये हैं। सत्य के साथ प्रयोग करने वाले और झूठ की माला जपने वाले क्या कभी साथ हो सकते हैं। गांधी के नाम पर जो भी किया जाता रहा या किया जा रहा है उसकी नाकामी क्या ये नहीं जतलाती है कि सरकारों को उन महान लोगों के नाम की लाज तक रखनी नहीं आती है। साल बाद एक दिन स्वच्छ भारत अभियान का दिखावा करना उनकी आत्मा के साथ मज़ाक नहीं है। कहां उनकी सादगी और ईमानदारी की मिसाल और कहां आजकल के नेताओं का अपने पर करोड़ों रूपये बर्बाद करना। उनकी रूह तो हर दिन तड़पती होगी ये सब देखकर। आखिरी आदमी के आंसू पौंछने की बात का अर्थ नहीं जानते हैं जो गांधी गांधी कहते हुए लगता है अट्टहास करते हैं। हे राम !!



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