Friday, 19 October 2018

क्या सच लिखने वाले नहीं थे ( सवालिया निशान ) डॉ लोक सेतिया

  क्या सच लिखने वाले नहीं थे ( सवालिया निशान ) डॉ लोक सेतिया 

       ये मामला अजीब लगता है दुनिया काली और सफ़ेद दो रंगों की नहीं हो सकती। मगर जितने भी महान समझे जाने वाले ग्रंथ हैं उन को पढ़कर लगता है ऐसा थी दुनिया। जो अच्छे थे बहुत अच्छे थे और जो बुरे थे बहुत खराब थे। इतना ही नहीं बुरे खलनायक को भी समझाने वाले अच्छे लोग थे मगर उसको बुराई अच्छी लगती थी मरना मंज़ूर था अच्छा होना नहीं। दार्शनिक बताते हैं ये वास्तविकता हो नहीं सकती है , असली दुनिया में न कोई फरिश्ता बनकर जी सकता है न ही शैतान होकर जीना चाहता है। फिर लिखने वालों ने ऐसा क्यों किया , जो जीता जंग उसको नायक और जिसकी हार हुई उसको खलनायक बना दिया। झगड़ा ईनाम वज़ीफ़े का रहा होगा , किसी को खुश करने को भगवान कहना पड़ा। आज भी कितने लोग हैं जो अपने स्वार्थ को किसी को भगवान घोषित करते हैं , उसकी कोई कमी कोई बुराई उनको दिखाई दे ही नहीं सकती। जाने किसकी खुराफ़ाती दिमाग़ की उपज है जो मसीहा देवी देवता पय्यमबर होने का भी प्रमाण बना दिया कि असंभव को संभव कर दिखाना। जिस किसी ने अंधविश्वास के खिलाफ बात की उसी को सूली चढ़ा दिया ज़हर पिला दिया या समाज से बाहर निकाल दिया। ऐसे ऐसे कारनामे करने का दावा किया गया जो आधुनिक विज्ञान लाख जतन कर आज भी नहीं कर सकता। चलो मान लिया उनकी काबलियत इनसे बढ़कर रही होगी तो उन सभी ने तो सबकी भलाई को किया था जो भी कर सकते थे फिर अपनी किसी भी खोज को सभी की भलाई को बाकी लोगों को बताते ताकि दुनिया को बांटते अपने ज्ञान की दौलत। मगर जब वास्तविकता नहीं केवल कल्पना से बात बनाई हो किसी को मसीहा या खुदा या पय्यमबर बनाने को तो ये तो झूठ की बुनियाद पर महल खड़ा करना हुआ। मगर कोई सवाल भी नहीं करे इसके लिए आस्था की ऊंची ऊंची दीवारें बना दी गईं। सवाल करना अपराध है नास्तिकता है। सांच को आंच नहीं तो सच को छुपाने बचाने का कोई तर्क नहीं है। सच को तो खुद सामने आकर साबित करना चाहिए , झूठ को छिपाना पड़ता है लाख पर्दों के पीछे।
      कई लोग चाहते हैं ईश्वर भगवान खुदा जो भी है सामने आकर दर्शन दे। मुंबई से इक अख़बार निकलता है जिसका नाम ही है। " भगवान सामने आकर दिखाई दो "। आपको सनक लग सकती है उनको आस्था लगती है। मगर सोचो अगर जो भी कोई है जिसने दुनिया बनाई है सामने आकर कहे तो कितने लोग कितने सवाल खड़े करेंगे उससे सबूत मांगेंगे। उसको क्या पड़ी है खुद के होने का प्रमाण उनसे पाने की जिनका खुद होना नहीं होना कब तलक है उनको नहीं मालूम। शायद तभी वो सामने नहीं आया न कभी आना चाहेगा। लोग हर किसी पर शक करते हैं उसे भी इतना तो पता है फिर जिसे भरोसा नहीं उसे भरोसा करवाना किसलिए। मानो चाहे नहीं मानो उसको क्या। मदिर मस्जिद गिरजाघर बना लिए और गुरूद्वारे भी मगर उन में ईश्वर है भी कि  नहीं कोई नहीं जानता , सोचना मना है क्योंकि सोचोगे तो समझ आएगा कि अगर है तो उसी के घर में वो सब कैसे हो रहा है जो कभी नहीं होना चाहिए। धर्म और भगवान सबसे बड़ा कारोबार बना लिया गया है , कोई नुकसान नहीं है मुनाफा खूब है। ये सब कहते हैं वो एक ही है फिर कितनी दुकानें कितने नाम और सब एक दूसरे से मुकाबला करते हुए क्यों हैं। ईश्वर हो भी तो कितना बेबस होगा कि कैसे किस किस को समझाए। जिनको तलाश करनी थी उन्होंने चिंतन किया भटकते रहे दुनिया भर में मगर पाने का दावा नहीं किया। जो कुछ भी नहीं कर सकते थे उन्होंने हमेशा अपने आस पास किसी को ईश्वर का रुतबा देने की बात कहकर खुद अपने को महाज्ञानी महात्मा घोषित करवा लिया। उपदेश दिया सबको बांटने का मगर खुद अपने पास संचय करते रहे , पर उपदेश कुशल बहुतेरे। औरों को नसीहत खुद पालन नहीं और हम उनकी हर बात को तब भी सही समझते हैं तो आंखे होते हुए भी अंधे हैं। उदारहण नहीं दिये क्या क्या लिखा हुआ किस किस किताब में जो वास्तविकता हो नहीं सकता केवल कल्पना है। इक सपना है जो ठगी करने वालों ने दिखाया अपने धंधे की खातिर। धरती पर सभी इंसान हैं फ़रिश्ते ज़मीं पर नहीं आते ये केवल ख्वाब है। लोग ख्वाब भी बेचने लगे हैं आजकल। दुष्यंत कुमार का शेर भी अब लगता है अर्थ खो तो नहीं रहा कभी।

                                 खुदा नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही ,

                                 कोई हसीं नज़ारा तो है नज़र के लिए।


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