Thursday, 12 April 2018

आओ यारो रल मिल गलां करिये - डॉ लोक सेतिया

     आओ यारो रल मिल गलां करिये - डॉ लोक सेतिया

पहली गल कि सारी गलती मेरी नहीं , जे कर मेरी वी ए की मैं तेरी नहीं। 

ओ कहंदा ए प्यार ते जंग विच जायज़ है सब , मैं केहनीं हां ओहो हेरा फेरी नहीं। 

कितना डर दा धोखा जांदा नींदर नू , तू की जांणे तेरे घर ज्यूं बेरी नहीं।

मेरी मन्न ते अपणे अपणे राह पईए , की केहनां ऐं जिंनी रही वधेरी नहीं। 

     कल किसी ने पंजाबी की ये रचना भेजी विडिओ में , मुझे अच्छी भी लगी और शिक्षाप्रद भी। शायद आपको मुहब्बत इश्क़ की बात लगेगी , मगर नहीं मुझे ये चार शेर ज़िंदगी के हर मुकाम में सही सबक लगे। चलो देश की घर की दोस्ती की रिश्तों की सभी की बात करते हैं इसी को लेकर। आपको क्या लगता है देश की सब से बड़ी समस्या गरीबी भूख बेरोज़गारी आपसी टकराव है। नहीं ये सब ठीक होना संभव है अगर जिनको ये सब करना हैं वो ईमानदारी से करना चाहें। जब सरकारी प्रशासन अपने काम अपने आप करता है तो गलत होने की संभावना रहती ही नहीं। बेशक सत्तर साल में सरकार किसी दल किसी नेता की रही हो अगर कार्यपालिका ने अपना फ़र्ज़ निभाया होता तो देश की समस्याएं हल हो गई होती। आप नेताओं की गलतियां समझते हो जो वास्तविकता भी है मगर शायद आपने विचार किया ही नहीं कि कोई भी नेता बिना अधिकारीयों के कुछ भी नहीं कर सकता , वो चाहे विकास हो या फिर घोटाले। ये हैरानी की बात हो सकती है मगर सच है विदेशी राज में यही अधिकारी सरकारी अमला ईमानदारी से काम किया करता था , क्यों देश की आज़ादी के बाद वही लोग ईमानदार नहीं रहे और कभी नौकर और गुलाम बन कर काम करने वाले आज़ादी का अधिकार मिलते ही खुद को शासक और मालिक समझने लगे। यहां फिर वही पहली बात कि सारी गलती उनकी भी नहीं , हम लोग ही उनको सलाम करने और जनाब हज़ूर साहब कहने लगे। उनको लगा कल तक विदेशी लोगों के गुलाम थे अब हमारे हैं। सब से पहला काम हमने उनसे अपने कर्तव्य निभाने की बात करनी थी और जो सही नहीं किया उसका हिसाब मांगना था , लेकिन हमारी मानसिकता गुलामी की रही और अपने अधिकार नहीं खैरात मांगते रहे। 
                 अब नेताओं की बात तो उन्होंने सत्ता हासिल करने को हर हथकंडा अपनाना सही मान लिया और हमने कभी उनसे नहीं सवाल किया कि लोकशाही में लोकलाज की उपेक्षा करने की हेरा फेरी नहीं। वो हमें अपने स्वार्थ में बांटते रहे और हम उनकी चाल में फंसते रहे। आज भी वही लोग जो आज़ादी के समय देश के विभाजन के विरोध की बात करते हैं आज भी , वास्तव में देश को धर्म के नाम पर और तमाम तरह की भेदभाव की दीवारें खड़ी कर बांटना चाहते हैं। जिनकी निष्ठा देश की जनता तो क्या अपने दल के लिए भी नहीं और अभी भी उस संगठन के लिए वफादारी निभाते हैं जो सामने आकर राजनीति नहीं करती और पीछे से कठपुतलियां नचवाती है। देशभक्ति केवल भाषण नहीं होते हैं , जब आप सत्ता में आसीन हैं तो आपको सभी देशवासिओं को एक समान न्याय दिलवाना चाहिए जिसकी शपथ ली थी आपने संविधान के अनुसार। खेद है सभी नेता वही पाठ औरों को पढ़ाना चाहते जिसे खुद याद नहीं रखते। 
          अगली बात , जिसके पांव न फ़टी बुआई , वो क्या जाने पीर पराई। ये नेता और अधिकारी जो गरीब जनता के धन से शाही ठाठ बाठ से रहते हैं उनको क्या पता लोग बदहाली में कैसे जीते हैं। अंत में बस बहुत हो गया गंदी झूठ की राजनीति और सरकारी प्रशासन की मनमानी से देश को रसातल तक ले आये। अब अपने सही रास्ते पर आ जाओ। अगर इसी तरह हालत बिगड़ते रहे तो देश ही सही सलामत नहीं बचेगा तब आप भी कहां शासन करोगे। ये लूट ये छल कपट और केवल चुनावी जीत हार की राजनीती देश सेवा नहीं कहला सकती है। अभी पुराने लोगों के इतिहास को पलटना चाहते हो मगर शायद भविष्य में जो इतिहास लिखा जायेगा उस में आप सभी अपराधी ठहराए जाओगे जिन्होंने स्वार्थ में देश का बदहाली में पहुंचा दिया है। आखिरी बात हम लोग भी अपने निजि स्वार्थ के इलावा भी देश और समाज के लिए कुछ सार्थक करें। अपना देश है कोई बाहरी लोग आकर नहीं उसको सही करने वाले।

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