Wednesday, 4 April 2018

क्या सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां यही है - डॉ लोक सेतिया

   क्या सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां यही है - डॉ लोक सेतिया 

        शायद इस से बड़ा झूठ कोई नहीं है , अगर यही अच्छा है तो बुरा क्या है। अक्सर किसी से चालीस साल पुरानी घटना इमरजेंसी की और उस से पहले के शासनकाल की बात पूछते हैं तो तमाम मेरी उम्र के लोग जिनके सामने ये सब हुआ था नहीं बता पाते कुछ भी। लोकनायक जयप्रकाशनारायण किसी को याद नहीं है उस काल की फ़िल्में गीत याद हैं। मधुबाला याद है लाल बहादुर याद नहीं। सवाल किसी नेता की याद का नहीं है सवाल ये है कि खुद अपने देश और समाज को लेकर हम कितने संवेदनशील हैं। कहने को किताबी शिक्षा से लेकर गूगल पर सब कुछ समझने और सोशल मीडिया पर उपदेश देने वाले आधुनिक ज्ञानी लोग हैं , मगर इतिहास तो छोड़ो जीवन की समस्याओं पर जानकारी कुछ भी नहीं रखते हैं। मगर बहस देश की समाज की हर समस्या पर करते हैं। वो सब जो वास्तव में मानते हैं हमारा देश महान है मुझे बतलाएं और दिखलाएं। मुझे देखना है सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां। मुझे जो नज़र आता है पहले उसकी बात करता हूं। 
                 हम किसी खेल में जीत हार से खुश और दुखी होने वाले , कभी कभी विशेष दिन देशभक्ति के गीत गाने को और पतंग उड़ाने को देश से प्यार बताने वाले , अपने ही देश की बदहाली को खामोश होकर देखते हैं और मुझे क्या सोचते हैं। हम नागरिक आज़ादी का मतलब मनमानी करने की छूट समझते हैं और किसी कानून का पालन करना और समाज के नैतिक मूल्यों की कदर करना ज़रूरी ही नहीं समझते। देश क्या है केवल ज़मीन नहीं होता है देश , देश एक सौ पचीस करोड़ नागरिक हैं और देश का संविधान हमारा सब से पहला धर्मग्रंथ है। अपने स्वार्थ में संविधान की भावना का निरादर करना और खुद अपने ही देश के बाकी लोगों के समानता के अधिकारों से खिलवाड़ करना देश के साथ प्रेम कदापि नहीं हो सकता है। किसी को भी दूसरों की आज़ादी उनके मौलिक अधिकारों के हनन की अनुमति नहीं दी जा सकती। ये तमाम लोग जो अपनी मांगें उचित या अनुचित मनवाने के लिए कानून हाथ में लेकर सब नागरिकों को बंधक बनाते हैं हड़ताल बंद की आड़ लेकर उनको आगजनी रास्ता रोकने जैसे अपराध करने का हक संविधान नहीं देता है। संविधान सब को बराबरी का अधिकार देता है और किसी को भी दूसरों की आज़ादी और अधिकार छीनने की अनुमति नहीं मिल सकती है। क्या भीड़तंत्र और अराजकता होना देश को सारे जहां से अच्छा बनाता है।
        राजनेता अपनी सत्ता की हवस पूरी करने के लिए , वोट बैंक की गंदी राजनीति करने के लिए , नफरत की आग फैलाते हैं और जाति धर्म अगड़े पिछड़े के नाम पर विभाजित करते हैं लोगों को। ऐसे स्वार्थी लोग क्या देशभक्त कहला सकते हैं। खुद अपने पर करोड़ों रूपये जनता के धन से बर्बाद करना क्या इसे जनता की देश की सेवा कह सकते हैं। दल कोई भी हो देश की सम्पति और धन का दुरूपयोग करना देश को लूटना इनकी आदत बन गई है। सफ़ेद हाथी बन गए हैं ये सब , इनको पालते पालते जनता अपना सब लुटा चुकी है। और अगर सवा सौ करोड़ की आबादी में कुछ हज़ार लोग भी हम ऐसे नहीं चुन सकते जिन्हें अपने लिए गाड़ी बंगला और तमाम सुविधाएं नहीं चाहिएं और जो ईमानदारी से बिना अपने लिए कुछ भी चाहे देश और जनता की सेवा करना चाहते हैं तो फिर देश की भलाई कैसे हो सकती है और सारे जहां से अच्छा देश अपना किस तरह बन सकता है।
               अंत में सब से महत्वपूर्ण बात। अदालत अपना काम करती है और हर बार सजग रहती है। सेना भी रात दिन अपना कर्तव्य निभाती है। मगर कार्यपालिका को अभी तक अपना फ़र्ज़ समझना नहीं आया अन्यथा देश की सभी समस्याएं कब की समाप्त हो जाती अन्य तमाम देशों की तरह जो हमारे साथ या बाद में आज़ाद हुए हैं। सब से बड़ी समस्या यही प्रशासन है जो आज तक भी खुद को विदेशी राज के समय की तरह शासक मानता है और खुद अपने आप कुछ भी नहीं करता। रिश्वत यही लेता है , सत्ताधारी नेताओं को उनके हर अनुचित काम में यही साथ देता है और सरकार में मंत्री बने लोगों की चाटुकारिता कर खुद मनमानी करता है। अगर अधिकारी नहीं शामिल हों तो कोई भी नेता किसी भी पद पर बैठ सत्ता का दुरूपयोग नहीं कर सकता है। जनता को आम नागरिक को अन्याय की या किसी भी समस्या की शिकायत करनी ही नहीं पड़ती अगर ये लोग अपना काम मुस्तैदी से ईमानदारी से और देश के लिए वफादारी और संविधान के लिए सच्ची निष्ठा से किया करते। ये सब से बड़ी समस्या है। इक और हैं जो लिखते हैं अख़बार टीवी चैनलों पर पत्रकारिता की बातें करते हैं उनको भी इक सजग प्रहरी की तरह काम करना था चौकीदारी करनी थी जो खुद थानेदार बन गए और न्यायधीश भी। मुझे सब तरफ अंधेरा दिखाई देता है कहीं कोई रौशनी नज़र नहीं आती। केवल नारे लगाने से भारत माता की जय बोलने से और देशभक्ति के गीत गाने से कुछ भी हो सकता है।

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