Saturday, 13 May 2017

मेरा कातिल ही मेरा मुनसिब है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  मेरा कातिल ही मेरा मुनसिब है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया


भगवान कहलाना सब चाहते हैं , भगवान बनना किसी को नहीं आता है। मालूम नहीं तब क्या होता था , मगर हमने किस्से कहानियां बहुत सुनी हुई हैं , बादशाह इंसाफ करने या न्याय देने को इक घंटा महल के द्वार पर लगवा देते थे। दावा किया जाता है कि कोई भी आकर घंटा बजा सकता था और अपने साथ हुए अन्याय की फरियाद कर न्याय की गुहार लगा सकता था। अब उस घंटा बजाने का कोई रजिस्टर तो होता नहीं था कि बाद में हिसाब पता चलता कितने लोग घंटा बजाने आये और उन में से कितनों की परेशानी का अंत हुआ। सोचा जाये तो कौन जाकर बादशाह से उसी की कार्यपालिका की शिकायत करने की सोचता भी होगा। और फिर राजा का आदेश ही न्याय कहलाता है इसलिए शासक जो भी करता इंसाफ ही माना जाता होगा। मगर बादशाह सोचते थे कि वही ईश्वर का सवरूप हैं इसलिए चाहते थे जनता उनके दरवाज़े पर आये इंसाफ और न्याय की याचिका लेकर और उनसे दया की विनती करे। अपने भारत देश में जब से लोकतंत्र के नाम पे वोटतंत्र का खेल चालू हुआ है राजनेताओं को खुद को भगवान की तरह सब की विनती सुनने का शाही शौक होने लगा है। कभी नेता आते जाते थे जब किसी शहर तब लोग उनका भाषण सुन बाद में किसी रेस्ट हाउस में अपनी अपनी अर्ज़ियां दे आते थे और इतने से खुश हो जाते थे कि मंत्री जी ने अर्ज़ी ले ली। इसका कोई ऐतहासिक प्रमाण नहीं मिलता कि उन सारी अर्ज़ियों का क्या किया जाता था। मगर देश की बिगड़ती दशा से समझ आता है की उन सभी अर्ज़ियों को रद्दी की टोकरी में ही डाला जाता रहा होगा। 
         इधर नेता भी समझ चुके हैं कि अब पुराने ढंग से जनता को नहीं बहलाया जा सकता है। इसलिए हर राज्य के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री सी एम विंडो या टॉक टू पी एम ओ जैसे नाम से से बादशाही घंटे जैसा कुछ नया शुरू कर देते हैं। हम लोग ऐसे नासमझ हैं जो हर बार छले जाते हैं तब भी वही तमाशा बदले नाम से देखने चले जाते हैं। समस्या और बढ़ गई है जब से सब ऑनलाइन होने लगा है , आपने शिकायत की और आप देख सकते हैं आपकी समस्या का क्या समाधान किया गया है। अब सरकार अपना डंका पीटने लगती है कितनी अर्ज़ियाँ मिली और उनका निदान कर दिया गया। बस ये कोई नहीं बताता कि उन सब को इंसाफ मिला या इंसाफ के नाम पर और अधिक अन्याय किया गया। बुरा हो सूचना के अधिकार और सोशल मीडिया का जिस पर हर प्रशासन और सरकार के झूठे दावों की पोल खुल जाती है वह भी प्रमाण सहित। मगर हर नेता मकड़ी की तरह अपने ही बुने जाल में फंस जाती है वाली दशा को पहुंच जाता है। उनकी खोली खिड़की जनता की शिकायत दर्ज करने के बाद उसी विभाग के उसी अधिकारी को भेज मान लेती है अपना दायित्व निभा दिया। और खुद गुनहगार लिखता है अर्ज़ी पर कि शिकायत पर कोई करवाई करने की ज़रूरत ही नहीं है। और इक एस एम एस भेज देते हैं शराफत से शिकायत करने वाले को कि आपकी शिकायत का निपटान किया जा चुका है आप साइट पर देख लें। 
              समझदार को इशारा बहुत होता है , फिर भी कई नासमझ पत्र लिख कर मंत्री जी को या पी एम अथवा सी एम को सूचित करने की जुर्रत करते हैं कि सब तो अनुचित है फिर भी आप कोई करवाई क्यों नहीं करना चाहते। और कभी कभी सबूत इतने साफ होते हैं कि शिकायत दोबारा खोलनी पड़ती है। मगर किया कुछ भी नहीं जाता , जब जिस नगर में मंत्री जी जाते हैं इक दिखावे की कोशिश करते हैं कि सब मिल सकते हैं समस्या बताने को। मगर मिलने की अनुमति उन्हीं विभाग के अधिकारी से ही मिलती है , और इस तरह चूहे बिल्ली का खेल जारी रहता है। मुश्किल ये है कि सब छुपाने का प्रयास सफल होता नहीं और किसी न किसी तरह सामने आ जाता है कि असली काम नहीं हुआ और कागज़ी बहुत किया गया है। ऐसे में इधर इक बेहद चौंकाने वाली बात सामने आई है , हरियाणा सरकार की सी एम विंडो नाम की जनशिकायत की जगह पर अब ये देखना छोड़ कर कि इसने किया क्या समस्याओं पर , उल्टा ये आदेश दिया गया है कि पता लगाओ कौन कौन बार बार शिकायत करते रहे हैं  उन पर कठोर करवाई की जाये ये समझ कर कि उनकी शिकायत झूठी और किसी निजि हित साधने को की गई है। अब घंटा बजाने वाले को गुनहगार साबित करने को वही अधिकारी ज़ोर शोर से लग जायेंगे ऐसा लगता है। ये न्याय का अनोखा ढंग है जिस में कोशिश की जाएगी कि लोग शिकायत करने से परहेज़ करें। 
                  वास्तव में इस सब की शुरआत की गई थी भगवान के मंदिर में घंटा लगाकर , लोग जाते हैं और भगवान के सामने घंटा बजाकर प्रार्थना करते हैं। अब भगवान को सुविधा है कि उसको सामने आकर जवाब देना नहीं पड़ता न ही कोई हिसाब कहीं से हासिल किया जा सकता है। पत्थर के भगवान को किसी शोर किसी विलाप किसी की सिसकियों से शायद कोई परेशानी नहीं होती और वह आराम से चैन की नींद सोता किसी ऐसी जगह जहाँ कोई नहीं जाकर देख सकता न पूछ सकता क्या किया मेरी विनती का। अब तो मंदिर वाले पुजारी लोगों ने भी समय तय कर दिया है , भगवान भी हर समय नहीं सुनते विनती। ये भगवान ने नहीं किया होगा , मंदिर या धर्मस्थल चलाने वालों ने अपनी सुविधा से किया है। सी एम या पी एम अगर भगवान जैसा होना चाहते हैं तो उनको भी पुजारिओं की तरह सब अधिकारीयों को मनमानी करने देना ही होगा। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को भगवान कहलाना है तो बिना पंडित पुजारियों के सम्भव नहीं है। बात समझ आई आपको या नहीं।

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