Sunday, 9 April 2017

हमारे घोटाले शाकाहारी हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

देखो ये भाईचारा है इसको घूस लेना मत कहो। कोई आकर घर पर मिठाई की जगह नकद पैसे नेता या अधिकारी के घर इनके बच्चों को दे कर अपना कोई काम निकलवा जाता तो बुरा है क्या। सभा में मंत्री जी को महंगे उपहार भेंट करना अनुचित कहां है। सदभावना की खातिर स्वीकार करते हैं कोई मांग कर नहीं लेते। अब अगर हर सरकारी योजना का धन बड़ा अधिकारी अपने कुछ ख़ास चाटुकारों का एन जी ओ बनवा आबंटित करता है थोड़ा खुद भी बचाता है तो गलत क्या है। जनता की सहायता को है राशि तो क्या अधिकारी देश की जनता में शामिल नहीं है , जो उसके परिचित ख़ास लोग हैं वो भी जनता ही हैं। आप अफ्सरों द्वारा किसी दुकानदार से कोई वस्तु खरीद मोल नहीं चुकाने को अपराध नहीं साबित कर सकते। जब देने वाला खुद कहता है भला आपसे झोला भर सब्ज़ी और टोकरा भर फल प्रतिदिन लेने के हम पैसे वसूल कर सकते हैं। ऐसे में उस पर कृपा की दृष्टि रखना हमारा परम कर्तव्य बनता ही है। ऐसे कारोबार वाले के कानून तोड़ने या कायदे का पालन नहीं करने पर भला कोई सख्त करवाई की जा सकती है। उच्च अधिकारी क्या मंत्री तक भेजते रहें पत्र बार बार कि आपने क्या किया शिकायत पर , कौन जवाब देता है। उच्च अधिकारी या मंत्री भी पत्र लिख इतिश्री कर लेते हैं , सब इक दूजे की समस्या समझते हैं। जाने क्यों अभी तक ये नियम साफ नहीं किया गया है कि उपहार देना लेना हमारी पुरानी परंपरा रही है। इक अनधिकृत फक्ट्री वाला नकद रिश्वत देने के विरुद्ध है , मगर अपने सरकारी ज़मीन पर अवैध कब्ज़े को अफ्सर के घर देसी घी का टीन और कुछ सामान अपने गांव से लाया शुद्ध बताकर देता है और अधिकारी खुश होकर उसका काम कर देता है। ये सब भाईचारा है , फिर भी आपको घोटाले लगते हैं तो ये विशुद्ध शाकाहारी हैं सेहत के लिये लाभकारी , कोई दुष्प्रभाव नहीं इनका। आजकल कोई घोटाला नहीं होता है बस प्रेम और भाईचारा बढ़ाने को थोड़ा लेन देन किया जाता है।  

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