Sunday, 5 February 2017

पीछे जो रह गये हैं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

                                           हर कारवां से कोई ये कह रहा है " तनहा "
                                           पीछे जो रह गये हैं उन को था साथ लाना।
मुझे अपनी ग़ज़ल का ये आखिरी शेर याद आया आज , जब इक टीवी शो पर देखा कभी एक साथ एक प्रतियोगिता में शामिल दो कलाकार इक मंच पर थे मगर एक निर्णायक की कुर्सी पर और दूसरा सालों बाद इक प्रतियोगी बन कर। सवाल प्रतिभा का नहीं है , सवाल किस्मत का भी नहीं है। सवाल अवसर मिलने का है और सवाल ये भी है कि काबलियत की पहचान से अधिक महत्व सफलता हासिल करने का है। ऐसे ही इक और टीवी शो में भी आज देखा , कल तक गांव के घर घर में काम करने वाली महिला का बेटा जब टीवी पर गा रहा तो तमाम गांव के लोग उसके  फोटो और नाम लिखी तख्तियां लेकर बार बार उसका नाम पुकार कह रहे हैं तुम ने गांव का नाम रौशन किया है। कौन जनता है यही लोग कल तक उसी को खुद से कितना छोटा समझते रहे हैं। मान लो अब वो शो का विजेता भी बन जाये मगर बाज़ार में सफलता नहीं हासिल कर सके तब फिर इन्हीं लोगों की नज़रें पहले की तरह दिखाई देने लगेंगी। सब इतनी तेज़ी से दौड़ भाग रहे हैं कि कोई ध्यान ही  नहीं देता कब कोई हमसफ़र किस जगह कैसे पीछे छूट गया कारवां से बिछुड़ गया। कभी बहुत देर बाद जब हमारे पास सब कुछ होता है मगर वो साथी नहीं होता जो अपना अकेलापन मिटा सकता था , तब समझ आता है उतना पाया नहीं जितना खोया है। इसलिए आज इक बात कहना चाहता हूं , हम मित्रता दिवस की बात करते हैं और बहुत संवेदना प्रकट किया करते हैं लेकिन बिछुड़ जाने पर कोई खबर ही नहीं रखते उसी मित्र की।  काश हम देशवासी यही सबक भूले नहीं होते कि अकेले खुद नहीं आगे बढ़ना , सभी को संग लेकर चलना है आगे और भी आगे। और ये बात राजनेताओं के झूठे और खोखले नारे जैसी हर्गिज़ नहीं है।
 

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