Sunday, 31 May 2015

राष्ट्रपिता होने की निशानी मांगती है इक बच्ची ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

बच्चों का खेल नहीं है बच्चों के सवालों के जवाब देना। बड़े बड़े ज्ञानी लोग बच्चों के सवाल का हल नहीं खोज पाते। अपनी अज्ञानता को छुपाने को कह देते हैं , ये बच्चों की समझ की बातें नहीं हैं। मगर हमेशा ये इतना आसान नहीं होता। भले टीवी पर इक विज्ञापन दावा करता है की अमुक ब्रांड का जांगिया पहन आप असम्भव को सम्भव कर सकते हैं " बड़े आराम से "। सरकारी विज्ञापन कब से समझा रहे हैं जनता को की देश प्रगति कर रहा है , मगर हम क्या करें देश में भूख से लोग मरते हैं , किसान खुदकुशी करने को मज़बूर हैं , लोगों को साफ पानी तक नहीं मिलता पीने को , बच्चे आज भी पढ़ने की उम्र में मज़दूरी करने को विवश हैं , गरीबों को कहीं भी मुफ्त इलाज नहीं मिलता। सरकार उनके मरने पर बीमे की बात करती है , ज़ख्मों पर नमक छिड़क कर कहती है , लो अच्छे दिन आये हैं। लगता है मैं भावावेश में विषय से भटक गया , चलो मुद्दे की बात करते हैं। काश बाज़ार के और सरकार के विज्ञापन झूठे नहीं होते , तो हर समस्या का समाधान किया जा सकता। कल तक अगर किसी बच्चे के सवाल का जवाब नहीं दे सकते थे तो चुप रहने से काम चल जाता था। सतसठ साल से देश में सरकारें यही करती आई हैं , लेकिन सूचना के अधिकार ने  सरकार को बहुत परेशानी में डाल रखा है।
    लखनऊ वालों की बात ही अल्ग होती है , जब वहां रहने वाली लड़की का नाम ऐश्वर्या हो तो कहना ही क्या। दस साल की ऐश्वर्या ने देश की सरकार को दुविधा में डाल दिया है , वह भी इक सवाल पूछकर की किस आधार पर महत्मा गांधी को राष्ट्रपिता का दर्जा मिला हुआ है। बच्ची ने सवाल पीएमओ से पूछा था , पीएमओ ने उसे ग्रहमंत्रालय और ग्रहमंत्रालय ने उसे राष्ट्रीय अभिलेखागार को भेज दिया था , अभिलेखागार की सहायक निदेशक जयप्रभा रवींद्रन ने जवाब भेजा की उनके पास कोई भी ऐसा दस्तावेज़ मौजूद नहीं है। अर्थात भारत सरकार को इसकी जानकारी नहीं है की महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता किस आधार पर माना जाता है। अब इससे आगे का प्रश्न बहुत ही असहज करने वाला हो सकता है। पुरानी कितनी हिट फिल्मों की कहानी पिता के नाम की , मां की अथवा माता-पिता के कातिल की तलाश को लेकर होती थी। उन फिल्मों से स्टार सुपरस्टार क्या नायक महानायक तक बन गये लोग। हमारे समाज में पिता का नाम होना बेहद ज़रूरी है , यदा कदा उसके सबूत की ज़रूरत आन पड़ती है। कभी किसी के पिता या बेटे होने पर संशय हो तो मामला संगीन हो जाता है। इक राजनेता को अदालत में घसीटा गया , डीएनए टेस्ट करवाया गया ये साबित करने को की वो किसी का पिता है। अब दुनिया वाले हमसे सवाल पूछ सकते हैं की बताओ क्या सबूत है गांधी जी के राष्ट्रपिता होने का , ऐसे में हम डीएनए टेस्ट भी नहीं करवा सकते सतसठ साल पहले स्वर्ग सिधार चुके महात्मा गांधी जी का। यहां उनकी चीज़ों का कारोबार ही होता आया है , उनके विचार सब कभी के भुला ही चुके हैं। दिखाओ कोई हो जो इक धोती में रहता हो ये देख कर की लोग नंगे बदन हैं।
         जब भी ये सवाल खड़ा होगा साथ कितने और प्रश्न भी लायेगा , पिता के नाम के साथ जन्म की तिथि की भी बात होगी। देश आज़ाद भले 1947 में हुआ हो उसका जन्म तब नहीं हुआ था वो बहुत पहले से था , नाम बदलता भी रहा हो तब भी इतना तो तय है की देश का अस्तित्व महात्मा गांधी के जन्म लेने से पहले से था। अर्थात राष्ट्र के पिता का जन्म बाद में हुआ जबकि राष्ट्र पहले से था। बात मुर्गी और अंडे जैसी सरल नहीं है , लगता है हमने एक पुत्र को अपने ही पिता का पिता घोषित कर डाला। " चाइल्ड इस फादर ऑफ़ मैन " कहते भी हैं , लेकिन दार्शनिकता की नहीं ठोस वास्तविकता की बात है। लोग इधर नकली प्रमाण पत्र बना लेते हैं , हमें ऐसा नहीं करना है , तलाश करना है किस आधार पर उनको राष्ट्रपिता घोषित किया गया। क्या है कोई सबूत या यहां भी किसी फ़िल्मी कहानी की तरह कोई इतेफाक है जो अंत में मालूम पड़ता है। सरकार को संभल जाना चाहिये , मीडिया को भी हर किसी को भगवान घोषित करने से सबूत सामने रखना चाहिये , जो आम इंसान भी नहीं साबित होते कभी वक़्त आने पर , उनको आपने कैसे कैसे भगवान घोषित किया हुआ है , खुद आपका भगवान तो केवल पैसा ही है ना। कल कोई बच्चा अपने मां -बाप से कह सकता है , मुझे तो नहीं लगता की आप मेरे माता-पिता हैं।

Wednesday, 20 May 2015

बिटिया रानी को लिखी इक चिट्ठी ( डॉ लोक सेतिया ) 110 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

बिटिया रानी ,
कभी नहीं बुलाया ऐसे तो तुझे मैंने ,
हां अक्सर तेरी मां बुलाती है तुझको ,
जाने कितने प्यारे प्यारे नामों से ,
पर दिल चाहता है मैं भी बुलाता ,
तुझको कोई ऐसा ही प्यार भरा ,
सम्बोधन दे कर बेटी-पिता के नाते का।
अभी तो बीता नहीं इक महीना भी ,
बिदा किया तुझको बिठा कर डोली में ,
कितने चाव से कतने अरमानों से ,
हज़ारों दुआएं देकर तेरे भविष्य की ,
जाने कितनी खुशियों की उम्मीदों ,
कितने रंग बिरंगे सपनों के साथ।
अभी तो गुज़रे हैं दिन पंद्रह ही ,
जब दो पल को ही सही तू घर आई थी ,
पगफेरे की रस्म निभाने को संग लिये ,
अपने जीवन साथी को अपने ससुराल के परिवार को।
याद आती रहती हैं हम सभी को पल पल ,
बातें तेरी क्या बतायें कैसी कैसी ,
कह देती मुझे पापा आप फिर लिख दोगे ,
हर बात पर कोई कविता-कहानी ,
मुझे नहीं है सुननी ,
नहीं मुझे भी बेटी सुनानी।
पर आज नींद नहीं आई मुझे रात भर ,
करते करते तेरे फोन का इंतज़ार ,
लगता है कब से नहीं हो पाई खुल के ,
तुझसे तेरे मेरे सबके बारे में बात ,
 दिल करता है अभी मिलने को तुझे ,
बुला लूं तुझे या चला जाऊं तेरे पास।
याद है जब भी कभी होता था कुछ भी ,
तेरे मन में कहने को ख़ुशी का चाहे ,
छोटी छोटी आये दिन की परेशानियों का ,
करती थी फोन पर हर इक अपनी बात ,
क्या क्या बता देती थी कुछ ही पल में ,
चाहे रही हो कितनी भी दूर घर से ,
यूं लगता था होती हर दिन थी मुलाकात।
जानते हैं हम सभी खुश हो तुम बहुत ,
अपने जीवन में आये इस सुहाने मोड़ से ,
बहुत कुछ नया सजाना है जीवन में ,
समझना है निभाने है रिश्ते नाते सभी ,
नहीं खेल बचपन का गुड्डे गुड़ियों का विवाह ,
खिलने फूल मुस्कुराहटों के तेरे चमन में।
तुझे नहीं मालूम आज तबीयत मेरी ज़रा ,
लगती है कुछ कुछ बिगड़ी हुई सी ,
यूं ही ख्याल आया कभी ऐसे में ,
मुझे प्यार से डांट देती थी तुम कितना ,
और अधिक की होगी लापरवाही ,
बदपरहेज़ी ,
ख्याल रखते नहीं आप अपना पापा ,
मुझे देनी पड़ती थी कितनी सफाई ,
बताता था कब से आईसक्रीम नहीं खाई।
कहने को मन में हज़ारों हैं बातें ,
यही चाहता मिल के खुशियों को बांटे ,
तुझे बुलाना है तेरे अपने ही इस घर में ,
कितनी ही तेरी अपनी चीज़ें हमने ,
वहीं पे सजा कर रखी हैं जहां रखी तुमने ,
सभी कुछ वही है ,
तेरा था जैसा घर में ,
नहीं है वो रौनक जो होती बेटियों से ,
तरसती है छत ,
तेरे कदमों की आहट को ,
तू ही फूल हो जो खिला इस आंगन में।
समझना वो भी जो लिख नहीं पाया ,
ये खत नहीं है ,
नहीं है पाती ,
मुझे याद है वो जो तुम हो गुनगुनाती ,
सुना तुझसे था खुद भी साथ गाया ,
कभी भी नहीं धूप तुमको लगे बेटी ,
रहे प्यार का खुशियों का तुझपे साया।