Sunday, 1 February 2015

प्रेम केवल प्रेम है ( कविता ) 109 भाग दो ( डा लोक सेतिया ) { वेलेनटाइन डे पर }

किसी सुंदर हसीना ,
किसी खूबसूरत नवयुवक ,
को गुलाबी रंग का प्रेम पत्र ,
लाल गुलाब का कोई फूल ,
देना किसी ख़ास दिन को ,
और आई लव यू कहकर ,
करना प्यार का इज़हार ,
क्या ऐसा ही होता है प्यार ,
जैसे सजता है हर साल ,
गली गली ,
शहर शहर ,
कोई खुला बाज़ार ।
काश कि इतना सुलभ होता ,
सच में प्यार मिल जाता सभी को ,
मगर नहीं है आसान मिलना ,
जीवन भर की तलाश में भी ,
इक ऐसा सच्चा प्यार जो ,
महका दे जीवन को ऐसे ,
इत्र की खुशबू हो जैसे ,
महका दे तन मन को ,
फूलों की महक हो जैसे।
प्यार किसी की मुस्कान है ,
बस किसी की इक नज़र है ,
कब हुआ ,
क्योंकर किस से ,
कहां होती किसी को खबर ,
न होता करने से ये कभी ,
न रुकता किसी के रोकने से ,
अपने बस में नहीं होता कुछ भी ,
दिल ,
जान सब लगता है ,
नहीं कुछ भी हमारा अब ,
जाने कैसे हो गये पराये सब।
इक तड़प है ,
बेकरारी है ,
न साथ देती दुनिया सारी है ,
प्यार है ईनाम भी ,
सज़ा भी है ,
है इबादत भी ,
खता भी है ,
भटक रहे लोग यहां सहरा में ,
समझ रहे चमकती रेत को पानी ,
इक आग है इश्क़ दुनिया वालो ,
चांदनी मत समझना इसको ,
राहें हैं कांटों भरी प्यार की ,
लिखी जाती है आह से आंसुओं से ,
जो भी होती है सच्ची प्रेम कहानी। 

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