मेरे ब्लॉग पर मेरी ग़ज़ल कविताएं नज़्म पंजीकरण आधीन कॉपी राइट मेरे नाम सुरक्षित हैं बिना अनुमति उपयोग करना अनुचित व अपराध होगा । मैं डॉ लोक सेतिया लिखना मेरे लिए ईबादत की तरह है । ग़ज़ल मेरी चाहत है कविता नज़्म मेरे एहसास हैं। कहानियां ज़िंदगी का फ़लसफ़ा हैं । व्यंग्य रचनाएं सामाजिक सरोकार की ज़रूरत है । मेरे आलेख मेरे विचार मेरी पहचान हैं । साहित्य की सभी विधाएं मुझे पूर्ण करती हैं किसी भी एक विधा से मेरा परिचय पूरा नहीं हो सकता है । व्यंग्य और ग़ज़ल दोनों मेरा हिस्सा हैं ।
अगस्त 24, 2023
POST : 1702 रिश्ता क्या चांद से धरती का ( अनचाहा संबंध ) डॉ लोक सेतिया
अगस्त 13, 2023
POST : 1701 दुनिया बदल गई हम नहीं बदले ( इज़हार ए मुहब्बत ) डॉ लोक सेतिया
दुनिया बदल गई हम नहीं बदले ( इज़हार ए मुहब्बत ) डॉ लोक सेतिया
न मिले ज़ख़्म न निशान मिले , पर परिंदे लहू-लुहान मिले ।
यही संघर्ष है ज़मीं से मेरा , मेरे हिस्से का आसमान मिले ।
छोड़ो कल की बात हमारे साथ चलो , बदलेंगे हालात हमारे साथ चलो ।
साज़िश में दिन-रात लगे कुछ लोग यहां , हाथों में दे हाथ हमारे साथ चलो ।
दर और दरीचों के लिए सोच रहा है , वो कांच की बुनियाद पे दीवार उठाकर ।
घर में सब के खिड़कियां थीं और दरवाज़ा भी था , घुट के मर जाने का सब को अंदाज़ा भी था ।
जब पूछ लिया उन से कि किस बात का डर है , कहने लगे ऐसे ही सवालात का डर है ।
ज़मीनों आसमां सब के लिए हैं सोच लो , तुम्हारी ही नहीं जागीर ज़हन में रखना ।
यकीनन मुश्किलें तो आयेंगी पर दोस्तो , निपटने की कोई तदबीर ज़हन में रखना ।
जुलाई 31, 2023
POST : 1700 बड़े क्या हुए बदनाम हो गए ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
बड़े क्या हुए बदनाम हो गए ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
दूर उन्हें लगता सवेरा है बहुत ।
एक बंजारा है वो , उसके लिये
मिल गया जो भी बसेरा है बहुत ।
उसका कहने को भी कुछ होता नहीं
वो जो कहता है कि मेरा है बहुत ।
जो बना फिरता मुहाफ़िज़ कौम का
जानते सब हैं , लुटेरा है बहुत ।
राज़ "तनहा" जानते हैं लोग सब
नाम क्यों बदनाम तेरा है बहुत ।
जुलाई 30, 2023
POST : 1699 निकले थे कहां जाने को पहुंचे कहां ( भटकाव ) डॉ लोक सेतिया
विवेकशील इंसान नहीं बने ( भटकाव ) डॉ लोक सेतिया
( निकले थे कहां जाने को पहुंचे कहां )
संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है ,
इक धुंध से आना है इक धुंध में जाना है ।
ये राह कहां से है ये राह कहां तक है ,
ये राज़ कोई राही समझा है न जाना है ।
इक पल की पलक पर है ठहरी हुई ये दुनिया ,
इक पल के झपकने तक हर खेल सुहाना है ।
क्या जाने कोई किस पर किस मोड़ पर क्या बीते ,
इस राह में ऐ राही हर मोड़ बहाना है ।
हम लोग खिलौना हैं इक ऐसे खिलाड़ी का ,
जिस को अभी सदियों तक ये खेल रचाना है ।
इंसान समझता है वो इल्म का सागर है ,
उस ने अभी दुनिया के इक कतरे को जाना है ।
जुलाई 29, 2023
POST : 1698 बर्तनों की तकरार ( सत्ता की रसोई ) डॉ लोक सेतिया
बर्तनों की तकरार ( सत्ता की रसोई ) डॉ लोक सेतिया
सवाल है ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया
जूतों में बंटती दाल हैमर गए लोग भूख से
सड़ा गोदामों में माल है ।
बारिश के बस आंकड़े
सूखा हर इक ताल है
लोकतंत्र की बन रही
नित नई मिसाल है ।
भाषणों से पेट भरते
उम्मीद की बुझी मशाल है
मंत्री के जो मन भाए
वो बकरा हलाल है ।
कालिख उनके चेहरे की
कहलाती गुलाल है
जनता की धोती छोटी है
बड़ा सरकारी रुमाल है ।
झूठ सिंहासन पर बैठा
सच खड़ा फटेहाल है
जो न हल होगा कभी
घोटालों का देश है
मत कहो कंगाल है
सब जहां बेदर्द हैं
बस वही अस्पताल है ।
कल जहां था पर्वत
आज इक पाताल है
देश में हर कबाड़ी
हो चुका मालामाल है ।
बबूल बो कर खाते आम
हो रहा कमाल है
शीशे के घर वाला
रहा पत्थर उछाल है ।
चोर काम कर रहे
पुलिस की हड़ताल है
हास्य व्यंग्य हो गया
दर्द से बेहाल है ।
जीने का तो कभी
मरने का सवाल है ।
ढूंढता जवाब अपने
खो गया सवाल है ।
जुलाई 23, 2023
POST : 1697 राजा का हमशक़्ल भिखारी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया
राजा का हमशक़्ल भिखारी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया
जुलाई 22, 2023
POST : 1696 महान नहीं अच्छा तो बनाएं ( देश-समाज ) डॉ लोक सेतिया
महान नहीं अच्छा तो बनाएं ( देश-समाज ) डॉ लोक सेतिया
बड़े लोग ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
बड़े लोग बड़े छोटे होते हैंकहते हैं कुछ
समझ आता है और
आ मत जाना
इनकी बातों में
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं ।
इन्हें पहचान लो
ठीक से आज
कल तुम्हें ये
नहीं पहचानेंगे
किधर जाएं ये
खबर क्या है
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं ।
दुश्मनी से
बुरी दोस्ती इनकी
आ गए हैं
तो खुदा खैर करे
ये वो हैं जो
क़त्ल करने के बाद
कब्र पे आ के रोते होते हैं ।
जुलाई 19, 2023
POST : 1695 जनता का गठबंधन कब होगा ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया
जनता का गठबंधन कब होगा ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया
राजनीति पर कुछ दोहे पेश हैं :-
शासक बन कर दे रहा सेवक देखो सीख ।
मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर ।
तड़प रहे हैं देश के जिस से सारे लोग
लगा प्रशासन को यहाँ भ्रष्टाचारी रोग ।
दुहराते इतिहास की वही पुरानी भूल
खाना चाहें आम और बोते रहे बबूल ।
झूठ यहाँ अनमोल है सच का ना व्योपार
सोना बन बिकता यहाँ पीतल बीच बाज़ार ।
नेता आज़माते अब गठबंधन का योग
देखो मंत्री बन गए कैसे कैसे लोग ।
चमत्कार का आजकल अदभुत है आधार
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार ।
आगे कितना बढ़ गया अब देखो इन्सान
दो पैसे में बेचता यह अपना ईमान ।
इक बेचैनी है देशवासियों के दिलों में उसे लेकर कविता पेश है :-
मन फिर हो जाता है उदास ।
कब अन्याय का होगा अंत
न्याय की होगी पूरी आस ।
कब ये थमेंगी गर्म हवाएं
आएगा जाने कब मधुमास ।
कब होंगे सब लोग समान
आम हैं कुछ तो कुछ हैं खास ।
चुनकर ऊपर भेजा जिन्हें
फिर वो न आए हमारे पास ।
सरकारों को बदल देखा
हमको न कोई आई रास ।
जिसपर भी विश्वास किया
उसने ही तोड़ा है विश्वास ।
बन गए चोरों और ठगों के
सत्ता के गलियारे दास ।
कैसी आई ये आज़ादी
जनता काट रही बनवास ।
जुलाई 15, 2023
POST : 1694 चंदा मामा ख़ुश हुए ( व्यंग्य कहानी ) डॉ लोक सेतिया
चंदा मामा ख़ुश हुए ( व्यंग्य कहानी ) डॉ लोक सेतिया
जुलाई 14, 2023
POST : 1693 आओ तुम्हें चांद पे ले जाएं ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया
आओ तुम्हें चांद पे ले जाएं ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया
ग़ज़ल डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
डूबी हैं कश्तियाँ किनारों पर ।
अपनी मंज़िल पे हम पहुँच जाते
जो न करते यकीं सहारों पर ।
खा के ठोकर वो गिर गये हैं लोग
जिनकी नज़रें रहीं नज़ारों पर ।
डोलियाँ राह में लूटीं अक्सर
अब भरोसा नहीं कहारों पर ।
वो अंधेरों ही में रहे हर दम
जिन को उम्मीद थी सितारों पर ।
ये भी अंदाज़ हैं इबादत के
फूल रख आये हम मज़ारों पर ।
उनकी महफ़िल से जो उठाये गये
हंस लो तुम उन वफ़ा के मारों पर ।
POST : 1692 जिसे करना मना वही करना पसंद है ( हादिसा ) डॉ लोक सेतिया
जिसे करना मना वही करना पसंद है ( हादिसा ) डॉ लोक सेतिया
करणो हुतो सु ना कीओ परिओ लोभ कै फंध ॥
नानक समिओ रमि गइओ अब किउ रोवत अंध ॥
ग़ज़ल डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
कोई कभी हिदायत ये आज तक न माना ।
मझधार से बचाकर अब ले चलो किनारे
पतवार छूटती है तुम नाखुदा बचाना ।
कब मांगते हैं चांदी कब मांगते हैं सोना
रहने को झोंपड़ी हो दो वक़्त का हो खाना ।
अब वो ग़ज़ल सुनाओ जो दर्द सब भुला दे
खुशियाँ कहाँ मिलेंगी ये राज़ अब बताना ।
ये ज़िन्दगी से पूछा हम जा कहाँ रहे हैं
किस दिन कहीं बनेगा अपना भी आशियाना ।
मुश्किल कभी लगें जब ये ज़िन्दगी की राहें
मंज़िल को याद रखना मत राह भूल जाना ।
हर कारवां से कोई ये कह रहा है "तनहा"
पीछे जो रह गए हैं उनको था साथ लाना ।
जुलाई 08, 2023
POST : 1691 तीन में नहीं तेरह में भी नहीं ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया
तीन में नहीं तेरह में भी नहीं ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया
POST : 1690 मेरी पुरानी डायरियों से ( कुछ यादें कुछ एहसास ) डॉ लोक सेतिया [ भाग - दो ]
मेरी पुरानी डायरियों से ( कुछ यादें कुछ एहसास ) डॉ लोक सेतिया
[ भाग - दो ]
जुलाई 07, 2023
POST : 1689 मेरी पुरानी डायरियों से ( कुछ यादें कुछ एहसास ) डॉ लोक सेतिया [ पहला भाग ]
मेरी पुरानी डायरियों से ( कुछ यादें कुछ एहसास ) डॉ लोक सेतिया
जुलाई 03, 2023
POST : 1688 कैसे कैसे गुरु कैसी कैसी शिक्षा ( आख़िर इस दर्द की दवा क्या है ) डॉ लोक सेतिया
कैसे कैसे गुरु कैसी कैसी शिक्षा ( आख़िर इस दर्द की दवा क्या है )
डॉ लोक सेतिया
जुलाई 01, 2023
POST : 1687 ग़ुलामी को बरकत समझने लगे हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
मेरा देश बदल रहा है ( शाहंशाह का डायलॉग ) डॉ लोक सेतिया
दुनिया बदल रहा हूं
खुद को ही छल रहा हूं ।
डरने लगा हूं इतना
छुप छुप के चल रहा हूं ।
चलती हवा भी ठण्डी
फिर भी मैं जल रहा हूं ।
क्यों आज ढूंढते हो
गुज़रा मैं कल रहा हूं ।
अब थाम लो मुझे तुम
कब से फिसल रहा हूं ।
लावा दबा हुआ है
ऐसे उबल रहा हूं ।
" तनहा " वहां किसी दिन
मैं चार पल रहा हूं ।
2 जाना था कहाँ आ गये कहाँ ( कविता )
ढूंढते पहचान अपनीदुनिया की निगाह में ,
खो गई मंज़िल कहीं
जाने कब किस राह में ,
सच भुला बैठे सभी हैं
झूठ की इक चाह में ।
आप ले आये हो ये
सब सीपियां किनारों से ,
खोजने थे कुछ मोती
जा के नीचे थाह में ,















