अगस्त 06, 2019

POST : 1172 चलती फिरती लाशें हैं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

        चलती फिरती लाशें हैं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

 अब तो विज्ञान और डॉक्टर्स भी मानते हैं जब दिमाग़ काम नहीं करता तभी ज़िंदगी ख़त्म होती है। दिल की धड़कन सांसों का चलना किसी काम का नहीं रहता ऐसे लंबी मदहोशी में जाने के बाद जिस्म से जिगर गुर्दा निकाल लेने की बात की जाती है। बस कुछ ऐसा ही सोचने समझने की क्षमता के बगैर इंसान चलती फिरती लाश बन जाता है। तमाम ऐसे लोग हैं जो आपको सोचने समझने नहीं देना चाहते हैं शिक्षक बनकर आपको जो जैसे पढ़ाया यकीन करने या रटने को कहते हैं उस को लेकर विचार चिंतन करना उस जानकारी को वस्तविक्ता के तराज़ू पर तोलने की बात उनकी नागवार लगती है। धार्मिक किताबों को पढ़ कर सुनाते हैं और उनकी अपनी अपनी व्याख्या करते हैं पर आपको उस पर कुछ भी बोलने की छूट नहीं है अन्यथा आपको नास्तिक घोषित किया जा सकता है। नास्तिक होना कोई गुनाह नहीं है जिन किताबों की बात करते हैं उन की कथाओं में कितने सवाल किये गए होते हैं तभी उनके जवाब खोजने का काम होता है। मगर धर्म का कारोबार करने के लिए अंधभक्त हों लोग ये ज़रूरत है उनकी। कबीर होना सबसे कठिन है हर धर्म वालों को खरी खरी कहने का साहस करना बनारस में गंगा के तट पर खड़े होकर। ये जो आज धर्म को लेकर विवाद खड़े करते हैं जानते भी नहीं कबीर की जाति क्या थी धर्म क्या था उनकी बाणी हिन्दू मुस्लिम सिख सभी धर्मों के लोग सुनते हैं। 

        हम किसी न किसी को मसीहा बनाकर उसकी आरती पूजा ईबादत करने के आदी हैं। ईश्वर को पाना उसको समझना नहीं उसको मानते हैं बिना विचारे हुए। आज़ादी को भी हमने समझने की कोशिश नहीं की कोई हम सभी को कहता है देश की भलाई इसी में है कि आपको कैदी बनाकर रखा जाये और हम बेबस होकर स्वीकार कर लेते हैं। जो किसी और के आपत्काल की घोषणा को अक्षम्य अपराध बताते हैं खुद सत्ता मिलते उस से बढ़कर तानाशाही करने लगते हैं। हमारी गलती है भूल है या फिर कायरता है जो हम कभी भी सच और झूठ को परखने की बात नहीं करते। राजनेताओं की बातों से खुश हो जाते हैं उनका असली आचरण क्या है नहीं देखते समझते। अब तो लोग इस कदर पागलपन करने लगे हैं कि राजनीति का मोहरे बनकर भीड़ में शामिल होकर हैवान बन हैवानियत को अंजाम देने लगते हैं। कोई भी धर्म किसी को इस तरह घायल करने जान से मारने की बात नहीं उचित बताता। क्षमा की बात हर धर्म में है हमने माफ़ करना सीखा ही नहीं खुद न्यायधीश बनकर फैसला भी करते हैं सज़ा भी देते हैं और अपने पाप को अपराध को देश समाज के कायदे कानून को तोड़ने को देश के संविधान को अपमानित करने को महान कार्य घोषित कर और भी समाज विरोधी काम करते हैं। 

    कुलदीप सलिल जी की ग़ज़ल है :-

इस कदर कोई बड़ा हो मुझे मंज़ूर नहीं 

कोई बंदों में खुदा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

रौशनी छीन के घर घर से चिराग़ों की अगर 

चांद बस्ती में उगा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना 

आपकी एक अदा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

 ( इस ग़ज़ल का सबसे ख़ास शेर ये है :- )

आज मैं जो भी हूं हूं बदौलत उसकी 

मेरे दुश्मन का बुरा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 


 


अगस्त 05, 2019

POST : 1171 कलयुग की रामायण और रामराज्य ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   कलयुग की रामायण और रामराज्य ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

 शायद ये अजीब इत्तेफ़ाक़ की बात है कि आज 5 अगस्त को टीवी पर लव-कुश सीरियल शुरू हुआ है जो अभी अभी देखा तो आज की सुबह की राजनीति की बड़ी घटना को लेकर विचार आते गए। नहीं साहित्य में राजनीति और धर्म की मिलावट की बात नहीं करना चाहता। मगर कुछ संवाद सुनकर बातें जुड़ती हुई लगीं लेकिन बदले हुए ढंग से। शुरआत राजा राम की बात से हुई जो अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण से धोबी की बात उसके अपनी पत्नी को कुलटा समझने और मार पीट करने पर वार्ता करते राम कहते हैं विश्वास या भरोसा ताकत के बल से नहीं पाया जा सकता है। मोदी सरकार ने संसद में कश्मीर को लेकर धारा 370 हटाने और उस राज्य को विभाजित करने उसे पूरे राज्य का दर्जा नहीं देने जैसे निर्णय करने से पहले कश्मीर की जनता और वहां के राजनेताओं को नज़रबंद कर धारा 144 लगा कर फोन इंटरनेट बंद कर दिया। सेना और संसद में संख्या बल को लेकर मनमाने ढंग से वहां की जनता का भरोसा नहीं पाया जा सकता है। बीच में धोबी का राजा के आदेश पर पत्नी को अपनाना मगर दिल से नहीं विश्वास करना राम को विवश कर देता है। लक्ष्मण कहते हैं धोबी को दंड देने को तब राम बोलते हैं कि प्रजा राजा की संतान होती है उसको मार नहीं सकता रक्षक होता है शासक। लोकतंत्र है अब कोई राजा नहीं है भले शानो शौकत शाही ढंग से सज धज मौज मस्ती उनसे बढ़कर करते हैं मगर जनता की चिंता वोट पाने तक ही। वास्तविक रामायण में शायद नहीं था मगर टीवी सीरियल की रामायण का राम सीता को बन नहीं भेजना चाहता खुद सीता जी जाने की ज़िद करती हैं और महिलाओं के सम्मान की बात करती हैं। लक्ष्मण सवाल करता है बड़े भाई से कि राजा का कर्तव्य निभाना याद है पत्नी के लिए पति का धर्म याद है क्या , राम कहते हैं तुम मेरे सेनापति हो मेरे आदेश का पालन करना ही होगा। लक्ष्मण बोलते हैं मैंने सवाल भाई से किया था जवाब राजा ने दिया है। कितनी मिलती जुलती है ये बात आज की देश की राजनीती से। मोदी जी महिलाओं की चिंता बहुत करते हैं किसी ने उनसे नहीं पूछा उनकी पत्नी भी महिला है उनको अधिकार मिले क्या कभी। जवाब नहीं देते ये  शासक हैं सबसे सवाल करते हैं औरों पर सवाल उठाते हैं खुद जवाब नहीं देते हैं। 

मुझे जाने क्यों आज आपातकाल की घटना फिर से दोहराई जाती नज़र आई , 25 जून 1975 की आधी रात को जो जैसे इंदिरा गांधी ने किया उसी तरह से दिन दहाड़े कश्मीर में मोदी सरकार ने कर दिखाया। ठीक उसी तरह से इनकी पसंद के बड़े पद पर बिठाये लोगों ने ख़ामोशी से सब करने में साथ दिया। याद आया लव-कुश सीरियल में राम याद करते हैं ताज पहनते समय शपथ ली थी , शपथ इन सभी ने भी ली हुई है न्याय बिना पक्षपात और संविधान और सभी के अधिकारों की रक्षा करनी है। ये कलयुग की नई लिखी रामायण है और कलयुगी राजनीति का नया अध्याय है। अब सरकार दावा करती है कुछ पांच-सात साल दे दो कश्मीर को बदल कर दिखा देंगे। पचास दिन मांगते थे पांच साल बीत गए अच्छे दिन खो गए नहीं मिले जनता को , बंद हैं भाजपा की तिजोरी में तभी विश्व की सबसे अमीर पार्टी बन गई है। हद तो ये है अब सरकार की किसी बात पर सवाल करते ही आपको कटघरे में खड़ा कर देते हैं। सेवक बनकर चौकीदार होने का दम भरते रहने के बाद इस बार कहते हैं फकीर हैं और आजकल कलयुग के भिक्षुक जितना भी मिल जाये लालच मिटता नहीं है। चार दिन पहले तीन तलाक कानून बन गया मगर तलाक से पहले निकाह की बात होती है उनको बाद में याद आई तो निकाह की रस्म कुछ ऐसे निभाई है।

                        कबूल  ? कबूल  ? कबूल ? (  जवाब ? )

  निकाह हो गया सब खुश हैं अब कोई फासला नहीं रहा। तीन तलाक खराब था मान लेते हैं मगर गठबंधन तो ख़ुशी रज़ामंदी से होता। जिनकी बात है उनकी आवाज़ बंद है उनको कुछ सुनाई भी नहीं देता और मुंह पर ताला लगा है बोल भी नहीं सकते। निकाहनामा तीन बार कबूल है कबूल है कबूल है पूछने और जवाब हां कबूल है हां कबूल है हां कबूल है मिलने के बाद दोनों की रज़ामंदी से होता है। मगर अपने अपने आप नियम बदल दिया है कि आवाज़ सुनाई देने की ज़रूरत नहीं है सर हिलाया था आपका भरोसे का गवाह गवाही दे देगा और सब ठीक हो गया समझ लिया जाएगा। ये भी होता है जिस को हासिल करना चाहा कोशिश की बहुत दिन तक साथ सरकार चलाई सत्ता की कुर्सी से प्यार हुआ। जब नहीं मानी तो अपहरण करने की परंपरा रही है ताकत से अपना बनाने की। जंग में सब जायज़ है मुहब्बत उनकी समझ की बात नहीं जिनको खुद से अच्छा कोई लगता ही नहीं है। 

    सरकार की साख कम होती जा रही थी चुनाव जीतने के बाद भी लगता था खेल तमाशे और जाने क्या क्या हथकंडे आज़मा कर सत्ता फिर हासिल कर ली मगर देश की जनता को नज़र कुछ नहीं आता किया क्या है अभी तक। झांसे में आकर भावना में बहकर या फिर विवशता कोई सही विकल्प ही नहीं मज़बूरी है जानते हैं हालात कितने बिगड़े हुए हैं। ज़ोर का धमाका करना ज़रूरी है ताकि शोर में चीख पुकार दब कर रह जाए। जिस तन लागे वो ही जाने कश्मीर की जनता को छोड़ सब खुश हैं जैसे उनको कश्मीर मिल गया है जबकि वास्तव में कश्मीर था ही अपना शायद अब भरोसे की दीवार में दरार आने का डर है। गांव की पंचायत कभी निर्णय करती है जिस ने किसी लड़की से बलात्कार किया उसी के साथ शादी करने का। क्या कोई महिला उस को जीवनसाथी मान कर आदर विश्वास करेगी नहीं जानते ये लोग फरमान जारी करते हैं। 

         ये रिवायत भी कमाल है सरकार महीनों  सालों गुनहगार को पकड़ने सज़ा देने में नाकाम रहती है अपराधी पहले बलात्कार फिर कत्ल  फिर सबूत मिटाने का काम करते रहते हैं। जब बदनामी हद से बढ़ जाती है तो सरकार संवेदना जताने जाती है मुआवज़ा देने की रकम खासी बड़ी रखी जाती है ज़ख्म भरते नहीं फिर से हरे हो जाते हैं। मगर सरकार सहानुभूति जताकर समझती है जिस पर अन्याय हुआ उसको राहत मिल होगी। ये जो बिना कबूलनामे निकाह अंजाम दिया है कुछ उसी तरह की बात है। सबको लगता है जन्नत मिल गई है दुल्हन मायके से ससुराल आने की देर है। दुल्हन के मन की बात कोई नहीं जनता न कोई समझता है। सब चाहते थे ये होना चाहिए मगर ज़ोर ज़बरदस्ती और रज़ामंदी का फर्क होता है। चलो शायद दुल्हन स्वीकार कर लेगी उसके अपने नसीब की लिखी बात को। लिखने वाले ने लिख दी तकदीर।

  सबसे गहरी बात आज के टीवी सीरियल लव-कुश में ये थी कि लक्ष्मण अपने भाई राम को कहता है मुझे तो लगा था अपनी पत्नी पर बुरी नज़र डालने और उसका स्पर्श करने वाले को अपने मार दिया है। लेकिन अब देख रहा हूं मरने के बाद भी आपके मन में ज़िंदा है रावण तभी पति - पत्नी के संबंध के बीच खड़ा हुआ है। कितना बड़ा सच है हमने रावण के पुतले को जलाने की परंपरा में उसको मरने नहीं दिया है। हमारे भीतर का रावण ज़िंदा है मगर राम शायद हमारे अंदर है ही नहीं , राम राम जपने से कुछ नहीं होता राम को जानना भी ज़रूरी है।

POST : 1170 महानता पाने की चाहत ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       महानता पाने की चाहत ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   पढ़ तो इक किताब से इक कहानी रहा था मगर कुछ शब्द पढ़कर सोचने की ज़रूरत महसूस हुई। कहानी में इक किरदार दूसरे को कहता है आपने अमुक धार्मिक किताब तो पढ़ी हुई है। किताब का नाम नहीं बता रहा अन्यथा सुनकर खुद उनको शर्मिन्दगी होगी जिस की जय जयकार करते हैं उसी को लेकर लिखी किताब की बात नहीं समझते। शब्द जो लिखे हुए हैं वो ये हैं , तुम मुझे छोटा बनाने की लाख कोशिश करो तुम्हारा बौनापन कम नहीं होने वाला। ऊंचे सिंघासन पर बैठने से अपने सामने नीचे बैठे लोगों से बड़े नहीं बन जाते और महान तो कदापि नहीं। ताकत से सेना के दम पर आवाम के दिलों को नहीं जीत सकते तुम जंग में किसी को हराकर भी विजयी नहीं होते अगर राज्य की जनता के दिलों में आदर नहीं भय या आतंक है। शासक की सफलता राज्य की सत्ता की ताकत या विस्तार से नहीं राज्य के निवासी लोगों की खुशहाली और राजा पर विश्वास करने से आंकते हैं। इक दोहा याद आता है :-

          बड़े बढ़ाई न करें बड़े न बोलें बोल , रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मेरो मोल। 

बड़बोलापन छोटा साबित करता है बड़ा नहीं बना सकता है। मगर आजकल हर कोई अपनी कीमत खुद ही बताता है। क्या क्या नहीं करते हैं अपनी शोहरत का डंका पीटने को , बात केवल राजनीति की नहीं है। हर लिखने वाला हर खबर देने वाला चैनल अख़बार हर शिक्षा देने का कारोबार करने वाला स्वास्थ्य सेवा का व्यौपार करने वाला योग से लेकर दाल चावल सौंदर्य प्रसाधन बेचने वाले से छोटे से शहर गांव का अधिकारी या चुना हुआ अथवा मनोनीत किया व्यक्ति नेता खुद को किसी से कम नहीं समझता है। हर शायर देश विदेश जाकर पैसा वाह वाह लूट सकता है मगर ग़ालिब मीर नहीं हो सकता है। सत्ता की बुलंदी की शोहरत वैसे भी भरोसा नहीं कब जिस शाख पे बैठे हैं वो टूट भी सकती है इक शायर कहता है। 

मुझे इक जन्म दिन पर किसी अपने ने डायरी दी थी जिस पर लिखा था , अगर शोहरत पाने की ख्वाहिश करते हैं तो वो इक गुनाह की तरह है। शोहरत आपको अपने आप मिलेगी आपके वास्तविक काम से और काबलियत से। शासक को राज्य की जनता की भलाई करने पर ध्यान देना चाहिए और नागरिक की खुशहाली से अच्छे राज को आकंते हैं। इतिहास लिखने वाले कभी हरने वाले के पक्ष की बात को उजागर नहीं करते अन्यथा उनको रामायण में लिखना पड़ता उसने अपनी लंका सोने की कैसे बनाई थी। रावण ने सीता का हरण क्यों किया था उस के साथ राम के अपनी पत्नी जो रानी थी को अग्नि परीक्षा के बाद भी वन क्यों भेजा था। अपनी पत्नी को न्याय नहीं देने उसका बिना अपराध त्याग करने वाले से राज्य की महिअलों को भला कैसा न्याय मिलता होगा। शासक राम नाम की रट लगाते हैं मगर उनकी कही बात को जानते ही नहीं हैं। रावण को हराने के बाद भी राम उनसे सीख लेने को भाई लक्ष्मण को क्यों भेजते हैं। खुद राम चाहते तो ताज पाने के बाद पिता के दिए वचन को निभाने की औपचारिकता निभा सकते थे लाव लश्कर के साथ बनवास को भी अपने लिए अवसर बना सकते थे या सत्ता मिलते अधिकार का उपयोग कर माता से ही वचन के बदले कुछ और मांगने को कह सकते थे। लेकिन उन्होंने परंपरा को निभाया क्योंकि हर शासक को पिछले शासक के दिए वचन संधि को निभाना होता है। लेकिन आजकल अपने से पहले के शासक की कमियां निकालने और उसको बुरा या छोटा साबित करने की बात होती है जो वास्तव में चांद सूरज पर थूकने की बात है।

 हर शासक को विरासत में जो थाती मिलती है उसको सहेजना संभालना संवारना होता है। न्याय का आधार ही सभी बड़े छोटों की समानता है अपने खास लोगों को पद बांटना सत्ता का मनमाना दुरूपयोग करना अनुचित तो है ही नाकाबिल लोगों को अधिकार देकर देश राज्य को विनाश की तरफ ले जाना भी है। शासक की महानता उसके बनवाये महल या सतंभ नहीं होते हैं उसके शासन में नागरिक को मिले अधिकार बताते हैं उनकी वास्तविक पहचान। किसी धोबी के झूठे आरोप लगाने पर अपनी पत्नी का त्याग करना क्या था समय उसकी व्याख्या दोनों पक्ष समझ करेगा। नागरिक की आमजन की राय जनमत को शासकीय न्याय से अधिक महत्व देना भी और उसी के साथ इक नारी को बिना अपराध निष्कासित करने पर सवाल उठना भी। मगर शासक को खुद को महान बनाने को कोई काम या निर्णय नहीं करना होता है उसके निर्णय से देश को भविष्य में क्या मार्गदर्शन मिलेगा इस से तय होता है।

  धार्मिक किताब में लिखा हुआ है कि पूर्वज की अच्छी बातों से सबक लेना चाहिए उनके आधार पर खुद को बदले में कुछ पाने की चाहत नहीं रखनी चाहिए। आपको माता पिता से हुई भूल का सुधार करने का फ़र्ज़ निभाना है और उनकी अच्छी बातों को अपनाना है। अपने पिता या पूर्वज से किसी को मुकाबला नहीं करना चाहिए क्योंकि उनके हालात और समय आपके हालात और समय से अलग हैं। पिछली सरकार की या सत्ताधारी की कमियां गलतियां बताने से आपकी अच्छाई साबित नहीं होती है। इतिहास ने उनको अच्छा नहीं बताया है जो खज़ाना अपने खुद पर खर्च नहीं करते थे बल्कि उनको अच्छा माना जो औरों की सहायता करने नागरिक के दर्द समझने का काम रहम दिली से करते थे। मगर अच्छा कर्म महान कहलाने को नहीं किया जाता है जैसे कई लोग माता पिता के नाम पर दान देने का कार्य करते हैं अपनी शोहरत की खातिर। वास्तविक दान वही होता है जिसका डंका नहीं पीटा जाता चुपके से किया जाता है मानवीय धर्म समझ कर। बदले में कुछ भी चाहना धर्म के खिलाफ है और उसको दान धर्म नहीं व्यौपार समझते हैं। रहीम से सीख ली जा सकती है दो दोहे इस बारे में हैं। गंगभाट कवि थे रहीम जागीर के मालिक बनकर हर किसी को सहायता देते थे मगर गंगभाट ने देखा जिसकी सहायता कर रहे होते हैं उसकी तरफ नहीं नीचे को आंखे झुकाकर दान देते हैं। उन्होंने सवाल किया रहीम से इक दोहा पढ़कर और रहीम ने दोहे से उनको जवाब दिया था दोनों दोहे पढ़ कर फिर समझते हैं अर्थ को।

गंगभाट :-

सिखियो कहां नवाबजू ऐसी देनी दैन , ज्यों ज्यों कर ऊंचो करें त्यों त्यों नीचे नैन। 

अर्थात नवाब साहब ये आपका अजीब तरीका लगता है जब भी किसी को कुछ सहायता देते हैं उसकी तरफ नहीं देखते अपनी नज़रें नीचे को झुकी हुई होती हैं। 

रहीम :-

देनहार कोऊ और है देवत है दिन रैन , लोग भरम मोपे करें याते नीचे नैन। 

अर्थात देने वाला तो कोई और है अर्थात ऊपर वाला मुझे देता है मैं तो उसका दिया आगे सौंपता हूं अमानत की तरह मगर लोग लेने वाले समझते हैं मैं देता हूं इस बात से मेरी नज़र झुकी रहती है। 

अब विचार करें ये राजनेता तो कोई नवाब नहीं विरासत नहीं मिली बाप दादा से कोई। जो भी है देश की जनता का है उसी से मिलता है कर वसूल कर के। खुद जनता के पैसे से शान से रहते हैं कोई उपकार नहीं किया करते जब देते हैं कुछ भी किसी को या कोई भी काम करते हैं अपनी जेब से नहीं देश की मालिक जनता के खज़ाने से। फिर इश्तिहार अपने नाम से हमने क्या क्या किया है , ये बड़ा होना नहीं छोटा बनना है।  
  
  

अगस्त 04, 2019

POST : 1169 आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक - आलेख - डॉ लोक सेतिया

 आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक - आलेख - डॉ लोक सेतिया

        बहुत देर कर दी मेहरबां आते आते। जब तथाकथित आधुनिक तौर तरीके एफआईआर से लेकर सीएम पीएम को शिकायत करने को लेकर दावे किये जाते हैं यहां तक कि हरियाणा जैसे राज्य की सरकार करोड़ों रूपये खर्च करती है बताने को कि कितनी संख्या की शिकायत का निवारण किया जा चुका है देश की सरकार ऐप्स से लेकर ट्विटर तक पर आपकी बात सुनती है। उन्नाव की महिला की शिकायती चिट्ठियां तीस चालीस जगह रद्दी की टोकरी में फेंकी जा चुकी होती हैं और सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर ये बताने के बाद देश की सबसे बड़ी अदालत के मुख्य न्यायधीश अपने दफ्तर से पता करते हैं और जागते हैं करवाई करने को। अदालत को बड़ी आलीशान इमारतों की नहीं इंसाफ करने और इंसाफ किया जाता है भरोसा कायम करने की अधिक ज़रूरत है। काश न्यायपालिका से जुड़े लोग विलंब से न्याय मिलना अन्याय ही होता है इस बात को समझते और चरमराती व्यवस्था को बचाने को संवेदनशील होकर काम करते न कि जब गली गली शोर है और सब जानते हैं सत्ताधारी दल सबसे अधिक अपराधी लोगों को विधायक सांसद बनाने का गंभीर अपराध करता है बाकी सभी दल भी उसी राह चलते हैं। राजनीति अड्डा बन गई है अपराध का। मगर हमारी पुलिस कितने विभाग इस सब से बेपरवाह नाच गाने की महफ़िल सजाते हैं किसी नाम से। आज भी हरियाणा में मेरे शहर में पुलिस राहगीरी नाम से मौज मस्ती नाचने झूमने रागनी गाने से लेकर योग का मसाला शामिल कर किसी चाटमसाले की तरह सब परोसने को लगा है जब कनून व्यवस्था की हालत सबके सामने है। मगर उनको उन्नाव या किसी और जगह की घटना से सीखना नहीं जब अपने राज्य शहर की घटना होगी तब देखा जाएगा। वास्तविक कर्तव्य को दरकिनार कर आडंबर तामाशे करना आसान है और सत्तधारी नेता भी यही चाहता है। शायद अभी भी नेताओं अधिकारियों को कोई कमी नज़र आती है कानून व्यवस्था की बदहाली में कोई कसर बाकी है। शर्म की बात तो कोई नहीं करता शर्म किसी और ज़माने की बात है।

     देश से जनता से किसी भी दल को कुछ भी सरोकार नहीं है सबका एक ही मकसद है सत्ता हासिल करना और सत्ता को किसी भी तरह से जाने नहीं देना। ऐसी मानसिकता के चलते देश की जनता ठगी जाती रही है और हर दल विरोधी को दोष देता रहा है अपने आप को कोई नहीं देखता क्या कथनी है और क्या वास्तविक आचरण करते हैं। देशभक्ति को ख़ास दिन झंडा फहरा कर सलामी देकर भाषण पढ़कर औपचरिकता निभाना बना दिया गया है। देश संविधान लोकमत और न्याय अन्याय की बात की चिंता नहीं बस चुनावी गणित साधना है उस के लिए गुंडे बदमाश अपराधी सबको गले लगा सकते हैं। वोट की खातिर कुछ भी करते कोई लज्जा नहीं आती बेशक समाज को बांटना पड़े लड़वाना भिड़वाना नफरत फैलाना पड़े किया जा सकता है। करोड़ों लोग बिना अपराध सज़ा पाते हैं सत्ता के अधिकार और ताकत को मनमानी करने और गुंडई करने को उपयोग किया जाता है। जानते हैं हर राज्य हर शहर गांव में सत्ताधारी नेता मनमानी करते हैं अधिकारियों के सहयोग से छूट पाकर। शायद उनको लगता है करोड़ों लोग कायर बनकर हमेशा उनके ज़ुल्म सहते रहेंगे , मगर क्या ऐसा संभव है। हमेशा सभी को मूर्ख कोई नहीं बना सकता है कभी तो हम निडर होकर उनके ऐसे आपराधिक आचरण और सत्ता की मनमानी लूट के खिलाफ डटकर खड़े होंगे। अत्याचारी की अत्याचार की किसी सीमा के बाद तो हम अपने अधिकार अपनी आज़ादी की खातिर सामने आकर आवाज़ उठाएंगे। 



POST : 1168 दोस्ती से दुश्मनी प्यार से नफरत तक ( फेसबुक से व्हाट्सएप्प तक ) डॉ लोक सेतिया

दोस्ती से दुश्मनी प्यार से नफरत तक ( फेसबुक से व्हाट्सएप्प तक ) 

                               डॉ लोक सेतिया 

 करीब सात साल का अनुभव है सोशल मीडिया पर इत्तेफ़ाक़ से नहीं अनजाने से शामिल हो गया था। कंप्यूटर पर लिखने की आदत शुरू की थी पता नहीं कब कैसे सामने ऑप्शन आया फेसबुक का और नासमझी में क्लिक करते करते फेसबुक में शामिल हो गया। समझ नहीं था क्या बला है कुछ भी नहीं जानता था बस नोटिफ़िकेशन मिलते रिक्वेस्ट भेजी किसी ने। याद नहीं था पासवर्ड भी और कैसे उपयोग करते हैं ये भी। मुझे कोई बात नहीं मालूम हो तो समझने या पूछने में संकोच नहीं किया करता और किसी ने बताया दोस्त बनाते हैं दोस्ती की बात है अपने विचार सांझा करते हैं। बचपन से दोस्ती की या यूं कहना उचित है किसी एक सच्चे दोस्त की तलाश थी , पागलपन या ख्वाब रहा है कहीं कोई है कभी न कभी मिलेगा। उसी चाहत से मुझे फेसबुक अकाउंट बनाने का विचार आया और फिर नई फेसबुक बनाई। अच्छी खराब कई बातें हुईं और कभी मोहभंग होने पर छोड़ दिया कभी दोबारा फिर वापस चला आया , नशा नहीं है मगर इक ज़रूरत बन गई। ब्लॉग से रचनाएं शेयर करने की आदत बनती चली गई। दोस्त बनाता रहा हटाता भी बहुत जल्दी था जब कुछ बातें जो मंज़ूर नहीं थी कोई आपत्तिजनक आचरण करता तब नहीं सहन होता था। खैर हर जगह कुछ पसंद कुछ नापसंद की बात होती रहती हैं धीरे धीरे अपना लिया था मगर आज सोच रहा हूं जब इस तथाकथित सामाजिकता की बस्ती में आया था तब से अभी तक कितना बदलाव हुआ है इस में। 

      आज साफ कहूं तो घबराहट होती है बेचैनी होती है डर सा लगता है ये देख कर कि फेसबुक व्हाट्सएप्प पर दोस्ती की नहीं दुश्मनी की मुहब्बत की नहीं नफरत की बात दिखाई देती है। जाने कैसी उल्टी पढ़ाई पढ़ रहे हैं कि लोग या तो किसी की चाटुकारिता करते हैं या फिर नफरत फैलाने का काम करते हैं। मुझे बड़ी हैरानी होती है अच्छी पढ़ाई लिखाई अच्छे व्यवसाय में शामिल देखने में बेहद शालीन लगने वाले सभ्य कहलाने वाले लोग अपने भीतर दिमाग़ में कितना ज़हर पाले हुए हैं। मज़हब के नाम पर धर्म को समझे जाने बिना धर्म के ठेकेदार बनकर देश को समाज को विभाजित करने की बातें करते हैं मगर समझते हैं देश समाज से प्यार करते हैं। खुद गुमराह हैं औरों को भी गुमराह करने का काम करते हैं। भटके हुए लोग दावा करते हैं मार्गदर्शन करते हैं। 

               सोशल मीडिया का वास्तविक मकसद था सामाजिकता की बात करना आपसी मेल मिलाप बढ़ाना विचारों का आदान प्रदान करना जानकारी हासिल करना। मगर तमाम लोगों ने इसका उपयोग ठीक बंदर के हाथ उस्तरा होने की तरह किया है। कोई सोचता समझता नहीं इस से किसी पर कैसा असर पड़ेगा , अफवाह और अधकचरी गलत जानकारी को सच समझना और झूठ सच को परखे बिना यकीन ही नहीं करना बल्कि औरों को भी अपनी मर्ज़ी की व्याख्या समझने को विवश करना जैसे बातें होने लगी हैं। हैरानी की बात है टीवी चैनल वालों को ये भी चर्चा का बढ़ावा देने का सनसनी पैदा करने टीआरपी बढ़ाने का माध्यम लगा जो हर कोई विशेष नाम से किसी सोशल मीडिया के वीडियो की वास्तविकता असली नकली साबित करने को जासूसी उपन्यास की तरह कौतूहल पैदा करने की बात करता है और हम उसे मनोरंजन समझते हैं जो वास्तव में हमारी सोच को कुंद करने का काम करता है। राजनीतिक दलों ने चुनावी गणित साधने को जितना गलत इस्तेमाल सोशल मीडिया का किया है उसे निजता का हनन और अभिव्यक्ति के अधिकार का दुरुपयोग अपने स्वार्थ की खातिर किया है। अख़बार में या किसी किताब में लिखी बात की सत्यता को परखा जा सकता है मगर सोशल मीडिया पर कौन क्या झूठ गलत जानकारी देकर आपसी भाईचारा खराब कर तनाव पैदा करने का अनैतिक आचरण करता है कोई परखता नहीं और विश्वास करते हैं इस तरह से पेश किया जाता है। 

देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए अनुचित है कि राजनैतिक दल जनता से संवाद करने को आमने सामने मिलने की जगह एकतरफा अपना पक्ष थोपने का काम करने लगे हैं। असंवैधानिक है ये बहस सोशल मीडिया पर करवाना किसको जीत हार वोट देने का विषय पोस्ट पर करना किसी का समर्थन या विरोध करने को। क्यों अनावश्यक आपत्तिजनक ढंग से जनमत को अपनी साहूलियत से बदलने की कोशिश करनी चाहिए। हद है अब राजनैतिक दल सोशल मीडिया का माहौल अपने पक्ष में बनाने को झूठी लाखों फेसबुक या कुछ लोगों को फोन और पैसे देकर व्हाट्सएप्प  पर उनकी महिमा के संदेश भेजने का फरेब करते हैं और उनको भरोसा है चुनाव इस तरह से लड़ा और जीता जा सकता है।


POST : 1167 दोस्ती का अर्थ किस्से कहानियां ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   दोस्ती का अर्थ किस्से कहानियां ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

दोस्त दोस्ती मेरे लिए दुनिया से सबसे महत्वपूर्ण यही संबंध है । मेरा तो सारा लेखन ही दोस्त और दोस्ती  के नाम है । कविता कहानी ग़ज़ल आलेख क्या नहीं लिखा । बहुत दोस्त मिले बिछुड़े हैं फिर भी अभी भी मुझे उस सच्चे दोस्त की खोज है जो साथ हो तो कुछ भी और नहीं चाहिए । दोस्त से बढ़कर कीमती कोई चीज़ दुनिया की नहीं हो सकती है । दो शब्दों में दोस्त मिल जाये तो भगवान की भी ज़रूरत नहीं है । आज संक्षेप में बताना है आज के दिन पर दोस्ती का अर्थ क्या है । पहले कुछ रचनाओं को फिर से पढ़ते हैं । 
 

और कुछ भी नहीं बंदगी हमारी : - लोक सेतिया "तनहा"

और कुछ भी नहीं बंदगी हमारी 
बस सलामत रहे दोस्ती हमारी ।

ग़म किसी के सभी हो गए हमारे 
और उसकी ख़ुशी अब ख़ुशी हमारी ।

अब नहीं मांगना और कुछ खुदा से 
झूमने लग गई ज़िंदगी हमारी ।

क्या पिलाया हमें आपकी नज़र ने 
ख़त्म होती नहीं बेखुदी हमारी ।

याद रखनी हमें आज की घड़ी है 
जब मुलाक़ात हुई आपकी हमारी ।

आपके बिन नहीं एक पल भी रहना 
अब यही बन गई बेबसी हमारी ।

जाम किसने दिया भर के आज "तनहा" 
और भी बढ़ गई तिश्नगी हमारी ।  


दोस्त भूले दोस्ती हम क्या करें  : - लोक सेतिया "तनहा"

दोस्त भूले दोस्ती हम क्या करें 
बन गए सब मतलबी हम क्या करें ।

प्यार से देखा हमें जब आपने 
ले गई दिल सादगी हम क्या करें ।

अब बताएं सब हुस्न वाले हमें 
जब सताए आशिकी हम क्या करें ।

एक दिन हम ढूंढ ही लेते खुदा 
खो गई है ज़िंदगी हम क्या करें ।

दिल हमारा लूट कर कल ले गईं 
सब अदाएं आपकी हम क्या करें ।

प्यार उनको जब रकीबों से हुआ 
फिर हमारी बेबसी हम क्या करें ।

आज कितना दूर देखो हो गया 
आदमी से आदमी हम क्या करें ।

सब परेशां लग रहे इस शहर में 
हम यहाँ पर अजनबी हम क्या करें ।

आज "तनहा" मार डालेगी तुम्हें 
अब किसी की बेरुखी हम क्या करें । 


जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर  : - लोक सेतिया "तनहा"

जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर 
हमारा भी इक दोस्त होगा कहीं पर ।

यही काम करता रहा है ज़माना 
किसी को उठा कर गिराना ज़मीं पर ।

गिरे फूल  आंधी में जिन डालियों से  
नये फूल आने लगे फिर वहीं पर ।

वो खुद रोज़ मिलने को आता रहा है 
बुलाते रहे कल वो आया नहीं पर ।

किसी ने लगाया है काला जो टीका 
लगा खूबसूरत बहुत उस जबीं पर ।

भरोसे का मतलब नहीं जानते जो 
सभी को रहा है यकीं क्यों उन्हीं पर ।

रखा था बचाकर बहुत देर "तनहा" 
मगर आज दिल आ गया इक हसीं पर ।


मिला था कभी इक पैगाम दोस्ती का : - लोक सेतिया "तनहा"

मिला था कभी इक पैगाम दोस्ती का 
हमें अब डराता है नाम दोस्ती का ।

बुझाता नहीं साकी प्यास क्यों हमारी 
कभी तो पिलाता इक जाम दोस्ती का ।

नहीं दोस्त बिकते बाज़ार में कभी भी 
चुका कौन पाया है दाम दोस्ती का ।

करेगा तिजारत की बात जब ज़माना 
रखेंगे बहुत ऊँचा दाम दोस्ती का ।

हमें जीना मरना है साथ दोस्तों के 
सभी को है देना पैग़ाम दोस्ती का ।

वफ़ा नाम देकर करते हैं बेवफाई 
किया नाम "तनहा" बदनाम दोस्ती का ।


ये सबने कहा अपना नहीं कोई  : - लोक सेतिया "तनहा"

ये सबने कहा अपना नहीं कोई 
फिर भी कुछ दोस्त बनाये हमने ।

फूल उनको समझ कर चले काँटों पर 
ज़ख्म ऐसे भी कभी खाये हमने ।

यूँ तो नग्में थे मुहब्बत के भी 
ग़म के नग्मात ही गाये हमने ।

रोये हैं वो हाल हमारा सुनकर 
जिनसे दुःख दर्द छिपाये हमने ।

ऐसा इक बार नहीं , हुआ सौ बार 
खुद ही भेजे ख़त पाये हमने ।

हम फिर भी रहे जहां में "तनहा" 
मेले कई बार लगाये हमने ।  


   मेरी जान , मेरे दोस्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

अक्सर आता है मुझे याद 
पहला दिन कालेज का
झाड़ियों के पीछे
पत्थरों पर बैठे हुए थे
हम दोनों कालेज के लान में ।

रैगिंग से हो कर परेशान 
कितने उदास थे हम 
कितने अकेले अकेले
पहले ही दिन कुछ ही पल में
हम हो गये थे कितने करीब ।

अठारह बरस है अपनी उम्र 
आज भी लगता है कभी ऐसे
कितनी यादें हैं अपनी
जो भुलाई नहीं जाती 
भूलना चाहते भी नहीं थे
हम कभी ।

पहली बार मुझे
मिला था दोस्त ऐसा 
जो जानता था
पहचानता था
मुझे वास्तव में ।

बीत गये वो दिन कब जाने
छूट गया वो
शहर उसका बाज़ार
गलियां उसकी ।

बरसात में भीगते हुए  
हमारा कुछ तलाश करना
बाज़ार से तुम्हारे लिये 
खो गई सपनों जैसी
प्यारी दुनिया हमारी ।
 
मगर भूले नहीं हम
कभी वो सपने
जो सजाए थे मिलकर कभी 
अचानक तुम चले गए वहां
जहां से आता नहीं लौटकर कोई ।

मुझे नहीं मिला
फिर कोई दोस्त तुम सा 
खाली है मेरे जीवन में
इक जगह
रहते हो अब भी तुम वहां ।

आज भी सोचता हूँ
जाकर ढूंढू 
उन्हीं रास्तों पर तुम्हें जहां
चलते रहे दोनों यूं ही शामों को
अब कहां मिलते हैं
इस दुनिया में तुझसे दोस्त ।

अब क्या है इस शहर में
इस दुनिया में
बिना तेरे मेरी जान मेरे दोस्त ।


साया ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

पी लेता हूं 
यूं तो अक्सर
ज़िंदगी का
मैं ज़हर ।

जाने क्यों
फिर भी कभी
भर आती हैं आंखें 
और घुटने
लगता है दम ।

रोकने से
तब रुकते नहीं
आंखों से आंसू
तनहाई में अक्सर ।

मन करता है
जा कर पास तुम्हारे
चुप चाप बैठ कर
जी भर के रो लेने को ।

सोचता हूं 
मैं कभी कभी
अकेले में ये भी
जिसकी तलाश है मुझे 
तुम वही हो कि नहीं ।

भीगी पलकों के
हम दोनों के शायद
इस नाते को कभी
मैं नहीं कोई भी
नाम दे पाया ।

तुम्हें भी
याद आता है कभी
छत के कोने में देर रात तक
राह तकता हुआ
गुमसुम सा
खड़ा कोई साया । 

ऊपर की रचनाओं से कुछ समझ आया होगा ,  लिखा हुआ बहुत है कहानियां भी बड़ी बड़ी मगर अब थोड़े में असली बात कहना चाहता हूं । कुछ मिसालें भी हैं फिल्म से और कथा कहानियों से लेकर । दोस्त साथ रहें या दूर भी कभी दोस्ती कायम रहती है । बात फिल्मों से की जाये तो दोस्ती फिल्म की कहानी गीत सभी दोस्ती को समझने को बहुत हैं । दोस्ती की खातिर कुछ भी करते हैं कोई एहसान कोई क़र्ज़ नहीं समझते हैं । बाकी हर रिश्ते नाते में हिसाब होता है दोस्ती में कभी हिसाब किताब नहीं होता है । संगम फिल्म में दोस्त जिसको चाहता है अपनी चाहत उस पर कुर्बान कर देते हैं जान भी दे देते हैं हंसते हंसते । आदमी फिल्म में भी यही दोहराया गया था चौदवीं का चांद फिल्म में दोस्ती की खातिर नायिका से जाने बिना विवाह करने के बाद जब पता चलता है कि गलती से दोस्त ने खुद जिसको पसंद करता उसी से विवाह करने को कह दिया तो हर रिश्ते से पहले दोस्त की ख़ुशी ज़रूरी लगती है । कृष्ण अर्जुन की दोस्ती और सुदामा की दोस्ती दोनों अपनी जगह हैं मगर कर्ण की दोस्ती गलत होने पर भी दोस्त का साथ जंग में देना अपनी जगह है । इतिहास में भी दोस्त शासक को खरी बात कहने से नहीं डरते ऐसा मिलता है और सही मार्गदर्शन आपका सच्चा हितेषी दोस्त ही हो सकता है । शोले फिल्म की जय वीरू की दोस्ती भी याद रहती है और जंज़ीर फिल्म में इक गुंडे की पुलिस अधिकारी से दोस्ती उसको क्या से क्या बना देती है । फिल्मों ने दोस्ती पर कई लाजवाब गीत दिए हैं ।

यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िंदगी । कोई जब राह न पाए मेरे संग आये कि पग पग राह दिखाए मेरी दोस्ती मेरा प्यार । दोस्ती में निराशा भी मिलती है और कभी कोई गलतफ़हमी भी मगर सच्ची दोस्ती कभी मिटती नहीं है । जो लोग मतलब से दोस्ती करते हैं या अनबन होने पर दुश्मनी करने लगते हैं कभी सही मायने में दोस्त नहीं होते । जिनके पास अच्छे दोस्त होते हैं दुनिया के सबसे खुशनसीब और धनवान लोग वही होते हैं । इतना बहुत है कहा तो बहुत जा सकता है मगर आज दोस्तों को दोस्ती के शुभ दिन की बधाई और शुभकामना संदेश इतना ही है कि इक सच्चा दोस्त हज़ार रिश्तेदारों से बढ़कर है अपने दोस्त को संभाल कर रखना खो नहीं जाये कहीं कोई भी । 

           एहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तो , ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तो । 
 
 
 Dosti Shayari in Hindi: दोस्तों के लिए सबसे अच्छी और बेस्ट दोस्ती शायरी


 

अगस्त 02, 2019

POST : 1166 पहुंचे हैं कहां मालूम नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    पहुंचे हैं कहां मालूम नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

आज की बात से पहले इक ग़ज़ल कैफ़ी आज़मी जी की कहना चाहता हूं विषय को समझने को उचित है। 

मैं ढूंढता हूं जिसे वो जहान नहीं मिलता , 

नई ज़मीन नया आसमान नहीं मिलता। 

नई ज़मीन नया आसमान भी मिल जाये , 

नये बशर का कहीं कुछ निशान नहीं मिलता। 

वो तेग मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मेरा , 

किसी के हाथ का उस पर निशां नहीं मिलता।

जो इक खुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्या , 

यहां तो कोई मेरा हमज़बां नहीं मिलता। 

खड़ा हूं कब से मैं चेहरों के एक जंगल में , 

तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहां नहीं मिलता। 

         आज जो बात कहनी है वो किसी एक की नहीं सारे समाज की है। साहित्य हो राजनीति हो धर्म हो समाज सेवा कोई कारोबार हो या कोई शिक्षा स्वस्थ्य समाज सेवा का क्षेत्र हो अजीब विसंगती है विडंबना है खेद की चिंता की बात है कि अपना योगदान देकर उसको समृद्ध कोई नहीं करना जनता हर कोई उस से बहुत कुछ हासिल करने को व्याकुल है। क्या हम सब इतने खाली हो चुके हैं जो जितना भी भरता रहे कोई भी फिर भी खालीपन ख़त्म नहीं होता है। ये देश समाज कभी ऐसा तो नहीं था जो सिर्फ मांगता है छीनता है देता किसी को कुछ भी नहीं है। ये कैसी हवस है और अधिक पाने की जो बढ़ती जाती है , ऊंचे से ऊंचे सिंहासन पर बैठा व्यक्ति भी वास्तव में बहुत छोटा है देना नहीं पाना चाहता है। राजनीति में लोग देश को सेवाएं देने नहीं अपने लिए धन साधन अधिकार शोहरत ताकत पाने को आते हैं। अर्थात हर कोई भिखारी है मांगता है देश को देने को पास है ही नहीं कुछ भी। 

धर्म वालों की हालत इतनी खराब है कि उपदेश देते हैं संचय नहीं करें गरीब दर्दमंद की सहायता करें मगर खुद धन दौलत का जायदाद का अंबार लगाने को लगे हैं। समाज सेवा या सरकारी नौकरी हो कर्तव्य नहीं अधिकार याद रहते हैं और उनका दुरूपयोग करना अनुचित नहीं लगता है। नैतिकता का पतन इस सीमा तक हो चुका है कि अपने पद की गरिमा को भी संभाल नहीं पाते हैं। जो जितना धनवान कारोबारी है उसको उतनी ही ज़्यादा भूख और किसी भी तरह पाने की है। हर कोई चलता है बड़े होने का मकसद लेकर मगर ऊपर जाने को नीचे गिरने से संकोच कोई नहीं करता है। खुद आत्मसम्मान स्वाभिमान को खोकर किसी की चाटुकरिता कर क्या हासिल किया नहीं समझते हैं। अंतरात्मा को ज़मीर को मारकर ज़िंदा रहना मौत से बदतर है। 

नहीं मिलता कुछ भी। जिस जहान की तलाश थी नहीं मिलता। कुछ भी नयापन नहीं है नई ज़मीन नया आसमान कोई ढूंढता ही नहीं चांद तारों की बात होती है। धरती को रहने के काबिल नहीं बनाते हैं। कोई इंसान इंसान जैसा नहीं मिलता मिलती है हर किसी में छुपी हुई हैवानियत जिधर भी जाओ। चर्चा होती है सब गलत होने की अन्याय की व्यवस्था की बदहाली की , ये भी जानते हैं किस तलवार से ये खून मानवता का बहा है मगर उस तलवार पर किसी क़ातिल के हाथ का निशां नहीं मिलता है। आपको खुदा अल्लाह की नहीं मिलने की कमी लगती है वो नहीं मिले तो मातम करने की क्या ज़रूरत है दुःख तो इसका है आदमी आदमी की बात नहीं समझता है। ये दुनिया किसी चेहरों के जंगल की तरह है मगर कोई भी चेहरा आदमियत का इंसानियत का दिखाई नहीं देता है। 

           सबको मंज़िल पानी है रास्ता कोई नहीं बनाना चाहता , शायद राह पर चलना भी नहीं चाहता कोई भी। राह की मुश्किलों को रास्ते की रुकावटों को हटाए बिना कभी कोई मंज़िल मिलती नहीं है। हम सभी बस खड़े हुए हैं ये उलझन लेकर कि कोई पूछे तो क्या बताएं कि जाना किधर है। निकले थे कहां जाने के लिए पहुंचे हैं कहां मालूम नहीं , अब अपने भटकते कदमों को मंज़िल के निशां मालूम नहीं।
 

 

जुलाई 31, 2019

POST : 1165 शहंशाहों की मुहब्बत ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      शहंशाहों की मुहब्बत ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

 शासकों की मुहब्बत की दास्तां अलग हुआ करती है। इधर मुहब्बत का रंग ढंग बदला है आशिक़ महबूबा की जान लेते हैं। इक आशिक़ी देश से मुहब्बत की भी होती है आजकल जिसका शोर बहुत है , कभी देश की खातिर जान देने वाले खुद को महान कहते नहीं थे समझते थे जन्मभुमि का हक अदा करना है उसको आज़ाद करवा कर। पहले शाहजहां मुमताज की मुहब्बत को समझते हैं इक तस्वीर पर लिखी सच्चाई को समझते हैं। 

   मुमताज शाहजहां की चौथी पत्नी थी सात पत्नियों में से और मुमताज से शादी करने को उसके पति का क़त्ल किया था उनहोंने उनके बच्चे को जन्म देते हुए छोटी आयु में मुमताज की मौत हो गई थी। जिसके बाद शाहजहां ने मुमताज की बहन से शादी कर ली थी। चलो इश्क़ मुहब्बत की बात से पहले बात करते हैं देश से मुहब्बत करने की और उसकी बदलती हुई आधुनिक परिभाषा की भी। मगर ताजमहल अपने देखा होगा कभी सोचा मुमताज को क्या मिला उसने नहीं देखा दुनिया को इक शहंशाह ने दिखाया उसकी मुहब्बत कैसी है। मगर फिर भी वो इक मज़ार है जिसमें किसी की जाने कितनी आरज़ूएं दर्द दफ़्न हैं। पत्थर कितने चमकदार हों उनमें कोई एहसास नहीं होता मुहब्बत तो बाद की बात है। साहिर ने कहा था इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक।

         उनका दावा है उन से बड़ा देशभक्त कोई नहीं है यहां तक बात पहुंची है कि जो उनकी आलोचना करता है उसकी देशभक्ति पर शक किया जाता है। शाहजहां ने मुमताज की मुहब्बत में तालमहल बनवाया था ताकि उसकी बगल में अपनी मजार मरने के बाद बनाई जाये अर्थात मरने के बाद भी उसके जिस्म को पास रखना चाहते थे और उस पर बेतहाशा धन सरकारी खज़ाने से खर्च किया गया। आज भले आमदनी होती होगी ताजमहल देखने वालों से मगर तब शासक उस धन से देश की जनता की भलाई को कितना कुछ कर सकता था। शायद शाहजहां ने फिर जन्म लिया है या इक नया शहंशाह पैदा हुआ है जो अपने शौक अपनी शोहरत की खातिर बेतहाशा धन बर्बाद करता है। लोकशाही है राजाओं का शासन नहीं सत्ता मनमानी करने को नहीं देश की समस्याओं को समझने उनका हल निकालने को मिलती है। कितने करोड़ धार्मिक आयोजन सैर सपाटे पर कितने हज़ार करोड़ पचास देशों की सैर करने पर कितना धन आडंबर करने ऊंची मूर्तियां बनवाने पर कितना धन सरकारी खज़ाने से अपने फायदे को जनता को झांसा देने को सोशल मीडिया अख़बार टीवी चैनल पर इश्तिहार देने पर खर्च किये जिनसे कितने भूखे पेट भर सकते थे कितने स्कूल अस्पताल बनवा सकते थे। केवल अपने और अपने दल के लिए शासन बनाये रखना देशभक्ति कहलाता है तो बड़ी हैरानी की बात है। सत्ता का ऐसा मोह देश से नहीं कुर्सी से प्यार कहला सकता है।

  आज देश आर्थिक बदहाली और बेरोज़गारी और हर तरह से बुरे हालात में पहुंच गया है मगर आपको फुर्सत ही नहीं पिछले शासकों को खराब बताने के अनुचित काम से। जिनकी बात करते हैं उन्होंने कभी देश पर कोई उपकार करने का दावा आपकी तरह नहीं किया था। शहीदों की शाहदत को वोट पाने का औज़ार कभी किसी ने नहीं बनाया था पहले। आपके दल के नेता आये दिन गंभीर अपराध करते पाए जाते हैं मगर आपकी ज़ुबान से दो शब्द नहीं निकलते उसको देश समाज का दुश्मन बताने को। सत्ता पाने को कितने अपराधी दल में शामिल किये हैं कोई हिसाब नहीं जैसे कोई धर्मं परिवर्तन या गंगा स्नान हो पापियों के पाप धोने को। गंगा को वादा किया था बेटा होने की बात कही थी सफाई की गंगा पहले से मैली हो गई बताते हैं। हर दिन कोई धर्म के नाम पर भीड़ बनकर दंगा करता है कोई सत्ताधारी बलात्कारी सरकारी संरक्षण पाकर पीड़ित पक्ष को और परेशान करता है। ये सुशासन है देशभक्ति है। देश से मुहब्बत हो या किसी आशिक़ की आशिक़ी दोनों इबादत की तरह होती हैं और इबादत शोर मचाकर नहीं ख़ामोशी से की जाती है। आजकल फ़िल्मी ढंग से गुलाब देकर या उपहार भेजकर किसी से प्यार का इज़हार किया जाता है और इनकार करने पर मुहब्बत नफरत में बदल जाती है। वास्तविक मुहब्बत कभी ऐसी नहीं हुआ करती है ये वासना जिस्मानी हवस है जो इधर नज़र आती है। इक गीत बहुत पसंद किया गया था , आये दिन बहार के फिल्म से। मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे। मैंने इस से बढ़कर बद्दुआ किसी को देते नहीं सुना है ये चाहत हर्गिज़ नहीं है इसको मुहब्बत नहीं कहा जा सकता कि मुझे नहीं किसी और को मिले तो हद से ज़्यादा नफरत दिल में हो जाये। जिस दिल में मुहब्बत होती है नफरत को जगह नहीं हो सकती। जिनकी देशभक्ति नफरत को बढ़ावा देती है भेदभाव की बात करती है उनकी देशभक्ति भी अपने स्वार्थ की दिखावे की हो सकती है।

   ताजमहल फिल्म बनाने के वक़्त साहिर को गीतकार बनाने को कहा गया तो उन्होंने इनकार कर दिया था। क्योंकि उनकी नज़्म कुछ और बात कहती थी और सच्चा शायर पैसे शोहरत की खातिर अपनी ज़ुबान नहीं बदल सकता है। शायर कहता है मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझको। मैं किसी शहंशाह की तरह नहीं जो मरने के बाद भी महबूबा को जकड़े रखना चाहता है। तुम मुझे ठुकरा के भी जा सकती हो तुम्हारे हाथ में मेरा हाथ है जंज़ीर नहीं। ये जिनकी देशभक्ति औरों को बंधक बनाये रखना चाहती है उसी तरह की है चाहत नहीं है मतलबपरस्ती की बात है।  इस आधुनिक शासक ने भी खुद अपनी शान दिखाने को वही दोहराया है। कुछ तस्वीरें देखते हैं।








मुस्लिम महिलाओं की बड़ी चिंता थी अच्छा है तीन तलाक को कानूनी अपराध घोषित करने को संसद में कानून बना दिया। मगर जिन महिलाओं को पति बिना तलाक छोड़ देते हैं उनका दर्द कोई कभी समझेगा। इनकी शानो शौकत देख का वो महिला जाने क्या सोचती होगी जिनको बिना कारण जनाब बेसहारा अकेली उस ज़माने में छोड़ आये थे जब छोड़ी हुई औरत का लोग जीना दूभर  देते थे। जब तक चाहा पत्नी होने की बात छुपाए रखी दस्तावेज़ में नहीं घोषित किया मगर जब लगा कहीं इसी से चुनावी नुकसान नहीं हो जाए घोषित कर दिया। चलो उनकी आपसी बात है हम कौन होते हैं।

     मगर क्या कानून बनाने से बाल मज़दूरी मिट गई दहेज लेना देना बंद हुआ और तो और बच्चों को शिक्षा का अधिकार भूखे को रोटी अनाज का अधिकार वास्तव में मिला है। कल कोई अपनी पत्नी को तीन तलाक देगा तो क्या होगा , महिला शिकायत करेगी तो शौहर जेल में बंद खुद अकेली बेसहारा और नहीं करेगी शिकायत तब तलाक  स्वीकार कर अलग। चाकू खरबूजे पर गिरे चाहे खरबूजा चाक़ू पर कटना खरबूजे को ही है। वोटबैंक के झांसे में हासिल आम नागरिक को कुछ नहीं होता है राजनीति अपना खेल खेलती है उसकी कोई संवेदना नहीं होती है।  खुदा खैर करे उन मुस्लिम महिलाओं को शायद कुछ राहत सच मिल जाये।

POST : 1164 किसी की नज़र न लगे ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया

    किसी की नज़र न लगे ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया 

पहले कुछ खूबसूरत तस्वीरों को देखते हैं। फिर समझने की कोशिश करते हैं इतनी अलग अलग अदाओं में फोटो सेशन करवाने में कितनी मेहनत कितना समय कितना पैसा लगा होगा। उस के बाद बही खाता बना कर हिसाब लगाने की नामुमकिन को मुमकिन करने की कोशिश की जाएगी। 







  शायद किसी और देश के सत्ताधारी राजनेता की पांच साल में इतनी तस्वीरें दिखाई दी होंगीं किसी को। हां हमने इक कलयुगी बाबा की ज़रूर देखीं हैं क्योंकि उसने अपनी खुद की फ़िल्में बनाई जिन में खुद ही अभिनय भी किया जाने क्या क्या नहीं किया। मगर इन जनाब का कहना है चौबीस घंटे देश की जनता की सेवा और भलाई करने का सब छोड़ छाड़कर। महिलाओं को सजने संवरने का शौक बहुत होता है और धनवान पति की आमदनी का काफी हिस्सा उनकी बनावट शृंगार मेकअप करवाने पार्लर के खर्च पर लगता है। रईस लोग ख़ुशी से पत्नी को सुंदर बनाये रखने दिखाई देने की कीमत चुकाते हैं। लेकिन भारत जैसा गरीब देश ऐसे महंगे खर्चीले शौक नहीं वहन कर सकता है। बात इतनी ही नहीं है फ़िल्मी अभिनेता नायिका को ये सब करना पड़ता है घंटों लगते हैं फिल्म की सफलता का सवाल होता है। देश की कितनी समस्याओं के बीच कैसे कोई सत्ताधारी नेता ये सब करने को समय निकाल सकता है। वास्तव में कोई कंप्यूटर हिसाब लगा सकता है ऐसे सैंकड़ों फोटो सेशन करवाने पर पांच साल में कितने महीने या शायद साल ही लगे हों। तब क्या गरीबों को लेकर केवल भाषण देने और मन की बात के नाम पर बहलाने का काम करते रहे। आधा समय तो आपका देश विदेश घूमने में ही लगता रहा। किसी भी एक व्यक्ति पर सरकारी खज़ाने से इतना बेतहाशा खर्च देश की गरीब जनता के साथ भद्दा मज़ाक नहीं तो क्या है। आपकी इतनी शानो शौकत की कीमत देश की जनता ने चुकाई है और बदले में मिला क्या है कोई नहीं जनता बस इक शोर जो हुआं हुआं जैसा लगता है।

जुलाई 30, 2019

POST : 1163 आईना धुंधला और टूटा हुआ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     आईना धुंधला और टूटा हुआ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

  कुछ दिन पहले जो अख़बार टीवी चैनल सब बढ़िया है का गुणगान करते शोर मचाते थकते नहीं थे अचानक उनको देश की समाज की बदहाली का सच नज़र आने लगा है। जिन से कीमत पाकर झूठ को सच साबित करते रहे थे उनका मकसद हल होने के बाद शायद उन्हीं से पूछकर सच कहने का आडंबर करना शुरू किया है। अब ऊंची आवाज़ में सरकार की नाकामी की ही नहीं नेताओं के संगीन अपराधों में सरकारी विभाग पुलिस
का गुनहगार को बचाने से आगे उनके गुनाह पर पर्दा डालने साथ देने तक बेशर्मी की खबर बताने लगे हैं। जो राज्य से अपराध मिटाने की बात करते थे खुद उनके विधायक गंभीर अपराध करते हैं पुलिस एफआईआर नहीं दर्ज करती बल्कि जिस के साथ बलात्कार हुआ उसके परिवार के लोगों को बंद करती है मारपीट करती है और हद से बढ़कर जब ऊपरी अदालत जांच एजेंसी आदेश देते हैं गुनहगार को पकड़ते हैं पीड़ित को सुरक्षा देने का दायित्व मिलता है मगर फिर भी पीड़िता को सड़क दुर्घटना की शक्ल देकर घायल और चश्मदीद गवाह को मार दिया जाता है गलत दिशा से आते ट्रक द्वारा जिस का नंबर कालिख पोत कर छिपाया गया था ये सब हालात गवाही देते हैं शक पैदा करते हैं हादिसा नहीं हुआ करवाया गया है मगर जो सुरक्षाकर्मी साथ होने थे नहीं होते इतना सब पुलिस को सामन्य दिखाई देता है। टीवी वाले भी चुनाव से पहले इस तरह की खबर को सुर्ख़ियों में नहीं आने देते और राजनीती की बहस में उलझाने का अपना काम करते रहते।

    मीडिया बदला नहीं है पहले सरकारी बिकाऊ भौंपू बना हुआ था अब चेहरा बदल मुखौटा लगाया है सच की जनहित की बात करने का जबकि विवशता है अपने होने को अस्तित्व को बचाये रखना है तो दिखावे को ही सही आंखे बंद रख कर नहीं चलते रह सकते। सरकार से सवाल करने से पहले इन सभी से सवाल पूछना ज़रूरी है आप को पहले ये घना अंधेरा रौशनी क्यों लगता था अंधे नहीं थे अपनी आंखों पर स्वार्थ की पट्टी बांधी हुई थी। सत्ताधारी दल के तथाकथित साहसी नेता अपने दल के अपराधी को अभी भी दल से बाहर नहीं निकाल पाए हैं और उल्टा बेशर्मी से भगवाधारी साधु बनकर संसद का चुनाव जीतने वाले जेल जाकर उनका आभार व्यक्त करते हुए उनकी तारीफ करते हैं। मतलब साफ है सत्ता धारी दल के लोगों के गुनाह अपराध नहीं उनका अधिकार बन गए हैं।

     अब कोई शक की बात नहीं है कि जो भी दल सत्ता में होता है न्याय कानून और सुशासन की बात नहीं अन्याय करने लूटने अत्याचार करने को अपना हक मानता है। पुलिस जनता की सुरक्षा नहीं नागरिक को डराने दहशत फैलाने और दमन करने का काम करती है ठीक किसी आपराधिक गिरोह की तरह। जो दल आजकल सत्ता में है मनमानी करने में कोई लाज संकोच नहीं करता है। अपने नेताओं को समर्थकों को खुली छूट दे राखी है कानून हाथ में लेकर दंगे फसाद कत्ल करने की। अच्छे दिन यही होते हैं क्या उनसे सवाल कौन करे क्योंकि उनको जवाब देने की आदत नहीं है हर किसी को बुरा बताने से आप अच्छे साबित नहीं हो सकते हैं। देश की वास्तविक समस्याओं की बात कोई नहीं करता सरकार हर दिन कोई नया तमाशा करती है बहलाये रखने को। पुलिस न्यायपालिका अपना काम कम बातें अधिक करते हैं। आम नगरिक को मिले अधिकार वापस लेने और उन पर अंकुश लगाने को रोज़ नये तरीके नये बहाने खोजने को लगे रहते हैं। सरकारी इश्तिहार बताते हैं सब बढ़िया है मीडिया वास्तिक देश की समस्याओं से किनारा कर चुका है। खुद को सच के पैरोकार झंडा बरदार बताने वाले झूठ को सच बताने का काम करते हैं मगर खुद को संविधान का स्तंभ बताते नहीं थकते ये उपाधि उनको मिली नहीं उन्होंने खुद छीन कर हासिल की हुई है जबकि इसके काबिल वो नहीं बन सकते। उनको दौलत शोहरत ताकत चाहिए जो सच कहने से नहीं झूठ का साथ देने से हासिल होती है।

    ये दर्पण टूटा हुआ है और धुंधली तस्वीर दिखाई देती है खुद उनको अपना ही चेहरा नज़र नहीं आता है। इस आईने को फैंकने का समय आ गया है। 
 

 

जुलाई 28, 2019

POST : 1162 मुहब्बत हक़ीक़त भी अफसाना भी ( इश्क़-इबादत ) डॉ लोक सेतिया

 मुहब्बत हक़ीक़त भी अफसाना भी ( इश्क़-इबादत ) डॉ लोक सेतिया 

 शोर बहुत सुनते रहे खुदा है मुहब्बत , मुहब्बत महबूबा से भी होती है वतन से भी इंसान को इंसान से प्यार सबसे बड़ा धर्म है। जो कहते थे जो सुनाई देता था दिखाई नहीं देता था यही उलझन थी। दीनो धर्म की कितनी किताबें पढ़ीं समझने को जो लिखा हुआ था अमल में सामने नज़र नहीं आता था। शायरी की किताबों को पहले भी पढ़ा तो था मगर समझने को वो नज़र वो दिल नहीं था उस वक़्त लगता है जो मायने ही कुछ और समझ आते थे। अरसे बाद पुरानी शायरी की किताब फिर से पढ़ी तो पता चला बात मुहब्बत की है मगर उस तरह की नहीं जो हमने समझा था। चलो पढ़ते हैं सुनते हैं समझते हैं आशिक़ी का मतलब इस तरह से अब। 

मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग , 

मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग

मैंने समझा था तू है दरख्शां है हयात , 

तेरा ग़म है ग़म ए  दहर का झगड़ा क्या है

तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात , 

तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है

तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगों हो जाए , 

यूं न था , मैंने फ़क़त चाहा था यूं हो जाए। 

अनगिनत सदियों के तरीक बहिमाना तलिस्म , 

रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुवे

जा-ब - बजा बिकते हुए कूचा-ओ -बाज़ार में जिस्म , 

खाक़ में लिथड़े हुए खून में नहलाए हुए

लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे , 

अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे 

और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा , 

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा 

मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग , 

मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग। 

             इश्क़ मुहब्बत प्यार का दम भरने से पहले समझ तो लेते ये है क्या बला। बात केवल दो दिलों की नहीं है बात दुनिवायी मुहब्बत की ही नहीं है बात खुदा भगवान की इबादत की भी है और अपने देश अपने आवाम हर इक इंसान से प्यार की भी है। मुमकिन है जो सबक आपको धर्म की किताब पढ़ने से नहीं समझ आया शायरी की किताब पढ़ने से समझ आ जाये। जब समाज में हर तरफ नफरत की आग लगी ही कोई मुहब्बत का फूल खिल कैसे सकता है। फैज़ अहमद फैज़ की मुहब्बत वतन से है किसी हसीना से नहीं भला कोई अदब वाला देश समाज की बर्बादी को अनदेखा कर किसी हसीना की मुहब्बत में खो कैसे सकता है। साहिर लुधियानवी भी सवाल करते हैं जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं। आजकल तो फिल्म बनाने वाले सच्ची मुहब्बत को समझते हैं न ही देशभक्ति को केवल आडंबर करते हैं और पैसे कमाने को अपनी साहूलियत से इधर उधर से चीज़े उठा लेते हैं। शायद आपको खबर नहीं होती जो आपको परोसा गया है किसी की नकल है और मंच पर नायक नहीं हैं विदूषक हैं हर तरफ। राह दिखाने की नहीं राह से भटकाने की बात करते हैं। अम्न  से प्यार गरीबी से बैर वतन से इश्क़ , सभी ने ओड़ रखे हैं नकाब जितने हैं। इक शायर की ग़ज़ल का शेर है।
   
              फिल्म निर्देशक राज खोसला ने गीतकार मजरूह सुलतानपुरी को कहा उनकी फिल्म के लिए इक गीत लिखने को जिसका मुखड़ा , तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है हो। चिराग़ फिल्म की बात है मजरूह जी ने कहा ये फैज़ अहमद फैज़ की नज़्म के शब्द हैं उनकी इजाज़त लिए बिना इस्तेमाल नहीं कर सकता। तब पाकिस्तान में फैज़ को खत लिख कर उनकी अनुमति मिलने के बाद ही गीत लिखा और बहुत पसंद किया गया भी। आजकल फिल्म टीवी सीरियल के कहानी लिखने वाले जानते ही नहीं और प्यार की कहानी के नाम पर जाने क्या क्या परोसने का काम करते हैं। टीवी शो पर आशिक़ी को मज़ाक बनाकर हंसाने का नहीं बल्कि वास्तविक प्यार को उपहास बनाने का अपराध किया जाता है। समाज में नैतिकता के मूल्यों के पतन का एक बड़ा कारण यही मुंबई की फ़िल्मी बस्ती है जो रिश्तों का व्यौपार करती है अमीर होने को। समाज के लिए उनको अपना कोई कर्तव्य नहीं मालूम बस दावा करते हैं दिखावा करते हैं वास्तव में खुद भी भटके हुए समाज को भी भटकाना चाहते हैं। अदब के लोग शायर कलाकार कथाकार लोगों का दायित्व है सही मार्ग और सच्चाई को दिखाने का और अच्छे देश समाज की परिकल्पना की बात करने का। जैसे पुराने फ़िल्मकार शायर कथाकार किया करते थे। नया ज़माना आएगा , हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे। सुनते ही जोश भर आता है उम्मीद जागती है। अब निराशा के सिवा कुछ है मीडिया में तो फूहड़ भद्दा हास्य जो समझ आये तो हंसने की नहीं रोने की बात है।

         आजकल आपको कहीं न कोई सच्चा आशिक़ मिलेगा न ही देश पर न्यौछावर होने वाले वास्तविक
  देश से प्यार करने वाले साहस पूर्वक देश समाज की लड़ाई अन्याय का डटकर विरोध करने वाले नज़र आते हैं। देशभक्त होने की बात करते हैं देश पर कुर्बान होने को सीमा पर सैनिक हैं हम अपने देश में रहकर क्यों देश समाज के खिलाफ आचरण करने वालों को मिटाने को सामने नहीं आते , असली पहचान यही है। बात प्यार की करें तो प्यार को जाना समझा नहीं है किसी को पाना हासिल करना प्यार नहीं है। खुद को किसी को सौंपना सच्ची मुहब्बत है इबादत की तरह। हम तो भगवान से भी सौदेबाज़ी करते हैं पूजा अर्चना भी कुछ मांगने को किसी स्वार्थ से करते हैं। खुद को समर्पित करना सीखा नहीं तो ऊपर वाले से नाता हो सकता है न किसी से इश्क़ ही।  ये कब क्यों हुआ कैसे हम प्यार मुहब्बत को छोड़ इक ऐसी ज़िंदगी जीने लगे जो लगता है चमक है रौशनी है मगर सच में है घना अंधेरा कोई। दिल में धड़कन है मगर एहसास नहीं है दर्द का अपने बेगाने सभी के दुःख दर्द को बराबर समझने वाला दिल नहीं है। जब दिल पत्थर का बन जाता है तो उस में कोई एहसास नहीं बचता ख़ुशी दर्द सब से बेखबर आदमी अपने आप में खोया नहीं जानता ये जीना जीना नहीं है। आधुनिकता ने मतलबी लोगों की चालों बातों में फंसकर हमने उन कहानियों को प्यार की दास्तान समझ लिया जो दरअसल प्यार को क़त्ल करने का काम कर रही थीं और ऐसी कहानी लिखने वाले उन पर फिल्म टीवी सीरियल बनाने वाले खुद मुहब्बत को इक सौदेबाज़ी से अधिक नहीं समझते थे। प्यार मुहब्बत का अर्थ ही बदलकर रख दिया उन्होंने अपनी मर्ज़ी या साहूलियत की खातिर। और हमने उनकी ज़िंदगी की आवारगी और मौज मस्ती की ऐशपरस्ती को मुहब्बत मानकर इश्क़ प्यार को इक इल्ज़ाम बना दिया है।

 बात शुरू की थी मुहब्बत की हक़ीक़त को समझने की शायरी की किताब से। शायर कवि जिस प्यार की बात करते रहे उस में आकर्षण और हासिल करने को कुछ भी हद से बढ़कर करने की बात कभी नहीं थी। कुछ भटके हुए लोगों ने हम सभी को जो राह बताई वो कुछ और है प्यार की मुहब्बत की राह हर्गिज़ नहीं। आशिक़ी किसी को बदनाम बेआबरू करने का काम कभी नहीं करती है जान देना जान लेना नहीं जाँनिसार करना किसी पर अपनी जान न्यौछावर करने का नाम है। प्यार किया नहीं जाता हो जाता है और तब जाति मज़हब नहीं दिखाई देता है। इश्क़ खुदा की इबादत की तरह है मीरा का भजन है राधा का नाता है हमने जाने कैसे मान लिया कि कोई रिश्ता कोई नाम बंधन का होना चाहिए प्यार करने वालों के लिए। आशिक़ी मुहब्बत प्यार से बढ़कर कोई भी रिश्ते का नाम नहीं हो सकता है। खुदा और उसकी इबादत करने वाले की तरह अनुबंध नहीं होता है कोई भी। आज समझ आता है पुराने लिखने वालों ने प्यार मुहब्बत इश्क़ पर क्यों ज़िंदगी भर इतना लिखा लिखते रहे क्योंकि इसकी ज़रूरत और सब से बढ़कर थी। इंसान को इंसान बनाये रखने को और कोई भी पढ़ाई कोई चीज़ काम नहीं आती है। हमने कितना कुछ पाया होगा बदलते परिवेश से मगर जो खो दिया है हमने समझा ही नहीं कितना ज़रूरी था। जैसे कोई फूल बिना सुगंध बिना कोमलता के कागज़ी या प्लास्टिक से बना या पत्थर का हो सजावट को , देखने में सुंदर मगर वास्तविकता में बेजान हो।

  आखिर में आपको इक गीत ऐसा जगमोहन जी का गाया हुआ सुनाता हूं जो मुझे लगता है सच्चे प्यार का सबसे पुराना गाना है जिसको सुनकर अनगिनत आशिक़ों ने मुहब्बत की है।





दिल को है तुमसे प्यार क्यों ये न बता सकूंगा मैं , ये न बता सकूंगा मैं। 

पहले मिलन की छांव में तुमसे तुम्हारे गांव में , 
आंखें हुई थी चार क्यों। ये   . .........    
 
रूप की कुछ कमी नहीं दुनिया में इक तुम्हीं नहीं , 
 
पर मैं तुम्हारी याद में रहता हूं बेकरार क्यों। ये ....
 
तुमको नज़र में रख लिया दिल में जिगर में रख लिया , 
खुद मैं हुआ शिकार क्यों ये न बता सकूंगा मैं। 
 
दिल को है तुमसे प्यार क्यों ये   ...... .......  






जुलाई 27, 2019

POST : 1161 गणित और बही-खाते का फर्क ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  गणित और बही-खाते का फर्क ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   गणित किताबी बात है मेरा दोस्त दसवीं के गोस्वामी जी ने मुझे कहा था हम हैरान होते थे तुम सौ में से सौ अंक कैसे हासिल कर लेते थे हम तो मुश्किल से पास होकर खुश हो जाते थे। सबूत मेरी दसवीं की नंबर वाली सूचि है पास होने पर मिले सर्टिफिकेट पर अंकित। मगर हिसाब किताब कारोबार या दुनिया और रिश्तों का मुझे ज़रा भी नहीं समझ आया। आजकल सरकार भी बजट को बही-खाता बताती है तो मुझे भी लगा जितना याद है थोड़ा लिख कर रखा जाना चाहिए। कभी काम नहीं आएगा मगर दिल बहलाने को ख्याल अच्छा है जन्नत की तरह। तारीख की बात छोड़ देते हैं ज़रा कठिन है हिसाब ज़िंदगी भर का जो है। 

बहुत लोग होते हैं जो बच्चों की पढ़ाई लिखाई पालन पोषण पर किया खर्च याद रखने को लिख भी लिया करते हैं। शादी के समय पिता बेटे की कीमत ब्याज सहित चाहता है कन्या पक्ष से। उस ज़माने में बेटी को पढ़ाने पर खर्च नहीं करते थे दहेज जमा करते थे अब बेटियों को पढ़ाने लिखाने और कमाने लगती हैं तब भी बेटे के परिवार की बात आदर की ज़रूरी है दहेज नहीं आजकल शान रखने की बात की जाती है। आपकी शान आपके दम पर हो या बहु के घरवालों के सर पर बोझ की तरह नहीं समझते लोग। खैर बचपन में भाई भाई होते थे चाचा मामा बुआजी के बेटे भी भाई बनकर रहते थे। मेरे पास सभी आते और उनकी महमान नवाज़ी खिलाने पिलाने से मौज मस्ती तक जेब खाली होने पर दोस्त से उधार लेकर भी खूब खर्च करता था आदत खानदानी थी पास नहीं हो तो क़र्ज़ लेकर भी महमान की खातिर करनी ज़रूरी है। कभी किसी ने जाकर घर नहीं बताया मैंने उनको क्या क्या दिया कितनी बार घर वापस जाने की किराया भी मुझसे लेते थे। मगर एक बार गलती हुई जो इक भाई से दो सौ रूपये मांग लिए थे और फिर घर से सालों तक ताने सुनता रहा शर्म नहीं आई ऐसे लेते हुए। ये मापदंड मुझे समझ नहीं आये आज तलक भी खैर। 

पढ़ाई के बाद काम करने लगा तो थोड़ी सी आमदनी से भी दोस्तों पर खूब खर्च किया। कभी गिनती की बात नहीं थी मिलते आते जाते बेहिसाब खर्च किया जाता रहा। सच्ची बात है शर्म की बात नहीं है अच्छे अमीर परिवार से था मगर अपनी आमदनी गरीबी जैसी होने पर भी खुद को गरीब समझता नहीं था। नाते रिश्ते निभाता सबको आने पर अच्छी तरह से आवभगत करता था। शादी से पहले कमाई जितनी भी थी थोड़ी भी बहुत लगती थी उसी से खुश रहता था। जेब खाली भी होती तब भी दिल खाली नहीं रहता था क़र्ज़ की पीते थे मय और समझते थे यही रंग लाएगी अपनी फ़ाक़ामस्ती एक दिन , शेर ग़ालिब का है। मैं शराबी नहीं हूं और अपने शौक की खातिर क़र्ज़ नहीं लिया जीवन भर। लगता है कोई पिछले जन्म का क़र्ज़ है सभी का मुझ पर बकाया चुकाने को। अब लगता है शायद ब्याजदर बहुत ज़्यादा है सूद भी नहीं चुकता हुआ असल वहीं का वहीं खड़ा है कोई सरकार भी इस की माफ़ी की योजना नहीं बना सकती है। 

रिश्ते होते ही उधार की तरह हैं किश्तों को समय पर चुकाना लाज़मी है अन्यथा बदनामी होती है। इक चचेरी बहन बोली थी भाभी को लेन देन की समझ नहीं अब उसको भाई की कमाई थोड़ी है तब भी दोष भाभी पर मढ़ दिया था। मगर पत्नी होने का इतना तो खमियाज़ा भरना होता है आमदनी कम होने पर अगर अधिक होती तो शान भी दिखाती ही। लेकिन हम नासमझ नहीं समझे जैसे भी हो कमाई का ढंग  बनाना चाहिए , ज़िंदगी ईमानदारी शराफत और उसूलों पर चलकर नहीं कटती है। शादी से पहले गरीबी का एहसास कभी नहीं हुआ मगर उसके बाद जैसे बीवी का क़र्ज़ बढ़ता ही गया ज़िंदगी भर उनकी मेहरबानियों का हिसाब नहीं चुकाया जा सका मुझसे। शायद दार्शनिक लोग इस विषय पर लिखना समझाना भूल गए कि आपके पास कितनी दौलत कितनी आमदनी होनी लाज़मी है शादी तब करनी उचित है। मुश्किल यही है बाकी दुनिया वाले दोस्त रिश्तेदार आपको कर्ज़दार होने का एहसास कभी कभी करवाते हैं अवसर मिलने पर मगर पत्नी आपको चौबीस घंटे याद दिलवाती है उसी से घर चलता है नहीं तो ऐसे कंगाल का जाने क्या होता। कोई दोस्त भी सलाह नहीं देता शादी करने के खतरे कितने हैं बच सको तो बचना ऊपर से विवाह करने को कहते हैं नाचने खाने पीने को मौका मिलने का लालच इतना अधिक है। 

सच्ची बात है कोई किसी का नहीं दुनिया में सब पैसे के नाते रिश्ते दोस्ती भाईचारा निभाते हैं। हर किसी के हिसाब में औरों से लेनदारी ही लेनदारी का पन्ना है देना है जिसका ये उसका काम है अपने हिसाब में लिखता रहे। मुझे इक चायवाले खोखे वाले की पुरानी बात याद आई है , बाज़ार में सभी को दुकानदारों को मुहल्ले वालों को चाय पिलाता था। सबका खाता बना रखा था मगर जब कोई काफी दिन उधारी चुकाने नहीं आता तो अजीब आदत थी हंसी ठिठौली करते हुए छोटू जो चाय देने जाता था उसका नाम लेकर बोलता था , अमुक व्यक्ति नज़र नहीं आया क्या उसके खाते पर मर गया लिख दूं और जो भी सुनता कह उठता चाचा मेरी उधारी जमा कर लो कभी मर गया मत लिख देना। लोग खुद को मर गया घोषिष करने से तब डरते थे अब तो विदेश भागने की परंपरा चल पड़ी है। मगर कोई कुछ भी करता रहे लोग किसी के मरने के बाद भी उसका खाता बंद नहीं करते हैं उसके वारिसों से वसूली जारी रहती है। भारत देश पर हर नागरिक पर विदेशी क़र्ज़ चढ़ा हुआ है बढ़ता जाता है क़र्ज़ चुकाना हम ने हमारी आगे आने वाली संतानों ने है और वसूल करने को नेता लोग हैं सरकारी अमला है जिसको जाने कितने जन्मों का क़र्ज़ हमसे लेना बाकी है। आपको गणित आता होगा मगर सरकार की तरह बही-खाता बनाना नहीं आता जिस में खर्च करने की बात है आमदनी होने की ज़रूरत नहीं है। क़र्ज़ लेकर घी पीने की मिसाल अभी भी कायम है।

जुलाई 26, 2019

POST : 1160 सवालों में उलझे हुए लोग ( अजब मंज़र ) डॉ लोक सेतिया

   सवालों में उलझे हुए लोग ( अजब मंज़र ) डॉ लोक सेतिया 

 हमने कथाओं कहानियों में पढ़ा था कोई किसी से जाकर कहता है मैंने कहीं ऐसा अजब मंज़र देखा जिसको देख मन विचलित है क्योंकि उसका मतलब नहीं समझ आता मुझे। और उस अनहोनी असंभव लगती बात का अर्थ कोई समझाता है। आज ऐसे सवाल बहुत हैं हमारे सामने मगर शायद कोई जवाब देने वाला ही दिखाई नहीं देता है और हम भी विचलित नहीं होते चाहे कुछ भी सामने घटता रहे हम अपनी आंखें बंद कर सोचते हैं दृश्य गायब हो गया है। कायरता ने हमें सच देखने सुनने से बचने का आसान रास्ता दिखाया है हम सोचते हैं समाज में किसी से क्या होता है हमें क्या चिंता की ज़रूरत है। आजकल की घटनाओं को समझने को देखते हैं देश में समाज में क्या क्या घट रहा है कोई बता सकता है ये समाज की कैसी तस्वीर सामने आ रही है और इस का आने वाला कल भविष्य कैसा हो सकता है। चलो कुछ समाचारों घटनाओं को ध्यान से समझते हैं। 

सरकार संवैधानिक संस्थाओं को बदलने का हर संभव जतन कर रही है जिन नियम कानून से मनमानी पर अंकुश लगता है हटाया जा रहा है। हर जगह चाटुकार लोग बैठाए जा रहे हैं देश के संविधान की अनुपालना करवाने को बनी हुई संस्थाओं के पदों पर। संसद विधानसभा को इक अखाड़ा बना दिया गया है और चर्चा नहीं विचार विमर्श नहीं दांव पेच इस्तेमाल कर जीत हासिल करने पर ध्यान है। उचित अनुचित की कोई व्याख्या नहीं है जिसकी लाठी उसकी भैंस की मिसाल है। लोकलाज की परवाह नहीं है अपनी गलती को गलती नहीं मानते हैं इल्ज़ाम किसी और पर धरते हैं। दलबदल का मौसम है जो पापी अपराधी सत्ता की चौखट पर चला आता है माथा टेकता है उसके गुनाह माफ़ हो जाते हैं। कानून की तलवार चलती है विपक्षी नेताओं को ठिकाने लगाने को उनकी कीमत घटाने को गड़े मुर्दे उखाड़ मुकदमे दर्ज किये जाते हैं मोल भाव तय होने के बाद फिर दफ़्ना देते हैं उन सभी आपराधिक आरोपों को किसी फाइल में। ईमानदारी का शोर बहुत है इश्तिहार भी मगर कोई अदालत से भगोड़ा आपराधिक मुकदमे का दोष लिए आरोपी किसी संस्था पर नियुक्त कर देते हैं। 

सत्ता पक्ष विपक्ष दोनों के नेता नफरत की आग भाषण में लगाते हैं भाषा की मर्यादा को ताक पर रखकर। नैतिकता की कहीं कोई बात नहीं है। धर्म के नाम पर दंगे करवाने की बात की जाती है। उधर भवन बनाये जाते हैं ऊंचे ऊंचे मचानों की तरह ऊपर चढ़कर नज़ारा देखने को , जिस मकसद से विभाग बनाया हुआ न्याय और निष्पक्षता से सबको समान न्याय देने को उस की हालत जर्जर गिरती इमारत की तरह है। बीस साल बाद कोई अदालत किसी को निर्दोष घोषित करती है , अपराध साबित नहीं हुआ या झूठा दोष लगाया गया था दोनों ही तरह से अन्याय हुआ है। अदालत को इतना समय लगता है ज़िंदगी खत्म हो जाती है फिर भी हम न्याय की उम्मीद की बात करते हैं क्योंकि न्याय मिलता है ख़ास लोगों को तुरंत ही मरते हैं सामान्य नागरिक छोटे छोटे अपराध के आरोप में जेलों में कोई नहीं देखता है। सरकार को वोटों की खातिर बड़े बड़े अपराधी साधु संत लगते हैं उनकी हर बात को अनदेखा किया जाता है संरक्षण दिया जाता है। धर्म सबसे बड़ा अड्डा बन गया है जहां पर हर गुनाह खुलेआम किया जाता है। हम धर्म की अफीम के नशे में सच झूठ पाप पुण्य का अंतर नहीं समझते और अपराधी को गुरु मान उसकी जय-जयकार करते हैं अधर्म को धर्म बताते हैं। 

जिनको सच बताना था टीवी अख़बार वाले चुनाव तक सत्ता का गुणगान करते रहे और मुंह बंद रखा लालच की खातिर। अब चुनाव के बाद दिखावे को जनता की जनहित की बात करने लगे हैं अपने पर लगे बिक चुके लोगों का समूह का दाग़ मिटाने की कोशिश भर है। कर्तव्य ईमानदारी से नहीं निभाते चाहते हैं निष्पक्षता का दिखावा कर छवि को सुधार सकें मगर इतने बदनाम हैं अब कोई चाहकर भरोसा नहीं कर सकता है। पैसे और स्वार्थ ने अंधा बना दिया है खबर नहीं अनावश्यक बहस दिन भर उलझाने को करते हैं। किसी सवाल का जवाब नहीं खोजते सवाल को सवाल से भिड़ाने का मज़ा लेते हैं। जुर्म अपराध दुर्घटना उनके लिए बेचने का सामान है। अपनी सूरत को पहचानते ही नहीं हैं कोई उनको आईना कैसे दिखाए जिनका कारोबार है आईने बेचने का हर शहर हर गांव गली गली। 

हम आधुनिक जानकर स्मार्ट फोन पर मनोरंजन के नाम पर समय बिताने को बेकार संदेश भेजते हैं उनकी सच्चाई को जाने समझे बिना ही। विचलित करने वाली बात को किनारे खड़े तमाशा देखने वाले आदमी की तरह समंदर के उठते तूफान किसी जलती हुई बस्ती की आग को रौशनी बताते हैं मगर जानते हैं। झूठ सच को मिला कर हमने जाने क्या बना दिया है। अपने छोटे छोटे मासूम बच्चों को स्मार्ट फोन से खेलने देकर उनको ऐसी अंधी गली में जाने देते हैं जिसका दूसरा छोर बंद है वापस निकलने को राह नहीं वापस मुड़ने की जगह नहीं है। पढ़ना भाता नहीं किसी गंभीर विषय पर चर्चा करना लगता है नाहक की परेशानी है। सामाजिक संबंधों को हमने अपने मतलब को बदलने और तबाह करने को कोई कसर नहीं बाकी छोड़ी है। अब हम स्वस्थ संवाद नहीं करते हैं या किसी की हां में हां मिलाते हैं या किसी की चाटुकारिता से खुश होते हैं झूठा गुणगान सुन कर। वैचारिक मतभेद को हम विरोध मानते हैं और अपनी जगह दोनों की बात सही और अलग भी हो सकती है इस को समझना छोड़ दिया है। हम जैसे बातचीत करने नहीं लड़ने भिड़ने को तैयार रहते हैं जो वास्तव में हमारी कमज़ोरी है ताकत नहीं है। निष्कर्ष नहीं निकालते सच को नहीं परखते बस उलझन को उलझाने को लगे रहते हैं। 

चांद की बात करते हैं दौड़ने की बात होती है मगर सरकार खुद दंगे फसाद अपराध होने तक सोई रहती है। कोई विधायक सत्ता का भागीदार सहयोगी दल का छह महीने पहले लिखित जानकारी देता है कि उस जगह अन्याय अत्याचार होता है सरकारी अधिकारी भू माफिया से मिलकर शोषण करते हैं गरीबों को डराते हैं धमकाते हैं मगर राज्य का मुख्यमंत्री कोई कारवाई नहीं करता है और कुछ लोग अपनी सेना बनाकर खुले आम हथियार लहराते हुए लोगों को कत्ल कर लाशें बिछा देते हैं तब सरकार ब्यान देने और न्याय कानून की बात कहने लगती है मगर अपने दोष को पिछली सरकारों पर डालना चाहती है। इंसानियत की आदमी की जान की कोई कदर नहीं उसकी कीमत लगाई जाती है हर मरने वाले को चंद रूपये मुवावज़ा देते हैं उसके परिवार को ये न्याय नहीं है किसी लाश को कफ़न से ढकने की बात है। लेकिन हम को किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कल की घटना भूल जाती है आज अभी की नई घटना पर वीडियो देख रहे हैं। भावनाशून्य समाज बनता जा रहा है हम सहानुभूति जताते हैं संवेदना व्यक्त करते हैं दिखावे की दो आंसू बहाते हैं पल भर बाद फिर कोई चुटकुला सुनते सुनाते हैं। 

                                 ( जारी है चर्चा अगली पोस्ट पर )