सितंबर 14, 2018

POST : 902 मैं हिंदी आपकी हिंदी , मेरा कोई नहीं ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

 मैं हिंदी आपकी हिंदी , मेरा कोई नहीं ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

       आज मेरा दिन है , मगर ये दिन कैसा है , मेरी सुबह लगती है जैसे रात है अंधेरी रात। सूरज की बात ही क्या चांद की हसरत भी क्यों , कोई सितारा तक नहीं चमकता। कितनी बेबस हूं खुद अपना तमाशा देखती हूं हर साल , वो जो कहते हैं हम हिंदी वाले हैं , उनको हिंदी भाषा की नहीं अपनी चिंता होती है। आज फुर्सत नहीं तो दो दिन बाद मना लेंगे या दो दिन पहले मना भी चुके हैं। 14 सितंबर को इक दिन भी मुझे नहीं देते और दावा करते हैं जीवन हिंदी के नाम किया है। सब कुछ विदेशी है आपका कम से कम हिंदी का दिवस तो हिंदी जैसा होता , अपने तो उसे भी उपहास या औपचारिकता बना दिया है। अपनों का दिया दर्द अधिक तड़पाता है गैरों का सहना कठिन नहीं है। एक दिन महिला दिवस की बात करने से महिलाओं की कोई भलाई नहीं हुई ठीक उसी तरह से इक दिन हिंदी हिंदी का आलाप करने से होगा क्या बताओ। हिंदी को ऐसे मत सताओ , हिंदी है माथे की बिंदी गाकर हिंदी का दिल नहीं दुखाओ। हिंदी की हालत समाज की गरीब औरत की जैसी है जो हाथ जोड़ती है विनती करती है रो रो कहती है मुझे बचाओ , मुझे बचाओ। हिंदी दिवस मनाने से बेहतर है हिंदी को वास्तव में अपनाओ , हिंदी को अधिक की चाहत नहीं है समानता का अधिकार दिलवाओ। हिंदी को लूट का साधन मत समझो , इनाम सम्मान , तमगे इन सब में मुझे नहीं उलझाओ। आज इक सवाल का जवाब सच सच बताओ। हिंदी से पाया है मिला है कितना हिंदी को अर्पित किया है क्या सोचो और समझाओ। किसी और भाषा से मुझे खतरा नहीं है खुद हिंदी वालों से डरती है हिंदी अपनों से बचाओ। हिंदी खूबसूरत है कभी प्यार की नज़र से देखो दिल लगाओ , झूठी चमक दमक के झांसे में नहीं आओ। मैं सभी की हूं सभी को समझती समझाती हूं , सबको कहो अब तो मेरे हो जाओ। मेरा हाथ थामो मेरे साथ नाचो मेरे संग झूमो गाओ। हिंदी दिवस पर मुझे और मत रुलाओ। हिंदी हिंदी बोलने से हिंदी को मिलता नहीं चैन , चलो आज कोई और तरीका सोचो हिंदी को मंच पर नहीं घर गली विद्यालय , सरकार , बोलचाल और व्यवहार में जगह दिलवाओ। हिंदी की शान निराली है लोग नहीं जानते अगर तो दिखला कर मनवाओ। हिंदी को कोई सहारा नहीं चाहिए , हिंदी सक्षम है मगर जकड़ी हुई है बेड़ियों में , आज मेरे हाथ की हथकड़ियां खुलवाओ मेरे पैरों की बेड़ियां कटवा कर कोई पायल पहनाओ। हिंदी को हिंदी लिखने वालों को उनकी महनत की उचित कीमत मिले कुछ ऐसा कर दिखाओ। भूखे पेट भजन नहीं होता , हिंदी वालों की नहीं हिंदी की जीवन भर सेवा करने वालों की भूख का अंत कैसे हो उपाय बताओ। 
 
                            टेलीविज़न अखबार फ़िल्में कारोबार , हिंदी बिना किसी का नहीं उद्धार , सब को हिंदी केवल अपने कारोबार की खातिर ज़रूरी लगती है। पत्रिका छापने वाले भी किताबों को छापने वाले भी खूब कमाई करते हैं मगर कोई भी हिंदी लिखने वाले साहित्य की साधना करने वाले को इतना भी नहीं देता है कि दो वक़्त निवाला भी उसे मिल सके। ये हिंदी दिवस की शुभकामनाएं देते हैं , कोई विशेषांक निकालते हैं , कोई अख़बार कविता पाठ करवाता है कोई साहित्य अकादमी के नाम पर मौज मनाता है। अपनों को रेवड़ियां बांटकर इतराता है। हिंदी को स्वालंबी नहीं विवश बनाता है , सब कहने को बही खाता है , किधर से आता किधर जाता है , आडंबर कितने रचाता है। हर सरकार चाटुकारों को अकादमी के पद पर बिठाती है , लिखने की आज़ादी उसी जगह खत्म हो जाती है। छापते हैं जो ठाकुर सुहाती है। असली नकली दांत वाला हाथी है , खाने को अलग दिखाने को अलग , और मद में है उत्पाती है। दूल्हा नहीं है दुल्हन नहीं है , हर कोई बाराती है। हिंदी भाषा बिनब्याही बिटिया रह जाती है और हिंदी लिखने वाला न किसी का बेटा है न किसी का दामाद है न ही किसी का नाती है।  लोग भूख से मर जाते हैं , कई कर्ज़दार ख़ुदकुशी कर जाते हैं , मगर ये हिंदी के लेखक जाने किस मिट्टी के बने हैं जो जीते नहीं रोज़ ज़िंदा रहकर भी मर जाते हैं। अधिकार मिलता नहीं बिना मांगे यहां और ये नहीं मांगते बिखर जाते हैं। ज़ुल्म सहने की हर इक हद से गुज़र जाते हैं। खाली हाथ जाते हैं दुनिया के बाज़ार में कुछ नहीं खरीदते वापस घर जाते हैं।  

 

सितंबर 12, 2018

POST : 901 अपने चरणों में जगह दे दो ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

        अपने चरणों में जगह दे दो  ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

       पैसा और शोहरत कुछ लोगों को आसानी से मिलती है टीवी पर कठपुतली बनकर दर्शक को बहलाना होता है । राजनेताओं को चुनावी गंगा में नहाना होता है जनता को राधा बना कर कृष्ण कहलाना होता है गोपियों की तरह जनता को निवस्त्र कर अपनी बात मनवाना होता है । राजनीति का नंगापन सामने दिखाई देता है फिर भी कोई राजा नंगा है नहीं कहता है , चुनाव लड़ने को सभी तैयार हैं दोस्त दुश्मन हैं दुश्मन बन जाते दिलदार हैं ।  चोरों की महफ़िल में शराफ़त का नहीं गुज़ारा है ईमानदार चुनाव लड़ता ही नहीं बिना लड़े जंग हारा है । चुनाव काले धंधे वालों का महत्वपूर्ण त्यौहार है बस उनकी खातिर आती ये बहार है । कोई कोई बिगबॉस होता है दल में कौन भला बुरा इस का टॉस होता है , नया आया खुश होता बड़ा ख़ास होता है जो पुराना था उदास होता है टिकट बिना सूखा मौसम ए बरसात होता है । नेता अपने गले में पट्टा चाहते हैं चुनाव से सदन तक जो हुक्म मेरे आका कहते हैं बंधुवा बन खुश रहते हैं ।  बिन मांगे मोती मिलें मांगे मिले न भीख सत्ता का मंत्र जपते रहते हैं आज़ादी की चाहत नहीं दल में गुलामी की आदत है लोकतंत्र की अजब ऐसी सियासत है । दल से असहमत होना बगावत है चुप चाप सहना हां जी कहना ज़रूरत है ।  चुनाव लड़ने की बस यही वजह दे दो टिकट दे कर दास बना लो आम से ख़ास बना लो आलाकमान आपकी है पहचान हम सभी हैं बेबस नादान चाहते आपका वरदान ।   
 
आप क्या चाहते हैं बाकी लोग क्या चाहते हैं आपकी समस्या है । आपके चाहने से हर बात नहीं हो जाती । हर कोई आपकी बात मानने को विवश नहीं है । घर में आपकी अपनी बिगबॉस पत्नी भी कितनी भी तानाशाही सोच रखती हो वो भी आपको उस सीमा से से अधिक विवश नहीं कर सकती जो आपको इस हद तक अपमानित करती हो कि आप अपनी आज़ादी की खातिर बगावत करने पर आमादा हो जाएं । हर कोई संविधान कानून और मानवाधिकरों की बात करता है आये दिन । मगर साल दर साल पता भी नहीं कौन है जो अपने शानदार महलों जैसे घर में कुछ लोगों को जेल की तरह कैदी बनाकर मनमानी करता है । मोगैम्बो खुश हुआ की आवाज़ वाले खलनायक को खुश करना उसके इशारे पर बिना सोचे समझे कुछ भी करना । देश में कुछ लोग हैं जिन पर कोई नियम कानून लागू होता ही नहीं , हर कानून हर नैतिक मूल्य को ठेंगा दिखाते हैं मगर वीवीआईपी जैसा रुतबा पाते हैं । सब जिनके किससे सुनते सुनाते हैं आज उनकी कहानी आपको सुनाते ही नहीं दिखाते हैं । चलो फलैशबैक में जाते हैं ।

                 राधा कौन है और राजू कौन सब जानते हैं । बोल राधा बोल , बोलना ही होगा । सत्ता चाहती है जनता भी राधा की तरह बोले चुप नहीं रहे मगर क्या बोले ये शासक की मर्ज़ी है । संगम फिल्म में राधा के कपड़े उठाकर फ़िल्मी नायक पेड़ पर बैठा खुश है गाता है , बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं । नहीं कभी नहीं । बोलती है राधा मगर सत्ता के पास  कपड़े हैं , राजा नंगा है की बात नहीं है जनता नंगी है । गांधी जी ने देखा था लोग नंगे बदन हैं तो इक धोती में रहने का संकल्प लिया था । यहां गांधी जी भी शर्मसार हैं कोई खुद इतनी बार कपड़े बदलता है और इतनी सजधज से रहता है कि भूखी नंगी जनता को चिढ़ाता लगता है । मुझ से सीखो बिना काम धाम किये कैसे मौज मनाते हैं , राजनेता वोट नहीं लेते देश की जनता के कपड़े चुराते हैं । फिर होगा कि नहीं गाते हैं , भाषणों में यही कहते हैं और सबसे हामी भरवाते हैं । इसी को समझते हैं दिन अच्छे आते हैं , आपको झूठे सपने दिखलाते हैं अपनी हक़ीक़त सब से छुपाते हैं । मैंने ब्लॉग पर पहले टीवी शो पर बहुत लिखा है , कौन बनेगा करोड़पति या ज़िंदगी के दोराहे  टीवी सीरियल तक सभी को देखकर लगता है इनको बनाने वाले समझते हैं दर्शक नासमझ और बेवकूफ ही नहीं बल्कि दिमाग का इस्तेमाल नहीं करने वाले लोग हैं और उनकी मज़बूरी है जो परोसा जाये उसे ही पसंद करना । पैसा पैसा पैसा सबको किसी भी तरह किसी भी कीमत पर जितना अधिक मुमकिन हो कमाई करनी है । बेशक इन सब से देश समाज को कितना भी नुकसान होता हो । आज बिगबॉस की बात बताते हैं ।  

              बिगबॉस के घर में कितने छुपे कैमरे हैं घर वालों को सामने नज़र आते हैं । मगर ये बंसी बजाने वाले सोशल मीडिया से आप सभी का सभी कुछ चुराते हैं । गुनहगार फेसबुक वाले क्यों कहलाते हैं आप शरीफ हैं जो गुनाह खुद करवाते हैं । सवाल पूछते हैं भाग जाते हैं जवाब देने से इतना खौफ खाते हैं , तभी तो संसद भी बेहद कम जाते हैं विदेश में रासलीला मनाते हैं । देश की जनता को केवल टीवी रेडिओ पर नज़र आते हैं , जो देश वाले देश से बाहर हैं उनको डिनर खिलाते हैं और खूब तालियां बजवाते हैं । जब से आये पूरा देश बिगबॉस के घर जैसा जेल है और आप अपना हुक्म चलाते हैं । चलो वापस टीवी शो बिगबॉस पर आते हैं । आज आपको नेपथ्य की बात समझाते हैं पर्दे के पीछे छुपे राज़ सामने लाते हैं ।

          ये खेल है या खेल के नाम पर इक नाटक है जो वास्तविकता को नंगा करता है दिल बहलाता है । चंद सिक्कों में हर कोई बिक जाता है , पैसे और शोहरत की हवस की खातिर अपनी आज़ादी को बाहर छोड़ बिगबॉस के घर में आता है । मौलिक अधिकार देश का कानून समाज के मूल्य सब बाहर रह जाते हैं । कुछ लोग किसी की शर्तों में बंधकर इस में रहने आते हैं , बंधुवा लोग क्या कहलाते हैं । जनहित याचिका वाले इस पर नहीं बोलते घबराते हैं । क्या आपके घर भी कुछ दिन रहने महमान आते हैं , क्या उनको इतना भी सताते हैं , वो जितने दिन आपके घर में हैं क्या कठपुतलियां बन जाते हैं । आपके इशारों पर रोते हैं आपके चाहने पर गाते हैं , क्या ऐसे ही किसी को जगाते हैं । गाना बजाते हैं उनको नचवाते हैं , क्या क्या ज़ुल्म ढाते हैं । घर में यातना शिविर चलाते हैं और घर आये महमानों को जी भर रुलाते हैं , दर्शक क्या सैडिस्टिक प्लेजर पाते हैं । क्यों किसी को परेशान होता देख मज़ा उठाते हैं । ये लोग क्या दुनिया ऐसी चाहते हैं । ये कैसे नियम हैं खुद किसी को अपने केबिन में बुलाते हैं और घर में गलत काम करने का हुक्म सुनाते हैं । बिगबॉस कैसे घर के मालिक हैं जो आग बुझाते नहीं खुद ही आग लगवाते हैं और उसके बाद बुझाने की आड़ में जमकर भड़काते हैं । ऐसा लगता है अभी भी मनोरंजन के नाम पर देश की न्याय व्यवस्था का उपहास होता है , कोई हद किसी बात की नहीं ये एहसास होता है । ये घर क्या देश के संविधान नियम कानून से ऊपर है जो इसमें कुछ भी करने देने की इजाज़त है । खेल नहीं है ये कोई शो भी नहीं है ये हमारी मानसिकता पर लानत है ।

            ये एंकर क्या है जो हर घर वाले को बहुत भाता है , यही है जो उनसे अधिक पैसा हर एपिसोड से कमाता है । जब जिसे चाहे प्यार जताता है , जब मर्ज़ी खुलेआम मज़ाक उड़ाता है । हर घर में रहने वाले को समझाता है जो मुझसे बगावत करता नहीं बच पाता है । कभी किसी को डराता है धमकाता है कभी अच्छे दिन की बात कहकर दिल बहलाता है । राजनीति भी बिगबॉस के घर जैसी है , आगे समझ जाना है क्या लगती कैसी है । आपकी ऐसी की तैसी है । पैसा पैसा पैसा सबको किसी भी तरह किसी भी कीमत पर जितना अधिक मुमकिन हो कमाई करनी है । बेशक इन सब से देश समाज को कितना भी नुकसान होता हो । जिस तरह लोकतंत्र बनी हुई राजनितिक दलों की रखैल है उसी तरह मनोरंजन कुछ लोगों की मनमानी करने और दौलतमंद बनने का गंदा खेल है ।  हर नेता सत्ता को वरमाला समझ जनता को राधा मान उसके साथ रंगरलियां मनाना चाहता है ।  ज़ोर-ज़बरदस्ती का प्यार संगम नहीं कुछ और कहलाता है । कर्तव्य किसी को याद नहीं अधिकार ही अधिकार है देश का संविधान खामोश है कानून लाचार है । कोई भी नहीं है जो अपने किये पर शर्मसार है । टीवी शो की आड़ में किसी को कितने भी पैसे देकर आप विवश नहीं कर सकते कुछ भी करने करवाने को ।  देश का कनून आपकी जागीर नहीं है । कोई आवाज़ नहीं उठाता क्योंकि हर कोई इनका यार है ।  सोशल मीडिया आपको कोई सरोकार है । ये भी गुनाह है चौकीदार को कोई करता खबरदार है । आज देखते हैं ये कैसी सरकार है ।


सरकार है बेकार है लाचार है - लोक सेतिया "तनहा"

सरकार है  , बेकार है , लाचार है ,
सुनती नहीं जनता की हाहाकार है।

फुर्सत नहीं समझें हमारी बात को ,
कहने को पर उनका खुला दरबार है।

रहजन बना बैठा है रहबर आजकल ,
सब की दवा करता जो खुद बीमार है।

जो कुछ नहीं देते कभी हैं देश को ,
अपने लिए सब कुछ उन्हें दरकार है।

इंसानियत की बात करना छोड़ दो ,
महंगा बड़ा सत्ता से करना प्यार है।

हैवानियत को ख़त्म करना आज है ,
इस बात से क्या आपको इनकार है।

ईमान बेचा जा रहा कैसे यहां ,
देखो लगा कैसा यहां बाज़ार है।

है पास फिर भी दूर रहता है सदा ,
मुझको मिला ऐसा मेरा दिलदार है।

अपना नहीं था ,कौन था देखा जिसे ,
"तनहा" यहां अब कौन किसका यार है।

       सरकार क्या होती है बिगबॉस कौन है , सब जानते हैं देख कोई नहीं सकता दोनों ही हैं मगर दिखाई नहीं देती हैं । किरदार निभा रहे तमाम लोग अपना अपना मगर खुद निर्णय करने की आज़ादी किसी को भी नहीं है । इक वही है जो बिगबॉस बनकर सबको बस में रखकर अपना दिल बहला रहा है ।  जनता हर तरफ रोती चिल्लाती है मगर वही अकेला नाच रहा है गा रहा है । सामने उसी का चेहरा नज़र आ रहा है , हर जगह उसी का फोटो इश्तिहार पर है आपकी बदहाली सामने है वो मुस्कुरा रहा है । इंसान कागज़ बन गया है संवेदना मर गई है आप को भूख लगी है वो हलवा पूरी खा रहा है । आपको तरसा रहा है अच्छे दिन का मतलब अब तो समझ आ रहा है । टीवी पर विज्ञापन बार बार आ रहा है बिगबॉस पुलिस और कानून को जोड़ीदार बना रहा है । मुझे फिर इक शेर दुष्यंत कुमार का याद आ रहा है । अंत में वही बंदा सुना रहा है ।

                    अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई कोई दरार ,

                     घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार । 

                      इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीक ए जुर्म हैं ,

                     आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार ।

 
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सितंबर 08, 2018

POST : 900 राजनीति के मकसद बदल गए हैं ( विडंबना ) डॉ लोक सेतिया

   राजनीति के मकसद बदल गए हैं  ( विडंबना  ) डॉ लोक सेतिया

                   ( देश सेवा नहीं रही अजब गोरखधंधा है आंखों वाला अंधा है  )

     जाने क्यों मेरे साथ अक्सर होता रहा है जो लोग राजनीति में थे या आना चाहते थे , और मुझसे जान पहचान रही  तब , उनकी असलियत और दिखावा अलग अलग ही नहीं विरोधाभासी भी था । जिन महान नेताओं की आदर्शवादी और विचारधारा की राजनीति हमें आकर्षित करती थी उनकी सोच जाने कब की गुम हो चुकी है । सत्ता पाकर शान से जीना और अपनी ईमानदारी की कमाई से नहीं देश के खज़ाने की लूट से ऐशो - आराम हासिल करना मकसद बन गया है । अलग अलग समय पर अलग अलग दलों के लोगों से जान पहचान हुई और जो शुरू में बड़ी बड़ी बातें करते थोड़े दिन बाद उन्हीं को वास्तविक जीवन में विपरीत आचरण करते देखा । डंकल प्रस्ताव के विरोध की बात करने वाले उस सरकार में शामिल थे या बाहर से समर्थन कर रहे थे जिसने हस्ताक्षर किये प्रस्ताव पर । वामपंथियों से अधिक दोगलापन शायद किसी और में नहीं होता है ।  मैंने वास्तविक जीवन में ईमानदारी की राह पर चलने वाला नैतिकता का पास रखने वाला कोई भी राजनेता नहीं देखा है । किताबों में पढ़ा है , बेशक लालबहादुर जे पी जैसे तमाम लोग हुए हैं देश में वास्तविक नायक कहला सकते हैं । मगर अपने करीब जिनको भी पाया बड़े ज़ालिम और मतलबपरस्त लोग ही रहे हैं । बेहद शरीफ समझे जाने वाले नेता को सत्ता मिलते ही बदमाशों की तरह व्यवहार करते देखा है , जिस थाली में खाया उसी में छेद करते देखा अपने सामने । इक कविता लिखी थी जो यहां दोहराता हूं : -

बड़े लोग ( नज़्म ) लोक सेतिया

बड़े लोग बड़े छोटे होते हैं
कहते हैं कुछ
समझ आता है और
आ मत जाना
इनकी बातों में
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं ।

इन्हें पहचान लो
ठीक से आज
कल तुम्हें ये
नहीं पहचानेंगे


किधर जाएं ये
खबर क्या है
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं ।

दुश्मनी से
बुरी दोस्ती इनकी
आ गए हैं
तो खुदा खैर करे


ये वो हैं जो
क़त्ल करने के बाद
कब्र पे आ के रोते होते हैं । 

 

     नेताओं में इंसानियत गधे के सर पर सींग की तरह मिली नहीं ।  ऊपर जो   7 सितंबर 2012 को लिखी हुई रचना है शत प्रतिशत सच है ।  कुछ दर्द कुछ ज़ख्म कभी नहीं खत्म होते । सत्ता का अहंकार इंसान को वहशी बना देता है और शरीफ समझे जाने वाले लोग किसी को बर्बाद कर देते हैं अपनी ज़रूरत पूरी करने की खातिर । ये अकेला अध्याय नहीं है , जिस जिस से वास्ता पड़ा सभी स्वार्थी और मतलब के लिए कुछ भी करने वाले निकले । दोस्त बन बन के मिले हमको मिटाने वाले । आज बहुत लोग हैं जो सत्ता में हैं मगर जिनकी वास्तविकता को मैंने करीब से देखा है । जो तब विचारधारा की बातें करते थे आज तानशाही तौर तरीके बन गए हैं और चाहते हैं उनके दल को छोड़ बाकी दल खत्म करने हैं । कई लोग ऐसे हैं जो कल किसी और दल में थे उससे पहले किसी और में और जिस भी दल में हों उसके बड़े नेताओं के तलुवे चाटते रहे हैं । इक बार इक सभा में दो दोस्त एसोसिएशन से सहयोग की मांग करने लगे तो उनसे सवाल किया आपका मकसद क्या है । 
 
   एम एल ए  बनना क्या लाज़मी है समाज सेवा करनी है तो । जवाब था यार पहले इक दल में घर से लगाया भी वसूल नहीं हुआ अब तो सारी कमी पूरी करनी है । एक साथी को देखा कि कोई काम नहीं था न कुछ पास था , किसी दल को सुरक्षित क्षेत्र से उम्मीदवार चाहिए था खड़ा किया सांसद बन गया और तकदीर से गठबंधन हुआ सत्ता मिल गई और ज़मीन से आसमान पर पहुंच गया । उसे देख कर कितने लोग उसी राह चल पड़े जबकि खुद उस की हालत धोबी के गधे की तरह है न घर का न घाट का । ये जो दूसरे की थाली में अधिक देखने की लाईलाज बीमारी है डॉक्टर भी उस रोग का उपचार तलाश करना छोड़ रोगी बन जाते हैं । कोई बात है जो बुराई भी लुभाती है । शरीफों का ज़माने में अजी बस हाल वो देखा कि तौबा कर ली हमने । तीसरी कसम की तरह सोच लिया आगे से किसी नेता को अच्छा समझने की मूर्खता नहीं करनी है । 
 
          शायद 15 -20  साल पहले कोई जाना माना नाम वाला आया मेरे शहर में । अख़बार वालों से मिला और जयप्रकाश नारायण जी के संपूर्ण क्रांति आंदोलन को दोबारा शुरू करने की बात की । इक दोस्त जो अख़बार को खबरें भेजता था जानता था मैं 1975 में दिल्ली में 25 जून को जेपी जी को सुनने गया था रामलीला मैदान में और उनका प्रशंसक हूं । उन को बताया और फोन पर बात की मेरे घर आकर मिलने की चाहत है । मैं दूध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर पीता था इसलिए कुछ सवाल कर दिए जो उनको अनावश्यक लगे थे । मैंने कहा था आप अपना काम छोड़ इस काम में आओगे या किसी दूसरे के नाम से दल बनाकर जगह बनाने की कोशिश ही है । क्या जेपी के आंदोलन में शामिल उन लोगों की राह तो नहीं अपनाओगे जो अवसर मिलते ही शासक बनकर घोटाले करते आये हैं । खुद जे पी अपने जीवन में निराश हुए थे जब जनता पार्टी की सरकार कुछ लोगों ने अपनी सत्ता की चाहत में तोड़ी गिराई थी और देश की आशाओं को धूल में मिला दिया था ।  वो मुजरिम हैं देश का भरोसा तोड़ने के । 

         शायद साल बाद उनका फिर बिना बताये आना हुआ , घर की डोर बैल बजी तो पांच लोग बाहर खड़े थे , आदर सहित लाये घर में । चाय आदि चल रही थी और एक शख्स मुझे थोड़ा अजीब नज़र से देखता हुआ शायद कुछ सोच रहा था । अचानक अपने झोले से इक पुराना अख़बार निकाल कर दिखा कर कहने लगे ये लेख अपने लिखा है । जनसत्ता अख़बार में छपा हुआ मेरा लेख था मगर मुझे तब तक पता नहीं था छपने का । पढ़ा दोबारा तो हंसी आई और मैंने उन जाने माने व्यक्ति से शब्द शब्द पर ज़ोर देकर सवाल किया क्या यही सच नहीं है , बताओ इतने दिन किया क्या है । केवल जगह जगह कुछ लोग अपनी मर्ज़ी के ही नहीं अपनी मर्ज़ी के वर्ग से चुनकर उनको पदों पर होने की घोषणा कर दी । जनता से कोई सम्पर्क नहीं किया , यही सब तो लिखा था । तब मैंने उनको आईना दिखलाया था कि जो लोग खुद अपनी नौकरी ठीक से नहीं करते वेतन लेते हैं घर बैठे और वास्तव में राजनीति या टीवी चैनल का कोई काम करते हैं । खुद पहले अपने को देख लें । 
 
          कितने लोग कितनी बातें हैं , मगर संक्षेप में यही है कि किसी को किसी विचारधारा से कोई मतलब नहीं है । हवा के रुख को देख कर इधर उधर जिधर किधर आते जाते हैं । ऐसे लोग देश और समाज को देना कुछ भी नहीं चाहते हैं । हद तो ये है कि बहुत बार जिस दल में हैं उसी के नेताओं को आपसी बातचीत में गलियां भी देते हैं मगर सामने जाकर दुम हिलाते हैं । भाई क्या करें गलत है सब मगर अपने दल के बड़े नेता का विरोध नहीं कर सकते , मुझे समझाते हैं । गलती उनकी नहीं है , खुद हमारी है जो उनके बहकावे में आते हैं । कुछ खास घरों के लोग बिना आधार नेता कहलाते हैं , बाप दादा जाने किस किस के नाम की कमाई खाते हैं । इक खास बात है ये नेता आपसे वोट मांगने आते हैं तब भी आपकी बात नहीं सुनते , मैंने अक्सर ऐसे में सीधे सवाल पूछने का हौसला किया है और इनको बचकर भागते देखा है । अभी चुनाव है फिर बात करेंगे कहते हैं , मगर फिर कभी बात होती नहीं । जीते तो वक़्त नहीं हारे तो कहना बेकार है ।

        अन्ना के आंदोलन की बड़ी चर्चा है , उसकी वास्तविकता शायद अभी भी बहुत कम लोग समझे हैं । मेरे पास एसएमएस आया इक पार्क में आने को निवेदन किया गया था । कुछ सोचकर इक बार जाकर देखना उचित लगा , मगर जाकर देखते ही समझ आया कि ये तो जे पी के आंदोलन की नकल भी हास्यसपद रूप से है । कोई माइक पर गलियां देता खड़ा था और तालियां बज रही थीं । मंच पर जो लोग फूलमाला डाले बैठे थे वास्तव में तहसील और बिजलीघर या अन्य सरकारी दफ्तरों में रिश्वतखोर लोगों की दलाली करने वाले लोग थे जो दो नंबर की कमाई से धनवान बन गये थे मगर समाज में उनकी हैसियत दो टके की भी नहीं थी । ये उनको अवसर लगा था आगे बढ़कर राजनीति में घुसने और अधिक मालदार बनने का । सम्पूर्ण क्रांति को भी इसी तरह के लोगों ने असफल किया था । लोग शोर और भीड़ को देख सोचते नहीं ये कौन लोग है और इनका अतीत क्या है । केजरीवाल वो शख्स है जो नौकरी में रहते वेतन की सुविधा हासिल कर विदेश में पढ़ाई करने जाता है मगर वापस आकर नियम का पालन कर विभाग में काम नहीं करता दो साल बल्कि घर पर बैठ छुट्टी लेकर नियमों की खिल्ली उड़ाता है । जब नौकरी छोड़नी पड़ी राजनीति में आने को तो विभाग को लिया क़र्ज़ नहीं चुकाना चाहता है मगर ईमानदारी की कसमें खाता है , मज़बूरी में वापस देना पड़े क़र्ज़ तो विभाग को नहीं देश के पी एम को चेक भिजवाता है । मज़ाक करता है या मज़ाक उड़ाता है अपनी असलियत दिखलाता है मगर आपकी समझ में नहीं आता है ।

              चार साल पहले कोई नेता सामने आता है , कोई नहीं समझ पाया कैसा जाल बिछाता है । आपको अच्छे दिन का सपना दिखलाता है जो बाद में चुनावी जुमला कहलाता है । देश फिर से धोखा खाता है उसकी मंशा को कहां समझ पाता है । आपको बार बार यही बताता है , अभी तक किसी भी सरकार ने कुछ भी नहीं किया है । खुद कुछ भी नहीं करता चार साल मस्ती में झूमता गाता है , कभी उस कभी इस देश को जाता है , खाली हाथ वापस लौट आता है , ये भारत देश है इस के पास साधन और संपदा का भंडार है किसी भी से भीख की नहीं दरकार है । समझने की बात इतनी सी है कुछ लोग नहीं देश के सब कुछ के मालिक हर कोई बराबरी का हकदार है । आखिर निकला क्या , चोर - थानेदार हैरान हैं राजनीति देश सेवा नहीं शुद्ध व्यौपार है । ये अच्छे दिन हैं या देश का किया बंटाधार है । मची हुई क्यों हाहाकार है , कोई नहीं अपने झूठे वादे से रत्ती भर शर्मसार है । मेरा आपसे इक छोटा सा सवाल है , क्या हमारा देश सवा सौ करोड़ का अपने बीच से किसी भी दल की बात छोड़कर 542 ऐसे संसद नहीं खोजकर चुन सकता जिनको करोड़ों की शानो शौकत और सुख सुविधा की चाहत नहीं और जो सादगी से विलासिता पूर्ण जीवन को छोड़ देश की सेवा कर सकते हों । अगर ऐसे देशभक्त नहीं हैं तो देश और समाज कंगाल है ।

                  आखिर में संविधान की बात । संविधान किसी को प्रधानमंत्री सीधे नहीं घोषित करता है , संविधान में जनता सांसद विधायक चुनती है जो बाद में अपने में किसी को नेता चुनते हैं । आप इस उस नाम की चर्चा करते हैं क्या समझते हैं , खुद ही संविधान को दरकिनार करते हैं । जो लोग संसद विधायक बनकर भी दलगत अनुशासन की तलवार से डरकर चुप रहते हैं वो किस लोकतंत्र की बात कहते हैं । जनतंत्र को राजनीतिक दलों ने बंधक बना लिया है जनता का शासन नहीं दल का है और शायद दल भी कहने को है केवल गिने चुने लोग हर जगह अपनी मर्ज़ी से मनोनीत करते हैं अपने ख़ास चाटुकार लोगों को । डेमोक्रेसी को कत्ल किया जा चुका है इक बेजान लाश को मोम के पुतले में ढकने की तरह । 
 

 

POST : 899 सच पर पाबंदी है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      सच पर पाबंदी है  ( तरकश )   डॉ लोक सेतिया

      झूठ का धंधा खूब चल रहा है , सच तो कोई पूछता ही नहीं है , बाज़ार में दुनिया के सच कोई बेचता नहीं ख़रीदार मिलता नहीं । सच बिना मोल मिल जाये तब भी किसी को ज़रूरत ही नहीं , खरीदने की औकात भी  नहीं । फिर भी सच को घर में घुसने क्या अपनी गली तक नहीं आने देते सच सच कहने वाले लोग सच को जानते नहीं मानते नहीं पहचानते नहीं  । सीसी टीवी कैमरे से देख लेते हैं और द्वार बंद कर लेते हैं फोन पर उपलब्ध नहीं है सुनाई देता है । घर दफ्तर की कॉलबेल बजती नहीं सुनाई देती । सोशल मीडिया पर ब्लॉक किया इतना काफी नहीं था जो अब ईमेल भी ब्लॉक करने लगे हैं । दावा फिर भी है हम आपकी आवाज़ सुनना चाहते हैं और आपकी बात समझना चाहते हैं । मुझे ये जानकर बिल्कुल भी हैरानी नहीं हुई न बुरा लगने की बात है । यही वास्तव में सच की जीत है और झूठ के हारने की बात है , उजाले की किरण भी है और अंधियारी भी रात है । खेल नहीं जंग है शह - मात है । आप बताओ क्या हालात है । सच की अर्थी है कि झूठ की बरात है । सूखा मचा रही है अजब ये बरसात है , जी हां दुष्यंत की बात है । 
 
      झूठ काहे डरता है जब सभी कुछ उसी के हाथ है । तलवार बंदूक चाकू छुरी सब अपने साथ है । जिसे चाहें कत्ल करें कानून का जब साथ है । फिर घबराहट क्यों है किस बात का पसीना माथे पर चमक रहा है धड़कन रुकी है कि और बढ़ी हुई दिल का कैसा उत्पात है । सांस को सांस आती नहीं दम घुटने की हालात है । सच का डर इतना है कि सोना भी दुश्वार है , ख्वाब में दिखती लटकती सच की तलवार है । झूठ मुझे कहता है आकर सच तू तो मेरा पुराना यार है । मैं क्या बताऊं तुझे मेरा अपने पर नहीं इख़्तियार है , झूठ की आदत है झूठ से व्यौपार है । सच तुम बताओ तुम्हारा तो बंटाधार है । झूठ की जब हर तरफ हो रही जय जयकार है , न जाने किस बात से फिर भी शर्मसार है । सच को माना नहीं सच है क्या जाना नहीं सच को अपनाना नहीं , कोई भी नया बहाना नहीं । सच की हर राह रोक कर भी चैन नहीं करार नहीं , बेगुनाह करार होकर भी मिला दिल को करार नहीं । सच का कसूर नहीं है जनाब आपको खुद अपने पर ऐतबार नहीं । झूठ होता कभी सच का तो पैरोकार नहीं । आपकी किसी बात पर मैं कर सकता तकरार नहीं । और कोई झगड़ा हमारा तो मेरे यार नहीं । हर बार माना जो चाहा तुमने मगर नहीं इस बार नहीं । 
 
 
Sach Shayari In Hindi - Amar Ujala Kavya - 'सच' पर ये 10 बेहतरीन शेर...

 

सितंबर 07, 2018

POST : 898 किताबों का मंदिर बनाना है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

       किताबों का मंदिर बनाना है  ( आलेख  ) डॉ लोक सेतिया

             हम लोग कितना बदल चुके हैं । कभी बैलगाड़ी और साईकिल होती थी आज मोटर कार बस और हवाई जहाज़ ही नहीं चांद और मंगल पर जाने की बात होती है । समय के साथ सब कुछ बदलता है और जो लगता है अब काम नहीं आता उसको छोड़ देते हैं । हम तर्क की कसौटी पर कसते हैं तब यकीन करते हैं । भला नये युग में पुराने ढंग से जीना संभव है , आज इंटनेट मोबाइल फ़ोन ईमेल के ज़माने में चिट्ठी लिखना कैसा लगता है । मैं अभी भी ईमेल से भी किसी को कोई बात लिखता हूं तो खुला खत शीर्षक देने की नासमझी करता हूं । सरकार अधिकारी अख़बार वाले सत्ताधारी नेता पहले रद्दी की टोकरी में डालते थे बिना कोई जवाब दिये या समस्या का निदान किये , अब ईमेल ही ब्लॉक कर देते हैं । उनकी पसंद की बात नहीं आईना दिखाओ तो बहुत आसान है ये करना । आप उनके महलों के सामने जाकर शोर मचाते रहो आपकी आवाज़ उनके शीशे की दीवारों के पार जाती ही नहीं है । साउंडप्रूफ हैं उनके घर दफ्तर और सरकारी शिकायत की ऐप्स भी । तरीके बदल गये हैं शासकों के तौर नहीं बदले हैं । हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है । 
 
    जब कोई नहीं सुनता तो लोग भगवान खुदा अल्लाह वाहेगुरु जीसस की चौखट पर इबादत करते रहे हैं , परस्तिश करते हैं आरती प्रार्थना करते रहे हैं अरदास करते रहे हैं ।  कभी इस कभी दर पर जाते रहे हैं । हर देवी देवता को मनाते रहे हैं , चढ़ावा चढ़ाते महिमा गाते रहे हैं । मिला कहां कुछ मन ही मन पछताते रहे हैं । दुनिया वाले अपने अपने खुदा भी बनाते रहे हैं । धर्म की किताबें पढ़ते पढ़ाते रहे हैं , झूठी आशा को जगाते रहे हैं । आवाज़ देकर बुलाते रहे हैं । दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्ला ।  मैं भी जाता रहा तमाम ज़िंदगी मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे । इक दिन बेहद निराश था और इबादतगाह मंदिर मस्जिद या गुरुद्वारा जो भी था , सहा नहीं गया और आंसू बहने लगे । कितने लोग थे आस पास कोई नहीं पास आया आंसू पौंछने तो क्या हाल पूछने को भी । जानते थे सभी मिलते रहते थे मगर सब अनदेखा कर चले गए तो समझा यहां आकर सबक किसी ने सीखा नहीं शायद । मगर दुनिया से नहीं गिला ऊपर वाले से भी किया नहीं मैंने और वापस आकर इक नज़्म लिखी थी । 

    शोर ( कविता )

वो सुनता है ,

हमेशा सभी की फ़रियाद ,

नहीं लौटा कभी कोई ,

दर से उसके खाली हाथ ।

शोर बड़ा था ,

उसकी बंदगी करने वालों का ,

शायद तभी ,

नहीं सुन पाया ,

मेरी सिसकियों की ,

आवाज़ को आज खुदा । 

 

         क्या ये हमारी गलती नहीं है , हम वहीं बार बार जाते हैं और हर बार खाली दामन लौट आते हैं । कभी गीता कभी बाइबल कभी और सब चौपाई चालीसा गाते हैं । ईश्वर को धरती पर आने को बुलाते हैं । भला स्वर्ग जन्नत छोड़ देवी देवता इधर आते हैं । हम मूर्खता करते हैं जो बंदों को भी खुदा बनाते हैं और वही जो मसीहा कहलाते हैं हम पर सितम ढाते हैं । चलो देख लिया ये सभी खुदा ऊपर नीचे वाले नहीं किसी काम आते हैं । कोई और नुस्खा आज़माते हैं । इंसानियत का कोई ऐसा मंदिर बनाते हैं और उसमें सबक नये युग का समझते हैं समझाते हैं । सब ताज उछाले जाएंगे सब तख़्त गिराये जाएंगे मिलकर गाते हैं अपने हौंसलों से अपनी दुनिया को बनाकर दिखाते हैं । कुछ समझते हैं समझाते हैं कर दिखाते हैं । 
 
           ये ज़रूरी है आज पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरत है देश और आज़ादी से मुहब्बत की शिक्षा देने वाले इक मंदिर की । शायद पहले इसकी ज़रूरत ही नहीं थी , ये जज़्बा अपने आप दिल में पैदा हो जाता था । भगतसिंह राजगुरु गांधी सुभाष नाम लिखने लगे तो लाखों नहीं करोड़ों नाम भी और बेनाम भी शामिल करने होंगे । धर्म जाति दीन मज़हब जमात आदमी औरत कोई अंतर नहीं सब साथ एक दूजे से बढ़कर । मगर अब आजकल शोर ही शोर है , दावे सभी करते हैं मगर क्या इसे देशभक्ति मानना उचित होगा । सवालिया निशान है कि देशभक्त होने का दम भरते हैं मगर देश की खातिर न जीते हैं न मरते हैं । देखा है इक भारतमाता का मंदिर बना हुआ है हरिद्वार में , शायद और भी बने होंगे । मगर उन को देखकर इक भावना जगती है पल भर को जब तक उस जगह हैं , थोड़ा दूर जाते ही इधर उधर नज़ारे देखने लगते हैं और वो भावना स्थाई दिल में बसती हो लगता नहीं है । मेरी कल्पना का मंदिर कैसा होगा आज बताता हूं , पहले ये बता देना चाहता हूं कि मेरे दिल में ये ख्याल आया कैसे । किसी ने मुझसे सवाल किया आप को अमुक देवी देवता का  मंत्र आता है आपको पढ़ना चाहिए सब कुछ संभव हो जाता है  । मैं उस वक़्त इक देश प्यार की नज़्म की बात सोच रहा था , मैंने कहा मुझे लगता है कि मुझे ऐसे गीत ऐसी नज़्में ग़ज़लें सुननी पढ़नी और दोहरानी चाहिएं । मेरे लिए यही सबसे बड़ी इबादत है कोशिश करने से कुछ हासिल नहीं भी हो तब भी चैन आता है । 
 
       और इसी से इक कल्पना उभर रही है कि ऐसा मंदिर कैसा बनाया जाये , अब ये भी बताना है कि उस में कोई भगवान कोई देवी देवता कोई मूरत कोई तस्वीर नहीं लगी हो । भले कोई ऊंची इमारत भी नहीं हो बस इक बड़ा सा हॉल हो जिसमें किताबें ही किताबें हर तरफ हों । मगर उनको पढ़ना लाज़मी हो पढ़ाना भी सुकून देता हो , सर झुकाने की नहीं ज़रूरत माथा टेकने की नहीं माथे पर लगाने की आदत पहली की जैसी हो तो अच्छा है । किताबें हों मगर ऐसी नहीं जिन पर कोई राजनैतिक दल अपनी विचारधारा का लेबल लगा सके । केवल सच्ची देश समाज की भलाई की जनता की परेशानियों को समझाने वाली किताबें । मैंने बहुत थोड़ी पढ़ी हैं फिर भी जिनको उस मंदिर में रखना चाहिए ये कुछ नाम हैं शामिल किये जा सकते हैं । 
 
       टैगोर , मुंशी प्रेमचंद , दुष्यंत कुमार , नीरज , शरद जोशी , श्रीलाल शुक्ल , हरिशंकर परसाई , इक़बाल , फैज़ , साहित्य की हर विधा में ऐसी रचनाएं हैं जो हमारी निराशा को दूर करती हैं और नई आशा का संचार करती हैं । वो सुबह कभी तो आएगी ।  नया ज़माना आएगा । जिन्हें नाज़ है हिन्द पर कहां हैं , प्यासा जैसी फिल्मों के नग्में । हक़ीक़त जैसी फ़िल्में । नया दौर । और भी साधना जैसी फिल्मों के गीत जो झकझोरते हैं । औरत ने जन्म दिया मर्दों को । शहीद जैसी फिल्मों की कहानियां और गीत । ऐसा बहुत बड़ा भंडार है हमारी विरासत का जिसे शायद हमने खो दिया है या बिसरा दिया है । कहीं ऐसा करना कोई अपराध तो नहीं है , मुझे लगता है ।  जाने क्या क्या पढ़ते हैं सीखते सिखाते हैं जिनको समझते हैं काम आएंगे किसी मकसद को ज़रूरी हैं । तो क्या देश और समाज की बात सोचना लाज़मी नहीं है । केवल खुद अपने आप तक सोच को सिमित रखना कितना उचित है । शायद हमारे समय की वो पढ़ाई जिस में देश प्यार और समाज से सरोकार की भावना शामिल रहती थी अनिवार्य रूप से आजकल नहीं होगी , ऐसा इसलिए लगता है कि आजकल के बच्चों और युवकों की बातों में इनका ज़िक्र दिखाई देता नहीं है । बच्चे देश का भविष्य होते हैं और बचपन में ही नींव रखी जाती है देश से मुहब्बत की भावना की । आधुनिकता की दौड़ में हमने शायद सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा के कार्य को भुला दिया है । हां राजनेताओं के लिए दो चार किताबें पढ़ना ज़रूरी किया जाना चाहिए , नीति कथा , लोक कथाओं की ऊंचे आदर्शों को समझाने वाली बोध कथाओं की नैतिकता ईमानदारी से आत्मा ज़मीर की बात की शिक्षा की सबसे अधिक आवश्यकता सत्ता और प्रशासन को है । पढ़ लिख कर भी अभाव है सोच समझ खोखली है तमाम लोगों की , कौन ऐसे मंदिर बनाता है कौन इंसानियत का सबक सिखाता है । 
 
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सितंबर 06, 2018

POST : 897 हम कमाल करते हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

         हम कमाल करते हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

    लोग सारे सवाल करते हैं , सरकार कितना बेहाल करते हैं । कौन समझाए करते क्या हैं जनाब , कुछ नहीं करते यही कमाल करते हैं । ऐसा भी नहीं कि उनको करना नहीं कुछ भी , ये भी नहीं कि कर दिखाना नहीं चाहते कुछ । समस्या है अभी तक उसी समस्या में उलझे हैं कि हमने वो करना है जो 67 सालों में पिछली सरकारों ने किया नहीं है । पहले देखना है जो जो पिछली सरकारों ने किया , हमारे अनुसार वो कुछ भी नहीं किया , उसको छोड़ बाकी कोई काम है जिसे सिर्फ हमीं करंगे ।  हमने कहा और समझा यही है कि हमसे पहले किसी ने कुछ भी नहीं किया और देश हमारी राह देख रहा था हम आएंगे और अच्छे दिन लाएंगे । आज आपको अच्छे दिन की कथा सुनाएंगे । सारे बहरे सुनेंगे जब सारे गूंगे गाएंगे । गूंगे निकल पड़े हैं ज़ुबां की तलाश में , सरकार के ख़िलाफ़ ये साज़िश तो देखिये । सोशल मीडिया पर वही रहते हैं जो खाली होते हैं , ये बात कोई पुराने उद्योगपति कहते हैं । हम आधुनिक युग में रहते हैं मन की बात दुनिया से कहते हैं । हमने ये भी कमाल किया है धोती को रुमाल किया है , रेडिओ को सीधा टीवी पर लेकर जाने किसका क्या हाल किया है । पहले किसी ने किया ऐसा बोले रेडिओ पर सुनाई टीवी पर दे , पहले टीवी पर भाषण या खेल का प्रसारण किया जाता तो रेडिओ पर आवाज़ सुनाई जाती थी , ताकि जिनके पास टीवी नहीं वो भी जान सकें । 

            चार साल पहले की बात है सिंघासन पर बैठते ही ऐलान किया था , हम शोले फिल्म के जेलर की तरह पहले के सभी जेलरों से अलग हैं । हमारी जेल में कैद सभी को समझ लेना चाहिए कि हमारे होते परिंदा भी पर नहीं मार सकता है चप्पे चप्पे पर हमारी नज़र है । अभी तक देश में कुछ भी नहीं हुआ है और हमने वही कर दिखाना है जो अभी तक किसी ने किया नहीं है । सभी अधिकारियों को बुलाया और कहा बताओ जो अभी तक नहीं हुआ है हम कर दिखाएंगे । किसी ने कहा अभी शिक्षा के लिए विद्यालयों की कमी है , अस्पतालों की बहुत कमी है , सुरक्षा और न्याय जनता को मिलने की बेहद कमी है । मतलब अभी तक स्कूल कॉलेज अस्पताल बनवाये ही नहीं गए । जी नहीं बहुत बनाये गए हैं मगर अभी बहुत और ज़रूरत है बनवाने चाहिएं । नहीं नहीं जो पहले बने हम भी वही और नहीं बनाएंगे , संख्या की बात होगी तो हम टिक नहीं पाएंगे । हमने सोच लिया है हम बहुत ऊंचा बुत बनवाएंगे , उनको उनकी उलझनों में उलझायेंगे । मगर इसके लिए महान नेता किधर से लाएंगे , हमारे पास कोई नहीं है तो उनके गांधी पटेल को चुरायेंगे अपनाएंगे । गोडसे को भी नहीं भुलाएंगे अब अपनी सरकार है तो गांधी का नाम भी लेंगे और उनके कातिल का मंदिर भी बनवाएंगे । जो पहले नहीं हुआ हम कर दिखलाएंगे । पहले कोई कोई अख़बार टीवी वाला सरकारी तोता हुआ करता था , बाकी सरकार को आईना दिखाते थे और जनता की वास्तविकता सामने लाते थे । अब कौन है जो अबनिका है हर तरफ इसकी चर्चा है । हमने सबको मालामाल किया है इतना बढ़िया कमाल किया है । जिनके गले में रस्सी कोई नहीं बांध सका उनका हमने शिकार किया है । आज किसी को उनका भरोसा नहीं रहा , जिन पर पहले सभी ने ऐतबार किया है । हमने हर दिन हर किसी के ऐतबार का शिकार किया है । किसी ने जो नहीं किया हमने पहली बार किया है । देश में निष्पक्ष पत्रकारिता का निशान तक मिटाया है सच को झूठ साबित कर सब बंटाधार किया है , सिर्फ इश्तिहार का व्यौपार किया है विज्ञापनों की लूट का कीर्तिमान स्थापित कर हर चोर को साहूकार किया है । स्वास्थ्य विभाग को ज़िंदा रहने दिया बस लाईलाज रोग का उसे बीमार किया है । 

              महिला उद्धार की बातों को देखो कैसे बेकार किया है । बिना तलाक दिये छोड़कर भी दावा भी है उपकार किया है । गंगा मां के बुलावे का कितना हमने प्रचार किया है , गंगा को पूछना किस तरह सफाई की बात कर उसको और बेकार किया है । दाग़ी नेताओं की खातिर नया अविष्कार किया है , खुद नहला धुला पद देकर चमकदार किया है । हमने हर जगह अपनी पसंद के लोगों को बड़े बड़े पदों पर बिठाया है , चयन को नहीं मनोनयन को आधार बनाया है । संविधान किसने पढ़ा है किसने पढ़ाया है । हमने चलन अपना देश भर में चलाया है । जो हमारी बात नहीं समझता मानता अपना नहीं पराया है , हमारे अपनों से पूछो क्या क्या सितम नहीं ढाया है । हमने धूप में सभी को खूब जलाया है , यही हमारा साया है ये भी कहलवाया है । यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है , दुष्यंत कुमार की बात सच कर दिखाया है । 

             बांध पुल सड़कें बिजली परमाणु बंब और विज्ञान की उन्नति की है पहले की सरकारों ने , हम मंदिर मस्जिद गाएंगे और अपनी सत्ता को बढ़ाएंगे । गरीबी भूख को नहीं मिटा सकते तो जनता की उलझनों को और बढ़ाएंगे , महंगाई और असमानता को शिखर पर ले जाएंगे । पेट्रोलियम के दाम कभी नहीं घटाएंगे और रूपये को निचली पायदान पर खड़ा कर दिखाएंगे । किसान ख़ुदकुशी करें मज़दूर महनत के दाम की बात करें लोग चाहे जैसे जिएं मरें हम बांसुरी बजाएंगे । विदेशों की सैर पर देश की दौलत उड़ाएंगे , अपनी छवि को इतना चमकाएंगे , सारे टीवी चैनल अख़बार अपना फ़र्ज़ भूल कर हमारे तलवे चाटेंगे हमारे गुण गाएंगे । हमको देख कर मॉडलिंग करने वाले भी शर्मायेंगे , हम दिन में इतनी बार पोशाक बदल कर सामने आएंगे । हम संसद नहीं जाने वाले सांसदों में अपना नाम लिखवाएंगे और अपनी सोभा बढ़ाएंगे , कहने को ही मज़बूरी में संसद या पीएमओ जाएंगे , हम अठारह घंटे काम करने की अफवाह उड़ाएंगे , मगर अठारह घंटे किया क्या नहीं लोग समझ पाएंगे । हम सबको बुरा साबित करने को खुद अपनी महिमा गाएंगे मियां मिठू बन जाएंगे ।

         विकास की अपनी परिभाषा समझाएंगे और झूठ बोलने में स्वर्ण रजत ताम्र पदक सभी खुद पाएंगे । झूठ नहीं कहा था अच्छे दिन लाएंगे , लोग बदहाल हम आनंद मनाएंगे । मन की बात कहेंगे मगर मन में क्या है नहीं बताएंगे । पांच साल जब बीत जाएंगे तब सोचेंगे देश को क्या दिखलाएंगे । राज़ की बात तब समझायेंगे , जो जो पहले हुआ उसे नहीं करना और जो हुआ नहीं उसे तलाश करने में पांच साल गुज़र जाएंगे । अब तक नहीं मालूम करना क्या है जो हुआ नहीं पहले जल्दी उसका पता लगवाएंगे । अगली बार जीत गए तो ज़रूर कुछ कर दिखलाएंगे । कमाल करने वाले कमाल करते जाएंगे । सच तो ये है कि पिछली सरकारों ने देश में बहुत कुछ किया है अच्छा भी बुरा भी , हमने ठानी है उनकी नहीं मानी है । सबको ठेंगा दिखाया है बिना कुछ किये काम किया है बदनाम भी हुए तो नाम कमाया है । चौकीदार बनकर चोरों का साथ निभाया है । आपकी खातिर बनाया क्या नहीं मालूम , मगर हर दिन बहुत कुछ ढाया है । डरता मुझसे खुद मेरा भी साया है , किसी ने ये रुतबा अभी तलक नहीं पाया है । मनघड़ंत इतिहास सबको समझाया है नहीं खुद को इतिहास समझ आया है । कौन है अपना कौन पराया है ये हमारा राज़ कभी कोई नहीं जान पाया है जनता ने जितना खोया है हमने सरकार बनकर उतना पाकर अपना गौरव बढ़ाया है । बहुत लंबा शाम ढलते हुआ साया है । 

Best Sher On Evening - Amar Ujala Kavya - सुहानी सांझ और ये 20 बड़े शेर...

सितंबर 05, 2018

POST : 896 मुजरिम ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

                मुजरिम ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

मैं इक ऐसा गुनहगार हूं ,
खुद अपने से शर्मसार हूं ।

अपने ही घर में चोर हूं ,
मैं हूं मैं कि कोई और हूं ।

कैसा अजब किरदार हूं ,
हर सज़ा का हकदार हूं ।

झूठ है मैं भी अमीर हूं ,
सच तो है इक फकीर हूं ।

जाने कौन क्या पहचान हूं ,
अपने से भी अनजान हूं ।

किसलिए अभी ज़िंदा हूं ,
इस बात पे शर्मिन्दा हूं ।

अब हो चुका चूर-चूर हूं ,
हां हां मैं वही मगरूर हूं ।

आशिक़ हूं पर अजीब हूं ,
आप अपना ही रकीब हूं ।

शहर नहीं न कोई गांव है ,
नहीं धूप भी न ही छांव है ।

हर कारवां से बिछुड़ गया ,
हर आशियां बिखर गया ।

हंसता नहीं रोता भी नहीं ,
बेजान कुछ होता ही नहीं ।

ख़ामोशी की आवाज़ हूं ,
बिना पर की परवाज़ हूं ।
 

 

POST : 895 दलित कहना मना है , पामाल लोग ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 दलित कहना मना है , पामाल लोग ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

बोलने जब लगे पामाल लोग - लोक सेतिया "तनहा"

बोलने जब लगे पामाल लोग ,
कुछ नहीं कह सके वाचाल लोग ।

हम भला किस तरह करते यकीन ,
खा रहे मुफ़्त रोटी दाल लोग ।

खा रहे ठोकरें हम बार बार ,
खेलते आप सब फुटबाल लोग ।

देख नेता हुए हैरान आज ,
क्यों समझने लगे हर चाल लोग ।

ज़ुल्म सह भर रहे चुप चाप आह ,
और करते भी क्या बदहाल लोग ।

मछलियों को लुभाने लग गया है ,
बुन रहे इस तरह कुछ जाल लोग ।

कुछ हैं बाहर मगर भीतर हैं और ,
रूह "तनहा" नहीं बस खाल लोग ।

            अदालत ने सरकार को फरमान जारी करने को कहा। सोशल मीडिया वालों को निर्देश जारी करो दलित शब्द नहीं उपयोग करें बोलते हुए , उसकी जगह एस सी , बी सी कह सकते हैं। भाषा विशेषज्ञ हैं क्या दलित उसे कहते हैं जिसका उत्पीड़न होता है और एस सी , बी सी जन्म से होते हैं। आपका मतलब क्या है या तो आप समझते हैं जिनका जन्म जैसे हुआ उनका नसीब वही है उनको दलित ही रहना है भले कभी सत्ता पर आसीन होकर वो स्वर्णों पर भी ज़ुल्म करते हों। या फिर बाकी लोगों पर किया दमन आपको अत्याचार ही नहीं लगता। अदालतों की व्याख्या भी कमाल की बात है। मगर असली विषय यहां कोई और है चलो उसकी चर्चा करते हैं।

                            दलित सम्मेलन , दलित लेखक , दलित साहित्य ?

  मैं कब से समझना चाहता था ये सब क्या है। साहित्य में भी बटवारा मुमकिन है। दमन शोषण गरीब मज़दूर महिला बच्चे बूढ़े सभी का होता है। यहां तक कि बड़ी बड़ी कंपनियां अपने कर्मचारियों का शोषण खुलकर करते हैं। वेतन सुविधाएं कम देना ही ज़रूरी नहीं है , गधों की तरह जितना चाहे बोझ लादना भी अनुचित है , मगर शायद आप नहीं जानते देश में गधों की भी अहमियत है और उनके लिए कानून बना हुआ है। नियम जानना चाहोगे , काम के घंटे , तीन बार भोजन अवकाश , पानी पीने को भी अवकाश तो है ही शाम ढलने के बाद काम नहीं लिया जा सकता है , इतना ही नहीं उनको बांधने से पहले रस्सी के नीचे मुलायम रेशमी कपड़ा भी होना चाहिए। बारिश में और उमस में काम से छुट्टी भी लाज़मी है। गधों को बता देना आप। 
 
        पामाल शब्द का अर्थ है पांव के तले कुचला हुआ , दलित से भी बढ़कर कह सकते हैं। ऐसे में दलितों का साहित्य उसके लेखक ही नहीं ईनाम और सम्मेलन भी होना कुछ लोगों की अपनी दुकानदारी है। कोई लिखने वाला कविता कहानी ग़ज़ल व्यंग्य आलेख कोई भी विधा अपना कर लिख सकता है मगर ऐसा सोचना ही अपराध जैसा है कि कोई केवल कुछ लोगों की ही बात लिखेगा। साहित्य इक समंदर की तरह है और अपना अलग तालाब बना कर उसी की मछलियों की बात करना चाहते हैं , मगर मगर की बात नहीं क्योंकि मगरमच्छ तालाब में कहां मिलते हैं। मगरमच्छ से बचना चाहते हैं। मुझे लगा आज टीवी वालों को सरकार सलाह देती है कल लिखने वालों को भी दे सकती है ऐसे में बेचारे दलित लेखकों को बड़ी कठिनाई होगी। सरकारी फरमान का क्या भरोसा आपको  अपनी किताबों में से दलित शब्द मिटाने को कहें अगर या कोई और आकर उन किताबों पर रोक ही लगवा दे जिन में दलित शब्द उपयोग किया गया हो। अभी इसिहास को दोबारा लिखना बाकी है और सारा साहित्य फिर से लिखवाना पड़ा इक शब्द को बाहर करने को तो क्या होगा। 
 
              जावेद अख्तर जी को अपनी ग़ज़ल दोबारा लिखनी होगी जो कुछ इस तरह है। 

सभी जाते जिधर जाना उधर अच्छा नहीं लगता , मुझे पामाल रस्तों का सफर अच्छा नहीं लगता। 

मुझे दुश्मन से भी खुद्दारी की उम्मीद रहती है , किसी का भी हो , कदमों में सर अच्छा नहीं लगता। 

        दलित राजनीति करने वालों से लिखने वालों और सामाजिक संस्थाओं के लिए बड़े काम की चीज़ है। ये कागज़ की ऐसी तलवार है जो घायल करती है निशान नहीं छोड़ती। अब कोई इसी को लेकर सर्वोच्च न्यायालय चला जाएगा दलित का पैरोकार बनकर। दलित शोर भी करते हैं हमारा दमन किया जा रहा है , जो बोल सकता है आवाज़ उठाता है वो अन्याय से लड़ता क्यों नहीं अत्याचार सहन किसलिए करता है। ये मामला टेड़ा लगता है। वास्तविक दलित चुप चाप सहते हैं कुछ भी नहीं कहते हैं। आपको कुछ ऐसे लोगों से मिलवाते हैं जो शोषित हैं जिनके अधिकारों का दमन किया जाता है। शुरुआत घर से करना भी बुरा तो नहीं। लिखने वालो आप लिख लिख भेजते हो और अख़बार पत्रिका वाले छापते हैं पब्लिशर्स किताब छापते हैं और ये लोग खूब मालामाल हैं लेकिन कितने लिखने वाले हैं जो लेखन से पेट भर सके इतना भी मिलता है जिनको। वास्तविक शोषण करने वालों पर खामोश हैं क्योंकि बोले तो छपास की बीमारी बढ़ जाएगी। ये आधा सच आधा झूठ वाला लिखना किस काम का है। महिलाओं के शोषण की बात करने वाले खुद घर में अपनी पत्नी से उत्पीड़न का शिकार हैं , किसी लेखक की पत्नी है जो लिखने वाले पति को निकम्मा नहीं  समझती है। बस यही समस्या है खुद सितम सहते हैं और बाकी दुनिया को अत्याचार और शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाने को कहते हैं। पुरुष के अन्याय की कहानी कविता दर्द भरी ग़ज़ल और औरत के अत्याचार के केवल चुटकुले , ये कैसा न्याय है। होता होगा किसी युग में अत्याचार नारी पर आजकल की नारी पुरुष पर पड़ती है भारी। आज उसकी है तो कल आपकी भी आएगी बारी। कोई नहीं समझता व्यथा कथा हमारी । 
 

 

सितंबर 04, 2018

POST : 894 गिद्ध की नज़र वाले लोग ( बेरहम समाज ) डॉ लोक सेतिया

  गिद्ध की नज़र वाले लोग  ( बेरहम समाज  ) डॉ लोक सेतिया 

      आज इस तस्वीर को देखकर दिल दहल गया है । बताया गया है ये सूडान में 1993 में आए सूखे और भुखमरी की तस्वीर है । मगर मुझे लगा ये किसी भी देश की सरकार और उस देश की जनता की असलियत को बयां करने को बनाई गई है । गरीब जनता भूख से बेबसी से इक जिस्म नहीं बिना मांस का हड्डियों का ढांचा भर है और सत्ता का गिद्ध उस पर निगाहें लगाए है । शायद इस गिद्ध में भी इतना इंतज़ार करने की समझ है जो सत्ता रुपी गिद्ध में कभी नहीं दिखाई देती है । गिद्ध कौन कहता है कम हो रहे हैं , बढ़ रहे हैं जिधर देखो गिद्ध टकटकी लगाए नौच खाने को व्याकुल हैं । और गिद्ध केवल सरकारी दफ्तरों में ही कुर्सियों पर बैठे हों ऐसा भी नहीं है । समाज में हर तरफ गिद्ध ही गिद्ध हैं जो ज़िंदा इंसानों को ही चबा जाना चाहते हैं उनके मरने तक का इंतज़ार नहीं करते । जिस देश में करोड़ों लोग हर दिन भूखे सोते हैं और बिना किसी छत के आसमान के नीचे सर्द रातें , गर्मी में तपती लू और आंधी तूफान झेलते हैं उस देश की सरकारों को जनता को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवाना भी अपना कर्तव्य नहीं लगता , और हर बार झूठा दावा करते हैं कितने साल बाद ये सब नहीं होगा । मगर वही लोग खुद अपने पर बेतहाशा धन बर्बाद करते हैं उसी जनता का जिसे नोच खाने के सिवा और क्या कह सकते हैं । एक आदमी को रहने को महल और उस की देखभाल पर लाखों रूपये खर्च का मतलब कितने हज़ारों की कितने दिन की भूख मिट सकती इतना धन केवल शानो शौकत दिखाने को । नहीं गरीबों से इनको रत्ती भर भी सहानुभूति नहीं है । देश सेवा के नाम पर इक अमानवीय अपराध है जनता के सेवक बनकर उसकी दौलत को यूं उड़ाना । 
 
                 अभी केरल में आई बाढ़ में कहा गया किसी अरब देश की सहायता स्वीकार नहीं की गई , ये सच है या झूठ या आधा सच मुझे कुछ नहीं कहना । मगर मुझे पूछना है उन सभी धर्म वालों से जिनके पास अंबार लगे हुए हैं वो किस दिन किस के लिए हैं । अगर धर्म के लिए हैं तो देश में इतने लोग गरीब हैं भूखे हैं और शिक्षा स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं क्यों इन सभी को दौलत जमा करनी धर्म लगती है जबकि हर धर्म संचय नहीं करने की शिक्षा देता है और ज़रूरत से अधिक जमा करने को दरिद्रता बताता है । और भी लोग हैं जो दया और समाजसेवा का दम भरते हैं मगर अपने पास हज़ारों करोड़ होने पर भी उनकी हवस कम नहीं होती है और पैसा कमाने में सब कुछ करना उचित समझते हैं । गांधी जी ने ही नहीं पहले भी सभी महान लोगों ने ऐसा कहा है कि दुनिया में सबकी ज़रूरत को बहुत है सब कुछ , मगर किसी की भी हवस पूरी करने को काफी नहीं है । अर्थशास्त्री भी बताते हैं कुछ लोगों के पास बहुत अधिक है इसी कारण बाकी लोगों के पास ज़रूरत को भी नहीं है । वो चाहे जो भी लोग हों जिन लोगों ने भी जिस किसी भी तरह देश की संपदा का बड़ा हिस्सा अपनी तिजोरी में बंद किया हुआ है वास्तव में बाकी लोगों के हिस्से का लूट का ही है । 
 
       ये कैसी व्यवस्था है जो गरीब को और गरीब बनाती जाती है और मुट्ठी भर अमीरों को और भी रईस । उस पर जनता को कोई करोड़पति बनने के सपने दिखला कर दौलतमंद बनता जाता है तो कोई किसी और तरीके से अपने स्वार्थ सिद्ध करने को भी महानता साबित करता है । सत्ता और दौलत का गठबंधन हो चुका है और अपराध इनको जोड़ने वाली कड़ी का काम कर रहा है । पुलिस सरकारी अधिकारी सभी विभाग और बड़े बड़े उद्योगपति मिलकर वही कर रहे हैं जो अधमरे बच्चे को देखकर गिद्ध की नज़र से दिखाई देता है । हम कहते हैं बहुत धर्म को मानने वाले हैं मगर वो धर्म धरातल पर तो नदारद है । कोई किसी पर दया नहीं करता बल्कि गरीबी का उपहास करते हैं और धनवान होने का अहंकार करते हैं चाहे हमने वो दौलत कैसे भी जमा की हो । आज फिर अगर गुरु नानक आये तो इन तमाम धनवान लोगों , नेताओं , अधिकारियों  की रोटियों को निचोड़ इक लहू की नदी बहती दिखला सकता है । कितने लोग हैं जिनकी दौलत वास्तव में महनत और हक सच की कमाई से जमा हुई है । अधिकतर की कमाई गरीबों के लहू से ही हासिल की हुई है । 
 
चुनाव आने से पहले कुछ लोग विधायक सांसद बनने को एड़ी चोटी का ज़ोर लगाते हैं तो उनको जनता का गरीबों का कल्याण नहीं करना होता उनको खुद अपना ही कल्याण करना होता है ज़र्रा से आफताब बन कर समाज को गुमराह करना होता है । वास्तविक जीवन में उनको किसी से कोई सहानुभूति संवेदना कदापि नहीं होती है । शोक सभाओं में भी जाते हैं तो मकसद चुनावी गणित रहता है भला इस से बढ़कर सत्ता की चाहत का प्रमाण क्या हो सकता है । मानवीय संवेदना भावनाओं का ऐसा उपयोग कितना अनुचित कार्य है ।  


 The Haunting Legacy of Kevin Carter's 1993 Sudan Famine Photograph — about  photography


 
 

सितंबर 03, 2018

POST : 893 पंछी पिंजरा तोड़ के आया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

          पंछी पिंजरा तोड़ के आया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

    शायद अभी भी शायद बाकी है । शायद पिंजरा छोड़ कर उड़ जाता तो मैं भी आज कुछ बन गया होता । पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोय , बाहर से खामोश रहे तू भीतर भीतर रोय । गीत गुनगुनाने से क्या मिला जब साहस ही नहीं किया पिंजरे को तोड़ने का , हरी मिर्च खाता रहा कड़वी जो पसंद भी नहीं थी , 
मिट्ठू तोता बनकर हासिल क्या हुआ । मोदी जी की दाद देता हूं इस बात पर कि कोई चिंता नहीं की अंजाम क्या होगा । शादी के पिंजरे की कैद से निकल भागे , आज देश की सत्ता के पति हैं । पति शब्द का अर्थ भी अब पता चला , लखपति लाखों का मालिक , करोड़पति करोड़ का मालिक , लंकापति लंका का मालिक , मगर कितने पति हैं जो वास्तव में मालिक की हैसियत से रहते हैं नौकर से बदतर हालत होती है और कहलाते हैं हम पति हैं । जोरू के गुलाम । सफल वही लोग होते हैं जो खुद अपनी मर्ज़ी से उड़ान भरते हैं , हम पतंग की तरह आसमान में भी उड़ रहे हों तब भी मांझा पत्नी के हाथ रहता है । जिधर चाहे डोर से इशारा करती है और हम उधर जाने को विवश होते हैं । ऐसी ऊंचाइयों पर नाज़ करना सिर्फ मूर्खता ही है । मोदी जी ने कोई विद्यालय इस पढ़ाई का खोला होता तो जाने कितने लोगों को समझ आ गया होता अच्छे दिनों का मतलब होता क्या है । सच मोदी जी आपने कभी बुरे दिन देखे ही नहीं , आपकी खुशनसीबी से रश्क होता है । जब चाहा खुद को कुंवारा समझा जब मर्ज़ी शादीशुदा हो गये । इतना बढ़िया नुस्खा आपको मिला कहां से , औरों को भी बताते तो दुनिया भर के लोग आपको दुआएं देते । 
 
         मालूम नहीं हमारे पंख किधर गये , कट गये या उड़ना भूल गये और पिंजरे में दाना चुगते रहे । दाना डालने वाले को लगता है मेरा पाला हुआ है , शासन करना चाहते हैं । पिंजरे के मालिक पंछी से प्यार नहीं करते हैं पिंजरे की कदर करते हैं । पिंजरा चाहे सोने का बना हो या चांदी का बनाया हुआ हो रहता पिंजरा ही है । आशियां नहीं होता कोई भी पिंजरा किसी भी पंछी का , कैद में है बुलबुल सय्याद मुस्कुराए कहा भी न जाए चुप रहा भी न जाये , बुलबुल और गुल की कहानी चमन में हो तभी मुहब्बत की कहानी होती है । गमले में गुल खिले और पिंजरे में बुलबुल हो तो उनको इजाज़त नहीं होती बात भी करने की । पिंजरा बरामदे में टंगा रहता है और गमला अंगने में पड़ा रहता है । मोदी जी खुद तलाक के पचड़े में बिना पड़े आज़ाद हैं मगर मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से मुक्ति दिलाना चाहते हैं इस से बड़ा खेल कोई खेल सकता है । पहले अपनी वाली को मुक्त ही कर देते , बीच मझधार लटकी हुई है इक अबला नारी । आजकल की सबला नारी होती तो आपको पंचायत पुलिस थाने और अदालत में ऐसा बेहाल कर देती कि आपको नानी याद दिलवा देती और अच्छे दिन की आस में जैसे जनता के चार साल बीते हैं आपकी तमाम ज़िंदगी बीत जाती । आज आप जो भी हैं उनका उपकार समझना । कुछ लोग आज़ादी को लेकर झूठे ब्यान देते हैं कि आज़ादी मिली जब से मोदी जी का शासन आया जबकि मोदी जी हमेशा से आज़ाद थे कभी किसी बंधन में रहना उनको मंज़ूर नहीं था । सभी को ऐसी स्वतंत्रता मिले ऐसा संभव नहीं है , हर कोई मुकद्दर का बादशाह नहीं होता है ।
 
       शादी का मतलब किसी को पहले नहीं पता होता है । खुद ही अपने कत्ल का सामान करते हैं । बस इक बार जाल में आये तो छटपटाने के सिवा कुछ नहीं कर सकते । पिंजरे से लगाव हो जाता है और उसके बाद खुद अपने पिंजरे को सजाने को लगे रहते हैं । घर क्या कभी पिंजरे को कहते हैं । बेगुनाह होकर भी सितम सहते हैं उनके रहमोकरम पर रहते हैं । मोदी जी इस बात पर खामोश क्यों रहते हैं , सच को सच कहें काहे चुप रहते हैं । मेरे दिल में इक ख्याल आया है , जीने मरने का सवाल आया है । थोड़े महीने बाकी है चुनाव का अगला साल आया है । वोट क्या महिलाओं के ही होते हैं , हम भी बराबर वोट देते हैं , पुरुषों पर निर्दयता की भी सीमा होती है । कोई सरकार पतियों के पक्षधर भी बनाई जा सकती है । जाति पाति धर्म की नहीं असली जंग महिला और पुरुष की लड़ाई है , इधर है कुंवा तो उधर खाई है । महिला संगठनों की तरह पुरुष संगठन बनाओ मिलकर , बोझ सब अपना हटाओ मिलकर । इक जुर्म किया मुहब्बत करने और शादी करने का , कितनी कठोर मिलती है सज़ा । और नहीं तो सेवानिवृत होने का अधिकार ही सही , स्वेच्छा से पति पद से मुक्ति का कोई उपाय ही हो । आरक्षण की नहीं मांग करते , न कोई क्षतिपूर्ति ही मांगते हैं , ज़रा सी सांस आज़ादी से लेने की राहत चाहते हैं । ऐसे अनुपम विचार नहीं बार बार आते हैं , हौसलों वाले लोग हौंसलों को आज़माते हैं । मोदी जी का क्या है जब मन चाहा पिंजरा तोड़ कर आज़ाद मनमौजी बन अपनी मस्ती में जिधर चाहा चल पड़े । कैफ़ी आज़मी कहते हैं , इतना तो ज़िंदगी में किसी के खलल पड़े , हंसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े । 11 साल की उम्र में ये लिखना कैसे हुआ वही जानते होंगे लेकिन कुछ लोग दुनिया को कम उम्र में समझने लगते हैं मोदी जी शायद समझदार हैं शुरुआत से ही समझे आप क्या ।









सितंबर 02, 2018

POST : 892 मौत महबूबा है मेरी ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

     मौत महबूबा है मेरी ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया 

         दिल कह रहा है यहीं कहीं आस पास ही हो , जानती हो कब से राह तक रहा हूं । फिर भी तड़पा रही हो इस कदर बेचैन हूं मैं तुम्हारे लिये कि इक इक लम्हा मुश्किल से गुज़रता है । आज फिर चाहता है दिल चुपके से आओ और मेरी आज की रात की सुबह को रोक लो । हर सुबह जागता हूं तो उदास हो जाता है दिल मेरा कि रात भर इंतज़ार किया सपने देखे अपनी खूबसूरत महबूबा से मिलन की घड़ी के और टूट गए रोज़ । बस दबे पांव आना किसी को ज़रा भी आहत नहीं होने देना , कहीं कोई रोकने की नाकाम कोशिश नहीं करे । तुम जानती हो मैं कितनी बार खुद चलकर आना चाहता था तुमसे मिलने मगर बिना किसी के रोके भी रुक गया यही समझ कर कि मुझे नहीं जाने देगा कोई । ये ज़िंदगी कितनी ज़ालिम है जीने नहीं देती और साथ भी नहीं छोड़ती । ज़िंदगी नहीं चाहती कोई उस पर इल्ज़ाम लगाए मुझसे बेवफ़ाई का और मैं अपने पर तोहमत नहीं लगने देना चाहता कि उसे बीच राह छोड़ दिया । मगर इतना मुझे पता है ज़िंदगी को नहीं है मुझसे मुहब्बत तो क्या तुम तो मुझे चाहती हो और बहुत प्यार से साथ अपने ले जाओगी । लोग कविता ग़ज़ल कहानी लिखते हैं अपनी माशूका के नाम , मैंने तो सब तुम्हारे नाम किया है जो भी लिखा अभी तलक । इतनी शिद्दत से किसी ने किसी को नहीं चाहा दुनिया में । मांगने से ज़िंदगी नहीं मिलती न ही मौत ही आती है । मैंने दोनों की भीख नहीं मांगी है , ज़िंदगी ने कभी नहीं चाहा और कदम कदम ठोकर लगाई है फिर भी कोई गिला शिकवा शिकायत लब पर नहीं लाया मैं । तुम तो सबको अपनाती हो मुझे भी बना लो अपना अब तो । और नहीं होता इंतज़ार मुझसे । 
 
                  मैंने हमेशा तुम्हारी बड़ी सुंदर सी छवि मन में बनाई हुई है । अपने कोमल हाथों से बड़े आराम से छू कर मुझे प्यार से बुलाओगी कहकर कि आ गई मैं तुम बुला रहे थे कितने सालों से । माना आने में देरी हुई है मगर जब आई हूं तो तुम्हारे दिल की चाहत तुम्हारे अरमानों को सुकून तो मिला है अब । बस जितने दर्द थे जितनी परेशानियां थीं जो जो कठिनाइयां थी सब मुझे दे दो और तुम मेरी आगोश में आकर चैन की नींद सो जाओ । मौत तुम दुनिया की सबसे खूबसूरत रचना हो , कितनी दयालु हो कितनी नर्मदिल हो । ज़िंदगी तो केवल इक रास्ता है तुम तक जाने का तुम से मिलकर एकाकार हो जाने का , ज़िंदगी का हासिल और कुछ भी तो नहीं । ज़िंदगी होती ही है तुम से मिलने की खातिर । कोई भी नहीं है जो जीने से तंग आकर कभी न कभी तुम्हीं को नहीं पुकारता हो । जाने क्यों कुछ लोग जीना चाहते हैं और तुमसे बचना चाहते हैं , दूर भागते हैं मगर कितनी दूर तक भाग सकते हैं । नहीं जब भी तुम आओगी मुझे अपनी तरफ बाहें फैलाए पाओगी । शायद वही इक पल मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत पल होगा । जन्म जन्म का मिलन झूठ है वास्तविक मिलना तो वही होगा तुम्हारा और मेरा अटूट मिलन । 
 
            मुझे लग रहा है जैसे मेरे बदन को जितने कांटे चुभ रहे हैं छलनी छलनी हुआ है मेरा बदन दुनिया के ज़हर भरे नफरत के तीरों से , ज़ख्म बेहिसाब जो नासूर बन चुके हैं इक तुम्हारे स्पर्श से सब गायब हो जाएंगे और मेरा बदन नाज़ुक फूलों की सेज पर रेशमी एहसास लिए आराम से सो रहा होगा । मेरा इक ख्वाब है जो मुमकिन नहीं पूरा हो मगर अगर ऐसा हो तो शायद मेरी हर आरज़ू दिल की हर तमन्ना पूरी हो जाएगी और मुझे फिर ज़िंदगी से दुनिया वालों से कोई गिला नहीं रहेगा । मेरे जीने का कोई हासिल मुझे नहीं हुआ शायद मारकर ही कुछ हासिल कर सकूंगा । तुम मुझे अपने सीने से लगा लेना उसी तरह जैसे कोई मां अपने बच्चे को लगाती है । जिनको ज़िंदगी से मुहब्बत है उन्हें ज़िंदगी मुबारक हो , हम तो आशिक़ हैं मौत तुम्हारे । मौत का दिन कितनी इंतज़ार के बाद आता है तभी तो और हसीं लगती है कयामत । 
 
 
 Deepak Chauhan

POST : 891 तुम्हीं ने बर्बाद किया है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       तुम्हीं ने बर्बाद किया है   ( तरकश  ) डॉ लोक सेतिया 

   हसीनों की दिलकश अदाएं मदहोश करने वाली शोखियां ऐसा जादू करती हैं कि दुनिया दीवानी हो जाती है । कुछ ऐसे  उनका करिश्मा चल गया और हर कोई उन्हीं पर फ़िदा है जान उनकी अमानत है , उनका है हर सितम मुहब्बत की इनायत है ।  हसीनों पर दिल आ जाता है तो आशिक़ को कुछ भी समझ नहीं आता है । उसको आता है प्यार पर गुस्सा हमें गुस्से पे प्यार आता है । सौ बार नहीं हर बार हज़ारों बार आता है दिल को उनको देख कर करार आता है । दुनिया में भला कब कहीं उन जैसा कोई सरकार आता है कभी कभी ऐसा मज़ेदार अचार आता है चटपटा मसालेदार आता है । चारागर ( इलाज करने वाला ) ज़हर भी पिलाता है , फिर भी सबको ऐतबार आता है , इश्क़े बीमार वही दिलदार आता है । चाहत में यही होता है झूठ समझ कर भी दिल को करार आता है जो कभी सच नहीं हुआ उसी वादे पर बार बार ऐतबार आता है । किसी ने ज़िंदगी बर्बाद कर दी तो क्या हुआ इश्क़ इक बार होता है सब कुछ हज़ार बार आता जाता है । वैसे तो उसी ने सभी को बर्बाद किया है इल्ज़ाम किसी और पे जाए यही अच्छा है । 

      रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया , इस बहकती हुई दनिया को संभालो यारो ।

दुष्यंत कुमार जानते थे समझाने से लोग समझते नहीं हैं । जिस राह जाना मना है उसी पर चलते हैं । चलो आज तीखी नहीं सीधी बात करते हैं । जवाब देंगे नहीं फिर भी सवाल करते हैं । आपने कहा हमने मान लिया आप चौकीदारी खूब करते हैं , मगर माफ़ करें लोग अब चौकीदार शब्द से बहुत डरते हैं । चौकीदार आओ आज आपका हिसाब करते हैं । संसद के सदस्य बनते हैं तभी सत्ता सुख चखते हैं , संसद भवन उदास है आप कहां रहते हैं । चार साल में एक महीना भी नहीं आये जिस चौखट पर सर झुकाया था , अब लगता है सबको उल्लू बनाया था । पीएमओ नहीं जाते फिर भी 18 घंटे काम की बात करते हो । सच ये आपकी हर बात झूठी हर योजना नाकाम रही है , आगे दौड़ पीछे चौड़ की कहावत है । पिछले लोगों का बनाया बर्बाद किया खुद किया क्या ।  गिलास तोड़ा बारहा आना ।  आपकी बात आप पर लागू करते हैं , सत्तर साल की बात नहीं बाकी 67 साल की आपके 4 साल से तुलना करते हैं । अपने खुद पर अपने ऐशो आराम पर अपने शोहरत के झूठे गुणगान पर विदेशी सैरों जिन से देश को मिला कुछ नहीं ठगा जाता रहा उन पर अपने रहन सहन पर अनावश्यक सभाओं पर और मंदिरों आदि के दर्शनों पर जितना पैसा बर्बाद किया है कोई पहले का सत्ताधारी कर ही नहीं सकता था । इक कहावत है चोरी का माल हो तो बांसों के गज होते हैं अर्थात बिना किसी माप तोल लुटाते हैं । चौकीदार नहीं चोर किया करते हैं । लूट लूट होती है कानूनी भी और कानून में छेद कर के भी जो भी होती है जिसे घोटाले कहते हैं , मगर आपके घोटाले भी देश हित में राज़ की बात है कीमत ही नहीं बताते और आप कुछ भी नहीं छिपाते । 
 
         कल कोई साहित्यकार बता रहा था इश्क़ अंधा होता है और राजनेता भी कुर्सी से इश्क़ ही करते हैं । आपको भी अपनी महबूबा कुर्सी के किसी और की होना मंज़ूर नहीं है । इश्क़ वतन से भी लोग करते हैं और वतन की खातिर मरते हैं । आप तो मरने से कितना डरते हैं झूठ कहते हैं देश से इश्क़ करते हैं । अपने गुनाह 
स्वीकार नहीं करते हैं जनता की नहीं अपनी शोहरत की फ़िक्र करते हैं । अच्छे दिन लाने नहीं आते खुद अपने बुरे दिन आने से डरते हैं । बदहाल देश की जनता है और शोर आप करते हैं शून्यकाल बंद किया हुआ है पल पल आलाप सिर्फ आप करते है । चार साल में देश को मिला क्या है सोचोगे तो घबराओगे , जिनकी बुराई करते रहे उनसे नज़र मिलाओगे तो घबराओगे । ऊंठ की तरह जिस दिन पहाड़ के नीचे आओगे अपनी असलियत तभी जान पाओगे । हर दिन गरीब देश के खज़ाने से अपने पर करोड़ रूपये बर्बाद करने को उचित ठहराओगे तो किधर जाओगे । अभी भी चाहते हो दोबारा सत्ता पाना कितना अंधियारा बढ़ाओगे । सब अकेले अकेले खाओगे और किसी को रोटी क्या पानी भी नहीं पिलाओगे , बुलेट ट्रैन कोई खिलौना है जिससे देश की जनता को बहलाओगे । भूख गरीबी और किसान मज़दूर को क्या झूठे सपनों से भरमाओगे । अतिथि तुम कब जाओगे बताओगे इस देश में भला कैसे रह पाओगे , हर दिन विदेश में ही नज़र आओगे ।  अबके बताओ क्या जुमला बनाओगे , चौकीदार से आगे कौन सा पद चाहोगे । 
 
        सब विकसित देश वाले हैरान हैं इस गरीब देश के चौकीदार की निराली शान देखकर । काश हम भी ऐसे चौकीदार बन सकते , रखवाली जिसकी करनी उसी को चर जाते । जो लोग अपनी सूरत पर फ़िदा होते हैं वो कभी किसी और से प्यार इश्क़ मुहब्बत नहीं कर सकते हैं । आपको यही रोग है अपने से बेहतर कोई नहीं लगता है , हर पल आईना देखते रहते होंगे और कपड़े बदलते रहे होंगे देश को बदलना आसान नहीं है । नीरज जी की कविता है :-

जितना कम सामान रहेगा , 

उतना सफर आसान रहेगा। 

उस से मिलना नामुमकिन है , 

जब तक खुद पर ध्यान रहेगा। 

हाथ मिले और दिल न मिले , 

ऐसे में नुकसान रहेगा। 

जब तक होंगे मंदिर मस्जिद , 

आदमी परेशान रहेगा। 

जितनी भारी गठड़ी होगी , 

उतना तू हैरान रहेगा। 

नीरज कल यहां नहीं होगा , 

उसका गीत विधान रहेगा। 

          काश कोई आपको इसका सही मतलब समझा सकता तो समझते आपने किसी और तथा देशवासियों को ही नहीं खुद अपने को भी छला है । जिस दिन सूरत नहीं सीरत को मन के आईने में झांककर देखोगे , समझ जाओगे मन की बात में मन कहीं था ही नहीं ।  बात ही बात थी , बिना बात की बात । भगवान अगर है कहीं तो आपको विवेक और वास्तविक सोच दे । आबाद हुए आप बर्बाद हुए सभी लोग की ऐसी ख़ता तुमको अपना समझ कर हर दिन सज़ा रहे हैं भोग । शायद तेरे जाल से निकलना नहीं मुमकिन आज़ादी का शायद अभी नहीं कोई संयोग ।  प्यार होता ही मानसिक गुलामी जैसा है कोई आज़ाद होना ही नहीं चाहता उस से ।


बहुत अधिक प्यार भी बर्बाद कर सकता है आपका रिश्ता - too much love can spoil  your relationship - AajTak

सितंबर 01, 2018

POST : 890 नसीब बांचने लगा मैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      नसीब बांचने लगा मैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     किसी ने लिखा था मैं ऐसा बदनसीब हूं कि अगर मैं कफ़न बेचने लगूं तो लोग मरना ही छोड़ देंगे । कुछ ऐसा ही अपने साथ होता रहा है जिस धंधे में हाथ आज़माया उसी में मंदी छा जाती है । और अधिक मत पूछो हाल मेरा बहुत सीधा है सवाल मेरा । पंडित जी को समझ नहीं आया कि आज क्या राय दें फिर भी बहलाने को बोल दिया तुम विश्वास ही नहीं करते ज्योतिष विज्ञान पर इसी कारण सही भविष्यफल मिलता ही नहीं तुम्हारा । ये मारा , मामला समझ गया और चुप चाप चला आया । अपनी दुकान पर नसीब बांचने वाले का बोर्ड तुरंत लगवाया , सही वक़्त पर याद आया । आजकल क्या इस धंधे का मौसम हमेशा सदाबहार रहता है । अभी तक मुझे भी ख्याल नहीं आया था कि मैंने जब जब जिस भी दल की जीत की बात कही वही सच साबित हुई है हमेशा । पंडित जी भी एक दिन बता रहे थे जो सबका नसीब बांचते हैं उनको भी खुद अपना नसीब पता नहीं चलता है ये अटल सत्य है । डॉक्टर अपना उपचार खुद नहीं करते , वकील को भी बचाव को कोई दूसरा वकील ढूंढना पड़ता है , शिक्षक भी किसी और से शिक्षा हासिल करते हैं । यहां तक कि मिठाई बनाने वाले अपनी मिठाई छोड़ किसी और की मंगवा कर खाते हैं । 
 
          इश्तिहार छपवा कर बांट दिये और अपनी घोषित पिछली भविष्यवाणियों का सबूत भी दिया कि फलां फलां से तसदीक़ कर लो , पहले आज़माओ फिर मेरे पास आओ । झूठी निकले भविष्यवाणी तो दुगना वापस ले जाओ । पता नहीं कैसे बात दिल्ली तक जा पहुंची और मुझे दरबार से बुलावा आ गया , सुरक्षा कारणों से खुद नहीं आ सकते थे मज़बूरी ज़ाहिर की । बोहनी की बात थी जाना था चला गया । आप किस तरह भविष्यफल बताते हैं जन्मपत्री देख कर या हाथ और माथे की रेखाओं को देखकर मुझसे पूछा गया । मैंने बताया मैं बिना जन्म समय पत्री देखे ही बता देता हूं और मेरा बताया उपाय भी सौ फीसदी सफल रहता है । आप समझ लो खुदा की दी हुई शफ़ा है । मुझे अपने भविष्यफल का भरोसा है । उन्होंने सवाल किया अगले चुनाव में जीतने का बताओ कोई नुस्खा है । तकदीर रूठी हुई लगती है जनता लगती खफा खफा है । मैंने कहा करोगे तो बहुत आसान सा उपाय लिखा है और उनको वादे के अनुसार लिखित दे दिया क्या मुमकिन है और कैसे मुमकिन होगा । 
 
                 सब को बाहर भेज दिया फिर पूछा क्या आपको भरोसा है जसोदा जी को मनाना कारगर नुस्खा है । मैंने कहा यकीनन मगर आपको इतना आसान लग रहा है जबकि है बेहद कठिन काम । हंसे जनाब कहने लगे रूठे हैं सनम तो फिर क्या है हमको भी मनाना आता है । मैंने कहा मेरा अनुभव थोड़ा अलग है मुझसे बस यही काम नहीं होता है , रूठे रब को मनाना आसान है रूठे यार को मनाना मुश्किल है । वो कहने लगे आपको पता ही नहीं कैसे मनाते हैं पत्नी को , ये बात वो कह रहा है जो कभी पत्नी के साथ रहा ही नहीं । नातजुर्बेकारी के वायस की ये बातें हैं , इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है , मेरा गुनगुनाना सुन कहने लगे आप किधर की बात किधर ले जा रहे हो । शायद मेरे हौसले को आज़मा रहे हो । मैंने कहा ठीक है हाथ कंगन को आरसी क्या चलकर देखते हैं और विशेष विमान से हम पहुंच गए ठिकाने पर । 
 
          जसोदा जी बोलीं आखिर तो वापस लौट ही आये हो , जानती थी इक दिन राजनीति की बेवफ़ाई ही आपको लाएगी इधर । कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे , तब तुम मेरे पास आना महोदय , मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए । नहीं मैं आपके पास आया नहीं हूं लाया गया हूं , जैसे पिछले चुनाव में गंगा मैया ने बुलाया था इस बार आपकी तपस्या का फल देने का वक़्त आया है । मैं आपको लिवाने आया हूं आप रूठी हुई हो मैं मनाने आया हूं । सोच कर बताओ दिल से भी दिमाग़ से भी काम लोगी तो निर्णय सही होगा । ठीक है आप जलपान करें मैं आपकी बात पर विचार करती हूं । खुश हो गये जनाब इनकार का सवाल ही नहीं है , दिल्ली की गलियां गलियां गलियां मेरी गलियां दिल झूम उठा था । 
 
             घंटा भर बाद फैसले की घड़ी आई जसोदा जी मुस्कराई । मुझे बोली आप कौन हो भाई । मैंने उनको अपनी भविष्यवाणी बताई , डोलती नैया है आप किनारा हैं इसलिए मान जाओ दुहाई है । अपने पति से मुखातिब होकर बोलीं आपको जब पिछले चुनाव में जीतने का विश्वास था तब ये बात क्यों नहीं याद आई । मेरे आंगन में बजती उस दिन भी फिर से शहनाई । आज आये हैं जब हारने की घबराहट मन में है छाई , मन की बात नहीं आपको समझ आई । मगर मैं भारतीय नारी हूं लाख मतभेद हो तब भी छोड़ती नहीं हाथ , निभा सकती हूं आज भी आपका साथ । मानोगे मेरी इक छोटी सी बात । रिश्तों में मत लाओ गंदी राजनीति को , दिन भी बना देती है राजनीति अंधेरी रात । अभी मतलब से आये हो लौट जाओ , आना फिर मन की बात कहने चाहत से । नहीं जाने नहीं दूंगी आपको तब वापस , अभी नहीं रोकती क्योंकि अभी पति नहीं आया है , नेता आया है ।  चुनाव हो जाने दो तब सोचना किसे किधर आना है जाना है । ये कोई शर्त नहीं है न ही कोई बहाना है , देखो कितना सुंदर ये छोटा सा आशियाना है । आपको क्या करना है सरकार बनानी है या घर बसाना है । मैं उठकर चला आया दोनों की आपस की बात में रहना उचित नहीं लगा मुझे । लेकिन उनको अपनी पत्नी को घर नहीं लाना था बस गिले शिकवे दूर कर रिश्ता जन्म जन्म का इतना समझाना था । मना लिया आखिर चुनाव में सब आज़माना था । उनको खुद मीठा खिलाकर उनके हाथ से मीठा खाना था , नाराज़ नहीं आपसे दिल से इतना कहलाना था । जब  मेरा बताया भविष्यफल सच साबित हुआ तो आप भी लाईन में लगे खड़े होंगे मुझसे नसीब पूछने । और मैं सबको उनका नसीब बताऊंगा भले खुद अपना नहीं समझ पाया आज तलक । माफ़ करना टीवी पर आज का भविष्यफल आने वाला है जो कभी सही नहीं होता फिर भी देखना मेरी आदत है । मेरी धर्मपत्नी की सख्त हिदायत है इस बात पर शक कभी नहीं करते हैं । मिलते हैं बाद में । 

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