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जून 11, 2018

POST : 800 कहानी नहीं है ( बेबसी जुर्म है ) डॉ लोक सेतिया

          कहानी नहीं है ( बेबसी जुर्म है ) डॉ लोक सेतिया 

   ऐसा हुआ विश्वास करने में अभी भी समय लगेगा। किसी फ़िल्मी कहानी में भी इतना शायद ही देखा हो। जो टीवी पर सीआईडी की तरह के शो में कहानी होती है ये उस से ज़्यादा उलझी हुई है। इस की पटकथा किस ने लिखी कभी कोई नहीं समझ सकेगा। कुछ पड़े लिखे सभ्य दिखाई देने वाले और धर्म और धार्मिकता की बड़ी बड़ी बातों से खुद को समाज की भलाई के पैरोकार समझने वाले या फिर ऐसा होने का लबादा ओढ़े लोग लगता था कितने भले हैं लेकिन वास्तव में अपना जाल बुनकर बिछा चुके थे। और हम इक छोटे शहर के खुद को शिक्षित समझने वाले परिवार के सभी सदस्य इस कदर नासमझ थे कि सामने देख भी नहीं देख पाये कि कोई हमें अपने जाल में फ़ांस रहा है। हमारे ही बीच से किसी को अपनी बातों से प्रभावित कर लिया था इस हद तक कि वो अपनी ही ज़िंदगी को दांव पर लगाने को राज़ी हो गया। जैसे किसी ने सम्मोहित कर लिया हो और अपने इशारों पर नचाता हो फिर भी ज़हर पीने वाला चुपचाप जानते हुए ज़हर पी जाये। उसे अभी भी लगता है ये उसकी शराफत थी जो उसने पहले से बता दिया था कि हम तुम्हारी ज़िंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं। वो जनता था कुछ दिन बाद ये राज़ खुलना ही है और सबसे बड़ा दोषी वही ठहराया जायेगा , इस तरह उसने बड़ी चालाकी से खुद को बचाने का उपाय कर लिया था। अपने को सब से समझदार समझने वाले हमारे परिवार के सदस्य को अपनी समझ और काबलियत पर इतना भरोसा था कि उसने सब जानते हुए भी अपने ही घर में किसी को नहीं बताया कि हम सब को कैसे ज़हर देने का काम किया जा रहा है। आज भी हम नहीं जानते कि हमारे साथ क्या हुआ क्यों हुआ , और हम समाज की परम्पराओं और मर्यादा के नाम पर लब सी कर अपने ही कातिलों को मसीहा कहते हैं ये जानते हुए भी कि वो मसीहा होने का लबादा ओढ़े हुए वास्तव में इंसान भी नहीं हैं। शायद मेरी गलती या भूल ही नहीं हद दर्जे की मूर्खता है जो मैंने इस ज़माने में हर किसी पर भरोसा करना छोड़ा नहीं बार बार धोखे खाने के बाद भी। आखिरी वक़्त तक मुझे ये एहसास होता रहा था कहीं कोई गड़बड़ है कुछ खतरा है और अंतिम पल तक वापस लौट जाना चाहिए। ये इक कठिन फैसला था जो मेरे इलावा कोई नहीं ले सकता था , मगर शायद हमेशा की ही तरह मुझे में आत्मविश्वास की कमी भी थी और बाकी लोगों पर अपने से बढ़कर भरोसा करने की आदत भी। सब समझाते रहे जैसा मुझे लगता है उस तरह का नहीं है और सब सही हो जायेगा बस थोड़ा आपसी समझ का अंतर है। नहीं अब कुछ भी नहीं हो सकता , अभी भी साहस नहीं कोई निर्णय लेने का , अब कोई राह ही नहीं बची है। आज कोई फैसला जो जो गलत हुआ उसे फिर से सही नहीं कर सकता है। जीवन भर इक दर्द तड़पाएगा मुझे , किसी कांटों की सेज पर सोने जैसा जो चैन से नहीं जीने देगा। पता नहीं यहां भगवान की बात करनी चाहिए भी अथवा नहीं , क्योंकि भगवान कभी किसी का बुरा नहीं करता है , भगवान कभी बुरे लोगों का साथ नहीं दे सकता। मगर भगवान उस पर भरोसा रखने वालों को बचा तो सकता है। उसने शायद समझाना भी चाहा मगर मुझी को समझ नहीं आया तब क्या करना चाहिए लेकिन आज अब इतना तो सोचता ही हूं कि क्या वास्तव में भगवान ऐसे जालसाज़ी धोखा छल कपट करने वालों को माफ़ कर देगा। कुछ भी नहीं है मेरे हाथ में सिवा उस भगवान पर भरोसा करने के कि ये सब जो भी जैसे भी हुआ तुम्हें ही इसे ठीक भी करना है और हम सभी की ज़िंदगी की कहानी को सुलझाना भी है। इक बात अब तय करनी ही है कि मैं अपने कातिलों को अपराधियों को मुजरिमों को जीवन भर माफ़ कभी नहीं कर सकता , बेशक मैं बेबस हो गया हूं और लाचार भी। इस बात को भूल जाना संभव भी नहीं और भुलाना भी गुनाह है। 

जून 10, 2018

POST : 799 इक्कीसवीं सदी में गुनाह है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      इक्कीसवीं सदी में गुनाह है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

       ऐसा तो नहीं सोचा था पिछली सदी वालों ने कि जिस तरह वो जिए उसको जीना ही नहीं कहते । आज अच्छा है जो उस सदी के लोग इस सब को देखने से पहले चले गए दुनिया से । अन्यथा इस तरह से जीते जैसे मुजरिम हैं । ये सब नये मूल्य नये दौर के नियम बनाए किसने , हमने तो नहीं । किसी पुरानी किताब में धर्म नैतिकता की कहानियों में भी नहीं है । आम आदमी क्या महान कहलाने वाले लोग भी और अपनी अपनी रियासत के जागीर के मालिक भी ऐसे ही जिये हमेशा शान से । आज आपने डियो नहीं लगाया तो आप महफ़िल में बैठने के काबिल नहीं हैं । आपको आधुनिक ढंग से हाथ मिलाना और गले भी ऐसे लगाना जैसे इक औपचारिकता निभानी है , उस तरह से नहीं जैसे दोस्त मिलते या भाई या बहन या मां-बेटी तो लिपट जाते थे और अलग होने का नाम नहीं लेते थे । अब उस तरह से गले लगना गंवार होना है । बाज़ार वाले और कुछ बाज़ारू सामान बिकवाने वाले टीवी अख़बार में विज्ञापन में समझाते हैं ऐसे रहना चाहिए । मगर ऐसे कैसे रहें वो नहीं जानते कि जिनकी आय उनकी तरह करोड़ों में नहीं उन्हें शायद जीना ही नहीं चाहिए । उनका सुझाया साबुन उनका बताया शैम्पू और पहनावा भी उनकी बताई कंपनी का सिला हुआ । इन सब को अपने बाप दादा जो घर में मां के सिले कपड़े डालते थे और घर का घी दूध और घर पर पिसे मसाले और घर में बनाया अचार भोजन जिसको कुछ साल पहले तक समझा जाता था असली स्वाद उसी का है , आजकल उसको याद करना भी अनुचित समझते हैं । आपको बाहर किस का पिज़्ज़ा किसका डोसा किस का चाइनीज़ किस का इटेलियन स्वाद कैसा है इसकी जानकारी नहीं होना साबित करता है कि आप बेकार जीते हैं । आज भी आप नल का पानी पीते हैं बिसलरी नहीं मंगवाते न ही घर में आर ओ लगवाया है तो बड़े मुजरिम हैं आप । आपके घर का पानी भी पीना पाप है , ये धर्म की किताब में किसी और तरह से बताया जाता था या है । 
 
     आपको सादा जीवन उच्च विचार की बात को भूले से भी याद नहीं रखना चाहिए । दिखावे का शानदार रहन सहन और तुच्छ विचार हैं तो आप बड़े बड़े लोगों की सभा में बैठने के काबिल हैं , जिस में बात करते समय महिला केवल महिला है किसी की बेटी बहन मां या बीवी नहीं , उनको लेकर जो बातें घटिया मज़ाक और आचरण में निम्न स्तर का तरीका हो आप आधुनिक हैं । अपनी घर की महिलाओं को छोड़ बाकी सभी को कैसी भी निगाह से देखना और कुछ भी सोचना बोलना आपको बेहूदा आदमी नहीं कहलवाता है । आपको जीने का मज़ा लेना चाहिए और पैसा किसी भी तरह से कमाना चाहिए । आप चोरी करें डाका डालें ठगी करें धोखाधड़ी से अमीर बनें या अपना ज़मीर भी बेचते हों , धनवान हैं तो किसी की मज़ाल नहीं जो आपकी बुराई करने का साहस भी करे । आजकल दौलमंद होना सब को महान बनवाता है भले दौलत किसी भी तरह से कमाई हो । रिश्वतखोर से कभी लोग नफरत करते थे , कितने खराब लोग थे , कोई घूस लेता पकड़ा जाता तो उसको शर्मसारी होती थी और घर से निकलते घबराता था । कोई कुछ भी नहीं बोलता था मगर तब भी सब की निगाहों में उसको दिखाई देता था जैसे बोलती हों यही है वो ज़मीर बेचने वाला । आजकल अपनी खुद की बोली लगवाते हैं लोग और जिसका कोई खरीदार नहीं हो उसकी औकात दो टके की नहीं समझी जाती । जो लोग किसी भी कीमत में बिकने को राज़ी नहीं थे , जो सब ज़ुल्म सहकर भी खुद को दौलत के तराज़ू में नहीं तोलते थे और जिनको अनमोल माना जाता था , वो आदर्शवादी लोग आज होते तो गुनहगार बताये जाते । 
 
शायद समाज की तरह आने वाले समय में सरकार भी जब जन गणना में ऐसे सवाल करेगी तब अभी भी इस तरह से गुनहगार बनकर जीने वालों के लिए कड़ी सज़ा मुकर्रर करेगी । हम अब देश नहीं हैं , समाज नहीं हैं , केवल इक बाज़ार हैं , हैरानी की बात है कि सोचते हैं हमीं खरीदार हैं , जबकि वास्तव में हम इंसान नहीं हैं केवल सामान हैं ।  सब पर कीमत का टैग लगा हुआ है , जो अधिकतम मूल्य है , मोलभाव करो तो सस्ता बिकने को भी कोई परेशानी नहीं है ।  कुछ तो हमेशा एक पर एक मुफ्त या इसके साथ वो भी उपहार की तरह , सेल पर रहते हैं बारह महीने ही । आदमी से अधिक कीमत जानवरों की लगाई जाने लगी है आधुनिक समाज इंसान से प्यार नहीं करता बल्कि छोटा समझता है या किसी के सामने खुद को छोटा महसूस करता है लेकिन जानवरों से लगाव है प्यार नहीं बल्कि उनको खिलौना समझ अपना दिल बहलाता है । कभी कभी लगता है हम इंसान से नहीं किसी जानवर से मिल रहे हैं । आदमी खुद बाज़ार का सामान बन गया है । हमको गुलामी से मुक्ति मिली थी आज़ाद होकर फिर से गुलाम जैसे बनते गए हैं । बाहर से नहीं भीतर से मानसिक तौर पर सोच जाने कितनी जंज़ीरों से जकड़ी हुई है ।

आजाद हो जाना खतरे को कम नहीं करता लेकिन आजादी के बाद फिर से गुलाम हो जाना  निश्चित ही भयावह होता है

जून 08, 2018

POST : 798 जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( कुछ सच कुछ सपना -- टीवी शो की बात ) डॉ लोक सेतिया

  जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( कुछ सच कुछ सपना )

       सबको अपनी ही किसी बात पे रोना आया ( टीवी शो की बात )

                             आलेख -  डॉ लोक सेतिया 

     बहुत कुछ और भी याद आया , मगर पहले कल रात की बात। क्रॉस रोड नाम भी आकर्षित करता है और जब देखा तो नाम सार्थक भी लगा। जीवन में कभी कभी नहीं जैसा बताया गया शो में , मुझे लगता है अक्सर हम इक दुविधा में खड़े होते हैं , इधर जाएं कि उधर जाएं। कहानी वास्तव में लिखी ही किसी मकसद को लेकर जाती है और लिखने वाला जानता है जो सन्देश देना है उसे कहानी को मनपसंद और मर्ज़ी के अंत से ही समझाया जा सकता है। यही तय था और हुआ भी। कल रात की कहानी में जवाब बहुत मिले मगर हर जवाब अपने में कई सवाल खड़े करता हुआ। किसी को मज़बूरी है बेटी के इलाज और उसकी जान बचाने को जितने पैसे ज़रूरत हैं , ठीक उतने दस लाख उसे किसी और के पड़े बस में मिल जाते हैं। एक तरफ कहानी में उस इमानदार बस कंडक्टर का साथी सही मार्ग से भटकाता है दूसरी तरफ टीवी स्टूडियो में बैठे दर्शक उपदेशक बन कर अपनी अपनी राय देते हैं। किसी को भी कहानी के किरदार के लिए रोना नहीं आया , बात करते करते सब अपनी व्यथा सुना रहे थे। इस में कोई बुराई नहीं है कि औरों को दर्द में देखकर अपना दुःख दर्द याद आये , मगर क्या वास्तविक जीवन में हम हमदर्द बनते हैं , शायद नहीं। किसी ने टीवी स्टूडियो में मानवता की बात करने वाले से उल्टा सवाल पूछ ही लिया आप डॉक्टर जब किसी को मरते देख उपचार करने से पहले हज़ारों नहीं कभी लाखों रूपये जमा करवाने को कहते हैं तब मानवधर्म नहीं याद आता , उनका कहना था अब ऐसा नहीं होता , मगर उनको भी पता है हर दिन यही होता है। कहानी का नायक ज़मीर की बात सुनकर उस बैग को पुलिस थाने में देने जाता है मगर देने के बाद पता चलता है कि ये सभी थाने वाले खुद ही मिल बांट रखने की बात करते हैं। ऐसे में वो चुपके से बैग वापस उठाकर भागता है ताकि सही मालिक को पहुंचा सके। ये इक कड़वा सच है वही पुलिस वाले अब उसी के पीछे लगे हैं और एंकर उसको चोर बन गया बता रहे थे , मगर चोर तो पुलिस बनकर इमानदार को चोर घोषित करना चाहती है। ये कैसा समाज है , इस टीवी शो के साथ इक और टीवी रियल्टी शो भी आता है दस का दम। एक दिन पहले ही उसमें सवाल था कितने फीसदी लोग भगवान को मानते हैं और जवाब था नब्बे फीसदी। ये झूठ है अगर इतने लोग भगवान को मानते हैं तो समाज में सब इतना बुरा क्यों है। मेरा ख्याल है हम में अधिकतर भगवान को मानते नहीं हैं न ही आत्मा अंतरात्मा और ज़मीर की आवाज़ सुनते ही हैं , केवल दिखावा करते हैं और भगवान को भी छलना चाहते हैं। भगवान हमें याद अपनी सुविधानुसार आते हैं जब खुद परेशानी होती है , औरों को परेशान करते भगवान क्यों भूल जाते हैं। तब नहीं सोचते ऊपर वाला सब देख रहा है , टीवी का इक शो ये भी है , मगर क्या टीवी चैनल वाले मानते हैं ऊपर वाला भगवान सब देख रहा है , नहीं। इनका ऊपर वाला इक कैमरा है जो चुपके से सब देख सुन रहा है। कहानी का अंत सुखद होता है और पैसा जिस का था उसे मिल भी जाता है और इमानदार की बेटी का उपचार भी हो जाता है।  लेखक यही करते हैं सच नहीं कल्पना करते हैं कि ऐसा हो , मगर जीवन में वास्तविकता कल्पना से विपरीत होती है। सत्य पराजित होता या नहीं होता सत्य को प्रताड़ित अवश्य किया जाता है। झूठ खिलखिलाता है सत्य को ही रोना पड़ता है। बिग बॉस भी फिर आएगा और कोई फिर से करोड़पति भी बनाएगा। मगर इक सच है जो कभी सामने नहीं आएगा। हर शो से कोई और ही मालामाल होता जाएगा , दर्शकों और खिलाडियों के लिए ऊंठ के मुंह में जीरे की तरह बचा खुचा रह जाएगा। इस शो के एंकर से कोई नहीं सवाल करेगा , करोड़पति खेल अपने खेल की वास्तविकता पर सवाल नहीं बनाएगा। इतने सालों में कितना धन लोगों से किस किस तरह वसूला और किस किस को कितना मिला कभी नहीं बताएगा। ये मनोरंजन के नाम पर कमाई का धंधा किसी के योग के कारोबार करने , किसी के गुरु बनकर व्यौपार करने की तरह है।  सभी भगवान को मानते हैं मगर ऊपर वाले भगवान को नहीं , पैसा ही खुदा है सबका।  इक राजनेता मुफ्त बदनाम हो गए थे टीवी वालों के स्टिंग ऑपरेशन में ये बोलकर कि पैसा खुदा तो नहीं है कसम से पर खुदा से कम भी नहीं है। लोग ये बोलते नहीं हैं मगर वास्तव में उनका खुदा पैसा ही है , और ये पैसे की खातिर आम जनता दर्शकों और भोले भाले लोगों को मीठी मीठी बातों से ठगने वाले बेहद अमीर लोग हैं करोड़ों की आमदनी होने के बावजूद भी पैसे की खातिर सब कुछ करते हैं।

                   इक नया एपिसोड , नया विषय , नई कहानी

   टीवी शो की कल रात की कहनी की बात बताने से पहले कुछ कहना लाज़मी है। कुछ बातें ख़ास होती हैं जिनकी चर्चा खुली महफ़िल में नहीं की जा सकती है। कुछ लोग होते हैं जो खुद स्नानघर में भी नाहते हैं तो अंगोछा लेकर , मगर दावा करते हैं कि जब बच्चा जन्म लेते समय नंगा होता है तो बड़े होकर भी शर्माने कोई बात नहीं।  ये टीवी और अख़बार के खबरची ही नहीं कुछ घटिया सोच वाले लेखक भी किसी के मरने के बाद उसके इश्क़ के किस्से लिखते हैं उसकी आधी सच्ची आधी झूठी घटनाओं पर लिखते हैं जैसे सब सामने देखा था। इतना ही नहीं कुछ लेखक अपने ही तमाम महिलाओं के साथ निजि संबंधों की बात लिखकर अपने रिश्तों को बीच बाज़ार बेचने का अपराध करते हैं। कल का विषय ऐसा ही था। आधुनिकता की ये परिभाषा घड़ी जा रही है , बच्चे अब बच्चे नहीं हैं समझदार हैं और उनको अपने फैसले करने दो , आप राय भी नहीं लो , वो कहें मुझे ज़हर पीकर देखना है अगर कड़वा लगा तो वापस उगल देंगें। बेटी आकर पिता से अपने प्रेमी के साथ बिना शादी किये पांच छह महीने रहकर तजुर्बा करना चाहती है कि जान सके हम इक दूसरे के साथ निभा सकते हैं जीवन भर। और पिता अपनी पत्नी के विरोध के बावजूद भी इजाज़त दे देते हैं। यहीं दो सवाल आपके तथाकथित आधुनिक समाज को लेकर उठते हैं। लड़की को पिता से अनुमति लेनी है , लड़के के माता पिता कहीं नहीं हैं अर्थात लड़के को बिना अनुमति जो मर्ज़ी करने की छूट है। अगर ऐसे में लड़की बिना विवाह मां बनने की दुविधा में पड़ती है तो लड़के के पास खोने को कुछ नहीं , उसको तब भी कुंवारा समझा जायेगा। चलो साथ साथ लिविंग रिलेशनशिप के बाद भी सब ठीक रहता है और दोनों आकर शादी करने की घोषणा करते हैं।  मां भी खुश , घर टीवी देखने वाले दर्शक भी ऑनलाइन राय बताने वाले भी और स्टूडियो में बैठे लोग भी। पर ये ख़ुशी अगले पल खत्म हो जाती है जब लड़की घर वापस आकर पिता को फिर बताती है कि हमने अलग अलग रहने का निर्णय किया है और मुझे उस लड़के को तलाक देना है और उस से तलाक लेने में पिता का सहारा इक वकील के रूप में चाहती है। किसी पुरानी फ़िल्मी कहानी की तरह पिता उनको फ़िल्मी अंदाज़ से राह पर ले आता है। ऐसा वास्तव में संभव होता नहीं है , मगर मुझे अनुमान था लेखक अपनी बात को सही ठहराने की खातिर दिन में तारे दिखला सकता है। यहां मुझे अपनी इक कविता याद आई है , शायद ठीक लगे आपको।

                  है अधूरी कहानी ( कविता )

ज़िंदगी  नहीं है ,
कागज़ पे लिखी ,
पर्दे पर दिखाई गई , 
कोई पटकथा ,
जिसे ले जाता है ,
मनचाहे अंत तक ,
लिखने वाला लेखक , 
भटकने नहीं देता ,
कहानी के पात्रों को ,
बचाये रखता है ,
अपने पात्रों के ,
वास्तविक चरित्र को ,
संबल बन कर।

छोड़ दिया है शायद ,
अकेला और बेसहारा ,
विधाता ने ,
जीवन में हर पात्र को।

भटक जाती है ज़िंदगी ,
धूप - छावं में,
अनजान पथ पर चलते हुए ,
बार बार।

जाने कब ,
कहाँ कैसे ,
भटक जाते हैं ,
सभी पात्र ,
सही मार्ग से जीवन में ,
सभी करते रह जाते हैं प्रयास  ,
कहानी को ,
उचित परिणिति तक ,
ले जाने का ,
मगर आज तक ,
पहुंचा नहीं पाया कोई भी ,
पूर्णता तक उसको।

रह गयी है अधूरी ,
सब के जीवन की ,
वास्तविक कहानी ,
त्रिशंकु बन कर ,
रह गये  हैं ,
जीवन में तमाम लोग। 

 

जून 06, 2018

POST : 797 कविता लापता है या मर गई है ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

  कविता लापता है या मर गई है ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया 

    कोई तो बताये , देखी है सुनी  है कविता।  कोई सुनाये मुझे कविता की प्यास है।  यू ट्यूब पर टीवी पर या किसी शहर के सभा हाल में। क्या ज़माना था खुले आसमान तले कविता का जलवा दिखाई देता था। क्या कहा यही है जो कोई महान कवि सुना रहा है और हज़ारों लोग तालियां बजा रहे हैं। इसे कविता कहते हैं , मंच पर आपस में बातचीत को , इधर उधर की बातों को जोड़कर। अकविता की कविता है , कवि हैं काव्य नहीं है। सुनने वालो क्या सुनी है कभी कविता। चलो इनकी बात को छोड़ो ग़ज़ल की बात ही करते हैं , बेहद नाज़ुक होती है और लयात्मक भी फूलों सी रेशमी एहसास लिए। ये कैसी ग़ज़ल कहने लगे जैसे तलवार लेकर घायल करना चाहते मगर किसको , लहू लुहान हो गई ग़ज़ल आपकी। इतना ज़ुल्म तो कोई नारी भी नहीं सहती आजकल। कविता ग़ज़ल माना फीमेल नाम हैं मगर डरती नहीं घबराती नहीं। आपने उनका बुरा हाल किया है कविता का सवभाव नहीं ग़ज़ल का मिजाज़ नहीं। 
 
       ये कोई सोशल मीडिया और टीवी चैनल वालों का कसूर नहीं है , किसी ने जो कहा आपने वही मान लिया तो फिर काहे को कवि शायर होने का दम भरते हो। कितने पैसे मिले होंगे , क्या इतने कि उसकी खातिर किसी को घायल कर दो। ये क्या है किसने कविता और ग़ज़ल की सुपारी ली है दी है। ऊंचे ऊंचे हाथ उठाकर ज़ोर ज़ोर से खड़े होकर वाह वाह करने वालो कविता से कभी जान पहचान की है। आपकी आवाज़ से डर गई कांपती थरथराती छुपी खड़ी होगी मंच के पीछे शायद। एफआईआर दर्ज कौन करवाए किसी की संतान है जो दुनिया में नहीं रहे। लावारिस है बिना माता पिता के बेबस है। घर बार नहीं ठौर ठिकाना नहीं , क्या हालत बना दी सभी ने। इस से तो अच्छा था किसी अख़बार के पन्नों में कहीं छपी रहना , कोई पढ़ लेता था तलाश कर के। ये मंच पर चढ़ने का चाव बहुत महंगा पड़ा है , जाने किस किस की कैसी निगाह है। सजी धजी बन संवर कर आई थी और दुप्पटा खो गया , लाज के मारे घर भी नहीं जा सकती। 
 
         जो लोग बेटियों का नाम कविता ग़ज़ल रखते थे शायद आजकल पछताते हों , नहीं ऐसा तो नहीं सोचा था। दो बहनों की दर्द भरी दास्तां है , कौन किसे तसल्ली दे ऐसे में। आयोजक अपना हिसाब लगाते हैं कविता ग़ज़ल कोई हिसाब किताब की बात नहीं हैं। भीड़ जमा होती है उनके नाम से मगर नाम जिस कारण हुआ जब वही नहीं बचा तो कवि शायर नहीं बिकाऊ सामान बन गए हैं। ये शोहरत भी बड़ी बुरी चीज़ है , सोचने ही नहीं देती सच और झूठ को। दरबार में बादशाहों का गुणगान करने वाले भी कविता की लाज रखते थे , अकविता नहीं करते थे। कविता के अस्तित्व का सवाल होने लगा है , छंद , दोहे , गीत , मुक्त छंद तक भी ठीक ही था मगर अकविता की कविता नहीं उचित।  थोड़ा तो रहम करो बेचारी कविता और ग़ज़ल वास्तव में रोने लगी हैं लोग हंसते है जिसे सुनकर वो ये नहीं हैं कोई और है। 
 

 

जून 03, 2018

POST : 796 भूली बिसरी कहानी ( लघुकथा ) डॉ लोक सेतिया

      भूली बिसरी कहानी  ( लघुकथा ) डॉ लोक सेतिया 

       बनने को तो ये उनकी कहानी उपन्यास भी बन सकती थी , मगर अब ज़िंदगी शीर्षक से लघुकथा बनकर रह गई है। अभी कुछ दिन हुए उसी मेरी लिखी पुरानी कहानी के दूसरे पात्र से फिर से मुलाकात हो गई। पहले आशिक से बात होती थी उसकी महबूबा का इतना ही पता उसने बताया था कि उस नाम की फेसबुक किसी दोस्त के बनाई है मगर फेसबुक पर रहती नहीं है केवल नाम को बना रखी है। उसने मेरी कुछ रचनाओं को कॉपी पोस्ट किया हुआ था जो मुझे पसंद नहीं और मुझे उसको ब्लॉक करना ही उपाय लगा। मगर इक दिन राह चलते अजनबी व्यक्ति से सफर में बात हुई तो मेरा नाम सुनकर उसने बताया कि अभी जिस लड़की से मिलने गया हुआ था वो मेरी रचनाओं की पाठक है और प्रशंसक भी है। सफर में उसने अपनी प्रेम कहानी बताई और लिखने को भी कहा नाम बदलकर। फिर मुलाकात नहीं हुई मगर कुछ महीने फोन पर बात करता रहा और जो जो होता बताया मुझे। अभी अधूरी थी कहानी मगर बाद में पता चला उस लड़की की किसी सहेली ने उनको घर से भागकर शादी करने में सहयोग दिया। उस आशिक का नंबर बदल गया और सालों से फिर बात नहीं हुई। 
 
               कुछ दिन पहले फेसबुक पर दोस्त बनाया तब पता चला ये वही है। मगर समझ नहीं आया माजरा क्या है। फेसबुक पर विवाहित पति पत्नी की तस्वीर देखी तो हैरान हुआ , ये कोई और है जो मुझे मिला वो तो नहीं है। अपने दुविधा मिटाने को मैसेज किया शायद आप वही हैं जिनकी बात मुझे बताई थी किसी ने। कुछ दिन बाद जवाब मिला आपको याद है , मैंने कहा आपने ही कहानी में अपनी पसंद का नाम प्रेमी का दिया था ये भी याद है। पता चला जिस से इश्क़ किया था और घर से भागकर बगावत कर साथ साथ रहे उससे निभी नहीं और वापस घर चली आई है और अब शादी किसी और से की है। वास्तव में आधुनिक युग में ऐसा ही इश्क़ होता है जो कब आशिक और महबूबा के दिमाग से इश्क़ वाला भूत उत्तर कर ज़िंदगी की असलियत को समझने लगता है और भावना की बात त्याग देता है कोई नहीं जनता। मुझे कहा है जो बातें आपको बताई थी उसके आशिक़ ने किसी को मत बताना।  क्या नहीं बताना मुझे नहीं पता कोई भी बात राज़ की रही नहीं और किसी और को मैंने उनका नाम भी नहीं बताया अभी तक।  राज़ को राज़ ही रहने तो दूं मगर राज़ है क्या मुझे समझ नहीं आया। विवाह की शुभकामनाएं और उन दोनों का साथ इस जन्म बना रहे यही दुआ है।  अगले जन्म में कौन क्या होगा भगवान जाने ।
 

 

जून 01, 2018

POST : 795 विरोध की सच की आवाज़ अपनी साहूलियत के साथ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   विरोध की सच की आवाज़ अपनी साहूलियत के साथ ( आलेख ) 

                                   डॉ लोक सेतिया 

    ये विषय तो बहुत पुराना है और मैंने इसको लेकर पहले भी लिखा भी है। मगर शीर्षक का विचार अभी अभी इक महिला के विडिओ यूट्यूब में उनकी बात सुनकर आया है। उन्होंने अपने विभाग के सरकारी नौकरी के काल में अपने अनुभव को लेकर बताया। ये भी बताया कि जिसको हमने पकड़ा आरोप लगाए और दोषी साबित किया वो वास्तव में अपराधी नहीं था , बकरा था। अर्थात गुनहगार कोई और था मगर हमने सज़ा किसी और को दिलवाने में इक हथियार बनकर काम किया। जब आप नौकरी में होते हैं तब तमाम गलत कार्यों में शामिल होते हैं अपनी मर्ज़ी से या मज़बूरी से , तब खामोश रहते हैं लेकिन जब आपका नाम हो जाता है तब पुरानी घटनाओं की असलियत बताते हैं मगर ये नहीं बताते कि आप भी हिस्सा थे सरकार और विभाग के आपराधिक कारनामों का। बहुत नाम हैं और बहुत विभागों से बड़े बड़े पदों पर रहे हैं , जब राजनीति में आये या फिर समाजसेवा की दुकान लगाई जिस में लाखों करोड़ों का चंदा दान और सरकारों से लाभ मिलता है , तब आप सच के पुजारी और झंडाबरदार बन पाक साफ़ दिखना चाहते हैं। अख़बार में कॉलम लिखते लिखते किसी दल में मंत्री बन गए तो सच लिखना क्या समझना भूल गए। सच तब सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करते थे। इक घटना की बात बताई कि कुछ नेताओं पर संदेह था और फोन टेपिंग की जा रही थी , इक सुबह आगजनी और अपराध की बातें सुनकर करवाई की और जो नेता लोग चाहते थे नहीं हुआ , मगर सबूत थे और रिपोर्ट दर्ज की गई मुकदमा दायर किया गया मगर सालों तक अंजाम तक नहीं पहुंचा क्योंकि बड़े बड़े नेताओं के पास बचाव को बड़े बड़े वकील होते हैं जो सब के लिए नहीं होते हैं। और फिर इक दिन उनका मुकदमा ही सरकार ने वापस ले लिया था। ये बात आपने तब क्यों नहीं बताई अदालत को कि ऐसा क्यों किया जा रहा है , आपको अधिकारी मंत्री आदेश देता है अनुचित कार्य करने के और आप सवाल नहीं करते इनकार नहीं करते , विरोध नहीं करते साथ देते हैं। जब आपको सुविधा है कि आप पर आंच नहीं आएगी तब आप सोशल मीडिया और टीवी चैनल या अख़बार को बताते हैं और महान कार्य करने का दम भरते हैं। ऐसे लोग देश में सब बदलने की बात कहते हैं तो धोखा है। दोस्तो संभलना और सोचना उनकी बात का दूसरा पक्ष भी है जो इसी के पीछे छुपा हुआ है कि तब क्यों नहीं बताया और आज जब बता रहे तब क्या मकसद है। 
 

 

मई 31, 2018

POST : 794 आसमान उठा रखा है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       आसमान उठा रखा है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      सोशल मीडिया पर कुछ लोग यही कर रहे हैं। ऐसे कहावतें बहुत हैं और अधिकतर उनमें किसी न किसी जीव जंतु की बात होती है। वैसे तो सिख गुरुओं की बाणी में भी उस बात पर सवाल उठाया गया है जिसमें मान्यता है कि धरती इक बैल के एक सींग पर टिकी हुई है और जब बैल थककर सींग बदलता है तो भूकंप आता है। सोचने की बात है कि  वो बैल भी खड़ा है तो उसके नीचे इक और धरती है फिर उस धरती के नीचे इक बैल और होगा।  ऐसे कितनी धरती कितने बैल।  विज्ञानिक चांद और बाकी ग्रहों तक जा पहुंचे अपने नीचे की धरती की सुध नहीं अभी भी। मगर बात आसमान की है , किस ने उठा रखा है। इक मान्यता की तरह कथा है कि इक बेहद छोटा सा जीव है जो जगता रहता है क्योंकि सब ने समझाया हुआ है कि जब कयामत आती है तो आसमान टूट कर धरती पर गिर जाता है , और जब भी उसको सोना होता है तब भी वो अपनी चारों टांगों को ऊपर की तरफ ही रखता है ये मानकर कि आसमान गिरा तो वो थाम लेगा। कुछ लोग खुद मानते हैं या नहीं मगर सभी को मनवाना चाहते हैं कि देश एक व्यक्ति के बिना नहीं कायम रह सकता। उन्होंने अपने हाथ पैर ऊपर आसमान की तरफ उठा रखे है ताकि उस नेता को सत्ता नहीं मिली तो वो उसी जीव की तरह कयामत को रोक लेंगे। उन्हें देश के इतिहास और संविधान का कुछ पता नहीं है उनके लिए जो उनका आका कहता है वही सच है। कितने झूठ पकड़े गए हैं और अभी भी झूठ पर झूठ बोल रहा है मगर तब भी आका को झूठा नहीं मानते हैं ये। 
 
       इक ऐसे बचपन के सहपाठी से बात हुई , हालांकि ऐसे लोग कभी विचार विमर्श और सार्थक वार्तालाप करने में यकीन नहीं रखते। जो उनकी बात से सहमत नहीं उसको भला बुरा कहने से देश का दुश्मन तक बता सकते हैं। उनको स्वस्थ लोकतंत्र में मतभेद और बहस का मतलब नहीं पता। बंद कुवें में कैद कैफ़ी आज़मी की कविता के लोगों की तरह , रौशनी चाहिए आज़ादी चाहिए का शोर मचाते हैं मगर कोई उनको कुंवे से बाहर निकाले तो घबरा जाते हैं खुली हवा और रौशनी को देख कर , और खुद ही  वापस छलांग लगा देते हैं कुंवे के अंदर। और फिर से नारे लगाने लगते हैं। मगर ये मेरे सहपाठी हैं और भले सीधे नहीं टेङी तरह से राजनीति में हैं फिर भी शिक्षित हैं और सभ्य दिखाई देना भी चाहते हैं , तो बात की जा सकती थी। मैंने कहा आपको क्यों लगता है वही नेता सब ठीक कर रहे हैं , कमियां नहीं बताता आप अच्छाई क्या है बतला दो। जो जो भी कहते थे हुआ हो या किया हो तो दिखाओ , जवाब देते नहीं बना। ऐसे में उनके पास तुरुप का पत्ता यही होता है कि दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। उनकी समझ पर दया आती है। क्या इतना बड़ा देश एक व्यक्ति का कोई विकल्प नहीं तलाश कर सकता , कितनी बार कितने लोगों का ये भ्र्म तोड़ा है देश की जनता ने। बात उल्टी है उनके पास या उस नेता के पास विकल्प नहीं है , और किसी देश में उनको कुछ भी नहीं मिल सकता। 
 
                       सालों से देखता रहा हूं इन लोगों को , कभी उस दल में कभी इस तो कभी किसी तीसरे दल में होते हैं। जिस दल में होते उसी के नेता को दंडवत चरण वंदना करते देखा है। अपनी आयु से बीस साल छोटे दल के नेता के सामने पांव को हाथ लगाते  भरी सभा में। एक दोस्त चुनाव से कुछ दिन पहले बता रहे थे ये दल किसी की कदर नहीं करता है तीस साल रहने पर कुछ नहीं हासिल हुआ तब अपमानित होकर दूसरे दल में शामिल हुआ हूं , यहां बहुत अच्छा है। मगर हैरान हुआ जब फिर से वापस उसी दल में चले गए वो भी आदर की बात भुलाकर क्योंकि चुनाव में टिकट उन्हें नहीं किसी और को दिया गया। साफ़ कर सकता हूं कि जिस की बात पहले की उनके परिवार में किसी को। मगर अब दोनों एक साथ एक दल में हैं , बराबर भी हैं क्योंकि एक को टिकट मिला नहीं दूसरा चुनाव हार गया। ये दोनों जब हारते हैं तो अपनी बिरादरी को दोष देते हैं और जीत जाते तो अपने नेता को श्रेय देते हैं। यही इनकी समझ है कि वोट देने वाली जनता का दिल से आभार कभी नहीं मानते हैं। 
 
               आपने सुना होगा इक स्टिंग ओप्रशन कोबरा पोस्ट ने किया अभी अभी बताया गया है। उस में तमाम मीडिया वालों को टीवी चैनल वालों से लेकर पेटीएम तक उसी जीव की तरह पीठ के बल लेटकर शोर मचाना था कि अगर इक नेता को नहीं जिताया तो कयामत आने वाली है। वो सब ऊपर को चारों टांगें कर आसमान को गिरने से बचाने का काम कर रहे है , मगर देश की खातिर नहीं पैसे की खातिर।
 
      जिसकी बात है उसने पहले ही बताया था मैं आपका पहला सेवक हूं। कुछ लोग बार बार सेवक शब्द उपयोग कर याद दिलवाते हैं बहुत भोले हैं। सरकारी नौकरी भी सेवा कहलाती है , मगर आप एक बार जिसे रख लिया आसानी से हटा नहीं सकते हैं। काम नहीं करना नौकरी से हटाने का कारण या बहाना नहीं हो सकता। ये खुद को जनता का निर्वाचित सांसद समझ ले तो बात पांच साल की हो जाती है , सेवक बनकर हमेशा सर पर चढ़े रह सकते हैं। इरादा साफ है अभी भी नहीं समझे तो और उदाहरण भी हैं। इक दवा कंपनी में नौकरी मिली मगर काम नहीं करते थे , घटना वास्तविक है , कंपनी से मिले दवा के मुफ्त डॉक्टरों को देने वाले सैंपल बेच देते केमिस्ट को। पता चला तो कंपनी ने नौकरी से हटाया भी , कोई सरकारी नौकरी भी नहीं थी , मगर एम आर एसोसिएशन साथ खड़ा हुआ तो उसे वापस रखना पड़ा। मगर निजि कंपनी वाले भी कम नहीं होते हैं , उनको जाल बिछाना आता है। कुछ दिन बाद उस को तबादला कर मैनेजर बना दिया और उसके बाद मैनेजर को काम नहीं करने पर हटा दिया। अब समझ आया कि नहीं। सेवक जिस जगह काम करते हैं हमेशा ध्यान रखते हैं कोई और उस जगह उसकी जगह काम नहीं कर सके। किसी दूसरे को अपनी जगह आने ही नहीं देते हैं।

                             लोग आज तक समझे नहीं सेवा में मेवा है का अर्थ क्या है। कुछ साल पहले की बात है हमारी एसोसिएशन के दो सदस्य मीटिंग में अपने अपने नाम का समर्थन देने की मांग करने लगे। संस्था को राजनीति से कोई सरोकार नहीं है और किसी को भी समर्थन नहीं मिलना था उनको भी पता था। आपसी हंसी मज़ाक में बात करते करते उनसे पूछा गया कि इतना लालायित क्यों हैं विधायक बनकर क्या करोगे।  इक सदस्य खुशमिज़ाज हैं बोले यार पिछले दल में घर फूंक तमाशा देखा है , दलबदल किया ही है घाटे की भरपाई और कमाई करने को। ये कोई राज़ की बात नहीं है , लोग शहर के वार्ड के पार्षद बनते हैं तो मालामाल हो जाते हैं। सभापति बनने की चाह रखने वाले लाखों देते हैं ताकि सभापति करोड़ों लूट सके। सारा खेल पैसे का है।

                             आखिर में बात आसमान से शुरू की थी उसी पर आते हैं। आसमान का कोई अस्तित्व होता ही नहीं है , सब जानते हैं ये हमारी नज़रों की सीमा है और कुछ नहीं। डरिये नहीं आज तक आसमान के गिरने टूटने की कोई कथा कहानी तक नहीं लिखी मिलती है। ये जो आसमान उठाये हुए हैं का दावा करते हैं उनकी असलियत यही है। गांव वाले बताते हैं गड्डा , जिसे बैलगाड़ी कहते हैं , उसके नीचे नीचे इक कुत्ता चलता हुआ समझता है कि गड्डे का बोझ उसने उठा रखा है। देश चल रहा है जनता के दम पर किसी को मुगालते में नहीं रहना चाहिए। 
 



 

मई 30, 2018

POST : 793 तुझे किस बात का डर है ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

       तुझे किस बात का डर है ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

   गीता गीता रटते हो गीता को पढ़ा नहीं और पढ़ा भी तो समझा नहीं। पहली बात अत्याचारी अन्याय करने वाले लोग कभी शूरवीर नहीं होते हैं। कायर होते हैं डरे हुए होते हैं। आज जिस से डर रहे हो सच बोल नहीं सकते वो भी डरा हुआ है। उसे शिखर से गिरने का डर उसी पल से है जब से वो शिखर पर चढ़ गया था। हम नहीं जानते वो तब भी घबराया हुआ था। उसके पीछे इक भूत का डर था और उसी डर से भागता भागता वो शिखर पर जा पहुंचा था। सब को दिखलाता है मैंने कहां से कहां पहुंच गया मगर खुद अभी तक उसी अतीत वाले भूत का खौफ बाकी है। उसे अभी घबराहट है और भीतर से अंदेशा है कि जैसे पहले बहुत लोगों के साथ होता रहा है , ऊंचाई से नीचे गिरने का , आकाश से पाताल का सफर बहुत कठिन होता है। शोहरत से बदनामी का रास्ता अकेला कर देता है। गीता समझाती है मौत कुछ नहीं है , हथियार डालना मौत से भयानक है। अत्याचारी से लड़ना साहस की बात है , हार जीत महत्व नहीं रखते। तुम कवि हो वीर रस की कविता लिखना छोड़ इस दौर में खुशबू की फूलों की ज़ुल्फ़ों की आंखों की कविता लिखने लगे , रणछोड़ बन रहे हो। हर पल ही मर रहे हो। 
                           हर ज़ुल्म करने वाला जब हद से अधिक क्रूर हो जाता है तभी उसका अंत आता है। याद करो तानाशाहों के ज़ुल्म ही आज़ादी की आधारशिला रखा करते हैं। पापी के पाप का घड़ा भरता है तभी फूटता भी है। भूल गये जब तोप मुकाबिल हो कलम उठाओ , तलवार कभी जीती नहीं कलम से। अपने अंदर आग भर कर अपने शब्दों की ज्वाला से रौशन कर दो अंधेरे में डूबी महफिलों को। सौ बरस कायर बनकर जीने से बेहतर है कुछ दिन निडरता से साहसी बनकर जी लेना।

वो पहन कर कफ़न निकलते हैं ,
शख्स जो सच की राह चलते हैं। 

राहे मंज़िल में उनको होश कहाँ ,
खार चुभते हैं , पांव जलते हैं। 

गुज़रे बाज़ार से वो बेचारे ,
जेबें खाली हैं , दिल मचलते हैं।

जानते हैं वो खुद से बढ़ के उन्हें ,
कह के नादाँ उन्हें जो चलते हैं। 

जान रखते हैं वो हथेली पर ,
मौत क़दमों तले कुचलते हैं। 

कीमत उनकी लगाओगे कैसे ,
लाख लालच दो कब फिसलते हैं। 

टालते हैं हसीं में  वो उनको ,
ज़ख्म जो उनके दिल में पलते हैं। 

अपनी ही ग़ज़ल को दोबारा दोहराता हूं , फिर से गुनगुनाता हूं।  

सच की राह का मुसाफिर हूं , झूठ से टकराना है टकराता हूं। 


 

POST : 792 कोई कानून नहीं , सब ठीक ठाक है ( स्वास्थ्य की बात ) - आलेख - डॉ लोक सेतिया

         कोई कानून नहीं , सब ठीक ठाक है ( स्वास्थ्य की बात )

                        आलेख - डॉ लोक सेतिया 

    अख़बार में ये खबर बहुत छोटी सी छपी है , न्यूज़ डायरी एक तरफ बहुत छोटी छोटी खबरें इक साथ देते हैं अख़बार वाले। कोई ध्यान ही नहीं देता , अख़बार वालों को भी ये महत्वपूर्ण नहीं लगती हैं। खबर लिखी है कि अब एक कमरे में नहीं खुलेगी पैथोलॉजी लैब। ये लिखा है कि आप हैरान होंगे कि अभी तक देश में कोई कानून ही नहीं था ठोस इस बारे में। साथ में ये भी जानकारी दी गई है कि स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा पारित , क्लीनिकल इस्टैब्लिशमेंट एक्ट भी कुछ ही राज्यों की सरकार ने लागू किया है जिसे बने कितने साल हो गए हैं। इस से समझ सकते हैं देश की सरकार और राज्यों की सरकारें नागरिकों के स्वास्थ्य के प्रति किस हद तक लापरवाह और गैर ज़िम्मेदार हैं। पिछले दिनों जब हरियाणा में गुड़गांव और दिल्ली में राजधानी में लाखों रूपये के बिल वसूलने की लूट जैसी घटनाओं का शोर मचा तो हरियाणा के बहुत बोलने वाले स्वस्थ्य मंत्री ने क्लीनिकल इस्टैब्लिशमेंट एक्ट लागू करने की बात कही। मगर बाद में अस्पताल वालों के दबाव में जनता के हित दरकिनार कर घोषित किया गया कि पचास बिस्तर वाले अस्पतालों पर एक्ट लागू नहीं होगा। ये शायद हमारे देश के नेता ही कर सकते हैं , कोई कानून किसी पर लागू हो किसी पर नहीं , फिर संविधान की बात कहां है जो सब के साथ समानता और न्याय की बात करता है। यहां इक पुरानी बात याद करना ज़रूरी है , जिस कानून की बात की जा रही है और जिसको अधिकतर राज्यों में लागू नहीं किया है , उस से पहले डॉ रामदास जी ने स्वास्थ्य मंत्री होते इक कड़ा कानून लाने का प्रयास किया था जिस में विश्व स्तर के नियम लागू करने का विचार था ताकि लोगों की जान से खिलवाड़ कोई नहीं कर सके। मगर उनको स्वस्थ्य मंत्री पद से ही हटा दिया गया था। मनमोहन सिंह जी बेशक ईमानदार समझे जाते हैं मगर उन्हीं की सरकार में एक ईमानदार मंत्री को सही दिशा में काम करने पर हटा दिया गया। जब सभी लोग चाहते हैं उन पर कोई नियम कानून लागू नहीं हो और कानून हो तो भी पालन नहीं करना चाहते ये कहकर कि ऐसा संभव नहीं है तब कुछ भी ठीक कैसे हो सकता है।

                       सब से अधिक विडंबना की बात तो ये है कि सरकारों का सारा समय ध्यान ही अपनी अपनी सहूलियत की राजनीति साधने में और सत्ता विस्तार में रहता है। गरीबी भूख शिक्षा स्वास्थ्य उनके अजेंडे में ही नहीं हैं। नियम कानून बनाने में हम बीस तीस साल पीछे रहते हैं। जैसे अभी अस्पतालों को तो छोड़ दिया गया है मगर लैब पर एक्ट लागू करना चाहते हैं , क्या लैब पचास बिस्तर वाले अस्पताल से अधिक गलतियां कर सकती है। वास्तविकता को नेता सरकार समझते ही नहीं हैं , आजकल अधिकतर टेस्ट टेक्नीशियन या डॉक्टर नहीं करते मशीनों से होते हैं टेस्ट। बेशक लैब में क्वॉलिफाइएड डॉक्टर होने चाहिएं , मगर क्या पचास बिस्तर के अस्पताल में कितने डॉक्टर कितना स्टाफ हो ये ज़रूरी नहीं है। किसी सरकारी नागरिक अस्पताल में पचास बिस्तर होते हैं तो पचास डॉक्टर और दो सौ लोग बाकी नर्स कम्पाउंडर आदि रहते हैं। अगर निजि नर्सिंग होम बीस बिस्तर का है तो एक या दो डॉक्टर से कैसे सही उपचार किया जा सकता है। कोई नियम नहीं है स्टाफ कितना क़्वालिफ़ाइड हो , साथ में अपनी दवा की दुकान और लैब से टेस्ट करवाना और सब में हिस्सा लेना। ये कोई उचित तरीका नहीं है , बहुत अस्पताल बाहर लिखा होता है चौबीस घंटे सेवा की बात मगर वास्तव में कोई डॉक्टर रहता नहीं है हर समय। अधिकतर नर्सिंग होम दावा करते हैं जिन सेवाओं का उनका प्रबंध होता ही नहीं है।

                                         आजकल स्वास्थ्य , शिक्षा दोनों सेवा के नहीं अधिक से अधिक कमाई के कारोबार या धंधे बन गए हैं। सरकार भूल गई है कि ये दोनों बातें सभी की ज़रूरत हैं और आधी आबादी निजि स्कूलों की फीस नहीं भर सकते न ही निजि अस्पतालों के भी बिल भर सकते हैं। लेकिन सरकारी अस्पताल तो किसी सरकार को ज़रूरी लगते ही नहीं कि उनकी ही व्यवस्था सही की जाये। कितना धन बेकार के इश्तिहारों पर सरकारी विभाग बर्बाद करते हैं उसे बंद कर उतना धन स्वस्थ्य और शिक्षा पर लगते तो अच्छा होता। कानून बनाने से पहले ही उसे प्रभावी ढंग से लागू करने की भी इच्छाशक्ति होनी चाहिए और ये भी समझना चाहिए कि हमारे देश में उसे किस तरह संभव किया जा सकता है। 
 

 

मई 29, 2018

POST : 791 इस दौर को परिभाषित करते मुहावरे और लोकगीत - डॉ लोक सेतिया

       इस दौर को परिभाषित करते मुहावरे और लोकगीत 

                        डॉ लोक सेतिया

शेर ग़ज़ल :-

अनमोल रखकर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में ,
देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई। 
 
मतलूब सब हाकिम बने तालिब नहीं कोई यहां ,
ऐसी हमारे देश की कैसे सियासत बन गई। 

    ( सब मनोनीत लोग सत्ता पर बिठाये हुए हैं ,  कठपुतिओं की तरह से ,  

      ये लोकतंत्र में कैसे हुआ कि कोई भी जनता द्वारा निर्वाचित नहीं है ) 


दोहे :-

मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर ,
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा है चोर।

चमत्कार का आजकल अदभुत है आधार ,
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार।

आगे कितना बढ़ गया अब देखो इंसान ,
दो पैसे में बेचता ये अपना ईमान।

झूठ यहां अनमोल है सच का ना व्यौपार ,
सोना बन बिकता यहां पीतल बीच बाजार। 

लकोक्तियां :-

राजनीति हो इश्क़ हो या दोस्ती , मुहब्बत प्यार कुछ नहीं ,
 
ज़रूरत है तो संबंध हैं , जो डराता है उसे खुदा बना लेते हैं। 

सखी वो ज़माना और था लोग पसंद करते थे उसे चुनते थे ,
 
अब आशिक डराता है मेरी नहीं बनोगी तो मर जाओगी।

शासक भय पैदा करता है और इक शोर खड़ा करता है ,
 
मुझे नहीं चुनोगे तो बहुत पछताओगे , समझ लो इसे।

आदर्श , मूल्य , नैतिकता , धर्म :-

सरकार झुकती है इक अपराधी के सामने , जो चुनौती देता है देश को , 
खुद को धर्मगुरु बताकर , सब धंधे करता है , गुनहगार खुद है दोष औरों के बताता है। 
बेशर्म नेता सत्ता की खातिर हर सीमा तक नीचे गिर सकते हैं। 

कोई और है जो खुद को देश समाज की सेवा करने वाला सच्चा बताता है ,
बाकी सबको लालची मिलावटी सामान बेचने वाला कहकर खुद बेचता ,
जो कभी नहीं बनाता है मुनाफा कमाकर करोड़ो अरबों कमाता है ,
किसी को नहीं पता उसका अतीत , कोई नहीं जनता कैसा बही-खाता है। 

ये समुंदर खारा है नहीं इसका पानी कभी प्यास बुझाता है ,
सब मीठी नदियों का जल मिलता है फिर भी खारा है प्यासा है। 

धनवान :-

इनकी हवस बढ़ती जाती है कभी खत्म नहीं होती है ,
सब से अधिक गरीबी इन्हीं की सच में होती है।
पैसा इनकी शान है पैसा ही इनका भगवान है ,
सभी कुछ है पास नहीं इनके पास केवल ईमान है।
सब अमीर जानते हैं कैसा ये इक हम्माम है ,
विश्वास किसी धनवान का नहीं हर इक बेईमान है। 
 

 

POST : 790 ईमान की बात , ईमानदारी के साथ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    ईमान की बात , ईमानदारी के साथ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

   पहले संक्षेप में आज ही की बात। कल रात को किसी व्यक्ति ने जौनपुर से फोन किया राष्ट्रधर्म पत्रिका में मेरा लेख पढ़कर। मेरे पास पत्रिका नहीं आई थी , डाकघर सामने ही है इसलिए सुबह जाकर देखा जहां डाक छांटते हैं मेरी दो पत्रिकाएं रखी थी। तब केवल सफाई करने वाले आये हुए थे और डाकखाना खुलने में अभी समय था। मैंने उस सफाईकर्मी को बताया कि मेरा नाम डॉ लोक सेतिया है और ये मेरे ही नाम की डाक है मैंने ले जा सकता हूं। जी नहीं उसने कहा आप बाद में आकर ले जाना जब डाकिया या और डाकघर के लोग आ गए हों तभी। मुझे बहुत अच्छा लगा उसका वो काम नहीं करना या करने देना जिसका अधिकार उसको नहीं है। उसी डाकघर में दो लोग काम करते हैं एक डाकिया जो डाक बांटने में कुछ देरी कर रहा था अन्यथा मुझे कल ही पत्रिका मिल जाती , और दूसरा ये जो जनता है कि जिस जगह वो काम करता है उस जगह रखी किसी चीज़ को छेड़ना उसका अधिकार नहीं है। सलाम उस सफाईकर्मी को। मुझे कई बातें याद आ गईं हैं पुरानी। बी के चम जी लिखा करते थे अंग्रेजी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में कॉलम। अंत में उस लेख की बात बतानी है , पहले आज की बात। 

                                  अधिकारों के दुरूपयोग की बात

 सरकारें बदलती हैं सरकारी तौर तरीके नहीं बदलते , ढंग नहीं बदलते। कल कोई कर रहा था और कोई और कर रहा है। कल तक अधिकारी उस दल के नेता के लिए अनुचित कार्य करते थे अब इस दल के नेता के लिए करते हैं। बदला कुछ भी नहीं बल्कि और अधिक खराब हालत होती जाती है। हरियाणा रोडवेज़ की खबर आई है कि जो कंडक्टर क्लर्क का काम पर लगा रखे थे उनको अपने काम पर लगाया जायेगा ताकि बस सेवा सही हो सके। ये अकेली घटना नहीं है , शहर के पार्क पर नियुक्त बताये माली बड़े अधिकारी की कोठी पर काम करते हैं , इतना ही नहीं पुलिस के सिपाही अफ्सरों के घरेलू नौकर की तरह काम करते हैं। पुलिस के बड़े अधिकारी अपने विभाग के सिपाही से ऐसा काम लेने देते हैं और अधिकारी भी ऐसा करते संकोच नहीं करते। सत्ता और पद का दुरूपयोग तो है ही साथ में छोटे पद पर नियुक्त सुरक्षाकर्मी कुंठा का शिकार हो जाते हैं। हम सोचते ही नहीं क्यों किसी सिपाही ने ख़ुदकुशी कर ली या किसी को मार डाला। जिन लोगों को नियम कानून लागू करने हैं वो खुद किसी नियम किसी नैतिक मूल्य की परवाह नहीं करते हैं। मगर आम नागरिक पर नियम लागू करने में इनका रुख बदल जाता है। किसी से घूस लेते हैं तो उसकी बड़ी से बड़ी गलती भी नहीं दिखाई देती और किसी को परेशान करना चाहते तो अकारण ही कमियां तलाशते हैं। फिर से इक बात को दोहराना ज़रूरी है कि देश में कोई भी सत्ताधारी नेता कोई भी घोटाला बिना सचिव आईएएस अधिकारी की मिलीभगत नहीं कर सकता है , क्योंकि संविधान में किसी भी चेक या भुगतान पर पहले अधिकारी के हस्ताक्षर होना लाज़मी है। इसका मतलब यही हुआ कि हर नेता के हर घोटाले में अधिकारी वर्ग शामिल होता ही है। ये वास्तव में शर्मनाक है , जिनको आम नागरिक की आमदनी से कई गुना अधिक वेतन मिलता है , सुख सुविधा सुरक्षा मिलती है वही देश और संविधान के लिए ईमानदार और वफादार नहीं होते। 

                      काला धन और नोटबंदी तथा उसका नाकाम होना

        अब ये कोई राज़ की बात नहीं है कि नोटबंदी असफल रही है। कारण बहुत हैं और नीयत की भी बात साफ़ नहीं होना इसमें आती है। गरीब लहरों पर बिठाये जाते हैं पहरे , समंदरों की तलाशी कोई नहीं लेता। मगरमच्छ सुरक्षित हैं मछलियां मर गई सभी। मुझे लगा था जैसे कोई बाज़ार से आटा दाल सब्ज़ी घी तेल सब शुद्ध लेकर खाना पकाये और सबको प्यार से खिलाये मगर लोग बिमार हो जाएं। क्योंकि आपने जिन बर्तनों में खाना बनाया और परोसा वही साफ़ नहीं थे , खाना गंदा होना ही था। सरकार की रसोई में सभी बर्तन अर्थात जिन बैंकों से ये सब करवाया गया वही ईमानदार नहीं थे। कितने बैंक वालों ने बहती गंगा में खूब मस्ती की बहुत दिन तक नहाये नंगे होकर। आपके सब नियम बेकार हुए। मगर यहां भी अजीब घोटाला हुआ। सरकारी बैंकों में घोषित किया गया कि इस काम में जितने लोग ओवरटाइम करेंगे उनको उस समय के अतिरिक्त पैसे मिलेंगे। अब सब से अधिक काम उन्होंने किया जो लोग कैश काउंटर पर ड्यूटी देते हैं , लेकिन अधिकतर हुआ ऐसा कि मैनेजर और बड़े अधिकारीयों के लिए लिखा जाता रहा अधिक समय काम किया और जो स्टाफ काउंटर पर भुगतान करता जमा करता जिसे सांस लेने की फुरसत नहीं मिली उनको नहीं मिला कुछ भी या फिर नाम मात्र को। जब तक हस्ताक्षर करना काम समझा जायेगा और वास्तविक काम करने वाले की उपेक्षा की जाती रहेगी सही कामकाज नहीं हो सकता। 

                                    बी के चम के लेख की बात

   उन्होंने अपने लेख में तीन ईमानदार लोगों को लेकर लिखा था। मुझे दो घटनाएं याद हैं तीसरी भूल गई है। एक बार वो अपने इक अधिकारी दोस्त से मिलने गए तो पता चला वो नौकरी के लिए आये आवेदकों का इंटरव्यू ले रहे हैं। कमरे में जाते उनको फोन पर बात करते देखा सुना और लिख रहे थे कागज़ पर , समझ गया कि नेता जो मंत्री हैं किसी की सिफारिश कर रहे हैं। बेहद निराशा हुई ये भी सिफारिश पर किसी को नौकरी देते हैं। मगर तभी बात समाप्त करते हुए उनहोंने कहा मंत्री जी आपका दिया नाम लिख लिया है और आप उनको बता सकते हैं कि उनको साक्षात्कार के अयोग्य घोषित किया जा रहा है नियमानुसार ऐसा सिफारिश करवाना अयोग्य बना देता है। मान गए उनके हौंसले की बात को , कोई चिंता नहीं थी , क्या होगा अधिक से अधिक तबादला। 
 
    दूसरी घटना शिमला की माल रोड की है , इक बड़े अधिकारी कार में जा रहे थे कि इक सुरक्षकर्मी अवरोधक लगा कर खड़ा था , साहब ने ड्राइवर को भेजा बताओ कौन हूं और रास्ता खुलवाओ। नहीं माना वो तो खुद नीचे उतर कर उसके पास जाकर बोले जानते हो मैं अमुक विभाग का आला अधिकारी हूं और कभी किसी दिन तुम्हारी नियुक्ति मेरे आधीन भी हो सकती है। जी मैं जनता हूं उसने कहा। अधिकारी बोले सोचो तब क्या होगा तुम्हारा। उसका जवाब था सर , तब आपको यकीन होगा कि कम से कम एक आदमी आपके आधीन ऐसा है जो अपना कर्तव्य निभाता है ईमानदारी से। मेरी निष्ठा अपने काम और देश के लिए है। सैल्यूट किया था उस अधिकारी ने और धन्यवाद किया था ये सबक समझाने के लिए। 
 

 

मई 28, 2018

POST : 789 वॉयरल टेस्ट वालों का सच ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     वॉयरल टेस्ट वालों का सच ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                       (  आधा सच्चा - आधा झूठ  )

         मेरे पास है वह विडिओ अगर आपको कहीं से नहीं मिला तो मुझे बताओ और पाओ। पे टीएम की तरह से नहीं। फेसबुक की तरह से नहीं। व्हाट्सऐप की तरह से नहीं। आपस की बात आपस तक रहेगी। इस बात का भरोसा आपको बहुत लोग दे सकते हैं जिनकी कितनी बातें मेरे भीतर गहरे कुंवे में पड़ी हैं , खुद मैं भी उन्हें भूल चुका हूं। जिस विडिओ की बात करनी है वो सब से अलग है। इतना कि किसी को कल्पना में भी नहीं विचार आया कि ये संभव है , बहुत सारी बातें अविश्वसनीय सच होती हैं। पांच साल पहले कोई सोच भी नहीं सकता था कि इक दल चाहे जितना बदनाम हो जाये घोटालों में , दूसरे दल को इतना बहुमत हासिल हो सकता है और उसके बाद देश से राज्यों तक उसी की विजय हो सकती है। मगर वो अविश्वसनीय बात अब इतिहास बन चुकी है। जब किसी के अच्छे दिन आते हैं तो यही होता है। तकदीर कब किसी को कहां पहुंचा देती है कोई नहीं जानता है। मुलतानी भाषा बेहद रोचक है , और मुलतानी कहावतें बहुत बढ़िया होती हैं। इक ऐसा ही मुहावरा है , किसे दी रन्न मोई किसे दे भाग खुले। हिंदी अनुवाद भी बताना होगा , किसी की पत्नी की मौत हुई और किसी की तकदीर खुल गई। अभी भी नहीं समझे तो पांच साल बाद समझोगे जनता की तरह। भाई सीधी बात है जिस लड़की की शादी नहीं हो रही थी , आयु बढ़ती जा रही थी , जिस की पहली बीवी नहीं रही उसको ज़रूरत थी , खुद ही मांग लिया रिश्ता। राजनीति में ये और ढंग से होता है , बीवी भी होते हैं नेता और रखैल भी बनकर रहते हैं , ये चुनाव के बाद का गठबंधन कहलाता है। कहने को किसी की और निष्ठा किसी और के साथ। अब असली बात पर आते हैं। 
 
                 जिसकी बात हो रही है उस विडिओ में इक उपकरण है जो आपको आपके सामने आपका अगला पिछले जन्म दिखाता है। विडिओ में टीवी चैनल वाला सच्चाई समझना चाहता है , उपकरण बनाने वाले को बहुत पैसा देने का वादा सरकार की तरह किया हुआ है। लालच भी दिया है कि टीवी पर देख कर हर कोई आपसे बनवाना चाहेगा उपकरण और आप मालामाल हो जाओगे। टीवी वाले ने अपना नाम आधार कार्ड नंबर डाला तो पटल पर इक कुत्ता सड़क पर भागता हुआ दिखाई दिया। बुलाया उस उपकरण बनाने वाले को ये पूछने के लिए कि ये तो कुछ और ही है , भला किसी कुत्ते का नाम और आधार कार्ड नंबर मेरे जैसा कैसे हो सकता है। उपकरण बनाने वाले ने समझाया कि आपने अंकित किया हुआ है इस पहचान वाले का अगला जन्म क्या होगा। भविष्य में आप गाड़ियों के पीछे भागते सड़क के श्वान हो सकते हैं जो स्पीड मैनिया के शिकार हैं। बुरा नहीं मानों तो अभी भी वही हैं , बेकार भौंकते रहते हैं , अनजान अजनबी वाहनों के पीछे भागते रहते हैं। आपको लगता है सब डरते हैं आपसे , मगर किसी को आपकी परवाह नहीं है , सब जानते हैं आपको टुकड़ा डाला तो दुम हिलाने लगते हैं। विज्ञापन देने वाले के पालतू हैं , आपने रखवाली करना छोड़ दिया है। बेकार की बहस जिसका कोई नतीजा नहीं इसी तरह की बात है भौंकने से लोग तंग आ चैनल बदलते रहते हैं मगर हर सड़क पर यही दिखाई देता है। देख लो किसी दिन इसी तरह कोई वाहन आपको कुचल देगा , कुत्ते की मौत मरना कोई नहीं चाहता। लेकिन आपसे ये दौड़ छूटेगी नहीं कभी , पागलपन की सीमा पार कर चुके हैं आप। पिछले जन्म में देखने से घबरा गये , दिखाई दिया सच मगर स्वीकार नहीं कर सकते। आपका उपकरण झूठा है हम इस को टीवी चैनल पर नहीं दिखा सकते। आप बेशक किसी अख़बार में इश्तिहार दे कर कोशिश कर लेना , कोई भी अपना पिछला जन्म ऐसा नहीं पसंद करेगा न भविष्य में ऐसा जन्म लेना चाहेगा। जी आपकी बात ठीक है मगर आप आगे क्या करोगे , मुझ पर मान हानि का मुकदमा तो नहीं करना चाहते। नहीं नहीं बिल्कुल भी नहीं , क्योंकि इस सच को सामने लेकर मुझे हासिल क्या होगा। मानहानि का मुकदमा करने वालों की गति देखी है , माफ़ कर जान छुड़ाते हैं ताकि झूठी इज्ज़त बच जाये जो बचती नहीं है। लोग सच कोई समझते हैं , झूठ पर खामोश रहते हैं , मन ही मन हंसते हैं। 
 
         माफ़ करें मुझे बीच में ब्रेक लेना पड़ रहा है , आप साथ बने रहिये , विज्ञापन के बाद आपको दिखाते हैं इस विडिओ की असलियत।  कहीं जाना नहीं हमारी टीआरपी की सौगंध।

मई 27, 2018

POST : 788 चाचा नेहरू की याद में - डॉ लोक सेतिया

        चाचा नेहरू की याद में - डॉ लोक सेतिया 

         आपने ये शब्द समझा है , दो ही लोग हुए हैं जिनको ये रुतबा हासिल हुआ है।  चाचा नेहरू और चच्चा ग़ालिब। यकीन करें इनसा दूसरा नहीं हो सकता। गांधी जी को लेकर कहा जाता है कि सदियों बाद लोग यकीन नहीं करेंगे कि हाड़-मांस का ऐसा कोई पुतला धरती पर होता था। मगर आज अभी 54 साल बाद कोई उसी कुर्सी पर बैठकर उनको नहीं अपने पद को अपमानित कर रहा है जिनका मुकाबला वो कभी नहीं कर सकता , उन देश के पहले वास्तविक प्रधान सेवक जवाहरलाल नेहरू की बुराई करते समय। उन जैसा नेता जो देश के भविष्य को लेकर बहुत बड़े सपने देखता है और समझता है कि देश से गरीबी भूख मिटानी है मगर उसके साथ आधुनिक विज्ञान और विकास भी करना है। खुद अपने मुंह से कहता है मुझे इतना अधिक प्यार देकर ऊंचा नहीं पहुंचाओ कि मैं तानाशाह बन जाऊं। किसी ने कभी आपको बताई ये बात आज तक। मैं तब 13 साल का बच्चा था और हमारे स्कूल में भीतर जाते ही नेहरू जी की कोट पर गुलाब लगाए हुई तस्वीर दिखाई देती थी। केवल कहने को नहीं हम बच्चे दिल से प्यार करते थे , कौन नहीं रोया था उनके निधन की खबर सुनकर। ये घटना मुझे कभी नहीं भूल सकती है , 1965 को 27 मई को स्कूल में नेहरू जी की याद में सभा हुई थी , केवल बच्चों को ही बोलना था और जो चाहे कर दिखाना था। आज रोज़ लिखता हूं बहुत कुछ , मगर कभी नहीं भूली वो बचपन की दिल की गहराई से निकली भावना की पहली लिखी कविता। मैंने अपनी पहली रचना नेहरू जी की याद में लिखी थी। 27 मई को याद करो चल बसे थे चाचा प्यारे , आंसू भरे सितारे। जो भी हो तुकबंदी भी हो मगर इक दिल से भावना से लगाव से लिखी थी। क्या आजकल किसी नेता के निधन पर किसी को ऐसा दर्द महसूस होता है। 
 
                                                पंचशील को भूल गये हैं जैसे बुरा सपना था , मगर नहीं आज भी सब कहते वही हैं जंग से किसी को कुछ हासिल नहीं होता है। पीठ में छुरा घोंपा था चीन ने और हम उस दोस्ती की आड़ में भरोसा तोड़ने वाले दुश्मन की बात को छोड़ इक सभ्य नेता को दोष देते हैं। आज देश जिस भी मुकाम पर है उद्योग को लेकर विज्ञान को लेकर बांध बनाने से लेकर राज्यों के अधिकार और लोकतंत्र को स्थापित करने तक उनका योगदान है। इस बात को आज़ादी के पचास साल पूरे होने पर संसद में अपने भाषण में अटल बिहारी वाजपेयी जी ने सपष्ट किया था। आज के सत्ताधारी कुत्सित मानसिकता के चलते ये कभी नहीं बोल सकते हैं। किसी ने कभी विचार किया कभी नेहरू ने इंदिरा को सत्ता सौंपने की सोच भी रखी थी , जिनको नहीं मालूम उनको याद दिलवाना ज़रूरी है कि नेहरू जी के निधन के बाद श्री गुलज़ारी लाल नंदा जी को काकाजी प्रधानमंत्री बनाया गया क्योंकि वो सब से वरिष्ठ सांसद थे। मगर उन्होंने अपने पद और वरिष्ठ होने का दुरूपयोग नहीं किया , जबकि उन्हें तीन बार इस तरह का अल्पकालीन प्रधानमंत्री बनाया गया। ये था नेहरू का स्थापित लोकतंत्र , इतना ही नहीं उसके बाद संसद में कोंग्रेस के नेताओं की बैठक हुई जिस में नेहरू जी का स्थान किसे दिया जाये ये तय किया जाना था। हैरान हो जाओगे किसी को पहले कोई पता नहीं था क्या होगा। लाल बहादुर शास्त्री जी सभा में देर से आये और कोई खाली कुर्सी नहीं देख आखिर में सीढ़ियों पर धरती पर बैठ गए। जब उनके नाम का प्रस्ताव सामने आया और सब ने तालियां बजाईं तो ध्यान आया की वो हैं कहां , तब उनको अगली कतार में बिठाया गया। आज किसी दल में ये साहस है कि खुली सभा में विचार कर काबिल व्यक्ति को चुना जाये। चुनाव से पहले घोषित करना कि ये या वो प्रधानमंत्री हों संविधान की भावना की बात नहीं है। 
 
                                    इक कविता है किसी कवि की। बौने लोगों को लगता है , पहाड़ पर चढ़कर , उनका कद , ऊंचा हो जाता है , मगर वास्तव में , पहाड़ पर चढ़कर बौने , और भी बौने दिखाई देते हैं। इसलिए महान लोगों से अपनी तुलना नहीं करें। आखिर में किसी शायर की ग़ज़ल के कुछ शेर अर्ज़ करता हूं। 
 

इस कदर कोई बड़ा हो मुझे मंज़ूर नहीं , कोई बंदों में खुदा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

रौशनी छीन के घर-घर के चिरागों की अगर , चांद बस्ती में उगा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना , आपकी एक अदा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

आज मैं जो भी हूं हूं बदौलत उसकी , मेरे दुश्मन का बुरा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

मैं जनता हूं उनको ये ग़ज़ल कभी समझ नहीं आएगी जो हर किसी को खुदा कहने लगते हैं और खुदा बदलते रहते है। अंतिम शेर की बात तो उनको अजीब ही लगेगी। मगर उनको बताना होगा इक महान नेता का कहना था , मैं तुम्हारी बात से असहमत हो सकता हूं , मगर मेरा कर्तव्य है आपकी अपनी बात कहने की आज़ादी की रक्षा करना। इक शेर जगजीत सिंह की गए ग़ज़ल से , हमने देखा है कुछ ऐसे खुदाओं को यहां , सामने जिस के वो सचमुच का खुदा कुछ भी नहीं। 
 

 

 

POST : 787 नानक समयो रम गयो , अब क्यों रोवत अंध ( मन की बात ) डॉ लोक सेतिया

       नानक समयो रम गयो , अब क्यों रोवत अंध ( मन की बात ) 

                                   डॉ लोक सेतिया 

    मैं तो इक मूर्ख हूं जो खुद मोह माया में रम गया है , बंधन से मुक्त होना चाहता हूं हो पाता नहीं। ये आज इक शब्द जो श्लोक मोहल्ला नौ सिख धर्म ग्रंथ की बाणी का बेहद महत्व रखता है जीवन में सही मार्गदर्शन के लिए जिसे काफी अर्से से नियमित सुनता हूं , उसी को साथ लेकर देश और समाज की बात करना चाहता हूं। मेरी विनती है कि मेरे ऐसे करने पर कोई भी मेरे मकसद को अन्यथा नहीं ले। वास्तव में धर्म की किताब चाहे गीता हो कुरान हो बाइबल हो सभी हम को सच की परख और सही जीवन राह पर चलने की ही बात समझते हैं। 
                 सीधी बात करने वाले सच्ची बात नहीं करते और अपना ज़मीर बेचने को राज़ी हैं। कोबरा पोस्ट ने जो आज बताया मुझे वही अख़बार वालों को पत्रिका वालों को लेकर लिखते बीस साल हो गए हैं। मीडिया हो सरकार के नेता हों चाहे अधिकारी सब की बात यही है जो शीर्षक है। 

करना हो सो ना कियो , पड़ेओ मोह के संग 

नानक समयो रम गयो , अब क्यों रोवत अंध। 

पहली बात करना क्या था , जो नहीं किया और जो नहीं करना था करते रहे। इसे शब्द में कहा है जो किसी को भय नहीं देता है और ना ही किसी से भयभीत होता ही है , नानक कहते हैं हे मन सुन ज्ञानी उसी को कहते हैं। दावा करते थे मुझे कोई मोह नहीं लोभ नहीं लालच नहीं , मगर किया क्या अपना गुणगान और झूठी शोहरत हासिल करने को अपनी लकीर बड़ी बनाना नहीं आया और जिनकी लकीर बड़ी लगी उनको छोटा करने लगे। मन की बात से इक भजन याद आया है।  तोरा मन दरपन कहलाये उसे भी सुन लेते हैं। 





मन की बात इसे कहते हैं , अपने मन को पा लिया भगवान को पा लिया। कोई बात मन से छुपी नहीं है , मन की बात का शोर नहीं होता ख़ामोशी से सुनते हैं। मन की बात सब से नहीं की जाती और खुलेआम तो कभी नहीं। जनता को वादा किया था जो वो अच्छे दिन यही हैं कभी मन से पूछना। धर्म की बात आचरण की बात होती है आडंबर की नहीं। रावण भी सुनते हैं बहुत की थी देवताओं की पूजा , कहते हैं सभी ग्रंथ कंठस्थ थे मगर आचरण में ज्ञानी नहीं था। सोने की लंका की तरह आलीशान भवन बनाने से महान नहीं हो जाते , जलकर राख हो जाती है ऐसी लंका भी। इस देश में हनुमान हर जगह विराजमान हैं , शायद भगवान कृष्ण जी अवतार लेना भूल गए वर्ना पाप की पापियों की अधर्म की कोई कमी तो नहीं बाकी आजकल। नाम की बात को छोड़ो नाम बदनाम लोगों का भी याद रहता है। इक अपना शेर कहना चाहता हूं। 

अनमोल रखकर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में , 

देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई। 

     अब इस से अधिक बात क्या होगी कोई बार बार कहता है , उनकी दुकान पर ताला नहीं होता तो हम विधायक रुपी सामान खरीद लेते या नहीं बिकना चाहते तो लूट कर चुरा कर भी अपनी सरकार बनवा लेते। लोकतंत्र किस चिड़िया का नाम है और जनता भले किसी को चुनती है सभी दल अपनी साहूलियत से व्याख्या कर लेते हैं। कोई विचारधारा नहीं कोई नैतिकता नहीं केवल सत्ता के लिए अवसरवादिता है। ये बहुत अजीब बात है आपने किसी भी राज्य में विधायकों को अपना नेता चुनने की आज़ादी नहीं दी , बस अपने ख़ास संगठन से जुड़े लोग मनोनीत करते गए , नतीजा कर्नाटक में राज्यपाल को देश संविधान नहीं अपने आका और संगठन की चिंता थी , सर्वोच्च अदालत कब कब ये करेगी। हरियाणा में पूरी सरकार इक अपराधी के संग खड़ी रही , उच्च न्यायालय और इक न्यायधीश के कारण पीड़ित महिलाओं को न्याय मिला। आप अपराधियों का बचाव ही नहीं करते सच को खरीदने का अधर्म ही नहीं करते , आप सच को डराने धमकाने परेशान करने में किसी गुंडे की तरह हर सीमा पार कर जाते हैं। नहीं ऐसा तो आपत्काल में भी नहीं देखा था। 
अब जब समयो रम गयो , अर्थात चुनाव सामने हैं तब , तरह तरह से बता रहे हमने क्या क्या किया है। जो किया जनता को सामने दिखाई देता होगा , अंधी नहीं है जनता। जो किया नहीं वो कैसे दिखाओगे। 

                ये सब करना था , किया है तो दिखाओ ?  

कालेधन वाले जेल नहीं गए , कालाधन मिला नहीं उसे सफेद करवा दिया। 
 
भ्र्ष्टाचार और महंगाई दोनों डायन अभी और विकराल रूप धारण कर चुकी हैं। 
 
सेवक होने की बात कहकर खुद पर देश का धन बर्बाद करना , नौकर का चोरी करना है। 
 
एकतरफा संवाद स्वस्थ लोकतंत्र में उचित नहीं है। 
 
किसान , बेरोज़गार , किसी को कुछ नहीं मिला है। 
 
सीमा पर सैनिक शहीद हो रहे हैं और आम जनता आपके भ्र्ष्टाचारी पल के नीचे दबकर मर गए हैं । 
 
( ये आपके ही बोले शब्द हैं जब किसी और राज्य में किसी दूसरे दल की सरकार के रहते दुर्घटना घटी ) 
 
विकास कहीं नहीं , विनाश करने में कोई कमी है जिसे दोबारा सत्ता हासिल कर पूरा करना है । 
अंत में मीडिया के नाम लिखी तीस साल पुरानी ग़ज़ल पेश है ,
 
इक आईना उनको भी हम दे आये,
हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं।    

बदकिस्मत होते हैं हकीकत में वो लोग,
कहते हैं जो हम तकदीर बनाते हैं। 

सबसे बड़े मुफलिस होते हैं लोग वही,
ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं। 

देख तो लेते हैं लेकिन अंधों की तरह,
इक तिनके को वो शमशीर बनाते हैं। 

कातिल भी हो जाये बरी , वो इस खातिर,
बढ़कर एक से एक नजीर बनाते हैं। 

मुफ्त हुए बदनाम वो कैसो लैला भी,
रांझे फिर हर मोड़ पे हीर बनाते हैं।

मई 26, 2018

POST : 786 इंसान हैं , इंसानियत नहीं है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   इंसान हैं , इंसानियत नहीं है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     आज पार्क में सैर करते हुए सोच ही रहा था कुछ इसी तरह के विषय की बात , हमारी कथनी और करनी की बात तथा अधिकतर अपने अधिकारों पद सत्ता धन ताकत के अनुचित उपयोग की बात। पार्क से निकलने को ही था कि तीन चार लोगों की बातें सुनाई पड़ीं। इक व्यक्ति कह रहा था इन सफाई कर्मचारियों की मांगे नहीं मानी जानी चाहिएं थी। रुक गया और उनको भी रोका और सवाल किया क्या उनका शोषण नहीं किया जाता रहा अभी तक , दो वक़्त खाना मिल जाये इतना ही मांगते हैं। बोले ये अपना काम नहीं करते ठीक तरह से। मैंने कहा आपने अधिकारी करते हैं ठीक से काम , नगरपरिषद के सभापति से विधायक मंत्री मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री तक क्या सभी ठीक काम कर रहे हैं। करते तो सब कुछ सुधर सकता था। मगर हम उनके खिलाफ आवाज़ नहीं उठा सकते , जो मुफ़लिस हैं गरीब हैं उनके लिए जो चाहे बोलते हैं। कोई अधिकारी आपको बिना बात डांट देता है मगर आप खामोश सहते हैं , किसी सफाई कर्मचारी ने आपको सलाम नहीं किया तो आपका अपमान हो गया। उसने आपकी बात नहीं मानी तो आप नाराज़ हो गए , मगर जिनको खुद आपने चुना वो आपकी बात को नहीं सुनते तब भी हाथ जोड़े खड़े रहते हैं। सब से पहले हमें ये कायरता छोड़नी होगी , टकराना है तो अपने से बड़े के साथ टकराओ सही बात पर। यही अधिकतर लोगों का चरित्र है।  हम अपने साथ अन्याय होने पर रोते हैं आहें भरते है , किसी और पर अन्याय होता देख विचलित नहीं होते , और खुद किसी पर अन्याय करते भी संकोच नहीं करते हैं। मेरे जीवन में कई बार ऐसी घटनाएं घटी हैं और उसी तरह सब को ऐसे कड़वे अनुभव होते हैं , जब उल्टा चोर कोतवाल को डांटता जैसी बात हो।

          किसी ने अपनी कार मेरे घर के गेट के सामने खड़ी कर रखी थी , उनसे कहा आप इसे थोड़ा परे खड़ा कर लो तो वो बोले मैं हुडा विभाग का हूं और मुझे पता है आपने जो रैंप बनाया हुआ है वो कितना अनुमति है। इसे क्या कहोगे , धौंस दिखाना , वो इंसान उसी समय जिस की दुकान पर खड़ा था उसने विभाग के प्लाट पर फुटपाथ पर कब्ज़ा कर रखा था जो उसको दिखाई नहीं दिया मगर मेरा रैंप जो सामन्य सभी की तरह से बना है उसको नियमानुसार नहीं लग रहा था , शायद उसके विभाग के नियम उसको ऐसा अमानवीय आचरण करने के अधिकार देते हों , देश का संविधान तो सब को बराबरी से न्याय की बात करता है।

       कुछ ऐसा ही इक और बार हुआ , कार में बैठ शराब पी रहे लोगों को मना किया कि ये क्लिनिक है जहां आपने दरवाज़े के सामने रोक कर कार खड़ी की हुई है और शराब पी रहे हैं। जनाब आये बाहर और बेशर्मी से बोले आप फोटो ले लो और शिकायत कर लो पुलिस को , मैं पुलिस में ही हूं। मैंने कहा तब तो और गलत बात है आपको जिस अनुचित काम को बाकी लोगों को रोकना हैं खुद वही कर रहे हैं , तभी तो देश की हालत ऐसी है। मैं बहुत ईमानदार पुलिस वालों को जनता हूं मगर ये कुछ लोग जो समझते हैं थानेदार हैं तो कुछ भी कर सकते हैं। ऐसे लोगों को देश समाज और नियम कायदा कानून से कोई सरोकार नहीं होता है। जब तक हम सभी अपने आचरण को सही नहीं करते बाकी समाज की कमियां निकालते रहेंगे मगर हासिल कुछ नहीं होगा।

      कोई दुकानदार कारोबार करते उचित दाम की बात याद नहीं रखता , मगर किसी और के अधिक दाम मांगने पर लूटता है कहता है , जो सफाई वाले को 400 रूपये दिन के काम के मिलने को सोचता है इतना काम नहीं करता है वो , खुद हज़ारों की दिन की कमाई पर उचित अनुचित की बात नहीं करता। बाज़ार में कम होने पर ब्लैक करते उसको अपराधबोध नहीं होता है। हम सोचते हैं मंदिर जाने से पूजा अर्चना करने से दान करने से हम भगवान के भक्त हो गये , मगर नहीं। नानक जी कहते हैं ये तो सांप का कुंचल स्नान की तरह है। भाई इंसान है नाग नहीं बनिये , कुंचल नहीं बदलिए , सवभाव बदलिए। जपुजी साहिब में लिखा है , सोचे सोच ना होवई , जे सोचे लख वार , भुखियां भूख ना उत्तरी जे बन्ने पूरियां भार। अर्थात नहाने धोने से आप पावन नहीं हो जाते बेशक लाख बार स्नान करते रहो। और लालच की भूख मिटती नहीं चाहे कितना पास जमा किया हुआ हो।

                            मगर इस देश में जिस में मानवधर्म की बात सदियों से होती रही ये हो क्यों रहा है। क्योंकि हम ने धर्म की किताबों को , जीवन की सही राह दिखाने वाली नीतिकथाओं की बातों को भुला दिया है। ज्ञान हासिल नहीं किया और तोते की तरह राम राम रटते हैं। जब किसी और की गलतियां ढूंढते हैं तो खुद अपनी गलतियां और कमियां भी देख लिया करें। समाज हम सभी से है पहले खुद को बदलना होगा। ये बात शायद आजकल समझना कठिन है , मगर हमने बार बार पढ़ा है कि साधु का काम क्या है चोर को भी इंसान समझना। इक साधु ने देखा इक बिच्छु पानी में डूबता जा रहा , कहानी आपने सुनी होगी , हर बार साधु उसे हाथ बढ़ाकर बचाने को कोशिश करता और हर बार बिच्छू काट लेता। किसी ने कहा ये आप क्या कर रहे हो। साधु बोलै कि जब मर रहा है फिर भी बिच्छू अपना सवभाव नहीं छोड़ता तो मेरा सवभाव है डूबते को बचाना मैं कैसे अपना सवभाव त्याग दूं। कोई आपसे अन्याय करता है तो आप किसी और से उसका बदला नहीं लें किसी अपने से छोटे पर अन्याय कर के। इक बार हम पाप पुण्य और कर्मों के फल की बात को भी छोड़ देते हैं , मगर आप को अपनी आत्मा अपने विवेक का सामना तो करना ही होगा। चाहे सारी दुनिया आपकी बढ़ाई करती हो मगर आपका मन आपकी असलियत जनता है कि जो लोग समझते हैं आप वो नहीं है तो ऐसे झूठे गुणगान का क्या मतलब है। इंसान खुद अपनी नज़र में गिर जाये तो उस से अधिक नीचे नहीं गिर सकता कोई।

                बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय

               जो मन खोजा आपने तो मुझसे बुरा न कोय। 


 


मई 24, 2018

POST : 785 ऐसी होगी मेरी शोकसभा कभी ( तीरे-नज़र ) डॉ लोक सेतिया

     ऐसी होगी मेरी शोकसभा कभी ( तीरे-नज़र ) डॉ लोक सेतिया 

      आप शोक जताने आये हैं या एहसान करने। चलो मेहरबानी की कुछ लोग तो मिल बैठे। मुझे मालूम है कितना कठिन है आपका मुझे अच्छा बतलाना। हमेशा जो बेहद खराब लगता रहा हो उसे अच्छा ही नहीं बेहद भला इंसान कहना सच साहस की बात है। आकर मेरी तस्वीर पर फूल चढ़ाना और हाथ जोड़ मन ही मन कुछ कहना , कमाल ही किया है। पता नहीं था वर्ना कब का मर जाता मैं। ये जो मंच पर भली भली बातें की जा रही हैं सब को पता ही हैं , हर शोकसभा में बार बार दोहराई जाती हैं। सुनाई देती हैं समझ नहीं आती कभी भी। अभी कहते हैं आत्मा नहीं मरती और अगर अच्छे कर्म किये हैं जीवन में तो भगवान से मेल हो जाता है , दुःख की कोई बात नहीं है , फिर इसे शोकसभा क्यों कहते हैं। जश्न होना चाहिए। मैं समझा नहीं सका मगर मैंने हमेशा समझा यही है। मौत से मुझे शायद ही डर लगा हो , ज़िंदगी ने डराया है मुझे हमेशा। 

           मौत तो दरअसल एक सौगात है , हर किसी ने इसे हादिसा कह दिया।

    रस्मे-दुनिया है निभा लेते हैं मगर ऐसे भी नहीं , आप तो भाषण देने लगे , इतनी मुहब्बत होती जिनको उनकी आवाज़ आंसुओं में डूब जाती है। संख्या की बात छोड़ो कोई फर्क नहीं पड़ता मुझे कितने अधिक आये या थोड़े आये , मगर जितने भी आये हैं सब दावा करते हैं मुझे जानते हैं समझते हैं , ज़िंदा था तब तलक तो मुझे पहचान नहीं सके आप लोग। मुझे लगता था शायद मैं किसी और जहां का हूं गलती से आपकी दुनिया में भटक कर चला आया। उपकार तो किया है आपने घंटा भर मेरे लिए मेरे नाम पर खर्च किया है और बदले में मैं इतना भी नहीं कर सकूंगा कि बदला चुका सकूं , उस जहां से वापसी का रास्ता नहीं मालूम। दोस्त तो दोस्त वो भी आये हैं जो जलते थे मुझसे बिना बात दुश्मन समझ , मैं कब किसी का दुश्मन बना कभी। आया ही नहीं दुश्मनी करना , जो दुश्मनी करते रहे उन्हें ठीक से दुश्मनी निभानी भी नहीं आती। अगर आती होती तो वही लोग इक पार्टी रखते जश्न मनाते गाते झूमते ख़ुशी मनाते। कम से कम इसी तरह मेरी इक इच्छा ही पूरी हो जाती। वो पंजाबी गीत भी सच नहीं हुआ , जदों मेरी अर्थी उठा के चलणगे , मेरे यार सब हमहुमा के चलणगे। चलणगे मेरे नाल दुश्मन वी मेरे , ओ वखरी ए गल मुस्कुरा के चालनगे। आप तो यहां भी झूठ का दिखावा कर रहे हो। झूठी गमगीन सूरत बनाकर किसे बहला रहे हो अपने आप को। या ऐसा तो नहीं कि अभी तक ऐतबार ही हो रहा कि मैं मर गया और मेरी शोकसभा आयोजित की जा रही है , खुद आकर तसल्ली करने पर भी शक बाकी है। अपने भीतर से मुझे निकाल दो और भूल जाओ अदावत की बातों को। मरने के बाद दोस्ती दुश्मनी क्या सभी रिश्ते नाते खत्म हो जाते हैं। औपचारिकता निभाना भी ज़रूरी था जनता हूं। पढ़ते पढ़ते सोचोगे ये लेखक भी कमाल का है मरने के बाद भी इसकी रचना पढ़नी पड़ रही है। वाह इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। 

                                      कल की बात से आगे 

     मुझे लगता है कि किसी के भी दुनिया से जाने के बाद अगर उसके अपने और चाहने वाले उसकी याद में कुछ भी करना चाहते हैं तो वह बात करें जो उस मरने वाले को पसंद हो या थी। ऐसा भारत में बेहद कम होता है मगर पश्चमी देशों में होता है ऐसा पढ़ते रहते हैं। अभिनेता अनुपम खेर के पिता की इच्छा थी उनके बाद शोकसभा नहीं इक शानदार पार्टी आयोजित की जाये और ऐसा ही किया भी गया। उनकी अलग दुनिया में कोई सवाल नहीं करता क्यों किसी ने क्या किया। मगर अधिकतर हम लोगों की दुनिया में अपने तरीके से कुछ करने की छूट नहीं होती है। मेरे इक दोस्त के पिता इन सब बातों को नहीं मानते थे ये उनके बेटे जानते थे , इसलिए जब वो सब भाई हरिद्वार अस्थियां लेकर जा रहे थे तो पिता की बात का ध्यान रखकर अस्थियां राह में किसी नदी में प्रवाहित कर खुद कहीं और चले गए हरिद्वार की जगह। मगर उनको नहीं पता चला कि जब वो किसी राह की नदी में अस्थियां डाल रहे थे तब किसी ने उनको ऐसा करते देख लिया था और पहचान लिया था। वापस घर आने पर कोहराम मच गया और लोग बहुत साल तक उनकी आलोचना करते रहे। कुछ ऐसे ही राजकुमार जो हम कहकर मुखातिब हुआ करते थे अपने अंदाज़ में डायलॉग बोला करते थे , नहीं चाहते थे कि उनके मरने की खबर भी किसी को पता चले और उनकी इस इच्छा को पूरा करते हुए उनका अंतिम संस्कार दो चार दोस्तों और परिवार के लोगों ने किया था और फिल्म उद्योग के लोगों तक को नहीं पता चला उनकी मौत कब हुई। अभी साल दो साल पहले की बात है इक बेहद अच्छे व्यंग्यकार की मौत के बाद उनकी इच्छा का आदर करते हुए उनकी रचनाओं का पाठ किया गया था। ये बेहद भावनापूर्ण दृश्य था कि जब उनकी बेटी आंखों में आंसू लिए उनकी हास्य व्यंग्य की रचना पढ़कर सुना रही थी। ऐसा ही कुछ मेरे दोस्त पंजाबी के शायर कवि हरिभजन सिंह रेणु की शोकसभा में दिखाई दिया था सिरसा में ही। किसी भी वास्तविक रचनाकार को इससे बेहतर श्रद्धांजलि नहीं दी जा सकती है।

          मैंने कुछ रचनाएं लिखी हैं इसी विषय को लेकर। हास्य व्यंग्य कविता श्रद्धांजलि सभा , इक ग़ज़ल , जश्न यारो मेरे मरने का मनाया जाये , इक कविता नाट्यशाला , मैं रहूंगा हमेशा , मेरी खबर। इक बात किसी कवि की कविता की मुझे बहुत पसंद आई थी और उसे मैंने अपनी कविता श्रद्धांजलि सभा के आखिर में लिखा भी है उसको दोहराना चाहता हूं।  दोस्तो मेरे लिए स्वर्ग की दुआ मत करना ,न ही मुझे मोक्ष या मुक्ति की चाह है।

भगवान से यही कहना है कि ,
मुक्ति दे देना तुम  ,
गरीब को भूख से  ,
दिला सको तो दिला दो  ,
मानव को घृणा से मुक्ति ,
और नारी को  ,
दे देना मुक्ति अत्याचार से  ,
मुझे जन्म देते रहना  ,
बार बार इनके निमित।
मित्रो ,
मेरे लिये  स्वर्ग की  ,
प्रार्थना मत करना  ,
न ही कभी मेरी  ,
मुक्ति की तुम दुआ करना ,
मेरी इस बात को  ,
तब भूल मत जाना  ,
मेरी श्रधांजली सभा में  ,
जब भी आना।