Saturday, 5 September 2020

लॉक-डाउन की महिमा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    लॉक-डाउन की महिमा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

 
     लॉक-डाउन को लेकर दुविधा में हैं लोग कब से कब तक और कितना कैसा कोई नहीं जानता खुद घोषित करने वाले अनजान हैं। हटते हटते ज़माना लगता है लगाने को चुटकी बजाना लगता है है हक़ीक़त मगर फ़साना लगता है आपको झूठा बहाना लगता है। मुश्किल बाहर जाना मुसीबत को घर बुलाना लगता है। अंधों में काना ही अब स्याना लगता है कोरोना को भगाना थाली बजाना लगता है। किसी को अवसर भुनाना लगता है किसी का खाली खज़ाना लगता है बारिश का मौसम सुहाना लगता है रोज़गार पकोड़े बनाना लगता है। सीबीआई को बुलाना पड़ेगा कोई गुनहगार पकड़वाना पड़ेगा कोरोना को मज़ा चखाना पड़ेगा उसे अब तो सूली चढ़ाना पड़ेगा तरीका वही आज़माना पड़ेगा गधे को बाप सबको बनाना पड़ेगा। किसी को कहीं से हटाना पड़ेगा किसी और देश को भाग जाना पड़ेगा नहीं सुनता कोई सुनाना पड़ेगा कुछ और ज़ोर से चिल्लाना पड़ेगा। ये सारा का सारा बोझ उठाना पड़ेगा नहीं सजदा करना मगर सर फिर भी झुकाना पड़ेगा दुष्यन्त कुमार को दोहराना पड़ेगा जो सच है आखिर बताना पड़ेगा। लॉक-डाउन लगाकर हटाना पड़ेगा चिड़िया चुग गई खेत बाद में पछताना पड़ेगा। कभी तो हर किसी को जाना पड़ेगा ये सिलसिला चलता है चलाना पड़ेगा रिवायत को आखिर निभाना पड़ेगा किसी को उठाकर बिठाना पड़ेगा। लॉक-डाउन का मतलब पढ़ाना पड़ेगा अनलॉक-डाउन तुझको समझना और समझाना पड़ेगा।

        लॉक-डाउन की कथा बनाई है लॉक-डाउन कोरोना का सौतेला भाई है दूध दूध है छाछ छाछ है मख्खन घी और मलाई है मिलकर रसमलाई बनाई है। नहीं मालूम किसने चुराई है लॉक-डाउन क्या कोई हलवाई है कोरोना है बड़ा कड़वा देखो तो लगता है कोई मिठाई है। बात मन की उसको जब सुनाई है क्या कहें कितनी उसको भाई है अब कसम सच्ची उसने खाई है सरकारी दामाद है कोरोना घरजवाई है। ऐलान जनाब ने किया आखिर आठ बजे सीधे संबोधन में कोरोना से बात बिगड़ी बन गई है ठन गई थी मगर फिर टनाटन गहरी छन गई है। वैक्सीन नहीं कोई दवाई नहीं हम कथा उसकी सुनाएंगे कोरोना संग लॉक-डाउन की भी महिमा गाएंगे सुबह शाम उसको जब मनाएंगे नाचेंगे झूमेंगे और गाएंगे बीमार चंगे हो जाएंगे। हम ये राज़ दुनिया से छुपाएंगे कोरोना क्या है कुछ भी नहीं मगर सब कुछ है ये समझा कर और उलझाएंगे। हमारे पास बेचने को रखा क्या है दुआ भी है बद्दुआ क्या है किया क्या और हुआ क्या कौन समझे ये माजरा क्या है। लॉक-डाउन चीज़ कितनी अच्छी है बात झूठी भी लगती सच्ची है हमने छाना कोना कोना है छिप गया डर कर जब कोरोना है हमने उसको ज़िंदा छोड़ने का किया वादा है पेश हो जाओ पक्का इरादा है।  सीबीआई  ने जाल बिछाया था तब कोरोना बहुत घबराया था दुहाई है दुहाई है कोरोना बहना है और  लॉक-डाउन उसका भाई है। राम ने खूब मिलाई है जोड़ी इक अंधा है दूजा है कोड़ी बात रहती है ज़रा अभी थोड़ी सुना रहे हैं उसको लोरी। गहरी नींद उनको जब आएगी अर्थव्यस्था पटड़ी पर खुद चली आएगी कथा सुनाने को नई ऐप्प बनाई जाएगी आरती भजन कीर्तन सतसंग जनता ताली भी बजाएगी सरकार कोरोना संग निभाएगी मगर जब सब जनता मनाएगी भाई लॉक-डाउन चला जाएगा बहना कोरोना भी भाग जाएगी।