सितंबर 04, 2019

ग़म है बर्बादी का क्यों चर्चा हुआ ( अजीब दास्तां है ये ) डॉ लोक सेतिया

       ग़म है बर्बादी का क्यों चर्चा हुआ ( अजीब दास्तां है ये ) 

                                          डॉ लोक सेतिया 

चलो इस तरह हमने दिखला दिया कि हम संवेनशील समाज हैं। साल में दो चार बार ऐसा होता है जब हमारे बीच किसी की संवेदना जाग उठती है और कोई खबर की सुर्ख़ियों में आकर सोशल मीडिया पर छा जाता है। जैसा अभी रानू मरिया मंडल के कोलकात्ता की रेलगाड़ी में इक प्यार का नग़्मा है गीत गाने को लेकर हुआ। हर दिन हादसे का शिकार हो रहे लोगों का वीडियो बनाने वाले किसी भूखे बच्चे और गिद्ध की तस्वीर लेने वाले संवेदनारहित लोग नाम कमा लेते हैं। कोई नहीं सोचता ये किस दुनिया में हम रहते हैं जहां ऐसे हज़ारों लाखों नहीं करोड़ों लोग हुनर क़ाबलियत होते हुए भी जाने कहां कहां अंधेरी दुनिया में घुट घुट कर जीते हैं मर जाते हैं। टीवी चैनल पर किसी रियल्टी शो में मंच पर बैठे और देखने वाले दर्शक दो पल को पलकें भिगो कर इंसानियत का दिखावा करते नज़र आते हैं। और इस के पीछे इक सच छुपा रह जाता है कि उस के इलावा और कितने गुमनामी में बेबसी भरा जीवन जीते हैं क्योंकि यहां काबलियत को नाम पहचान यूं ही नहीं मिलती है मिलती है किसी बड़े की ख़ास शख्सीयत की निगाह ए रहमदिली पड़ने के बाद। और कौन बनेगा करोड़पति जैसे शो में कितनी तरह से कैसे भी कमाई करने वाले लोग दयालु बनकर उभरते हैं और उनके पास धन दौलत के अंबार कैसे जमा हुए इसकी बात कोई नहीं करता है। आपको ख़ुशी होती है किसी एक की भलाई हुए जानकर मगर कितने नहीं आये सामने कोई नहीं सोचता है। हम जिसे संवेदनशीलता समझते हैं वास्तव में वो हमारी समाज की और उच्च वर्ग की बेहरमी को दिखाता आईना हो सकता था जिसको शोषण करने वाले वर्ग ने ही तमाशा बना दिया है। 

  ये समाज रहमदिल नहीं रहा है हम अपने आस पास बेबस लोगों से कोई सहानुभूति नहीं रखते हैं कोई किसी को सहारा नहीं देता है कोई गरीब भूखे को खाना खिलाना इंसानियत नहीं समझता है। हम जाकर किसी दिन किसी को पैसे भोजन देते हैं औपचारिकता निभाने को रस्म अदायगी को अमावस को किसी त्यौहार के दिन। हमारी सरकार भी यही करती है मतलब और शोहरत की खातिर कोई ऐलान करती है और साथ साथ कोई और ढंग अपना कर अपनी तिजौरी भरती जाती है। दान का चर्चा घर घर पहुंचे लूट की दौलत छुपी  रहे , नकली चेहरा सामने आये असली सूरत छुपी  रहे। क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी फ़ितरत छुपी रहे।  इज़्ज़त फ़िल्म का ये गीत बड़े लोगों की असलियत को ब्यान करता है। फिर बार बार दोहराना पड़ता है अपने नाम शोहरत या कोई मकसद हासिल करने को कितना पैसा बर्बाद करते हैं रईस लोग राजनेता अमीर लोग और सरकारी विभाग भी इश्तिहार छपवाने लगवाने पर क्या उस से कोई समाज की भलाई करने की बात सोचता है। दान भी देते हैं तो नाम लिखवा कर अपनी दयाशीलता का दिखावा करने को। अधिकांश लोग उन्हें दान देते हैं जिनको शायद सहायता की ज़रूरत नहीं होती और उन्होंने इस को धर्म का नाम देकर अपने लिए सुख सुविधा का उपाय कर लिया है। वास्तविक धर्म ये नहीं कहता है सच्चा दान वो है जो आप किसी अपने पहचान वाले की तसल्ली को नाम को दिखावे को नहीं देते जब किसी को असहाय देखते हैं तो चुपचाप दे देते हैं। सच बताओ अब किस किस धर्म की जगह भूखे की भूख मिटाने का धर्म निभाया जाता है किस जगह कोई मुसाफिर या बेघर आसरा पा सकता है। 

     हम सब की अपनी चाहत और अधिक पाने की और शानो शौकत दिखाने की हमको किसी और की मज़बूरी किसी की तकलीफ़ दर्द मुसीबत समझने देती ही नहीं है। हमारा समाज अजीब है जो आडंबर पर जितना बर्बाद करता है उतने से बहुत सार्थक भलाई का काम किया जा सकता है। हर दिन समाज सरकार कितना धन खर्च करती है अनावश्यक आयोजन करने आदि पर और नेता अधिकारी अपने खुद पर। जितना खाते हैं उस से अधिक फैंकते भी हैं किसी कचरे के डिब्बे में या कभी गटर में भी जाता है भोजन। अपने कितने ऐसे दाग़ को ढकने को कभी कभी ऐसा कुछ करते हैं तो भी अपने नाम का डंका पीटते हैं। हमारा देश और समाज कुछ और हुआ करता था जैसे कोई चमन हो अब तो इक सहरा बन गया है किसी रेगिस्तान की तरह है और ये जो हम समझते हैं पानी है सबकी प्यास बुझाएगा वास्तव में इक मृगतृष्णा है। ये चमक झूठी है भटका रही है। 
 

 

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