Monday, 2 September 2019

पाप अधर्म लूट अनैतिक असंवैधानिक अनुचित शब्दों के अर्थ - ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   पाप अधर्म लूट अनैतिक असंवैधानिक अनुचित शब्दों के अर्थ

                           ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

नहीं मैं कोई धर्मों का जानकर नहीं संविधान का विशेषज्ञ नहीं पढ़ाई लिखाई भी साधारण सी है और दुनिया की सैर या ज़माने भर का अनुभव भी मुझे नहीं है। किसी गुरु से सीखा नहीं किसी साधु संत का अनुयाई नहीं कोई विशेष लगाव किसी एक धर्म से भी नहीं है। फिर भी चिंतन मनन से अनुभव से जीवन के जो भी समझ पाया हूं उस से इन शब्दों का सही अर्थ समझ सकता हूं। जैसे भी हो आजकल राजनीति में शामिल नहीं होकर भी कोई भी अछूता नहीं रह सकता देश राज्य की राजनीति के असर से। बेशक यहां बात समाज की है मगर राजनीति को अलग रखकर संभव नहीं है इसलिए उद्दाहरण वहां से लेना ज़रूरी है। 

शासक हैं सत्ताधारी नेता या विपक्षी दल से नेता हैं अथवा अधिकारी हैं जन सेवक कहलाते हैं अगर आप देश की बदहाली की चिंता नहीं करते और केवल अपने स्वार्थ की बात सोचते हैं तो अपना कर्तव्य अपना धर्म नहीं निभाते हैं फिर चाहे आप कितनी पूजा अर्चना धर्म की किताब की पढ़ाई या धार्मिक कार्य करते रहें। 

देश में लोग बेघर हैं भूखे मरते हैं और आप नेता बनकर बड़े ओहदे पर राजसी शान से रहकर देश का पैसा अपने ऐशो-आराम अपनी इच्छाओं की पूर्ति या मौज मस्ती करने पर सज धज कर महल में रहने पर खर्च करते हैं तो संविधान की भावना का अनादर करने वाले गुनहगार हैं। 

अपने भाषण दिए सभाएं आयोजित की अपनी महत्वआकंक्षा की खातिर सत्ता का दुरूपयोग किया अपनी झूठी शोहरत की खातिर देश के खज़ाने को कुछ ख़ास लोगों को देने का पाप किया और आपकी बात में अधिकांश बेमतलब की बात थी या सच नहीं झूठ बताने का जतन किया या सच पर पर्दा डालने का काम किया तो लोग कितनी भी तालियां बजाते रहें कुदरत उसको अनैतिक आचरण समझेगी और वास्तविकता सामने आने पर आपकी सारी शान बेकार जाएगी। 

राजनैतिक मकसद से जो लोग अपने नाम और पहचान का दिखावा करने पर बेतहाशा धन खर्च करते हैं और दावा करते हैं समाज सेवा और ईमानदार होने का उनका स्वार्थ की खातिर अपने पैसे का ऐसा दुरूपयोग चाहे वो पैसा किसी भी ढंग से कमाया गया हो धर्म के ख़िलाफ़ है। शायद उतने पैसे से कितना कुछ किया जा सकता था कितने गरीबों को रोटी रहने को घर या शिक्षा स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध करवाई जा सकती थी। और जिस जिस ने वास्तविक धार्मिक और सामाजिक कार्य की जगह ऐसा किया उसने देने वाले दाता की अनुकंपा का अपमान किया है। क्योंकि हर धर्म अधिक धन होने पर असहाय लोगों की सहायता करना कर्तव्य बताया है। 

सरकारी अधिकारिओं को देश और जनता की सेवा निष्ठा से करनी चाहिए न कि शासक दल या नेताओं की ख़ुशी और मर्ज़ी को देख उनके राजनीतिक मकसद पर ध्यान देना चाहिए और जो ऐसा करते हैं देश समाज और संविधान के गुनहगार हैं। अपने जो अनुचित किया उसका दायित्व किसी और का नहीं है और उस का फल आपको मिलना ही है। 

हम आम लोग भी इतने नासमझ नहीं हैं जो इन सब बातों को नहीं समझ सकते फिर भी जानकर भी अनुचित को उचित ठहराना या झूठ को सच समझना मूर्खता से बढ़कर अज्ञानता है। और सच नहीं बोलना या झूठ की महिमा का गुणगान करना तो कायरता है ऐसा करने के बाद अपने पूर्वजों की महानता की कथाओं की बात करना आडंबर ही नहीं छल है खुद अपनी आत्मा से भी। आपको कोई जंग नहीं लड़नी है मगर इतना अवश्य कर सकते हैं कि जो जो भी इस तरह से पाप अधर्म लूट अनैतिक कर्म असंवैधानिक और अनुचित काम करते हैं उनका आदर सम्मान नहीं करें उनको मंच पर फूलमाला नहीं पहनाएं। अधर्म का साथ नहीं देकर भी अच्छा कर्म किया जा सकता है।

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