Sunday, 1 September 2019

वक़्त के साथ न बदलने वाले ( पुराने चावल ) डॉ लोक सेतिया

  वक़्त के साथ न बदलने वाले ( पुराने चावल ) डॉ लोक सेतिया 

आधुनिकता से जी घबराता है तो हम पुरानी बातों को याद करते हैं। क्या दिन थे क्या ज़माना था वो भी बहुत कुछ नहीं था फिर भी कोई कमी नहीं लगती थी और आजकल कितना कुछ है फिर भी महसूस होता है कुछ भी नहीं है जैसे। किस बात की कमी है या हर बात की कमी है। चलो आज देखते हैं हम कितना बदले लोग कितने बदले हैं ये नया दौर का लाया है और पिछले दौर का हमने क्या खोया है आधुनिक बन क्या पाया है। 

कल शाम खूब झमाझम बरसात हुई सावन का महीना पानी को तरसते बीता तो पहली बार बारिश ने सब भिगोया। तन भीगे मन भीगे नहीं शायद क्योंकि हर कोई सोशल मीडिया पर घबराया हुआ लग रहा था। किसी बिरहन ने याद पिया की आये नहीं लिखा। खबर शहर से राजधानी पहुंच गई फोन आने लगे सब ठीक है , बरसात नहीं हो जैसे मुसीबत हो। ये टीवी चैनल वालों की शरारत है जो हर मौसम का मज़ा खराब कर दिया है अजीब अजीब भयानक शीर्षक देकर खबर के। बारिश के मौसम में बरसात नहीं होगी तो क्या लू चलेगी कुदरत को इल्ज़ाम देना अच्छी बात नहीं है। 

बरसात में कभी गरीब की झौंपड़ी को घबराहट हुआ करती थी , कोई सजनी साजन से लिपट जाती थी बिजली से डरने के बहाने। अब हैप्पी रैन से लगता है बारिश की नहीं रात की बात है बुरा हो इस नामुराद सोशल मीडिया का व्हाट्सएप्प पर संदेश लिखा कुछ पढ़ा कुछ जाता है। आई लव यू इतना सस्ता हो गया है कि पढ़ कर धड़कन बढ़ना तो दूर की बात लगता है रस्म निभाने की बात है। ऐसे में कोई आशिक़ पहले की तरह हाले दिल लिख बैठे तो उधर बिना पढ़े ही डिलीट कर ट्रैश के कूड़ेदान से भी बाहर कर देता है कोई। बारिश ने अमीर लोगों के अरमानों पर पानी फेर दिया है। होटल जाने का मन था मगर घर पर ही ऑनलाइन मंगवा खाना पड़ा है। आशिक़ बादल को चाहते हैं महबूबा को धूप से डर लगता है चेहरा ढक कर रखते हैं रंग काला नहीं पड़ जाये या मेकअप ही धुल गया पसीने में तो मुसीबत होगी कोई पहचान नहीं सकेगा। 

कितना अच्छा था अख़बार कम पढ़ने वाले कई होते थे चौपाल में मिल बैठते इक पढ़ा लिखा पढ़ कर बताया करता ताज़ा खबर और बाकी लोग सुनते रहते। अब हर कोई पढ़ लिख कर नासमझी का शिकार है खबर क्या है कोई नहीं जानता और अफ़वाह से लेकर बकवास तक को समाचार समझने लगे हैं। शिक्षित होने से समझ नहीं आती है और चिंतन मनन की आदत नहीं रही फुर्सत भी किसे है। यार मुझे क्या किधर क्या हादिसा हुआ लोग दुर्घटना को मनोरंजन समझने लगे हैं। सामाजिकता निभाने को दिन बना लिए हैं स्मार्ट फोन पर संदेश भेज औपचारिकता निभाई जाती है। हंसते हैं खुश नहीं होते और आंसू बहाते हैं दुःख दर्द का एहसास नहीं करते हैं। लगता है इंसान मशीन बन गया है जिस में हलचल होती है शोर भी सुनाई देता है संवेदना नहीं होती है। बाहर शीतल पवन चलती है और मैं मूर्खता कर रहा बंद कमरे में ये फालतू बात लिख रहा जिस को कोई पढ़ेगा भी नहीं। फेसबुक पर कभी लोग पढ़ते थे अब लाइक करने तक उपकार करते हैं शीर्षक से ही मान लेते हैं जो हम समझते हैं वही लिखा होगा। 

पुराने चावल की खुशबू हुआ करती है मगर अब बाज़ार में सब नकली है पुराने चावल खरीद लाए उस पर पिछले महीने की तारीख लिखी थी। चावल पुराने नहीं हैं बेचने वाली दुकान कितनी पुरानी है ये कहते हैं। ऐसे में कोई ढाबे वाला सौ साल पुरानी दाल खिलाता है कमाल की बात है। नदी से पानी बहता रहता है तो कोई उसको बता सकेगा ये कितनी सदियों से बहकर समंदर में जाता रहा है। समंदर जिस का नाम है सबसे प्यासा वही है उसकी प्यास बुझती नहीं कभी भी। उलझन ऊपर से नीचे तक वही है चलना सबको है राहें कितनी हैं मगर मंज़िल का अता पता किसी को नहीं है। मैं भी कब से खड़ा हूं वहीं पर जहां से चला था दुनिया बदल रही थी मैं देखता रह गया।

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