Saturday, 16 February 2019

कहां से कहां पहुंचे खोया क्या पाया क्या ( आत्मनिरीक्षण का समय ) आलेख - डॉ लोक सेतिया

कहां से कहां पहुंचे खोया क्या पाया क्या ( आत्मनिरीक्षण का समय )

                                          आलेख - डॉ लोक सेतिया 

    बस अब आतंकवाद को खत्म करने का वक़त आ गया है , ये ब्यान उस समय का है जब संसद पर आतंकी हमला हुआ था। तब समझ आया था तब तक आतंकवाद को खत्म करने का समय ही नहीं आया था। अपने घर को आग लगी तब समझ आया वर्ना देश जलता रहा शासक बंसी बजाते रहे। अमेरिका भी 11 सितंबर से पहले आतंकवाद को हथियार बेचने का कारोबार समझता रहा था। हमारे नेता हर समस्या पर उचित समय पर कदम उठाने की बात करते हैं। गरीबी भूख बदहाली खराब शिक्षा और स्वास्थ्य दवाओं को ठीक करने का वक़्त कभी नहीं आने वाला है क्योंकि राजनीति करने को इनकी बहुत ज़रूरत है। आतंकवाद पर कहते हैं पड़ोसी देश बढ़ावा देता है और सीमा पार से आतंकी आते हैं मगर क्या हमने आतंकवाद को अपने घर महमान बनाने की बात नहीं की है। अज़हर मसूद जैसे आतंकवादी को खुद कंधार ले जाकर रिहा करने का फल था संसद पर हमला। आज बात का विषय केवल आतंकवाद नहीं है और न ही किसी भी दल की सरकार की ही बात है बात देश के हर वर्ग की है केवल राजनेताओं की ही नहीं है आम नागरिक से कारोबार करने वाले नौकरशाही और उद्योग जगत के साथ टीवी अख़बार और समाज को दर्पण दिखाने वाले बुद्धीजीवी वर्ग की भी है। ये बेहद ज़रूरी है कि आज चिंतन और मनन ही नहीं किया जाये कि हमने आज़ादी के बाद क्या खोया क्या पाया है बल्कि अपनी गलतियों को स्वीकार कर उनको सुधारना भी होगा। अपनी महानता का डंका पीटना छोड़ खुद को सक्षम बनाना होगा और ऐसा आंखें बंद कर नहीं किया जा सकता है। 
       जिस देश की महिमा का गुणगान किया जाता है वो ऐसा तो नहीं था। झूठ मक्कारी बेईमानी ख़ुदपरस्ती और कर्तव्य पालन की नहीं अधिकारों और ताकत सत्ता धनबल के दुरूपयोग की खराब आदतों ने देश की जड़ों में दीमक की तरह खोखला करने का काम किया है सारी व्यवस्था को ही। देशभक्ति और साहस केवल भाषण देने बोलने और लिखने का नाम नहीं है। हम अन्याय अत्याचार के सामने घुटने टेकने के आदी होकर किसी भी तरह से मतलब पूरा करने में विश्वास रखते हैं। आतंकवाद हिंसा कोई भी किसी भी कारण करता है उचित नहीं ठहराया जाना चाहिए। पूर्वोतर की बात हो या पंजाब में हुए आतंकवादी हमले उनका कोई धर्म नहीं होता है मगर खेद की बात है आज भी कोई भिंडरावाले को संत बताता है तो किसी ने गोडसे का मंदिर बना रखा है। ये दोगलापन आतंकवाद को बढ़ावा देता है। हर सरकार दोषी है जनता की समस्याओं पर ध्यान नहीं देकर केवल सत्ता की राजनीति करते रहे हैं। बेशर्मी है कि देश की आधी आबादी को दो वक़्त रोटी नसीब नहीं और राजनेता और अधिकारी राजाओं की तरह विसालिता पूर्वक जीवन जीते हैं और अपने खुद के ऐशो आराम पर ही नहीं अपने झूठे गुणगान करने पर बेतहाशा धन खर्च करते हैं। जिस आज़ादी की बात भगतसिंह गांधी सुभाष ने सोची थी वो कहां है। हमने अपने पूर्वजों से अंगेरजी शासन की निर्दयता की बात सुनी है तो उनकी देश के धन को ईमानदारी से खर्च करने की भी मिसाल देखी है क्योंकि उनकी बनाई हुई इमारत पुल अवधि बीत जाने के बाद भी कायम रहे हैं जबकि हमारे नेताओं के अपने खास लोगों को ठेके देने की बात आम है जिस में घटिया सामान और अन्य कारणों से हादसे हुए हैं। जिस भी दल की सरकार जिस भी राज्य में रहती है उसके लोग लूट को अपना अधिकार मानते हैं। इतना ही नहीं बड़े बड़े नेता अधिकारी वर्ग को अपने दल के लोगों की बात नहीं मानने पर अंजाम भुगतने की बात तक कहते हैं। 
         हमारी पुलिस हमारे सभी विभाग के अधिकारी कर्मचारी अगर अपना कर्तव्य निष्ठा से और देश के लिए ईमानदार होकर निभाते तो शायद हालत बहुत हद तक अच्छी हो चुकी होती। मगर उनके लालच और स्वार्थ के साथ नेताओं की चाटुकारिता ने देश की दशा को बदहाली तक ला खड़ा किया है। हम आम लोग भी नियम कानून को तोड़ने में संकोच नहीं करते हैं मगर अपने देश के संविधान की उपेक्षा करने के बाद भी नेता अधिकारी और आम नागरिक खुद को देशभक्त कहते हैं। उद्योग जगत ने केवल अपने मुनाफे कमाने को उद्देश्य बना लिया है और तमाम करोड़पति लोग देश की खातिर कोई योगदान नहीं देते हैं अन्यथा हमारे देश की परंपरा रही है समाज कल्याण पर अपनी आमदनी खर्च करने की खुद अपने पर केवल ज़रूरत भर को खर्च करने की। धर्म के नाम पर भी संचय करने का कार्य किया है हर किसी ने और ये कहना अनुचित नहीं होगा कि सभी धर्म साधु संत वास्तविक उद्देश्य से धर्म के मार्ग से भटक गये हैं। कलाकार टीवी फिल्म वाले देश को जनता को जगाने और संदेश देने की जगह पैसा बनाने को टीआरपी और विज्ञापन जाल में उलझे रसातल को जाते जा रहे हैं। नारे लगाना जुलूस निकलना गीत गाना झंडा फहराना देशभक्ति क्या यही है या हम सभी को अपना सर्वस्व देश को अर्पित करने की वास्तविक देशभक्ति की ज़रूरत है। जिस दिन हम देश को बाकी सबसे अधिक महत्व देंगे और अपने पास और अधिक की लालसा को छोड़ सभी को समानता की बात का विचार करने लगेंगे शायद देश को सारे जहां से अच्छा बनाने की ओर उस दिन चलने लगेंगे।
             हम जिनको आदर देते हैं और जिनकी कही बात को आंखें बंद कर यकीन करते हैं उनकी बात सच साबित नहीं होने पर भी हम नहीं समझते कि उनकी कथनी और करनी अलग अलग है। किसी को याद है कभी किसी ने देश के सबसे बड़े पद पर होते इक सपना दिखलाया था कलाम जी ने 2020 में भारत से गरीबी भूख जैसी समस्याओं का अंत होने और हर नागरिक खुशहाल होगा ऐसी योजना पर काम करने का दावा किया गया था। अगले साल 2020 आने को है मगर देश की समस्याएं कम नहीं हुई बढ़ती गई हैं। देश के बड़े पद के नेताओं का काम झूठी तसल्ली देना और झूठे ख़्वाब दिखलाना नहीं होना चाहिए। और जब कोई ऐसा कहता है तो हम को उनसे सवाल करना चाहिए कि कैसे होगा और अगर नहीं हुआ तो किसकी ज़िम्मेदारी होगी। ये कहना कि गरीबी हटाओ अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे नारे केवल जुमले थे और वोट पाने को ऐसा              हम जिनको आदर देते हैं और जिनकी कही बात को आंखें बंद कर यकीन करते हैं उनकी बात सच साबित नहीं होने पर भी हम नहीं समझते कि उनकी कथनी और करनी अलग अलग है। किसी को याद है कभी किसी ने देश के सबसे बड़े पद पर होते इक सपना दिखलाया था कलाम जी ने 2020 में भारत से गरीबी भूख जैसी समस्याओं का अंत होने और हर नागरिक खुशहाल होगा ऐसी योजना पर काम करने का दावा किया गया था। अगले साल 2020 आने को है मगर देश की समस्याएं कम नहीं हुई बढ़ती गई हैं। देश के बड़े पद के नेताओं का काम झूठी तसल्ली देना और झूठे ख़्वाब दिखलाना नहीं होना चाहिए। और जब कोई ऐसा कहता है तो हम को उनसे सवाल करना चाहिए कि कैसे होगा और अगर नहीं हुआ तो किसकी ज़िम्मेदारी होगी। ये कहना कि गरीबी हटाओ अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे नारे केवल जुमले थे और वोट पाने को ऐसा करना पड़ता है तो देश की जनता से छल करना है। जिस देश के राजनेताओं को चुनाव जीतना ही सबसे बड़ा मकसद लगता हो उस देश का भगवान भी कुछ नहीं कर सकते हैं। विचारधारा नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देकर भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल होकर हमने खोया जो सब है वो बेहद कीमती था और जिसको पाने की बात करते हैं उसकी अहमियत कुछ भी नहीं मगर वास्तव में उसको भी पाया कुछ मुट्ठी भर लोगों ने है। चंद घरानों पर धन की बारिश और अधिकतर के हिस्से कुछ भी नहीं ऐसी व्यवस्था नहीं चाहिए थी। जिस समाजवाद की बात थी उसको कभी का छोड़ पूंजीवादी व्यवस्था अपनाने का अंजाम यही होना ही था। करना पड़ता है तो देश की जनता से छल करना है। जिस देश के राजनेताओं को चुनाव जीतना ही सबसे बड़ा मकसद लगता हो उस देश का भगवान भी कुछ नहीं कर सकते हैं। विचारधारा नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देकर भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल होकर हमने खोया जो सब है वो बेहद कीमती था और जिसको पाने की बात करते हैं उसकी अहमियत कुछ भी नहीं मगर वास्तव में उसको भी पाया कुछ मुट्ठी भर लोगों ने है। चंद घरानों पर धन की बारिश और अधिकतर के हिस्से कुछ भी नहीं ऐसी व्यवस्था नहीं चाहिए थी। जिस समाजवाद की बात थी उसको कभी का छोड़ पूंजीवादी व्यवस्था अपनाने का अंजाम यही होना ही था।

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