Saturday, 13 February 2016

प्रेम दिवस पर इक पत्र सभी महिलाओं के नाम पर ( कविता ) 112 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

नहीं लिख सका आज तलक ,
किसी को भी मैं कभी ,
कोई प्रेम पत्र  ,
किसी की ज़ुल्फों पर ,
गोरे गालों पर ,
किसी हसीना पर नहीं
तो किसी भोली सी लड़की पर ही ,
आ ही सकता था
अपना भी दिल सादगी को देख कर भी ,
कोई तो मिल ही जाती ,
देखता रहता जिसके सपने मैं भी ,
मुझे भी लग सकती थी कोई फूलों जैसी ,
चांद जैसी सुंदर ,
कोई समा सकती थी
मेरी भी बाहों में आकर चुपके से ,
लिख सकता था
कोई प्रेम कविता कोई ग़ज़ल किसी पर ,
किसी के इश्क़ में मैं भी
भुला सकता था सारे जहां को !
लेकिन नहीं कर सकता था
मैं ऐसा कुछ भी , क्योंकि ,
मुझे लगता रहा कुछ और
इस से कहीं अधिक ज़रूरी ,
मेरे सोचने को समझने को
और परेशान होने को हर दिन ,
देश की गरीबी ,
भूख , शोषण ,
अन्याय और भेदभाव ,
समाज का नकली चेहरा
और झूठ का व्योपार होता हुआ ,
जो नहीं हैं वही कहलाने की
हर किसी की चाहत होना ,
जिधर देखो सभी डूबे हुए
बस अपने स्वार्थ पूरे करने में ,
लोकतंत्र के नाम पर
जनता को छला जाना बार बार ,
देश में बढ़ता अमीरी और गरीबी के बीच का अंतर ,
शिक्षा स्वास्थ्य सेवा
समाज सेवा हर किसी का हाल ,
जैसे हर जगह बिछा हुआ हो
कोई न कोई जाल ,
इन सभी ने रहने नहीं दिया
मुझे कभी चैन से ,
कैसे लिखता तुम्हें
प्रेम पत्र ये बताओ तुम्हीं मुझे ,
या हो सके तो पूछना उनसे
जो करते हैं ये दावा ,
कि उनको है मुहब्बत
तुम में से किसी न किसी से ,
क्या उनको मुहब्बत है
अपने देश से समाज से ,
इंसानों से इंसानियत से
किया है कभी प्यार ,
है उनके दिल में दर्द औरों के लिये कोई तड़प ,
बिना ऐसे एहसास भला हो सकती है मुहब्बत।

4 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " मालिक कौन है - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Shanti Garg said...

सार्थक व प्रशंसनीय रचना...
मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है।

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

सर्वथा उचित प्रश्न ?

sunita agarwal said...

Sach hi hai ek mayaan me do talwaare nhi rah sakti :)