Saturday, 23 November 2013

डेमोक्रेसी का सपना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

कल रत मेरे सपने में वो आ गई जिसे मैं चाहता रहा हमेशा से। मैं जिसका दीवाना था। मेरे इतना करीब कि मैं छू सकता था उसे। मगर फिर वही पुरानी आदत कि मैं उसे कभी दिल की बात कह भी नहीं सका न अपना हाथ बढ़ा कर उसका दामन भी थाम न सका। नाम सुना था बहुत उसका मगर कभी नज़र आई नहीं थी कहीं वो। जैसे हर कुंवारे की कल्पना होती है ,कुछ उसी तरह हमारे मन में डेमोक्रसी की मोहिनी सूरत का ख्वाब पलता रहा। इसलिये जब विश्वस्त सूत्रों ने सूचना दी कि आ रही है वो , तो हम खुशी से फूले नहीं समाये और उसका स्वागत करने को तैयार हो कर बैठ गये। कहीं दूर से शोर सुनाई दे रहा था उसकी जय जयकार हो रही थी ,और  हम अपने घर से निकल कर सड़क पर चले आये। देखा हर कोई उसको फूलों की माला पहनाने को बेताब है। सब यही समझ रहे थे कि वो हमारे घर की शोभा बढ़ाने को आ रही है। तभी पता चला कि वो राजनेता की हवेली में प्रवेश कर गई और हवेली का द्वार बंद कर दिया गया उसकी सुरक्षा की बात कह कर। आम जनता बैठी रह गई उसकी सूरत को एक नज़र देखने की आस लगाये , और वो किसी बड़े घर की दुल्हन की तरह छिप गई हवेली के पर्दों के पीछे जाकर। सबने यही सोच अपना दिल बहला लिया कि जिसमें उसकी ख़ुशी हम भी उसी में खुश हैं। अब सभी के मन की मुराद वो कैसे पूरी करती , अबला की तरह।
     अचानक रात को हम राजनेता की हवेली के पीछे से गुज़र रहे थे कि हमें अंदर से रोने सुबकने की आवाज़ें सुनाई दी। हमने जाकर खिड़की से दरार में से भीतर झांका तो हमें अंदर का नज़ारा दिखाई दे ही गया।  अंदर नयी दुल्हन सी सजी संवरी डेमोक्रेसी इक कमरे में कैद थी और मुझे कोई बचाओ की गुहार लगा रही थी। मगर उसकी आवाज़ दब कर रह जाती थी हवेली के उस कमरे में ही। हमने भी सोच लिया कि चाहे जो भी हो आज हम डेमोक्रसी का हाल जान कर रहेंगे और भीतर जाकर मिलेंगे उससे। किसी तरह हम हवेली की दीवार को फांद कर पहुंच ही गये अपनी महबूबा के पास। राजसिंघासन जैसी सजी सेज पर सजी धजी बैठी डेमोक्रसी को देखा तो लगा हमारा सपना साकार हो गया है। हमने पूछा उससे कि इस शाही चमक दमक , इतने बनाव श्रृगांर के बावजूद भी तुम्हारे चेहरे पर उदासी क्यों दिखाई दे रही है हमें। इस भरी जवानी में किस बात की चिंता है तुम्हें , यहां हर कोई तो तुम्हारा चाहने वाला है। तुम्हारे लुभावने रूप की चर्चा है हर तरफ। नेता अफसर सब पल पल तुम्हारा नाम जपते हैं , तुहारी चाहत का दम भरते हैं। जनता में तुम्हारी सुंदरता की ऐसी छवि बनी हुई है कि तुम्हें पाना चाहती है अपना सब कुछ लुटा कर भी। तुमसे प्यार है देश की सारी जनता को , ऐसा लगता है कि तुम्हें कोई वरदान मिला हुआ है चिरयौवन का जो आज़ादी के छिहासठ साल बाद भी तुम्हारी सलोना रूप मोह रहा है सभी को।
                        मेरी बात सुनते ही आंसुओं से भर आई डेमोक्रसी को आंखें। कहने लगी ये सारा मेकअप है मेरे असली चेहरे को सब से छुपाने के लिये। मेरे चेहरे का रंग तो पीला पड़ चुका है और रो रो कर मेरी आंखों के नीचे काले धब्बे पड़ गये हैं। भ्रष्टाचार रूपी कैंसर मेरे फेफड़ों को खाये जा रहा है और मेरा दम तो खुली हवा में भी घुटने लगा है आजकल। मेरे पूरे बदन पर निशान हैं राजनीति से मिले अनगिनित ज़ख्मों के जो छुपे हुए हैं इस चमकीले खूबसूरत लिबास के भीतर। मेरी आत्मा लहुलूहान हो चुकी है , कब से सत्ता की हवेली में कुछ लोगों का दिल बहलाने को नाचकर। जैसे दहेज के लोभी ससुराल वाले अपनी दुल्हन को सताते हैं उसके परिवार वालों से धन ऐंठने के लिये , वैसा ही अत्याचार हो रहा हर दिन मुझ पर। ये सब नेता अफसर मेरे साथ अनाचार करते रहते हैं और बेचारी जनता किसी बेबस बाप की तरह चुपचाप सब देख कर भी कुछ नहीं कर पा रही है। जनता को समझ नहीं आ रहा कि अपनी इस राजदुलारी को कैसे बचाये।
                 मैंने कहा डेमोक्रसी अब ज़माना बदल चुका है , अब बहू पे अत्याचार करने वालों को बेटी के माता पिता सबक सिखा देते हैं। दुल्हन को जलाने वालों के विरुद्ध धरने परदर्शन किये जाते हैं। महिलाओं की रक्षा के लिये बहुत कड़े कानून लागू हो चुके हैं। तुम अपनी व्यथा अपना दुःख अपने माता पिता रूपी जनता को सुनाओ , आखिर कब तक भीतर ही भीतर घुटती रहोगी। डेमोक्रसी बोली तुम भी जानते हो दुनिया चाहे जितनी भी बदल चुकी हो महिलाओं की दशा नहीं बदली है आज तक। इसीलिये तुम्हें आज अपने पास बुलाया है ताकि तुम मेरी बात सुन कर सब को बताओ बाहर जाकर। मेरे साथ होते अत्याचार कि एफ आई आर दर्ज करवाओ , किसी तरह से मुझे इंसाफ दिलाओ। तभी हवेली के बाहर से डेमोक्रसी की जय जयकार के नारों की आवाज़ें सुनाई देने लगी थी , शायद रात खत्म होने को थी। अचानक मेरी नींद खुल गई और मेरा सपना टूट गया था। मेरे घर के बहार वोट मांगने वालों का शोर सुनाई दे रहा था।

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