नवंबर 27, 2019

POST : 1226 कितने क़ातिल हैं सच के ( सत्येंद्र दुबे की बात ) डॉ लोक सेतिया

  कितने क़ातिल हैं सच के (  सत्येंद्र दुबे की बात )   डॉ लोक सेतिया 

जाँनिसार अख़्तर जी की ग़ज़ल से दो शेर उधार ले रहा हूं । आज 27 नवंबर सच की खातिर जान देने वाले एक आई ए एस अधिकारी का जन्म दिन भी है और उनका क़त्ल भी इसी दिन किया गया था । 

                   इन्कलाबों की घड़ी है , हर नहीं हां से बड़ी है ।

                 कितनी लाशों पे अभी तक , एक चादर सी पड़ी है । 

कल संविधान दिवस था और हर साल की तरह संसद में इक औपचारिकता रस्म की तरह निभाई गई । संविधान की भावना की बात छोड़ो उसकी अस्मत से खिलवाड़ करने वाले बड़ी बड़ी बातें बिना किसी लज्जा संकोच कह रहे थे । जबकि लोकतन्त्र की रूह तक परेशान थी उसको कितनी बात कत्ल किया और दफ़नाया जा चुका है और जैसे किसी रोगी को अस्पताल वाले अपनी कमाई की खातिर धड़कन बंद सांस नहीं चलती फिर भी वेंटीलेटर पर मुर्दा लाश की तरह ज़िंदा रखे हुए होते हैं ठीक उस तरह नेता सत्ता की खातिर करते रहे हैं । ये विडंबना की बात है कि हम लोग ऐसे वास्तविक ईमानदार देशभक्त और भ्र्ष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले अधिकारी को याद नहीं रखते और जिन लोगों ने अपना कर्तव्य नहीं निभाया उनको सच के क़ातिल होने की कोई सज़ा नहीं दिलवा सके हैं   । आज आपको उस आदर्श आईएस अधिकरी की वास्तविक जीवनी से अवगत करवाते हैं। 

                         सत्येंदर दुबे जी


             


                                   जन्म              2 7 नवंबर 1 9 7 3

                              कत्ल हुआ        2 7 नवंबर  2 0 0 3

 

सत्येंदर दुबे जी एक अधिकारी थे , इंडियन इंजिनीरिंग सर्विस ऑफिसर , प्रोजेक्ट डायरेक्टर नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया कोडरमा । उनको गया बिहार में जान से मार दिया गया था क़त्ल कर उनके ठीक जन्म दिन को ही तीस साल की आयु में ।

   हुआ ये था कि उन्होंने जब राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना में बहुत भ्र्ष्टाचार देखा और तमाम कोशिश करने के बाद भी रोकना संभव नहीं लगा तब उन्होंने एक सरकारी आला अधिकारी रहते एक गोपनीय पत्र पी एम ओ को भेजा विस्तृत जानकारी देते हुए । नियमानुसार उस खत को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी को ही पढ़ना था । मगर उस गोपनीय सूचना की बात को पी एम ओ से सड़क माफिया तक पहुंचाया गया और उन भ्र्ष्टाचारी लोगों ने सत्येंदर दुबे जी को क़त्ल कर दिया था । मगर कभी भी वास्तविक दोषी उन लोगों को कोई सज़ा नहीं मिली जिन्होंने उनके गोपनीय पत्र को माफिया तक पहुंचाया । और आज भी ये व्यवस्था उसी ढर्रे पर चलती है क्योंकि उसमें रत्ती भर भी बदलाव लाने की कोशिश ही नहीं हुई है ।  आखिर में इक शेर मेरी ग़ज़ल से लेकर सत्येंदर दुबे की आत्मा जो सवाल पूछती है कहना चाहता हूं ।

                                  तू कहीं मेरा ही क़ातिल तो नहीं ,

                                   मेरी अर्थी को उठाने वाले । 

 

एक ईमानदार IES अधिकारी : सत्येन्द्र दुबे || Biography of satyendra dubey ||  SUPERTOP - YouTube


नवंबर 25, 2019

POST : 1225 खज़ाना ले भागा खजांची बन ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   खज़ाना ले भागा खजांची बन ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   ये कहानी अलग है और बिल्कुल नई है इस का चौकीदार चोर है कथा से कोई संबंध नहीं है। इक परिवार के मुखिया चाचा और चाचा के भरोसे के भतीजे की आपसी बात है। घर की तमाम जायदाद के 54 दस्तावेज़ राजनीतिक दल के विधायकों की तरह अनमोल सत्ता की चाबी जैसे भतीजे की जेब में सुरक्षित रखने को चाचा ने सौंपे थे। मगर अचानक नीयत खराब होने से भतीजे ने उन दस्तावेज़ों को चुपके से किसी दुश्मन को ऊंची कीमत लेकर बेच दिया। चाचा को जब तक खबर होती दस्तावेज़ उपयोग कर दुश्मन की मालिकाना हक कानूनी ढंग से हासिल हो चुका था। कुछ खास लोग अपनी शिकायत पुलिस थाने नहीं लिखवाते हैं उनकी सीधी पहचान कमिश्नर तक होती है और उनका मुकदमा बड़ी अदालत छुट्टी के दिन भी सुनवाई करने को मंज़ूर करती रहती है। यहां भी वही बात है अदालत को सब खबर है फिर भी उसको संविधान न्याय से अधिक चिंता इस बात की है कि जिनके दस्तावेज़ चोरी हुए उन्होंने अर्ज़ी उस की नहीं बल्कि ये की थी कि जिस ने उन दस्तावेज़ों को देख कर किसी को सत्ता के ताले की चाबी सौंपी थी उस के आदेश को अनुचित घोषित कर निरस्त करना है। जबकि संबंधित अधिकारी के वकील अदालत को बता रहे हैं कि ये उनके मुवकिल का सरदर्द नहीं है कि जिन लोगों ने दस्तावेज़ हस्ताक्षर कर भतीजे को दिए थे उनकी सहमति उचित थी या नहीं थी। और अगर चाचा की जायदाद के कागज़ात किसी पावर ऑफ़ अटॉर्नी का अनुचित ढंग से उपयोग है तो ये चाचा भतीजे का आपसी मामला है। मगर अदालत को ऐसे दस्तावेज़ों से मिले अधिकार को लेकर कोई विचार नहीं करना चाहिए और अगर ये कोई धोखा है हेराफेरी है तो खुद वही अधिकारी इस पर उचित करवाई करने की आज़ाद है मगर कोई समय सीमा अदालत को तय नहीं करनी चाहिए। उधर हर कोई कीमती जायदाद की तरह अपने पास के सामान की सुरक्षा करने का काम कर रहा है ताकि दुश्मन कोई छीनाझपटी जैसी गुंडागर्दी या फिर कोई और ढंग नहीं अपना सके। जिनको सत्ता की चाबी मिली है जानते हैं उनकी ज़मीन पांव तले से निकल चुकी है मगर समय मिल जाये तो संभलने की उम्मीद रखते हैं या फिर चाबी वापस करने की ईमानदारी नहीं कर सकते क्योंकि नीयत खराब हो जाती है तो लाज शर्म की परवाह नहीं करते हैं। धड़कन सभी की बढ़ी हुई है सांसे फूलने लगी हैं जान अटकी हुई है और अदालत ने मामला और चौबीस घंटे को टाल दिया है।
    
   अदालत कहती है कोई उसको ये सुझाव नहीं दे सकता कि जो भी अनुचित कार्य किया जा चुका है उसको किस तरह से सुधारा जा सकता है। अदालत को अपने आदर की चिंता हमेशा रहती है और ज़रा सी बात अदालत की अवमानना की तलवार का शिकार हो सकती है इस डर से सभी सच बोलने की जगह खामोश रहना उचित समझते हैं। जान है तो जहान है कोई ओखली में सर नहीं डालना चाहता खासकर जब ऊपर सुनवाई की कोई उम्मीद ही नहीं हो। अदालत को पता चल चुका है कि आज जिन लोगों ने किसी को लिखित अपने अधिकार सौंपे थे इरादा बदल चुके हैं और कानून ये भी साफ है कि पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी देने वाला जब भी भरोसा नहीं रहे अपने दिए अधिकार वापस लेने का ऐलान कर सकता है। अगर ऐसा हुआ तो जिस ने भी भरोसा तोड़ा उसको भविष्य में कोई भी कार्य करने की इजाज़त नहीं होगी। मगर यहां दग़ाबाज़ भतीजा दस्तावेज़ के दम पर बयनामा कर चुका है और अभी जायदाद को उनके नाम कर सकता है जिनसे सौदेबाज़ी की है। ये इक अजब ढंग की मिसाल बन जाएगी अगर अदालत जानते समझते हुए किसी के अनुचित तरीके से दस्तावेज़ का गलत उपयोग करने वाले लोगों को रोकने को कठोर कदम नहीं उठती बल्कि उनका साथ देती है न्याय की साख को दांव पर लगाकर। वास्तविक अधिकारी लोग बंधक बन जाएंगे और जिसे खज़ाने की रखवाली को खजांची नियुक्त किया था दस्तावेज़ हथिया कर खुद को असली मालिक घोषित कर सकेगा। अर्थात खुद अदालत और कानून खज़ाने की हेराफेरी लूट या उस पर कब्ज़े को अनदेखा कर बंदरबांट की आधुनिक कथा लिख सकती है। और मुमकिन है भविष्य का इतिहास अदालत को गलत परंपरा कायम करने का मुजरिम करार देने की बात कहे।

नवंबर 21, 2019

POST : 1224 उड़ने की चाह में इरादे बदल जाते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

       उड़ने की चाह में इरादे बदल जाते हैं ( ग़ज़ल ) 

                       डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

उड़ने की चाह में इरादे बदल जाते हैं 
पांव चलते हुए अचानक फिसल जाते हैं । 

अब मुहब्बत कहां , तिजारत सभी करते हैं 
अब तो क़िरदार रोज़ सारे बदल जाते हैं । 

ढूंढती हर शमां नहीं मिलते वो परवाने 
आग़ में प्यार की जलाते हैं जल जाते हैं । 

आस्मां पे नहीं ज़मीं पर नज़र रखते हैं 
राह फ़िसलन भरी कदम खुद संभल जाते हैं । 

फिर उसी मोड़ पर मुलाकात नहीं हो उनसे 
हम झुका कर नज़र उधर से निकल जाते हैं । 

दब गई राख में चिंगारी बनी जब शोला 
तेज़ आंधी चले महल तक भी जल जाते हैं । 

अब वहां कुछ नहीं न शीशा न साकी फिर भी 
देख कर मयक़दे को "तनहा" मचल जाते हैं । 
 

 
 


 

नवंबर 20, 2019

POST : 1223 शायरी हमने की , आशिक़ी हमने की ( ग़ज़ल ) लोक सेतिया "तनहा "

शायरी हमने की , आशिक़ी हमने की ( ग़ज़ल ) लोक सेतिया "तनहा "

शायरी हमने की , आशिक़ी हमने की 
इस तरह उम्र भर , बंदगी हमने की । 

हर सफर पर नये दोस्त बनते रहे 
जो जहां पर मिला दोस्ती हमने की । 

ज़ख्म भी दर्द भी हर किसी से मिले 
पर न घबरा कभी ख़ुदकुशी हमने की । 

मैं खिलौना सभी मुझसे खेला किए 
आप अपने से भी दिल्लगी हमने की । 

सी लिए लब सदा कुछ नहीं कह सके 
बोलने की नहीं ,  भूल भी हमने की ।

हम सितारे , ज़मीं पर बिछाते गए
चांदनी कह रही , बेरुखी हमने की ।

की वफ़ा फिर भी खुद बेवफ़ा बन गया 
भूल हर बार "तनहा" वही हमने की ।
 

 


नवंबर 18, 2019

POST : 1222 गर्दिश में सितारे ( लघु कथा ) डॉ लोक सेतिया

     गर्दिश में सितारे ( लघु कथा ) डॉ लोक सेतिया 

 साहिल की ज़िंदगी में पांच लड़कियां आईं मगर जाने क्यों किसी से भी बात जीवन भर को साथ निभाने तक नहीं पहुंची। पचास का होने पर भी अविवाहित ही है। अपनी डायरी से अपने नाकाम इश्क़ के किस्से पढ़ता रहता है। ऐसे में जब पहली बार इक महिला से कहानी अंजाम तक पहुंचने लगी तो उसने मालिनी को अपने अतीत की हर बात बताने को अपनी निजि डायरी जिसे कभी किसी को पढ़ने तो क्या छूने भी नहीं देता था दे दी और कहा शायद ये मेरा आखिरी इश्क़ है क्योंकि इस से पहले मैंने कभी किसी को ऐसे पागलपन की हद तक नहीं चाहा था। और जब भी जिसने रिश्ता नहीं निभाना चाहा मैंने स्वीकार कर लिया था कि शायद मेरे नसीब में मुहब्बत मिलना नहीं है। तुम मेरी डायरी पढ़ कर फिर सोच कर निर्णय करना कि क्या तुम भी वही पुरानी कहानी नहीं दोहरानी है। मालिनी भी साहिल को उतना ही चाहती है मगर फिर भी उसने सोचा कि यही अच्छा होगा साहिल की ज़िंदगी की वास्तविकता को जानकर ही विवाह का फैसला किया जाये। 

   अभी कॉलेज की पढ़ाई पूरी नहीं की थी जब बिंदु जो पड़ोस में रहती थी उसने खुद प्यार की बात करने को पहल की थी। मगर साहिल ने अभी सोचा ही नहीं था और पढ़ाई पूरी करने के बाद विचार करने को कहा था। हंसी मज़ाक की बात होती रहती थी मगर कुछ महीने बाद बिंदु की सगाई हो गई और विषय का अंत हो गया था। कुछ समय बाद किसी रिश्तेदार ने हंसिनी से उसके दफ्तर में साहिल को ले जाकर मुलाकात करवाई और कहा जब तक साहिल की नौकरी नहीं लगती खत लिख कर संबंध रख सकते हैं। फिर साल भर बाद हंसिनी के विवाह का निमंत्रण पाकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि खत का जवाब मिलना बंद होते ही आशंका होने लगी थी। अमृता से अचानक मिलना हुआ जब एक साथ इक जगह काम करने पर साथ आना जाना पड़ा और राह चलते बात होने लगी मगर दिल की बात कह नहीं सके दोनों ही। अचानक अमृता ने दफ्तर आना बंद कर दिया और जैसे कोई खो जाता है कुछ भी बताये बिना , मगर कोई वादा नहीं हुआ था दोनों में कभी। साहिल को थोड़ा एहसास हुआ जैसे कोई दोस्त नहीं मिले कुछ दिन तो याद आती है। फिर शायद पहली बार खुद किसी ने पसंद करती हूं कह कर हैरान कर दिया था। दो साल नाता रहा और लगता है जैसे बहाने बनाकर रचना इंतज़ार करती रही साहिल के और अच्छी नौकरी मिलने का मगर जब इंतज़ार नहीं किया गया तब इक कारोबारी से घरवालों की मर्ज़ी से शादी कर ली थी। साहिल अपनी नौकरी छोड़ दूर चला आया था और दस साल से अकेला रहने लगा मन से विवाह की बात ही भुला दी थी। उर्मिला से जान पहचान हुई तो उसने शर्त रखनी चाही जो साहिल ने मंज़ूर नहीं की थी। हर नाता कुछ दिन महीने या एक साल भर बाद टूट गया था। 

  मालिनी ने साहिल की डायरी से उसके जन्म की तारीख समय स्थान देख कर लिख लिया और अपने पंडित जी को जाकर कुछ भी नहीं बता कर ज्योतिष के अनुसार साहिल को लेकर कुंडली बनवाई। पंडित जी ने बताया कि साहिल का रिश्ता जिस भी लड़की से टूटता रहा वास्तव में ऐसी पांच लड़कियों की कुंडली में विधवा होने की संभावना रही है। मगर साहिल की आयु लंबी है तभी उन से विवाह तय नहीं हुआ और वो लड़कियां विवाह के कुछ साल बाद सुहागिन नहीं रही। वास्तव में साहिल के सितारे गर्दिश में कभी नहीं थे बल्कि खुशनसीबी है जो अविवाहित रहा अभी तक। मगर तुम उनसे अलग हो क्योंकि तुम सदा सुहागिन होने के सितारे पाकर आई हो साहिल के जीवन में। और ऐसे उनका विवाह हो गया था और अब दोनों साथ साथ ख़ुशी से रहते हैं। साहिल के सितारे अच्छे हैं तभी पांच पांच बार उन कश्तियों से किनारे लगने से पहले किसी मझधार में डूबने से बचता रहा है।

POST : 1221 पुरानी मुहब्बत की तलाश में ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

     पुरानी मुहब्बत की तलाश में ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

तुम मेरी महबूबा हो ,
मुझे प्यार है तुमसे दिल्ली । 

कभी नहीं भूलती पहली मुहब्बत ,
मेरा दिल हमेशा यहीं कहीं रहा है ,
माना 45 साल बीत गए हैं बिछुड़े ,
जैसे कोई मुसाफिर भटक गया हो ,
अपनी मंज़िल की राह से किसी दिन ,
और भूल गया हो राह अपने घर की ,
मगर याद अपनी मुहब्बत की साथ ,
लेकर करता रहा लौटने की दुआएं। 

फिर ढूंढता फिरता हूं बिछुड़े कारवां ,
के धुंधले से कदमों के निशानों को अब ,
इधर भी उधर भी चला था जिधर भी ,
वो अचानक आना यहीं रह जाना मेरा ,
तुम भूल गईं हो नहीं भुलाया है मैंने ,
कहीं बहुत दूर से कितनी बार तुझको ,
देकर आवाज़ दिल्ली बुलाया है मैंने। 

जाने क्यों बदनाम करते हैं तुझको लोग ,
बदल गई है पुरानी ग़ालिब की दिल्ली ,
मुझे अभी तक तेरी हर गली कूचे में ,
हवा में भीनी भीनी पहचानी खुशबू वो ,
कहीं न कहीं से कोई झौंका बनकर के ,
सांसों को महकाती है ताज़गी देकर के ,
लगता है फिर से जीने लगा हूं जैसे ,
मिलते हैं दो आशिक़ कहानी में आखिर। 

मुझे अपनी आगोश में फिर से ले लो ,
गले से लगा लो अपना बना लो तुम ,
माना बाल मेरे सफ़ेद हो गए हैं और ,
ढलती उम्र के निशां चेहरे पे उभर आए ,
अपनी बाहें पसारे सबको अपनाती रही ,
तुम मेरी चाहत हो जानती हो ये बात ,
कोई कैसे समझे किस किस को समझाए ,
वो दिन वो समां था कितना सुहाना जब ,
जवानी के पल साथ साथ हमने बिताए। 

तुम्हीं मेरी मंज़िल हो मेरी जान दिल्ली ,
मुझे कोई गैर अजनबी मत समझ लेना ,
तेरी मिट्टी की खुशबू अभी तक भी मुझे ,
वही बारिश के मौसम सी महकती हुई सी ,
धड़कन में नाम तेरा दोहराता रहा हूं मैं ,
कितनी बार आने की आरज़ू में करीब आ ,
बिछुड़ता रहा  दूर तुझसे जाता रहा हूं मैं।

पर मेरा आखिर ठिकाना है मेरी दिल्ली ,
तू रूठी हुई है तुझको मनाना है दिल्ली ,
नहीं बिन तेरे मुझे कोई  भाया है दिल्ली ,
ये सच है यकीं तुझे दिलाया है दिल्ली ,
कोई नहीं मैंने बहाना बनाया है दिल्ली ,
लग रहा फिर तुम्हीं ने बुलाया है दिल्ली।


नवंबर 16, 2019

POST : 1220 सर्वोच्च न्यायालय के गांव की पंचायत की तरह का फैसला ( मत-अभिमत ) डॉ लोक सेतिया

     सर्वोच्च न्यायालय के गांव की पंचायत की तरह का फैसला 

                ( मत-अभिमत ) डॉ लोक सेतिया 

खामोश रहना उचित नहीं होता है मगर कभी अत्याधिक शोर से भी बचना चाहिए। तभी इस संवेदनशील विषय पर कुछ समय विचार करने के बाद अपना मत रखने जा रहा हूं। आस्तिक हूं मगर धर्म को लेकर कभी भी कट्रता को स्वीकार नहीं किया है। मुझे मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे इक समान लगते हैं और मेरा अभिमत है कि धार्मिक आस्था व्यक्ति का निजि विषय है और सरकार कानून अदालत को निरपेक्ष होकर कार्य करना चाहिए। 

     ये उचित परंपरा नहीं हो सकती कि बिना नियम कानून और तर्क के बहुमत की राय को स्वीकार कर लिया जाये। संविधान सबको बराबर की आज़ादी देता है इसलिए बिना सोचे समझे किसी की बात को विरोधी समझ कोई अनुचित आरोप नहीं लगा देना चाहिए। मगर ऐसा लगता है अब कुछ लोग यही करते हैं और उचित बात कहने पर देशभक्ति पर सवाल खड़े करने लगते हैं। 

  इक आई एस अधिकारी ने अपना पद छोड़ दिया सरकारी निर्णय को अनुचित समझते हुए। उनका भाषण उनकी बात सुनने लायक हैं। 


   इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय के अयोध्या विवाद पर निर्णय पर इक रिटायर न्यायधीश ने विचार व्यक्त किये हैं जो सोचने को विवश करते हैं। उनकी कही बातों को समझने की कोशिश करते हैं। कुछ बातें हैं जिन पर विचार करते हुए अपनी आस्था विश्वास और चाहत को किनारे रख कर देश के संविधान की भावना को समझना ज़रूरी है। 

      अदालत एक तरफ कहती है उसको आस्था को लेकर कोई निर्णय नहीं करना और विवाद कानूनी मालिकाना अधिकार का है। फिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ए एस आई का जांच करना आधार बनाना इस को लेकर कि सैंकड़ों साल पहले उस जगह क्या था क्या होता था निर्णय को प्रभावित कैसे कर सकता है। देश की आज़ादी के बाद संविधान लागू किया गया और देश की अदालत और कानून को उसके बाद उसके अनुसार विचार करना उचित होता क्योंकि इस तरह से देश भर में कितनी इमारतें भवन निर्मित हुए कितने शासकों के शासनकाल में। केवल इस बात को सोचकर कि बहुमत की अवधारणा और राय किस पक्ष में होगी निष्पक्ष होकर निर्णय नहीं किया जा सकता है। पहले भी सत्ताधारी शासक नेताओं द्वारा अपनी पसंद के लोगों को नियुक्त कर अपनी मर्ज़ी के सुविधाजनक निर्णय करवाए जाते रहे हैं। 

 इतिहास की आंखों ने वो मंज़र भी देखे हैं 

लम्हों ने खता की थी और सदियों ने सज़ा पाई।


नवंबर 09, 2019

POST : 1219 कौन हैं मेरे मम्मी-पापा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     कौन हैं मेरे मम्मी-पापा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   बड़ी प्यारी सी बच्ची है तुतली ज़ुबान में बोलती हुई सवाल पूछती है कोई मेरे मम्मी-पापा का नाम पता बताओ मुझे अनाथालय में छोड़ गया जो जन्म देते ही वो कौन था। स्कूल में पढ़ाई करने जाना चाहती है आधार कार्ड बनवाना ज़रूरी है समझो कितनी मज़बूरी है। सरकारी ऐलान है नोटबंदी हुई बदनाम है काली कलूटी उसका नाम है पर उसका रंग गुलाबी है छुपे खज़ाने की चाबी है काला धन कहां छिपा है तूं तूने की सब बर्बादी है। धन काला मिला नहीं इसका कोई गिला नहीं पर जो तीन साल की बच्ची है ये अक्ल की कच्ची है राजनीति से वाकिफ़ नहीं सरकार से पहचान नहीं ये जायज़ संतान नहीं। सच इसको समझाए कौन काला धन खोज लाये कौन। रोटी से जो खेलता है उसका पता बताये कौन संसद इस सवाल पर आखिर रहेगी कब तलक मौन। चलो हम मिलकर जन्म दिन मनाते हैं हैप्पी बर्थडे टू यू गाते हैं बच्ची का दिल बहलाते हैं। 

        मोदी जी आएंगे आकर तुझे खिलाएंगे जब रात आठ बज जाएंगे गले तुझको लगाएंगे। तुझे पढ़ाया जायेगा तुझको सबसे बचाया जायेगा बच्ची तू इतिहास नहीं वर्तमान है भविष्य बनाया जायेगा। हम गुब्बारे बहुत फुलाएंगे पार्टी राह पर मनाएंगे केक भी कटवाना है मोमबत्ती बुझवाना है ताली बजाकर हैप्पी बर्थडे टू यू गाना है। मोदी जो तोहफ़ा लाएंगे सबको ये सच बतलाएंगे खाते में कितना धन डलवाएंगे हम मालामाल हो जाएंगे। मोदी जो ने फ़रमाया है पांच साल व्यर्थ गंवाया है अब दूर की कौड़ी लानी है की अब तक मनमानी है। अध्यापक जी समझाएंगे नोटबंदी की बात बताएंगे पूरी कहानी सुनाएंगे हम झूमेंगे और गाएंगे तीन साल का जश्न मनाएंगे। जन्म दिन तुम्हारा मिलेंगे लड्डू हमको गीत बजवाएंगे , तुम जियो हज़ारों साल जिओ वाले मुस्कुराएंगे। थक कर खुद सो जाएगी ये बच्ची भूखी प्यासी सपनों में खो जाएगी। सरकार आपको बधाई हो प्यारी सी बिटिया आई है गूंगी नहीं है खामोश है लगता है देख आपको घबराई है। 

    मोदी जी कहते हैं नोटबंदी करने का फायदा तीन साल बाद नज़र आया है। दुश्मन मुल्क़ में महंगाई आसमान छूने लगी है। अब अपने देश का इस में क्या भला हुआ अपनी समझ से बाहर है ये कुछ उस तरह है कि मेरी पोशाक मैली है मगर देखो मैंने दुश्मन की गंदी कर दी है। अर्थात मोदी जी चले थे सफाई करने मगर मैल छुड़ाने नहीं आता था गंदगी करना आसान था औरों को अधिक मैला कर खुद की चमक बढ़ाने का दावा कर लिया। मैल कपड़े का धुल जाता है मन का मैल साफ करने को कोई साबुन नहीं बना है। संसद की चौखट पर माथा टेका था याद होगा अब मन से सोचना पांच साल में कितना मन का मैल छुड़ाया , बस कपड़े बदलते रहे दिल की सफाई नहीं की। अब मानो न मानो नोटबंदी आपकी दी सौगात है और अपने किसानों को फसल का दुगना दाम देने का वादा किया था मगर हरियाणा के सीएम साहब पानीपत की अनाज मंडी में आकर किसानों की बर्बादी की बात पर बोलते हैं तो हम क्या करें। भले भी हम बुरे भी हम समझिओ न किसी से कम , हमारा नाम बनारसी बाबू। बनारस के ठग मशहूर हुआ करते थे ये गुजरती तो बनारस वालों का भी बाप निकला। बनारस वालों को गंगा मईआ के नाम पर ठग गया और शरद जोशी के मामा जी की तरह हम घाट किनारे खड़े हैं तौलिया लपेटे पूछते हैं देखा है उसको जो हमारे कपड़े सामान ले गया उल्लू बनाकर।

     कहावत है इक बार सच और झूठ नदी में नहाने को गए। झूठ जल्दी से बाहर निकला और सच के कपड़े पहन चल दिया। सच बाहर निकला तो उसके कपड़े नहीं थे और झूठ के पहन नहीं सकता है तभी से सच नंगा है। नोटबंदी बिटिया की दर्द भरी कहानी ऐसी ही है , तीन साल से हर कोई उसको बुरा बता रहा है और धुत्कार खाती फिरती है अपने जन्मदाता को ढूंढती जो शायद उसको अपना समझना तो क्या पहचानना भी नहीं चाहता है। जन्मदिन पर भी उदास है रोते रोते सो गई है।

नवंबर 02, 2019

POST : 1218 इक नज़र बीते ज़माने पर और इक नज़र कल के भविष्य पर ( बदलते हुए एहसास ) डॉ लोक सेतिया

   इक नज़र बीते ज़माने पर और इक नज़र कल के भविष्य पर 

                         ( बदलते हुए एहसास ) डॉ लोक सेतिया

 रिहाई की बात नहीं है रिहा होने की आरज़ू भी कभी की भूल गई। थोड़ा बदलते समय के दौर पर सोचा तो फुर्सत में किसी फिल्म की तरह फ्लैशबैक की तरह यादें चली आईं। ज़िंदगी अपनी हरदम किसी कैद में रहते गुज़री है कैदी यही रहा सय्याद बदलते रहे। आदमी को इतना भावुक और संवेदनशील भी नहीं होना चाहिए कि जीना दूभर होता जाये। हंसना चाहो तब भी आंखें नम हो जाएं और हर किसी से अश्क़ छिपाने की ज़रूरत हो या फिर ख़ुशी के आंसू हैं बताना पड़ जाये। मगर कुदरत भी कभी ठोस पत्थरीली ज़मीन पर कोई नाज़ुक सा फूल उगा देती है शायद मुझे यही मिला नसीब से। पत्थरों में रहकर भी फूल कोमलता बरकरार रखता है नहीं बन सकता पत्थर दुनिया की तरह। 

     कैद खुद अपनी भी बनाई हुई है और रिहा होने को कोशिश भी खुद ही करनी होगी इस बात को जानता हूं मगर होता है कभी जीवन भर पिंजरे में रहते रहते पिंजरा भाने लगता है। कोई पिजंरे का दरवाज़ा खोल देता है फिर भी मन बाहर नहीं निकलता और मुमकिन है कोई पकड़ कर खुली हवा में उड़ा दे तब भी पंछी खुद अपने पिंजरे में वापस लौट आये। बोध कथा की तरह। पर ये भी सच है पिंजरा चाहे सोने का हो या चांदी का बना पिंजरा पिंजरा ही होता है पंछी उड़ने को बेताब रहता है। मगर सय्याद ने जब पंख ही तोड़ डाले हों तब पंछी छटपटा भी नहीं सकता उड़ना तो दूर की बात है। 

   मुझे कैद रखने वाले समझते रहे मुझसे मुहब्बत करते हैं मेरा ख्याल रखते हैं मुझे सब दुनिया से बचाकर रखना ज़रूरी है। पिंजरे में बंद पंछी का चहकना अपने अंदर कितना दर्द छुपाये रहता है कोई नहीं समझता है। आज़ाद होने की ख्वाहिश रहती थी कभी अब नहीं बची शायद नियति को मंज़ूर कर लिया है। कितने साल जिस घर में रहा अपना था मगर लगता नहीं था अपना उस से बिछुड़ते समय पता नहीं उदासी का अर्थ क्या था मगर मन उदास उदास था अवश्य। 

    दुनिया की तेज़ रफ़्तार ने सुबह से शाम तक कितना लंबा सफर तय कर लिया और मैं खुद अपने पिंजरे को साथ लिए नई अजनबी दुनिया में चला आया नहीं सोचा समझा कुछ भी। अब उलझन पड़ी है सब बदला बदला है और मुझे समझाया जा रहा है नए माहौल में बदले तौर तरीके यहां की भाषा तहज़ीब सीखनी होगी। उनकी बात सुन सकता हूं अपनी कहनी नहीं आती है ऐसे में किस तरह बताऊं सीखने को जितना है जीने को उतना वक़्त भी शायद बचा नहीं है। आपके इशारे समझते समझते जाने कब कोई इशारा मिल जाये और भीतर का पंछी उड़ जाए अपनी आखिरी मंज़िल की तरह सुहाने सफर पर। 
 

 

 


अक्टूबर 31, 2019

POST : 1217 मेरा लिखना क्या क्यों कैसा ( आलेख-अपनी बात ) डॉ लोक सेतिया

 मेरा लिखना क्या क्यों कैसा ( आलेख-अपनी बात ) डॉ लोक सेतिया 

   कहानी हो ग़ज़ल हो बात रह जाती अधूरी है , करें क्या ज़िंदगी की बात करना भी ज़रूरी है। 

   मेरी ग़ज़ल का मतला है बहुत पहले लिखा था। कई बार पहले सोशल मीडिया पर और व्यक्तिगत तौर पर भी मिलने वालों को बताया है कि मैंने लिखने की शुरुआत 1974 में नियमित रूप से इक मकसद को लेकर की थी। इक मैगज़ीन में कॉलम पढ़कर जिस में संपादक ने सभी से कहा था की शिक्षित होने पर अपने खुद घर परिवार को छोड़कर कोई न कोई काम देश समाज की भलाई को लेकर करना भी इक कर्तव्य है समाज से जो भी मिला उसका क़र्ज़ उतारने के लिए। डॉक्टर होने से साहित्य को पढ़ने का अवसर कम मिला बस इधर उधर से थोड़ा बहुत ही पढ़ा है। समाज की जनहित की बात लिखते लिखते व्यंग्य कविता कहानी ग़ज़ल आलेख लिखता गया जब जिस विषय पर जो भी विधा उचित लगती रही। लिखने के स्तर को लेकर हमेशा से मुझे मालूम रहा है कि ग़लिब दुष्यंत परसाई शरद जोशी मुंशी प्रेमचंद अदि को सामने कुछ भी नहीं हूं न बन सकता हूं। साहित्यकार होने का भ्र्म नहीं पाला दिल में और नाम शोहरत ईनाम पुरुस्कार की चाहत रही नहीं। लिखना मेरे लिए जीना है सांस लेने की तरह ज़रूरी है। नहीं रह सकता लिखे बिना। मैंने जितना जो भी लिखा ज़िंदगी की बातों से अनुभव से और निष्पक्षता से समाज की वास्तविकता को उजागर करने को लिखा और बगैर इसकी चिंता किये लिखता रहा कि किसी और के तो क्या खुद मेरे भी ख़िलाफ़ तो नहीं। मेरा पहला व्यंग्य " उत्पति डॉक्टर की " अपने ही व्यवसाय पर तीखा कटाक्ष था। अभी तक कोई किताब नहीं छपवाई मगर अख़बार मैगज़ीन लोगों को समाजिक संस्थाओं से नेताओ अधिकारियों को लिख कर जहां जो भी समस्या थी विसंगति थी गलत हो रहा था लिखकर भेजता रहा। 

        जो लोग किताबें पढ़कर दुनिया समाज को समझते हैं किताबी साहित्य के मापदंड और नियम आदि की चिंता करते हैं उन्हें कभी मेरे लिखने पर उलझन होती है। सीखा है कई तरह से लिखने को सुधारने की कोशिश करता रहता हूं मगर उपदेशकों की ज़रूरत नहीं लगती है। खुद विचार चिंतन और अभ्यास से कोशिश करता रहता हूं और अच्छा लिखने की।  मगर सबसे महत्वपूर्ण बात लगती है सच और सही बात ईमानदारी से निडरता से लिखने की। भले मेरा लेखन जैसा भी जिस भी विधा में हो उसमे वास्तविक्ता है आडंबर नहीं बनावट झूठ या बात को उलझाने की कोशिश कभी नहीं की है। इतना काफी है। खुद को किसी तथाकथित साहित्यगुरूओं के तराज़ू पर उस इस पलड़े पर रखकर तोलना ज़रूरी नहीं लगा है उनसे कोई प्रमाणपत्र पाने को जिसकी मुझे कोई चाहत नहीं है। 
 

 



अक्टूबर 22, 2019

POST : 1216 शराफ़त की नकाब ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       शराफ़त की नकाब ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   कल चुनाव में चर्चा थी फलां व्यक्ति शरीफ है इसलिए लोग उसको वोट देंगे। मुझे ये वास्तविकता अनुभव से कई साल पहले समझ आ गई थी कि राजनीति में आने वाले नेताओं की शराफ़त नई नवेली बहु की तरह होती है लाज का घूंघट दो दिन में उतर जाये या कुछ महीने लग जाएं हालात पर निर्भर होता है। ससुराल में बहुरानी और राजनीति में आदमी आता है मन में छुपाकर सबको उनकी औकात दिखाने की भावना को। साफ शब्दों में शराफत की नकाब नेता लोग सत्ता मिलते ही उतार फैंकते हैं और असली रंग दिखाने लगते हैं। ये राजनीति का बाज़ार वैश्या का कोठा है जिस पर आकर अस्मत का सौदा होते ही शर्म का पर्दा उतारना ही पड़ता है। विधायक संसद बनते ही लोग किसी बड़े राजनेता के हाथ की कठपुतली बन जाते हैं। कठपुतली करे भी क्या नाचना तो पड़ेगा डोर किसी और के हाथ है उसकी मर्ज़ी है जिस तरह मर्ज़ी नचवा सकता है। आनंद का नायक नाम बदलता रहता है हंसी मज़ाक में दोस्त बनाने को समझाता है जॉनी वाकर जैसा कलाकार कि दुनिया के रंगमच पर हम सभी कठपुलियां हैं जिनकी डोर ऊपर वाले के हाथ में है कौन कब कैसे उठेगा कोई नहीं जानता। डॉयलॉग सुपर हिट है फ़िल्म का अंत भी टेप रिकॉर्डर की आवाज़ से होता है। नायक अंतिम सांस लेता है और टेप रिकार्डर चालू होता है , दोस्त आता है और आवाज़ सुनाई देती है। 
 
" बाबूमोशाय हम सब तो रंगमंच की कठपुलियां हैं जिनकी डोर ऊपर वाले के हाथ है , कब कौन कैसे उठेगा कोई नहीं जानता   .................... ( थोड़ी ख़मोशी )  हाहाहाहा। 

            अंतर है फ़िल्मी कहानी में सच्चाई विचलित करती है दिल दर्द से भर जाता है। राजनीति में सत्ता का रावण अट्हास करता है तो आपकी रूह कांप जाती है। कल की बहु आपको नाकों चने चबाबे का सुना हुआ मुहावरा समझा देती है। मुल्तानी भाषा की कहावत है उहो अच्छा जेड़ा कोयनी डिट्ठा। आज़ादी के बाद देश की राजनीति ने शराफ़त का चोला उतार दिया था बीस साल बाद तो बिलकुल नंगी हो गई थी। अपने फ़ैशन बदलते देखा महिलाओं को कपड़े तन ढकने को नहीं दिखाने को पहनते हैं की सोच बदलते देखा। आपको भीतर राजनीति कैसे बदलती रही पता ही नहीं चला आपको जो लगता है जश्न है पार्टी चल रही है वास्तव में कोई किसी को नंगा करने को आतुर है तो कोई खुद अपने को परोस रही होती है बेहूदगी का नाच दिखला कर। कला के नाम पर फ़ैशन की आड़ में वासनाओं का खेल जारी है अब फ़टे हुए कपड़े चीथड़े उधड़े हुए अमीर और आधुनिक होने की निशानी है। सत्ता की राजनीति इन सबसे बढ़कर है ज़मीर बेचने को तैयार हैं सब के सब कीमत लगवाने की होड़ लगी है। देश सेवा जनता की भलाई की अच्छी बातें चुनाव तक ठीक विवाह से पहले लड़की की ससुराल को ही अपना घर सास ससुर माता पिता अदि जैसी बातें मगर सत्ता मिलते नेता और शादी होते ही पड़की असली रंग दिखलाते हैं। दामाद भी तब पता चलता है जो कहता था कितना सच झूठ था , चांद तारे के सपने चुनावी वादे साबित होते हैं और खींचातानी होती है पति पत्नी में कौन भला कौन चालाक का खेल जारी रहता है अनंत काल तक।

       अच्छे दामाद अच्छी बहुरानी किस्मत वालों को नसीब से मिलती है और ख़ुशनसीन थोड़े लोग होते हैं। बदनसीबी अधिकांश के हिस्से में आती है। अच्छे सच्चे ईमानदार राजनेता विरले ही दिखाई देते हैं बेशक मां के पेट से कोई खराब नहीं पैदा होता की तरह राजनीति में आने से पहले कभी सभी शरीफ लोग हुआ करते थे मगर फिर शरीफों ने ही बदमाश लोगों को साथ मिलाने का काम शुरू किया और बदमाश लोगों ने शरीफ लोगों को अपने जैसा बना लिया। शराफत आजकल चेहरे को ढकने को नकाब की तरह है अपने अंदर सभी गुंडागर्दी करने का इरादा छिपाए रहते हैं। सोने में धतूरे से हज़ार गुणा नशा होता है सबने दोहा सुना है सत्ता धन दौलत का नशा उस से लाख करोड़ गुणा अधिक होता है। पैसा ताकत शोहरत और सत्ता का अहंकार वो ताकत हैं जो विवेक को रहने नहीं देते हैं। भले बुरे की परख रहती नहीं है राजनीति के दरबार की रौशनी की चकाचौंध अंधा कर देती है। भाषण ऐसी कला है जिस में मीठा झूठ जनता को बेचकर नेता लोग सत्ता की सीढ़ी चढ़ते हैं और अच्छे भाषण की विशेषता यही है कि नेता जो कहता है हम देखते हैं उसके विपरीत आचरण करता है फिर भी ऐतबार करते हैं झूठी बातों पर जब तक कोई बड़ा कारनामा सामने नहीं आता जिस में उसकी असलियत पता चलती है तो हैरान होते हैं कि जिस ने महिला सुरक्षा की बात से मोहित किया था उसी के हरम में महिलाओं से वासना का गंदा खेल खेला जाता रहा बंदी बनाकर। सच्चे आशिक़ और सच्चे देशभक्त नेता इतिहास की कथा कहानियों की बात रह गई है। अब हम्माम में सभी नंगे हैं।      

अक्टूबर 18, 2019

POST : 1215 महत्वहीनता की बात ( चिंतन-मनन ) डॉ लोक सेतिया

     महत्वहीनता की बात ( चिंतन-मनन ) डॉ लोक सेतिया 

  शुरुआत भले कहीं से करें अब मुझे महसूस होने लगा है तमाम चीज़ें अपनी उपयोगिकता खो चुकी हैं। कल शाम पढ़ा अख़बार में इक तथाकथित सन्यासी स्वामी जी अपने अनुयाईओं को किसी दल को समर्थन देने की बात समझाते हुए कह रहे थे जाति वर्ग से ऊपर उठकर विचार करो। जबकि वही हमेशा उसी जाति वर्ग की रहनुमाई की बात शान से किया करते थे और कुछ लोग आपसी विवाद सुलझाने को उन्हीं को बुलाया करते थे। विषय उनकी बात या किसी एक घटना को लेकर नहीं है बस मिसाल देने को अभी की बात ध्यान आई है। वास्तव में बहुत कुछ अपना महत्व खो चुका है और धर्म सामजिक संस्थाएं आदर्श नैतिक मूल्य से लेकर देश समाज की ज्ञान की बात इसी गति को पा चुके हैं। मुमकिन है ऐसा मुझे अपनी निराशा के कारण लगता हो। 

  आप फेसबुक पर पढ़ रहे हैं ये बात या व्हाट्सएप्प पर पढ़ते हैं कभी अख़बार मैगज़ीन में पढ़ते थे किताब में पढ़ते थे ध्यान से। अब गंभीर चिंतन नहीं करते लोग सरसरी नज़र डालते हैं जो पोस्ट चार लाइनों की होती हैं पढ़ते हैं विस्तार से लिखी पोस्ट को पढ़ना मुसीबत लगता है क्योंकि पढ़ना अब समझने का मकसद से नहीं बस समय बिताने मनोरंजन को करते हैं। मुझे लगता है पढ़ने का मकसद ही खो गया है। आडंबर बनकर रह गई हैं तमाम संस्थाएं भी चुनाव सरकार सरकारी विभाग संस्थाएं संविधान न्याय देशभक्ति समाजसेवा सभी लगता है मकसद कुछ था और बन कुछ और ही गए हैं। 

     धर्म कितने हैं कोई भी वास्तविक मानवता इंसानियत की बात वास्तव में नहीं सिखलाता है। इक होड़ सी लगी है खुद को अच्छा किसी को खराब साबित करने में , कितनी खेदजनक दशा है ये तो धर्म के खिलाफ है। अपने चोला पहन लिया है उपदेशक संत साधु सन्यासी या कोई धर्मगुरु होने का मगर सब को दुनिया छोड़ने की बात लोभ लालच मोह माया त्याग की बात बताने वाले संचय करने में लगे हैं। पढ़ लिख कर या फिर किसी भी तरह बड़े पद पर बैठकर कर्तव्य की बात भूलकर अधिकार और अहंकार की सोच से खुद को जाने क्या समझने लगे हैं जबकि वास्तव में सब की हैसियत समंदर में बूंद की भी नहीं है और ये बात नेताओं अधिकारियों से लेकर लिखने वाले साहित्यकारों से धनवान लोगों ही नहीं कलाजगत की बड़ी हस्तिओं खेल टीवी अख़बार सभी आदर्शवादी बातें करने वालों पर लागू होती है। हर ज़र्रा खुद को आफ़ताब समझता है।  आधुनिकता ने हमको जितना दिया है उस से अधिक मूलयवान था जो छीन लिया है। हमने जो जो भी जिस जिस मकसद को लेकर बनाया था वही अपने ही मकसद के विपरीत आचरण करता लगता है। जिनका उपयोग करना था हम उन्हीं के हाथ का खिलौना बन गए हैं। आदमी आदमी नहीं सामान बन गया है।

         
    बात कभी सीधी तरह समझ नहीं आती , जब कोई सीमा लांघ जाता है तब सोचते हैं ये कोई सही राह दिखाने वाला नहीं है अपने मकसद को सच को झूठ और झूठ को सच बताता है। आखिर कब तक कोई गुरुआई की आड़ लेकर कमाई की मलाई खा सकता है। देर से ही सही सन्यासी की बात कुछ लोगों को बेहद अनुचित लगी है। कभी कभी कायर लोग भी अपने अस्तित्व की खातिर ख़ामोशी तोड़ने लगते हैं और खलनायक को नायक मानने से इनकार कर देते हैं। ऐसा पहले किया होता तो अपने अस्तित्व पर सवाल खड़ा नहीं होता। मगर चालाक लोग अभी भी कुछ न कुछ तरीका अपनाकर उनको मनवा लेंगे ऐसा कुछ समय का गुबार थोड़ी देर में गुज़र जाता है। जब तक अपने अंदर की ताकत को जगाते नहीं और विवेक से काम लेकर अच्छे बुरे को समझ कर हिम्मत नहीं करते सच्चाई का साथ और झूठ का विरोध करने को तब तक बात बनेगी कैसे। अपने जिस के हज़ार ज़ुल्म ख़ामोशी से सहे आज दर्द से कराह उठे जब सूली पर चढ़ाने की नौबत सामने है। खुद हम बुराई को बढ़ने देते हैं जब पहाड़ बनकर खड़ा होता है कोई तब होश आता है। मगर जब चिड़िया खेत चुग गई तो हाथ मलने पछताने से फायदा क्या। सबसे महत्वपूर्ण बात है हम आदर्श को लेकर नहीं अवसर के कारण खड़े होते हैं जबकि सच और झूठ की लड़ाई हर रोज़ लड़नी होती है। इंसाफ की डगर पर चलना है तो मुश्किलें रोज़ आएंगी और सामना करना होगा। अन्यथा आपको विभाजित करने को उनके पास कई चालें हैं आपको हर चाल को समझना भी होगा और टकराना भी होगा समझदारी से। दीवार से सर टकराने से कुछ नहीं हासिल होता आपको ज़ुल्म की दीवार भले फौलाद की हो उस में छेद दरार कमज़ोर जगह देख उस पर वार करना होगा। ये महत्वपूर्ण बात ध्यान रहे।



              

अक्टूबर 15, 2019

POST : 1214 दिल्ली का चोर बाज़ार ( आज की राजनीति ) कटाक्ष - डॉ लोक सेतिया

        दिल्ली का चोर बाज़ार ( आज की राजनीति ) 

                                 कटाक्ष - डॉ लोक सेतिया 

  अपने भी नाम तो सुन रखा होगा , खुलेआम लगता था पुरानी दिल्ली में चोर बाज़ार नाम से सब मिलता था सस्ते दाम पर। आज की राजनीति को समझना चाहा तो याद आई कभी जाकर देखा तो नहीं था। आपको अपना बेहद कीमती अधिकार पांच साल बाद उपयोग करना है मगर आपको खरा सोना तो क्या शुद्ध पीतल भी किसी भी दुकान पर नहीं दिखाई दे रहा। हर दल नकली मिलावटी या इधर उधर से सस्ते दाम खरीदे माल को अपना लेबल चिपका कर आपको बेचना नहीं ठगना चाहते हैं। संभल कर चोर बाज़ार में जेबतराश भी बहुत हैं और चेतावनी भी जगह जगह लिखी हुई है जेबकतरों से सावधान।  चोर बाज़ार अब देश भर में फ़ैल चुका है राजनीति का चोखा धंधा इतना बढ़ता गया है कि चोरी और सीनाज़ोरी यही होने लगा है। चलो आपको शुरू से चोर बाज़ार चोरों की टोली और चोरों के सरदार से अली बाबा चालीस चोर की वास्तविककता बताते हैं।

         तब एकाधिकार जैसा था उनकी धाक थी और गांव शहर उन्हीं का नाम बिकता था। विकल्प तलाश करने की हमारी आज भी आदत नहीं है बिना समझे इस नहीं तो उस को चुन लिया मगर हमारी कसौटी पर खरा कोई भी नहीं उतरा कभी। सब एक थैली के चट्टे बट्टे हैं हमने भी हार मान ली उसी गलती का सिला चुका रहे हैं कभी खुद ढूंढते सच्चे लोगों की कमी नहीं थी मगर हमने कोशिश की ही नहीं अच्छे बुरे की पहचान करने की। ऐसे में गंगा उल्टी बहती रही जनता के चुने लोग कहीं नहीं रहे और तथाकथित ऊपरी आलाकमान की मर्ज़ी के लोग मनोनीत होते रहे। नतीजा लोकतंत्र की जगह चाटुकारिता और मनमानी का बोलबाला होने से तानाशाही फलने फूलने लगी थी। भीड़ की आवाज़ में सच किसी को सुनाई नहीं देता था और धीरे धीरे ये रोग देश से राज्य तक फैलता गया और कुछ लोगों ने देश की आज़ादी और लोकतंत्र को अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया था।

       स्थनीय स्तर पर लोगों ने कुछ विकल्प बनाने की कोशिश की तो सत्ता की चाहत ने उनको स्वार्थी बिना विचारधारा के गठबंधन की राजनीति ने भटका दिया और ऐसे दल किसी व्यक्ति की निजि जायदाद बन गए। जो लोग स्वार्थ से साथ जुड़े उनके स्वार्थ समय समय पर बदलते रहे और ऐसा लगने लगा जैसे ये राजनीति काजल की कोठरी है जिस में भीतर जाते ही कालिख लगना नियति है। मगर नहीं देश की चिंता करने वाले लोग अडिग होकर बदलाव की कोशिश करते रहे। एक समय आया जब जनमत ने ख़ामोशी से तानाशाही को हराकर अपना इरादा ज़ाहिर कर दिया था। मगर उसके बाद सत्ता की चाह ने गठबंधन के धर्म को छोड़कर लालच की राह चल कर जनता को देश को फिर अंधी गली में ला दिया। तब से केवल सत्ता की स्वार्थ की राजनीति ने लोकतंत्र के आसमान को ढक दिया है और उम्मीद की कोई किरण नहीं नज़र आती है।

    हम लोग बार बार रौशनी की खोज करते हैं और किसी को सूरज समझ लेते हैं मगर जैसे ही सत्ता के सिंहासन पर बिठाते हैं वो घना अंधकार साबित होता है। जो रौशनी लाने की बात करता है वही अंधेरे को बढ़ाता जाता है और जितने भी चोर लुटेरे जिस भी जगह होते हैं उनको साथी बनाकर देश के खज़ाने की लूट में शामिल कर लेता है। देशभक्ति ईमानदारी का तमगा लगाकर राजनेता खुद अपने लिए सुख साधन हासिल कर शान से रहते हैं और जनता को अधिकार नहीं खैरात बांटने का आडंबर करते हुए और भी बेबस कर देते हैं क्योंकि उनका शासन कायम तभी रह सकता है।

                                     ( अभी बात अधूरी है )
     
     

अक्टूबर 14, 2019

POST : 1213 झूठा है तेरा वादा ( नेताओं-आशिक़ों के वादे ) डॉ लोक सेतिया

   झूठा है तेरा वादा ( नेताओं-आशिक़ों के वादे ) डॉ लोक सेतिया 

    जाने किस कवि शायर की रचना है जो पंजाबी में रचना है मैंने उसका वीडियो देखा और शेयर किया था। आज संक्षेप में बता देता हूं। कवि कहता है , रावी नदी से तीन नहरें निकलीं जिन से दो सूखी और तीसरी में कभी पानी नहीं आया सतलुज यमुना नहर की तरह। जो कभी भी नहीं बहती उस में तीन लोग नहाने को गए उन से दो डूब गए और तीसरा खो गया मिला ही नहीं। जो मिला ही नहीं उसको नहर से तीन गाय मिलीं जिनसे दो फंडड़ अर्थात जो बच्चा नहीं दे सके और तीसरी जिसका गर्भ नहीं बच्चे देने को। जिसका गर्भ नहीं उसने जन्म दिया तीन बछड़ों को जिन में दो लंगड़े और तीसरा उठ भी नहीं सकता। जो उठ भी नहीं सकता उसकी कीमत तीन रूपये दो खोटे और एक चलता ही नहीं। जो रुपया चलता नहीं उसको देखने को तीन सुनयारे आये जिन में दो अंधे और एक को कुछ भी दिखाई नहीं देता। जिसको कुछ भी दिखाई नहीं देता उसे तीन घूंसे मारे गए दो निशाना चूक गए और तीसरा लगा ही नहीं। बस चुनावी वादे ऐसे ही हुआ करते हैं जिनसे हासिल कुछ भी नहीं होता है। 

      अब आज की बात एक दल ने सौ वादे किये दूसरे ने दोगुणा वादे गिनवा दिए। पहले भी उन दोनों ने हज़ार वादे किये थे भूल गए उनकी बात अब नहीं करते। गरीबी भूख अन्याय और जाने क्या क्या स्वर्ग धरती पे ले आने की बातें की थीं। मछली को जाल में फंसाने को कांटे में कुछ देते हैं कोई मछली से प्यार नहीं करता है। आशिक़ चांद तारे तोड़ कर आंचल में भरने की बात कहता है शादी के बाद पता चलता है वादा तेरा वादा। औरत या वोटर हमेशा धोखा खाते हैं सपने कभी सच नहीं होते हैं। आज तक कभी किसी नेता ने सत्ता पाकर खुद सब कुछ नहीं हासिल करने की बात नहीं कर दिखाई और पति बनते ही पत्नी को कभी खुश करने को तुम से अच्छा कौन है नहीं समझा है। नेता और पति बेवफ़ा होते ही हैं आप इन पर भरोसा करते हैं तो धोखा खाते हैं। इस विषय को समझना है तो इक पुराना व्यंग्य नेता पति है पत्नी है जनता पढ़ सकते हैं। 

     वादों का इतिहास यही है वो वादा ही नहीं जो निभा दिया गया हो। जो मिल गया मुक्क्दर था वरना कोई आपको खोटी कोड़ी भी नहीं देना चाहता। गज़ब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया तमाम रात कयामत का इंतज़ार किया। कसमें वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या। कितने गीत कितनी कहानियां कितनी कविताएं ग़ज़ल मुहब्बत की बेवफ़ाई की बात समझाती हैं लोग फिर भी नासमझ बन सोचते हैं अपने को जो मिला वफ़ादार है। खूबसूरत है वफ़ादार नहीं हो सकता लोग समझाते हैं सुंदर सुनहरे ख्वाब सच नहीं होते कभी। हम लोग आदी हैं सपने देख कर यकीन करते हैं किसी दिन सच होगा भगवान छप्पर फाड़ कर देगा मगर कभी किसी गरीब के घर पैसों की बारिश नहीं हुई नेताओं अफ्सरों के घर दफ्तर धनलक्ष्मी बरसात करती है। आप तो शरद पूर्णिमा को खीर बनाकर भोग लगाते रहते हैं दीपावली पर लक्ष्मी अब भी किसी दल के घर जाकर रहेगी। पांच साल में उनका कायापल्ट हो जाता है। वादा नहीं था जो हो जाता है वादे बस वादे रहते हैं उनकी कहानी बदलती नहीं कभी भी।


अक्टूबर 09, 2019

POST : 1212 घर की दास्तान ( हक़ीक़त ) डॉ लोक सेतिया

          घर की दास्तान ( हक़ीक़त ) डॉ लोक सेतिया 

   हुआ करते थे घर गलियां चौबारे और लोग रहते ही नहीं थे जीते भी थे। अधिक पुरानी बात नहीं है आज भी ढूंढने से कहीं उनके बाकी निशान मिल जाते हैं। ये भी उन्हीं से एक घर की कहानी है जो थोड़ी थोड़ी ज़हन में याद है भूली हुई याद जैसे किसी दिन किसी बहाने आती है याद तो लगता है काश फिर से वही ज़माना वही लोग घर मिल सकते। घर था उसमें खिड़की रौशनदान दरवाज़ा हुआ करता था भौर होते ही सूरज की पहली किरण से घर उजला और खुली हवा के झौंके से ताज़गी भरता लगता था। तब कोई पर्दा नहीं लगाया जाता था बाहर से छिपाने को रौशनी भली लगती थी ठंडी मीठी भी अब नकली चकाचौंध बिजली की आंखों को चुभती लगती है। किवाड़ की सांकल बजाने की ज़रूरत कम हुआ करती थी दिन भर गली गांव के अपने बिना कोई ज़रूरत भी चले आते थे , घर पर हो क्या आवाज़ देते तो घर से जवाब आता भीतर चले आओ अपना ही घर है। घर की चौखट लांघते ही आंगन हुआ करता था कोई पेड़ छांव देने को कोई चारपाई बिछी रहती थी। दिन भर छहल पहल रहती थी दोपहर को मिल बैठती थी सखी सहेलियां बड़ी बूढ़ी दादी नानी हंसी ठिठोली और हाल चाल सुख दुःख का सांझा करती हुई। किसकी बिटिया की शादी है कौन बेटी ससुराल से आई है किस की बहु की ख़ुशी की खबर आने वाली है। घर लगता था महका हुआ बाग़ जैसा है खुशबू और चिड़ियों की चहकती हुई आवाज़ें सुनाई देती थी। हर मौसम सुहाना लगता था गर्मी की लू से बारिश की बौछार से सर्दी की ठंडक भी और धूप की तपिश साथ मिलकर गर्माहट को और बढ़ा देती थी।

         ये भी घर हैं जैसे ख़ामोशी छाई रहती है आवाज़ सुनाई नहीं देती इंसान की और बंद खिड़की दरवाज़ा कोई आकर आहट करता है तो ख़ुशी नहीं चिंता होती है बेवक़्त कौन आया है बिना बताये कोई नहीं आता। झांकते हैं कोई अजनबी तो नहीं और सामने के घर में रहने वाला भी पराया अनजान लगता है। बिना मतलब मिलना तो क्या बात करने की फुर्सत नहीं किसी को। आपके पड़ोस में कौन है नहीं नाम भी मालूम उसके दुःख सुख से सरोकार की बात ही क्या की जाये। खुद को अपने घर में बंद कर जैसे कैद में रहते हैं और सभी अकेलेपन के शिकार हैं। जुर्म क्या है किस बात की सज़ा खुद ही झेलते हैं भरोसा किसी को किसी पर नहीं रहा ये कैसा समाज बन गया है। मगर कहने को शहर क्या दुनिया भर से जान पहचान है दिखावे की जब भी कोई अवसर तीज त्यौहार शुभ दिन आता है मिलते हैं फ़ासला भी रखते हैं गले मिलते हैं हाथ मिलाते हैं दिल नहीं मिलते दिल की बात कोई नहीं जानता समझता। घर अब घर नहीं रहे खाली शीशे पत्थर से बनी इमारत में मकान हो गए हैं। ये महानगर की सभ्यता गांव शहर तक पहुंच गई है कभी बड़े शहर जाकर लोग खो जाते थे अब इन मकानों के जंगल में घर खो गए हैं। मुझे चाहिए इक घर चाहे छोटा ही हो अब नहीं चाहत इक बंगला बने न्यारा।
       

POST : 1211 लोकनायक जयप्रकाश नारायण ( वास्तविक नायक ) डॉ लोक सेतिया

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ( वास्तविक नायक ) डॉ लोक सेतिया


       लेखक ललित गर्ग जी ने कल लिखा है। आजादी के आंदोलन से हमें ऐसे बहुत से नेता मिले जिनके प्रयासों के कारण ही यह देश आज तक टिका हुआ है और उसकी समस्त उपलब्धियां उन्हीं नेताओं की दूरदृष्टि और त्याग का नतीजा है। ऐसे ही नेताओं में जीवनभर संघर्ष करने वाले और इसी संघर्ष की आग में तपकर कुंदन की तरह दमकते हुए समाज के सामने आदर्श बन जाने वाले प्रेरणास्रोत थे लोकनायक जयप्रकाश नारायण, जो अपने त्यागमय जीवन के कारण मृत्यु से पहले ही प्रातः स्मरणीय बन गए थे। अपने जीवन में संतों जैसा प्रभामंडल केवल दो नेताओं ने प्राप्त किया। एक महात्मा गांधी थे तो दूसरे जयप्रकाश नारायण। इसलिए जब सक्रिय राजनीति से दूर रहने के बाद वे 1974 में ‘सिंहासन खाली करो जनता आती है’ के नारे के साथ वे मैदान में उतरे तो सारा देश उनके पीछे चल पड़ा, जैसे किसी संत महात्मा के पीछे चल रहा हो।


     11 अक्टूबर, 1902 को जन्मे जयप्रकाश नारायण भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता थे। वे समाज-सेवक थे, जिन्हें ‘लोकनायक’ के नाम से भी जाना जाता है। 1999 में उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें समाजसेवा के लिए 1965 में मैगससे पुरस्कार प्रदान किया गया था। पटना के हवाई अड्डे का नाम उनके नाम पर रखा गया है। दिल्ली सरकार का सबसे बड़ा अस्पताल ‘लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल’ भी उनके नाम पर है।

       लोकनायक जयप्रकाशजी की समस्त जीवन यात्रा संघर्ष तथा साधना से भरपूर रही। उसमें अनेक पड़ाव आए, उन्होंने भारतीय राजनीति को ही नहीं बल्कि आम जनजीवन को एक नई दिशा दी, नए मानक गढ़े। जैसे - भौतिकवाद से अध्यात्म, राजनीति से सामाजिक कार्य तथा जबरन सामाजिक सुधार से व्यक्तिगत दिमागों में परिवर्तन। वे विदेशी सत्ता से देशी सत्ता, देशी सत्ता से व्यवस्था, व्यवस्था से व्यक्ति में परिवर्तन और व्यक्ति में परिवर्तन से नैतिकता के पक्षधर थे। वे समूचे भारत में ग्राम स्वराज्य का सपना देखते थे और उसे आकार देने के लिए अथक प्रयत्न भी किए। उनका संपूर्ण जीवन भारतीय समाज की समस्याओं के समाधानों के लिए प्रकट हुआ, एक अवतार की तरह, एक मसीहा की तरह। वे भारतीय राजनीति में सत्ता की कीचड़ में केवल सेवा के कमल कहलाने में विश्वास रखते थे। उन्होंने भारतीय समाज के लिए बहुत कुछ किया लेकिन सार्वजनिक जीवन में जिन मूल्यों की स्थापना वे करना चाहते थे, वे मूल्य बहुत हद तक देश की राजनीतिक पार्टियों को स्वीकार्य नहीं थे। क्योंकि ये मूल्य राजनीति के तत्कालीन ढांचे को चुनौती देने के साथ-साथ स्वार्थ एवं पदलोलुपता की स्थितियों को समाप्त करने के पक्षधर थे, राष्ट्रीयता की भावना एवं नैतिकता की स्थापना उनका लक्ष्य था, राजनीति को वे सेवा का माध्यम बनाना चाहते थे।

       लोकनायक जयप्रकाशजी की जीवन की विशेषताएं और उनके व्यक्तित्व के आदर्श कुछ विलक्षण और अद्भुत हैं जिनके कारण से वे भारतीय राजनीति के नायकों में अलग स्थान रखते हैं। उनका सबसे बड़ा आदर्श था जिसने भारतीय जनजीवन को गहराई से प्रेरित किया, वह था कि उनमें सत्ता की लिप्सा नहीं थी, मोह नहीं था, वे खुद को सत्ता से दूर रखकर देशहित में सहमति की तलाश करते रहे और यही एक देशभक्त की त्रासदी भी रही थी। वे कुशल राजनीतिज्ञ भले ही न हो किन्तु राजनीति की उन्नत दिशाओं के पक्षधर थे, प्रेरणास्रोत थे। वे देश की राजनीति की भावी दिशाओं को बड़ी गहराई से महसूस करते थे। यही कारण है कि राजनीति में शुचिता एवं पवित्रता की निरंतर वकालत करते रहे।

              महात्मा गांधी जयप्रकाश की साहस और देशभक्ति के प्रशंसक थे। उनका हजारीबाग जेल से भागना काफी चर्चित रहा और इसके कारण से वे असंख्य युवकों के सम्राट बन चुके थे। वे अत्यंत भावुक थे लेकिन महान क्रांतिकारी भी थे। वे संयम, अनुशासन और मर्यादा के पक्षधर थे। इसलिए कभी भी मर्यादा की सीमा का उल्लंघन नहीं किया। विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने अपना अध्ययन नहीं छोड़ा और आर्थिक तंगी ने भी उनका मनोबल नहीं तोड़ा। यह उनके किसी भी कार्य की प्रतिबद्धता को ही निरूपित करता था, उनके दृढ़ विश्वास को परिलक्षित करता है।

             मैंने जेपी को नहीं देखा लेकिन उनकी प्रेरणाएं मेरे पारिवारिक परिवेश की आधारभित्ति रही है। मेरी माताजी स्व. सत्यभामा गर्ग उनकी अनन्य सेविका थी। राजस्थान में होने वाले जेपी के कार्यक्रमों को वे संचालित किया करती थी, उनके व्यक्तिगत व्यवस्था में जुड़े होने के कारण उनके आदर्श एवं प्रेरणाएं हमारे परिवार का हिस्सा थे। मेरे आध्यात्मिक गुरु आचार्य श्री तुलसी के जीवन से जुड़ेे एक बड़े विरोधपूर्ण वातावरण के समाधान में भी जयप्रकाश का अमूल्य योगदान है। उनकी चर्चित पुस्तक अग्निपरीक्षा को लेकर जब देश भर में दंगें भड़के, तो जेपी के आह्वान से ही शांत हुए। जेपी के कहने पर आचार्य तुलसी ने अपनी यह पुस्तक भी वापस ले ली।

          जयप्रकाश नारायण को 1970 में इंदिरा गांधी के विरुद्ध विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए जाना जाता है। इंदि‍रा गांधी को पदच्युत करने के लिए उन्होंने ‘सम्पूर्ण क्रांति’ नामक आंदोलन चलाया। लोकनायक ने कहा कि संपूर्ण क्रांति में सात क्रांतियां शामिल हैं- राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक क्रांति। इन सातों क्रांतियों को मिलाकर सम्पूर्ण क्रांति होती है। संपूर्ण क्रांति की तपिश इतनी भयानक थी कि केन्द्र में कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ गया था। जयप्रकाश नारायण की हुंकार पर नौजवानों का जत्था सड़कों पर निकल पड़ता था। बिहार से उठी संपूर्ण क्रांति की चिंगारी देश के कोने-कोने में आग बनकर भड़क उठी थी। जेपी के नाम से मशहूर जयप्रकाश नारायण घर-घर में क्रांति का पर्याय बन चुके थे। लालमुनि चैबे, लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान या फिर सुशील मोदी, आज के सारे नेता उसी छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का हिस्सा थे।

         देश में आजादी की लड़ाई से लेकर वर्ष 1977 तक तमाम आंदोलनों की मशाल थामने वाले जेपी यानी जयप्रकाश नारायण का नाम देश के ऐसे शख्स के रूप में उभरता है जिन्होंने अपने विचारों, दर्शन तथा व्यक्तित्व से देश की दिशा तय की थी। उनका नाम लेते ही एक साथ उनके बारे में लोगों के मन में कई छवियां उभरती हैं। लोकनायक के शब्द को असलियत में चरितार्थ करने वाले जयप्रकाश नारायण अत्यंत समर्पित जननायक और मानवतावादी चिंतक तो थे ही इसके साथ-साथ उनकी छवि अत्यंत शालीन और मर्यादित सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति की भी है। उनका समाजवाद का नारा आज भी हर तरफ गूंज रहा है। भले ही उनके नारे पर राजनीति करने वाले उनके सिद्धान्तों को भूल रहे हों, क्योंकि उन्होंने सम्पूर्ण क्रांति का नारा एवं आन्दोलन जिन उद्देश्यों एवं बुराइयों को समाप्त करने के लिये किया था, वे सारी बुराइयां इन राजनीतिक दलों एवं उनके नेताओं में व्याप्त है। संपूर्ण क्रान्ति के आह्वान में उन्होंने कहा था कि ‘भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रांति लाना, आदि ऐसी चीजें हैं जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकतीं क्योंकि वे इस व्यवस्था की ही उपज हैं। वे तभी पूरी हो सकती हैं जब संपूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए और सम्पूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए क्रान्ति, ’सम्पूर्ण क्रान्ति’ आवश्यक है।’ इसलिए आज एक नयी सम्पूर्ण क्रांति की जरूरत है। यह क्रांति व्यक्ति सुधार से प्रारंभ होकर व्यवस्था सुधार पर केन्द्रित हो। कुर्सी पर कोई भी बैठे, लेकिन मूल्य प्रतिष्ठापित होने जरूरी है। ऐसा करके ही हम एक महान लोकनायक को सच्ची श्रद्धांजलि दे पाएंगे।

                         ( हिंदी न्यूज़ वेद दुनिया से आभार सहित )

 
          मैं खुद को बेहद खुशनसीब समझता हूं कि मैंने ऐसे महान नायक को देखा सुना और इसिहास के उस पल का  गवाह बना जिस दिन दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी जी ने जनसमूह को संबोधित किया था और जिस के आधार बनाया गया था इंदिरा गांधी द्वारा आपात्काल घोषित करने को। मैंने 11 ऑक्टूबर 2013 को छह साल पहले जो लेख लिखा था आज फिर से दोहराना चाहता हूं।

     जन नायक श्री जय प्रकाश नारायण जी और आपात्काल   ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

        11 अक्टूबर जब भी आता है मुझे हैरानी होती है सभी टीवी चैनेल अमिताभ बच्चन जी का जन्म दिन मना रहे होते हैं उनको नायक नहीं महानायक सदी का घोषित किया जाता है। कल इक महान लेखक की बात पढ़ी थी , उनका कहना था नायक वो होते हैं जिनको सही राह मालूम होती है , वो खुद सही मार्ग पर चलते हैं और लोगों को भी साथ रखते हैं। जे पी जैसे वास्तविक नायक हमें याद नहीं रहते और फ़िल्मी अभिनेता को हम नायक बता उसका गुणगान करते हैं। इस से समझ सकते हैं कि हम मानसिक तौर पर कितने खोखले हो गए हैं। शायद हमें आज़ादी से पहले का तो क्या आज़ादी के बाद तक का इतिहास याद नहीं है। भूल गये हैं कि किसी भी नेता का इस कदर महिमामंडन नहीं किया जाना चाहिये कि वो खुद को संविधान से ऊपर समझने लगे। आज भी हम वही गुलामी की मानसिकता के शिकार हैं और किसी न किसी को खुदा बनाकर उसकी परस्तिश करने में लाज अनुभव नहीं करते। ऐसे कितने खुदा लोगों ने तराश लिये हैं जो उनकी इसी बात का उपयोग पैसा कमाने और अमीर बनने को कर रहे हैं। उनका धन दौलत का मोह बढ़ता ही जाता है , शास्त्र बताते हैं जिस के पास सभी कुछ हो फिर भी और पाने की हवस हो वही सब से दरिद्र होता है। लेकिन हम जे पी जैसे जननायक को भूल जाते हैं जिसने कभी किसी पद किसी ओहदे को नहीं स्वीकार किया और हमेशा जनता की बात की। और जिस ने देश समाज को कुछ नहीं दिया जो भी किया खुद अपने लिए ही किया उसको हम भगवान तक बताने में संकोच नहीं करते। विशेष कर मीडिया को तो समझना चाहिए लोकतंत्र में चाटुकारिता कितनी खतरनाक होती है।
                                    
             पच्चीस  जून 1 9 7 5 को जयप्रकाश नारायण जी के भाषण को आधार बना आपात्काल की घोषणा की गई थी। मैं उस दिन उनका भाषण सुनने वालों में शामिल था। आज वो लोग सत्ता पर आसीन हैं जो कभी आपात्काल में भूमिगत थे , आज देखते हैं वही खुद तानाशाही ढंग से आचरण करते हैं और मीडिया तब भी उनकी महिमा का गुणगान करता नज़र आता है। कोई उनको याद दिलाये कभी आपको किसी सत्ताधारी की तानाशाही लोकतंत्र विरोधी लगती थी , आज खुद दोहराते हैं वही सब। मुझे तो आज तक ये समझ नहीं आ सका कि इस अभिनेता ने देश व समाज को क्या दिया है। मगर हमारी मानसिकता बन गई है सफलता को , पैसे कमाने को महान समझने की। कोई के बी से से जीत लाये धन तो शहर वाले उसको सम्मानित करने लगते हैं। ये नहीं सोचते कि ऐसा करना कितना उचित या अनुचित है। सब जानते हैं कि ये धन जनता से आता है एस एम एस से और विज्ञापनों से। न चैनेल घर से देता है न ही अमिताभ जी , बल्कि दोनों की कमाई होती है ऐसा करके।

    जे पी जी जैसे लोग कभी कभी मिलते हैं। आज आप अन्ना हजारे जी को जानते हैं भ्रष्टाचार का विरोध करने के लिये चलाये आन्दोलन के कारण। 1975  में जो आन्दोलन देश भर में जे पी जी ने चलाया था वो अपने आप में एक मिसाल है। इंदिरा गाँधी जिनको बहुत ही साहस वाली महिला माना जाता है डर गई थी उनके आन्दोलन से और आपातकाल की घोषणा कर दी थी। 19  महीने तक देश का लोकतंत्र कैद था एक व्यक्ति की कुर्सी की चाहत के कारण। कांग्रेस लाख चाहे ये काला दाग मिट नहीं सकता उसके दामन पर लगा हुआ। ये अलग बात है कि  उस आन्दोलन में ऐसे भी लोग शामिल हो गये थे जिनको आगे जा कर खुद सत्ता प्राप्त कर वही सब ही करना था। लालू यादव और मुलायम सिंह जैसे लोग होते हैं जिनको अपने स्वार्थ सिद्ध करने होते हैं। वे तब भ्रष्टाचार और परिवारवाद का विरोध कर रहे थे लेकिन आज खुद वही करने लगे हैं।
    मगर जे पी जी का सम्पूर्ण क्रांति का ध्येय तब भी सही था और आज भी उसकी ही ज़रूरत है। शायद आज और अधिक ज़रूरत है क्योंकि तब केवल बिहार और दिल्ली की सरकार की बात थी जब कि आज हर शाख पे उल्लू बैठा है। मगर आज के नवयुवकों को ये बताना बेहद ज़रूरी है कि नायक वो होते हैं जो पद को कुर्सी को ठोकर मरते हैं उसूलों की खातिर। देश के सर्वोच्च पद के लिए इनकार कर दिया था जयप्रकाश नरायण जी ने।

         आज है कोई जो सत्ता को नहीं जनहित को महत्व दे। आज उनको याद किया जाना चाहिए , उनसे सबक सीख सकते हैं आम आदमी पार्टी के लोग कि वही सब फिर न दोहराया जा सके। भ्रष्टाचार के विरोध की बात कर सत्ता पा कर खुद और ज्यादा भ्रष्टाचार करने लगें। इधर लोग दो लोगों को भगवान कहने का काम करते हैं अक्सर। लेकिन उन दोनों तथाकथित भगवानों की  दौलत की चाहत थमने का ना म ही नहीं ले रही। क्या भगवान ऐसे होते हैं , भगवान देते हैं सब को , अपने लिए कुछ नहीं चाहिए उसको। मुझे किसी शायर के शेर याद आ रहे हैं।

इस कदर कोई बड़ा हो हमें मंज़ूर नहीं
कोई बन्दों में खुदा हो हमें मंज़ूर नहीं।

रौशनी छीन के घर घर से चिरागों की अगर
चाँद बस्ती में उगा हो हमें मंज़ूर नहीं।

मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना
आपकी एक अदा हो हमें मंज़ूर नहीं। 
                               

        अब आज की बात , आज हालात आपात्काल जैसे हैं शायद उस से भी खराब हैं मगर खेद की बात है आज के शासक उनका नाम भी नहीं लेना चाहते जबकि उनको पता है उन में से बहुत नेता आज राजनीति में हैं तो उन्हीं के साये में बढ़े कभी आंदोलन में थे। क्योंकि ये सब उन के आदर्शों की बात करने का साहस नहीं कर सकते उनका अनुसरण करना तो दूर की बात है। इनकी सुविधा पटेल के बूत बनाने की है जिन से वास्तव में इनका कोई मतलब कभी नहीं रहा है जैसे भगवान राम के आदर्श इन लोगों को नहीं मालूम मगर उनके नाम की राजनीति इनको सत्ता की सीढ़ी लगती है। राम को सत्ता का मोह नहीं था और हमेशा वंचित पीड़ित लोगों का साथ चुना था जबकि तथाकथित रामभक्त कोई आदर्श नहीं मानते और सत्ता का त्याग करने की मार्ग उनके बस की बात नहीं है जैसे ही इनसे सत्ता छुट्टी है ये बदलते देर नहीं लगाते हैं। ये बेहद खेद की बात है कि लोग ऐसे वास्तविक आदर्श पुरुषों के बारे कम जानते हैं जिनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। जो लोग ईमानदारी की बात करते हैं उनको कभी सत्येंद्र दुबे जैसे अधिकारी याद नहीं आते जिनकी हत्या तीस साल की आयु में 27 नवंबर 2003 को उन्हीं लोगों ने कर दी जिनकी शिकायत नेशनल हाईवे के अधिकारी रहते उन्होंने पीएमओ को की थी भरषटाचार को लेकर। आज भी ये खनन माफिया और अवैध कब्ज़े करने वाले लोगों को दल में शामिल कर उम्मीदवार बनाते हैं और ईमानदार सरकार का खुद ही तमगा लगाए फिरते हैं।

     11 ऑक्टूबर दो दिन बाद जेपी का जन्म दिन है मगर शायद ही कोई सत्ताधारी उनकी बात करेगा। टीवी चैनल भी उस दिन वास्तविक जननायक की नहीं फ़िल्मी तथाकथित महानायक की बात करेंगे बिना विचारे कि उसने देश समाज को क्या दिया है। शायद मतलबी राजनेता नहीं चाहते हम लोग वास्तविक आदर्श के पालन की बात को समझें भी , उनको केवल आडंबर करना है ऐसे लोगों के अनुयाई होने की बात कह कर अपने मकसद सिद्ध करने को। जेपी उनके काम के नहीं रहे अब जब थी ज़रूरत तब साथ थे और उनके मकसद को छोड़ अपनी राजनीति करते समय नहीं लगा था शायद लोग जल्दी इतिहास को भूल जाते हैं। मगर जो बात सच है वो ये है कि कुछ लोगों की महत्वआकांक्षा ने जेपी के सपने को चूर नहीं किया होता तो देश आज किसे और ऊंचाई पर खड़ा होता जिस में वास्तविक सत्ता जनता के पास होती। 





अक्टूबर 07, 2019

POST : 1210 दिल लगता नहीं नकली नज़ारों में ( हाल-ए-दिल ) डॉ लोक सेतिया

 दिल लगता नहीं नकली नज़ारों में ( हाल-ए-दिल ) डॉ लोक सेतिया

   आज लिखने से पहले जानता हूं किसी को फुर्सत ही नहीं इतनी जो किसी और की बात को पढ़े मेरी हो किसी की कोई नहीं पढ़ता बस इक नज़र देख कर लाइक कमेंट औपचारिकता सी है पढ़ भी लिया तो समझना ज़रूरी नहीं और कोई समझ कर भी मुझे क्या सोच लेता है। फिर लिखने का मकसद बस दिल की तसल्ली या फिर खाली समय बिताना खुद से खुद की बात कहना। मगर ऐसा क्यों है भरी दुनिया में आस पास ही नहीं अब सोशल मीडिया ने विश्व को मुट्ठी में भरने की बात कर दी है फिर भी शायद मेरी तरह कितने और लोग भीड़ में अकेले घबराते हैं अजनबी सी लगती है मुझे ये दुनिया। कोई भी एक दोस्त तक नहीं जिसको अपना कह भी सकते हों और अपनापन का एहसास भी होता हो। जान पहचान हर किसी से है बाहरी दिखावे की भीतर से हम खालीपन लिए भटकते हैं। ये मेरी दुनिया नहीं है मुझे नहीं चाहिए ये झूठ फरेब और नकली नज़रों की दुनिया , आज याद आ रही है छोटी सी इक प्यारी सी दुनिया हुआ करती थी कभी मेरे सपनों की और शायद यहीं कहीं हुआ करता था उसके होने का एहसास भी दिल को अक्सर। मिल जाते थे ये कभी मिले थे कुछ लोग जो जैसे भी थे बहुत अच्छे थे मगर खो गए वक़्त की आंधी उन्हें जाने कहां उड़ा ले गई। अब जो दुनिया है मुझे अजीब लगती है अपने देखा है कभी इसको कैसी बन गई है आपकी दुनिया। 

      लगते हैं अमीर लोग मगर वास्तव में भिखारी हैं मांगते हैं दिल भरता नहीं चाहे जितना भी पास हो। क्या लोग होते थे थोड़ा भी पास होता था तो उसी में खुश रहते थे इतना ही नहीं चाहते थे कुछ बांट देना औरों को भी जिनके पास नहीं होता था कुछ भी। अब सभी पागल हैं अधिक हासिल करने को किसी भी सीमा तक जाने को राज़ी हैं। ख़ास होने के बाद दौलत शोहरत ताकत की हवस बढ़ती जाती है और बाहर से ऊंचे लगने वाले खुद अपने भीतर से डरे सहमे लगते हैं खो जाने का डर उनको और पाने को उकसाता है। अमीरी से दिल नहीं भरता बल्कि गरीबी का एहसास बढ़ता जाता है करोड़ों भी कम लगते हैं। और दौलत ताकत शोहरत हासिल करने को अपने आप को खो देते हैं। जिसे भी देखते हैं राजनीति की तरफ आकर्षित है ताकि ऐशो आराम और तमाम सत्ता के साधन पाकर देश के खज़ाने जनता के धन से खिलवाड़ कर सके। राजनीति का पतन इस हद तक गिर गया है कि राजनेताओं और शासन करने वाले अधिकारियों को कर्तव्य की बात क्या ईमानदारी की बात क्या मानवता तक नहीं याद रहती है। जिसे देखो देश सेवा जनता की भलाई की बात कह कर अपनी हवस मिटाना चाहता है। हम जिनको चुनते हैं जानते हैं उनका मकसद कोई देशभक्ति नहीं है जनकल्याण की भावना होती ही नहीं स्वार्थ ही उनका सब कुछ है। देख कर समझ कर भी खुद ही केवल अपने नहीं समाज और देश के हित की अनदेखी करते हैं और ऐसे गलत लोगों को सांसद विधायक बनाने का अपराध करते हैं देश के खिलाफ बिना विचारे। 

       मुझे नहीं भाती है ये दुनिया जो नज़र आती है खूबसूरत है चमकीली है मगर वास्तव में बड़ी डरावनी भयानक तस्वीर है इसकी जो अपने पीछे घना अंधकार समेटे हुए है। लोग शानदार लिबास और आलीशान घरों में रहते हैं मगर उनका मन और सोच घटिया और निचले स्तर की मतलबपरस्त होती है। रिश्ते नाते झूठे दिखावे के और केवल स्वार्थ को देखने वाले बन गए हैं। हमने जिनको नायक कहना शुरू कर दिया है उनका सच बेहद अजीब है उनका नैतिकता से कोई वास्ता नहीं है और वो देश समाज को कुछ भी देते नहीं हैं। आपने देखा होगा ख़ास वीवीआईपी लोगों को गांव की गरीबी की पुरानी यादों पर नम आंखे पौंछते हुए मगर क्या उनको अपने देश राज्य को तो क्या गांव से लगाव होता तो अपने पास दौलत का अंबार होते अपने उन बचपन के साथी लोगों की बदहाली मिटाने को कुछ भी नहीं कर सकते थे। कैमरे पर झूठा प्यार अपनापन दिखावा ही नहीं ये भी शोहरत पाने का ढंग बन गया है। आपको कई लोगों के भलाई और गरीबों की सहायता को किसी एनजीओ या संस्था की पता होगी जो कुछ उसी तरह है जैसे कोई डाकू लूट का कुछ हिस्सा अपने अपराधबोध मिटाने को दान आदि पर खर्च करते थे। कोई नहीं पूछता उनके पास हज़ारों करोड़ कैसे आते हैं काश सोचो तो समझोगे कि ये पैसा छल कपट धोखा ही नहीं कभी तो आपको ज़हर बेच कर भी हासिल किया होता है। हैरानी हुई होगी तो समझ लो , उनको विज्ञापन से करोड़ों मिले आपको खराब सामान बेचने की लूट के मुनाफे से। उनको पता होता है जिस को खरीदने की सलाह देते हैं खुद कभी उपयोग नहीं करते हैं। 

 ऐसा ही सरकार का भी हाल है विज्ञापन पर जितना धन बर्बाद किया जाता है अपने स्वार्थ की खातिर और जनता को मूर्ख बनाने को उसी से कितना कुछ जनता का कल्याण किया जा सकता था। मगर जिनको खुद अपने रहन सहन विलासिता पूर्वक शान से रहने पर रोज़ लाखों करोड़ों खर्च करना उचित लगता है उन से देश की बदहाली मिटाने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। देशभक्ति या देशसेवा अपने लिए सब हासिल करना नहीं जो भी पास है देश समाज को देने को कहते हैं। खुद को महान कहना या समझना वास्तव में सबसे अधिक छोटेपन का सबूत है। अपने जिनको बनाया आपके दिए कर से कुछ भी कर दावा करते हैं हमने ये किया है ये कितनी बेशर्मी की बात है। कोई और लोग हुआ करते थे जिनको नैतिकता का पास था और जो समझते थे उनको अपने नहीं देश समाज की चिंता पहले करनी है सत्ता मकसद नहीं था साधन था देश की समाज को आगे बढ़ाने का। अब देश समाज को पीछे धकेल कर दावा किया जाता है बड़े काम किया है। शायद फिर से विचार करना होगा कि भूल किस से हुई है कैसे हमने झूठे स्वार्थी और आडंबर करने वाले लोगों को नायक महानायक घोषित करने का कार्य कर अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने की बात की है। आपको लगता होगा मुझे ये समाज जीने के लायक लगता नहीं है। ये मेरी कल्पना का समाज नहीं है जिस में सभी को जीने का अधिकार होता समानता की न्याय की बात होती , यहां तो सब अपने स्वार्थ में पागल हैं।


अक्टूबर 04, 2019

POST : 1209 जम्हूरियत की हक़ीक़त ( चुनाव की बात ) डॉ लोक सेतिया

   जम्हूरियत की हक़ीक़त ( चुनाव की बात ) डॉ लोक सेतिया 

      असली कहानी कुछ और ही है। आपको अपनी पसंद से कोई विधायक सांसद नहीं चुनना है। सच तो ये है कि आपको बस इक दिन की बादशाही का आनंद उठाना है मगर आपकी पसंद नहीं होने होने का कोई अर्थ नहीं है। मान लो आधे से अधिक लोग नोटा पर उंगली दबा आएं तब भी जो खड़े हैं उन्हीं से जिसे अधिक मत मिले विजयी घोषित किया जाएगा जबकि मतलब होगा जनता किसी को नहीं चुनना चाहती है। शायर को भी इस बात का पता नहीं था जब उसने कहा था " जम्हूरियत वो तर्ज़े हुकूमत है कि जिस में , बंदों को गिना करते हैं तोला नहीं करते "। जाँनिसार अख़्तर कहते हैं " वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं , जो इश्क़ में तालिब नहीं मतलूब रहे हैं "। अर्थात मनोनित लोग ही शासक हैं आजकल और हम समझते हैं हम चुनते हैं। 

    हम अभी खेल का इंतज़ार कर रहे हैं जबकि खेल तो कभी का शुरू हो चुका है। सत्ता के खिलाड़ी बहुत पहले अपनी तैयारी करने लगते हैं बिसात बिछने से पहले ही अपनी गोटियां अपने पासे फैंकने की शुरुआत होने लगती है। बंदर बिल्लियों को बराबर बांटने को पलड़े पर तोलता है बिल्लियां बंदर की जय जयकार करती रहती हैं। कोई केंकड़ा उस पलड़े से इस पलड़े की तरफ आने को बेताब है जिधर पलड़ा झुका हुआ है। नेता दल बदलते हैं देख कर पलड़ा किस का झुका लगता है जनता खामोश है मगर जनता की राय क्या होगी ये कोई और लोग हैं जो समझने का दावा करते हैं। फिर जनता को समझाते हैं उनकी बताई राय को मानना ही जनता की भलाई है। चुनाव घोषित होने से पहले नेता अपनी सुविधा से किसी दल के बड़े नेता की करीबी हासिल करने लगते हैं ये सोचकर कि उसी की मर्ज़ी से दल की टिकट की दावेदारी पक्की हो जाएगी। मगर पता नहीं चलता कब किधर से कोई और आकर निर्णय करने का अधिकार पा जाता है। चुनाव घोषित होते होते सब का गणित बदल जाता है और फिर से हिसाब समझना पड़ता है। 

     पर्दे के सामने कुछ भी नहीं नज़र आता पीछे हलचल होती रहती है। सौदेबाज़ी से लेकर चापलूसी तक सब आज़माने के बाद साक्षात्कार का ढकोसला होता है। सवाल आसान जवाब कठिन होते हैं उलझाने की कोशिश की जाती है। धनबल बाहुबल ही नहीं जातीय समीकरण से लेकर जीतने को कुछ भी करने नियम कानून संविधान की परवाह नहीं करने की बात अनुभव और झूठ को सच कहने की कला जैसे गुण परखे जाते हैं। चंदा अलग बात है और टिकट की बोली गोपनीय अपनी जगह ऐसे कितने काम साथ साथ साधने होते हैं। आपको आदत है अच्छा खराब नहीं देखते चोर डाकू जैसा भी हो अपने किसी दल को मत देना है किसी धर्म या जातीयता की बात ध्यान रखनी है अपने पांव पर खुद कुल्हाड़ी मारनी है फिर चिल्लाना है हाय मर गए हम लोग। जब सभी उम्मीदवार सामने खड़े हो गए तब हम उनकी वास्तविकता को भूलकर इस बात की चर्चा करते हैं कि जीतना तो उसी को है जिसका शोर है तो हम उसी को वोट डालते हैं मतलब ये कि हम कितने बड़े नासमझ हैं जो चुनाव से पहले निर्णय कर लेते हैं कि हमारे वोट की कोई कीमत नहीं है और हम वोट नहीं भी डालते या किसी को देते तब भी जिसे जीतना है वो जीत जाएगा। जब हम खुद जम्हूरियत की ताकत को नहीं समझते और आज़माते तो फिर देश की हालत का दोष किसी और को देने से कुछ भी कैसे हो सकता है। 

        कभी सोचा है ये दलीय व्यवस्था क्या है शायद हमने विचार ही नहीं किया कि जब अपना विधायक या सांसद हमने चुनना है जो हमारे लिए काम करे हमारी बात कहे सुने तब किस को चुनाव लड़वाना ये कोई और कैसे निर्णय कर सकता है। संविधान किसी दलीय व्यवस्था की बात नहीं करता है और चुनाव आयोग का राजनैतिक दलों को महत्व देना नागरिक के समानता के बुनियादी अधिकार में हस्ताक्षेप है। ये कुछ लोगों का संगठित होकर अधिकांश लोगों को निरीह बेबस बनाकर सत्ता उन्हीं के हाथों में रखने का उपाय है। यकीन करिये इस व्यवस्था से आम जनता का शासन कभी नहीं स्थापित किया जा सकेगा। चोर चोर मौसेरे भाई की तरह उनका गठबंधन मनमानी कर सकता है और करता रहता है। कब कौन किधर होता है आप जो चुनकर भेजते हैं नहीं समझ सकते न जानते हैं और रोक भी नहीं सकते। क्या हमने चुनते समय खुद को उनके पास गिरवी रख दिया था , उनका आचरण यही दर्शाता है। वास्तव में देश की जनता को सही मायने में आज़ादी नहीं मिली है बस विदेशी शासक चले गए और अपने देश के कुछ मुट्ठी भर लोग सेवक का चोला पहन कर शासन करने लग गए हैं। अन्यथा हमारे निर्वाचित विधायक सांसद शाही अंदाज़ से कैसे रहते जब देश के असली मालिक आम नागरिक बदहाली और गरीबी में घुट घुट कर जीने को विवश हैं। नहीं ऐसी आज़ादी की कल्पना किसी भी देश की आज़ादी की जंग लड़ने वाले शहीद ने नहीं की थी , उनके नाम लेकर सत्ता और स्वार्थ के भूखे लोगों ने अपने लिए सब छीनने का काम किया है। कभी कभी तो लगता है ये आज़ादी इक छल है धोखा है और आज भी हम गुलामी भरा जीवन जीने को विवश हैं। केवल पांच साल बाद चुनाव में सत्ता बदलने से हासिल कुछ भी नहीं होता है। बल्कि अब तो हालत और भी खराब है क्योंकि अपनी ही चुनी हुई सरकार की गलती या मनमानी करने पर हम विरोध तो क्या आलोचना भी करते हैं तो भयभीत हो कर क्योंकि सत्ताधारी दल और शासन करने वाले सच कहने को देशहित विरोधी घोषित करने में संकोच नहीं करते हैं।

   देश की जनता से निर्वाचित होने से मिले अधिकारों का जनता के खिलाफ ही इस्तेमाल किया जाता है और समझाया जाता है कि जनादेश मिलने से उनकी हर बात उचित है जबकि वास्तव में सही जनादेश का अर्थ अगर देश की जनता का बहुमत समझा जाये तो अधिकांश सत्ता पचास फीसदी से कम वोट पाने वालों को मिलती रही है और दलीय व्यवस्था में विभाजित बहुमत सत्ता से बाहर रहता है। ये पहले भी हुआ करता था लेकिन इक सोच हुआ करती थी कि विपक्ष की अपनी अहमियत है मगर इधर कुछ वर्षों से सत्ता पर आसीन लोग विपक्ष को खत्म करने की बात खुले आम कहते हैं जिस का मतलब ही तानाशाही व्यवस्था की ओर जाना है। हम खामोश रहकर ये सब कब तक देख सकते हैं। अभी इतना ही और आखिर में मेरी इक ग़ज़ल।

  खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई -लोक सेतिया "तनहा"

खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई
हर सांस पर पहरे लगाना सब की चाहत बन गई।

इंसान की कीमत नहीं सिक्कों के इस बाज़ार में
सामान दुनिया का सभी की अब ज़रूरत बन गई।

बेनाम खत लिक्खे हुए कितने छुपा कर रख दिये
वो शख्स जाने कब मिले जिसकी अमानत बन गई।

मतलूब सब हाकिम बने तालिब नहीं कोई यहां
कैसे बताएं अब तुम्हें ऐसी सियासत बन गई।

( मतलूब=मनोनित। तालिब=निर्वाचित )

अनमोल रख कर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में
देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई।

सब दर्द बन जाते ग़ज़ल , खुशियां बनीं कविता नई
मैंने कहानी जब लिखी पैग़ामे-उल्फ़त बन गई।

लिखता रहा बेबाक सच " तनहा " ज़माना कह रहा
ऐसे  किसी की ज़िंदगी कैसी इबादत बन गई।   
 

 

POST : 1208 नेता की विशेषताएं ( अधर्म-कथाएं ) डॉ लोक सेतिया

      नेता की विशेषताएं ( अधर्म-कथाएं ) डॉ लोक सेतिया 

   लिखने वाले को सच की कलम ईमान की स्याही को फेंक देना होता है। झूठ के देवता की वंदना से नेता की हर कहानी को कथा कहना होता है। नेता की असलियत आसानी से सामने नहीं आती है जो होता नहीं दिखाई देने देता और जो कदापि नहीं वो नज़र आने को कुछ भी करता है। जनता को आप अबला नारी समझ सकते हैं और नेता उस शख़्स को समझना होगा जो उस पर बुरी नज़र रखता है उस बेचारी अबला नारी को भरोसा दिलाता रहता है कि मुझे तुझसे प्यार है और बिना किसी स्वार्थ के है। मुझे चिंता है कोई तुम्हारी अस्मत को नहीं लूट जाये मुझे रत्ती भर भी इच्छा नहीं है तुम्हें खराब नियत से छूने की। मगर दिल में हसरत छुपी रहती है कब मौका मिलते ही जनता का सब कुछ लूट सकता है। नेता महिला भी बन सकती है मगर यही बात उस में थोड़ा बदले ढंग से रहती है। साफ सच्ची बात नेता होने को मक्कार झूठा आवारा और हद दर्जे का स्वर्थी जो मतलब को पांव पकड़ सकता है तलवे चाट सकता है और अवसर मिलते ही गले लगाकर पीठ में छुरा घौंप सकता है और किसी का कत्ल करते हुए उसको कोई अपराधबोध नहीं होता है। सफ़ेद रंग के अंदर काला रंग छुपा रहता है इसलिए हर किसी को इस तरह के लोगों से सावधान रहना चाहिए। 

         चुनाव के समय किसी नेता को अपनी ईमानदारी सब से खूबसूरत दिखाई दी और बाकी जितने भी नेता चुनाव लड़ना चाहते थे दाग़ी और अपराधी हैं इसका प्रमाण देते रहे। नेता आरोप लगाते हैं अपने पर सवाल का जवाब देना तौहीन समझते हैं मेरे नाम के साथ जी नहीं लिखा आपकी खैर नहीं की बदले की भावना हर नेता में होती है। राजस्थान में लोग कुत्ते को कुत्तो जी कहकर बुलाते हैं आदर देना उनसे सीख सकते हैं। नेता जी से उनकी पत्नी सवाल कर सकती है ये हर महिला का विशेषाधिकार हुआ करता है। नशे में नेता जी किसी का नाम ले रहे थे मेरी जान हो तुम बिन नहीं जी सकता , नशा उतारना आता है हर पत्नी को। नशा उतरने के बाद पूछा बताओ किस कलमुंहीं की बात है बेशर्मी से हंस दिए जानेमन सत्ता की कुर्सी को प्यार से नाम दिया हुआ है मुझे गलत नहीं समझना आपको छोड़ किसी को देखना भी पाप है। पत्नी भोली नहीं होती मगर भोलापन का दिखावा करना जानती है और रंगे हाथ पकड़ कर फिर जो कहना है करना चाहती है पता चलता है। मगर भारतीय नारी देश की जनता की तरह सब सहती है रोने धोने के बाद झूठी कसम अपनी ही खाने पर चुप हो जाती है और नेता मन ही मन उसके मरने की बात पर चिंतन करता है नहीं मरने वाली कभी। मुझे मारकर खुद सती हो सकती है उपवास रखती है मगर जीने नहीं देती मरने भी नहीं देती है। 

    पत्नी ने सवाल किया ये क्या बकवास ब्यानबाज़ी की है ईमानदारी वाली बढ़ चढ़ कर बात कहने की कोई ज़रूरत नहीं थी। विधायक बनने से पहले जितना पैसा खर्च किया अपने इश्तिहार छपवाने पर उतना तो चुनाव आयोग इजाज़त भी नहीं देता बताओ चुनाव क्या खाक लड़ोगे बिना पैसे के। नेता जी बोले पगली तुम नहीं समझी समझने वाले समझ गए हैं दल की निष्ठा की ईमानदारी की बात है। बाकी सब दलबदलू लोग हैं उनके पिछले पाप धुले नहीं हैं सत्ता की चादर से ढके गए हैं छुपाने की नाकाम कोशिश है छुपे नहीं हैं किसी की नज़र से भी। ये जो पब्लिक है सब जानती है। मुझे भी पहचानती है झूठ सच सब जानती है मगर अंधी है देखती नहीं है आवाज़ के शोर से पहचानती है किस ने उसको बख्शा है। पत्नी को याद आया शादी से पहले का ज़माना नेता जी का जाल बिछाना और मछली का फंस जाना और फिर दोनों का समझना और पछताना। ये पहेली अनसुलझी रहने दो किस ने किस को मुहब्बत के जाल में फंसाया कोई नहीं ये राज़ जान पाया। 

    नेता जी ने फिर समझाया आपको सही अर्थ नहीं समझ आया। इक थानेदार ने ईमानदारी का मतलब यूं समझाया। आधा खाया आधा ऊपर पहुंचाया कभी भी हिस्सा नहीं चुराया , थाने की बोली को निभाया जितना बोया उतना फल खाया। उम्मीदवार बनने को टिकट की कीमत सबने बंद लिफाफे में लगाई है बस मैंने कीमत की जगह खाली छोड़ रस्म निभाई है जितनी मर्ज़ी लिख सकते हैं अपने  पिता की बात दोहराई है।  मुझे छोड़ने की मत पूछना किस किस ने कीमत पाई है बस तुम नहीं मानी मुसीबत घर लाई है। बात सुनते सुनते दोनों को नींद आई है। अधूरी कहानी समझ आपको पूरी नहीं आई है सुबह बाकी बताएंगे। मीनाकुमारी की बात याद आई है। ज़माना बड़े शौक से सुन रहा था हमीं सो गये दास्तां कहते कहते। नेता जी की नींद खुली तो नज़ारा बदल चुका है उनकी ईमानदारी किसी काम नहीं आई और जिस को सबसे बड़ा खराब कह रहे थे उसी को दल के बड़े नेताओं का वरदान मिला है। नेता जी अपने दिल के टूटने का खुद तमाशा देख रहे हैं और लोग उनके दिल के टुकड़ों को गिनते फिर रहे हैं।

        समझदार राजनेता वक़्त की नज़ाकत को समझते हैं विलाप नहीं करते मुराद पूरी नहीं होने पर। कोई और चौखट तलाश लेते हैं झट से और रंग बदलते हैं भगवा छोड़ हरा अपना लेते हैं। पांच साल पहले का रंग का बदलना भी उचित था फिर तीसरी बार बदलना भी अच्छा है। रंग बदलती दुनिया है नेताओं ने गिरगिट से सीखा है मौसम के साथ जिस डाली जिस पेड़ की शाख पर हो उसी जैसा हो जाना। ये विशेषता बड़े काम आती है।