Wednesday, 21 November 2018

बंद बक्से में छुपे राज़ ( पर्दे के पीछे ) डॉ लोक सेतिया

     बंद बक्से में छुपे राज़ ( पर्दे के पीछे ) डॉ लोक सेतिया 

    पर्दा उठता है तभी समझ आता है पीछे क्या क्या छुपा हुआ था। सीबीआई बनाम सीबीआई का सच ऐसा भी हो सकता है नहीं कल्पना तक की थी। आंच पीएमओ से आगे सुरक्षा सलाहकार तलक पहुंची तब लगा अभी कितनी पर्तें खुलनी हैं। देश का सुरक्षा सलाहकार जब सीबीआई में दखल दे रहा हो और बड़े बड़े अधिकारी अदालत को शपथ लेकर बता रहे हों कि उनको किस किस तरह से दबाव डालकर गंदा खेल खेला जा रहा था तब अदालत को इतनी गंदगी की सड़ांध से अधिक चिंता अपने आदेश की गोपनीयता की होना भी डराता है। आपको किसी संस्था की छवि बचाने की चिंता होनी चाहिए या ऐसे किसी संस्था को ठीक करने की , किसी के भीतर की गंदगी कालीन के नीचे दबाने छिपाने से उसको खत्म नहीं किया जा सकता है। जब कोई चेहरा दाग़दार हो तो आईने को दोष देना या उसे तोडना हल नहीं हो सकता। सब से बड़ी अदालत को सबसे पहले देश और संविधान की चिंता होनी चाहिए। सच जो भी है पूरा सामने लाना चाहिए बेशक सच कितना कड़वा ही क्यों नहीं हो। अदालत ने कहा कि आप सभी इस काबिल नहीं हैं कि आपकी बात सुनी जाए।  एक लाइन में बिना कहे सब समझा दिया सर्वोच्च न्यायलय ने सीबीआई केस की सुनवाई करते हुए इनकार ही कर दिया , पहले जवाब दो गोपनीय बात मीडिया तक लीक हुई क्यों। हो सकता है ऐसी तल्ख़ टिप्पणी को भी लोग चार दिन में भुला दें मगर समझा जाए तो ये बेहद चिंताजनक हालत है। बड़े बड़े पदों पर या नामी वकील समझे जाने के बावजूद भरोसा किस पर किया जाए नहीं समझ आता। ग़ज़ल कहने वाले गर्व करते हैं कि दो मिसरों में हर बात पूरी कर देते हैं मगर यहां कुछ शब्दों में एक लाइन में जो कहा उसका विस्तार बहुत है। बात निकली है तो दूर तलक जाएगी। सोचता हूं कभी मकान बड़े ऊंचे नहीं हुआ करते थे पर उन में रहने वालों के कद उनके आचरण के कारण महान हो जाते थे। नैतिकता और ईमानदारी सच्चाई की राह पर चल कर इंसान होकर भी फरिश्ता लगा करते थे। कोई छोटा सा ओहदा मिलते ही भावना रहती थी कि अपने पद की गरिमा को कम नहीं होने देना है आज बड़े से बड़ा अधिकारी विचार ही नहीं करता कि उस जगह होते हुई कोई घटिया काम कर कैसे सकता है। राजनेताओं के ब्यान और कारनामें देख कर लगता है लाज शर्म को ताक पर रख आए हैं। किसी वकील ने किसी राजनेता के झूठ बोलने पर इक वाक्य बोला था , ये कहना बेकार है कि आपको शर्म आनी चाहिए। लेकिन आज तमाम बड़े बड़े पद वाले अधिकारीयों और राजनेताओं की दशा उस तरह की दिखाई देती है। वास्तव में बहुत देर हो चुकी है फिर भी इस पर अंकुश लगाना होगा और तय करना होगा कि जो भी बड़े पद पर अथवा सत्ता के सिंहासन पर हो उसको अपनी मर्यादा का पालन करना लाज़मी हो अन्यथा उसको कोई भी अनुचित कार्य करते ही पद से हटाया जाना चाहिए।
           नियम सब पर लागू होने चाहिएं , मीडिया पर भी धर्म वालों पर भी कारोबार करने वालों पर भी , सरकार के अधिकारी कर्मचारी चाहे पुलिस न्यायपालिका का हिस्सा बने लोग हों या खुद को ख़ास समझने वाले नायक अभिनेता खिलाड़ी जो भी हो। अधिकार पाना चाहते हैं मगर उत्तरदायित्व निभाने को तैयार नहीं कोई भी। मनमानी या सत्ता और अधिकार की निरंकुशता पर रोक लगाना ज़रूरी है। हम समय के साथ सभ्य और परिपक्व होने की जगह गैरज़िम्मेदार बनते गये हैं और सत्ता पद अधिकार पाकर अपने कर्तव्य निर्वाह करने को भूल खुद को नाकाबिल साबित करने लगे हैं। ज्ञान और शिक्षा इंसान को बेहतर बनाने को है और अगर डॉक्टर वकील अधिकारी  या अख़बार के संपादक टीवी चैनल के एंकर पत्रकार बन कर हम इंसानियत ईमानदारी नैतिकता और कर्तव्य को भूलते हैं तो अच्छा होता अनपढ़ गंवार ही रहते। आपको हथियार मिलता है औरों को सुरक्षा देने को मगर आप अगर उसका उपयोग किसी को कत्ल करने या घायल करने को करते हैं तो आपका अपराध अधिक गंभीर हो जाता है। आजकल यही होता दिखाई देता है। मगर सवाल इंसाफ का है और देश के संविधान को सुरक्षित रखने का पहले है। ऐसा पहली बार होता दिखाई दिया है कि कोई सत्ता पाकर सब कुछ अपने आधीन करने को व्याकुल है बेताब है और इसके लिए किसी सीमा तक जाने को तैयार है। अब अगर गोपनीयता को ढाल बनाकर सत्ता के असंवैधानिक कार्यों पर पर्दा डाला जाएगा तो देश का लोकतंत्र ही नहीं बचेगा। हर बड़े पद पर किसी एक संस्था या उसकी विचारधारा के लोग नियुक्त करना इक खतरनाक सोच को दर्शाता है। आज सामने आता है कि काला धन घोटाले की बात करने वालों को देश की कोई चिंता नहीं थी उनको ऐसी बातों को औज़ार बनाकर सत्ता पर काबिज़ होना था। जब सत्ता मिली तो ये सब उन विषयों पर खामोश हैं। सत्ता का दुरूपयोग और मनमानी करने से देश की आर्थिक दशा बदहाल कर दी है और अच्छा कोई भी काम किया नहीं है। मानसिकता बन गई है केवल एक दल भी नहीं बस एक नेता ही सही बाकी जो उसका विरोध करता है सब नेता नहीं देश के विरोधी हैं।
             अभी रिज़र्व बैंक तक को अपने आधीन करना चाहते हैं केवल सत्ता में जीतने को चुनाव में अच्छी तस्वीर दिखाने को। इतना संकीर्ण नज़रिया देश को किस तरफ ले जाएगा। मगर धन वो भी जनता का पैसा खर्च कर अख़बार टीवी चैनलों तक को विवश कर दिया है वास्तविकता नहीं दिखाने को और मीडिया देश हित और अपना कर्तव्य भूल कर सत्ता का पक्षधर बन गया है। ऐसे में सरकार और संगठन संस्थाएं कोई भी गैरकानूनी या अनुचित अथवा अनैतिक कार्य करें तो जनता को खबर नहीं होगी और जब कोई अधिकारी अदालत को बताना चाहे तो उसको सुनना ज़रूरी नहीं है क्या। क्या अंतर है उस बाबा में जो धर्म और समाजसेवा की आड़ में गुनाहों का अपना अड्डा बनाकर महान संत कहलाता रहा और उस सरकार में जो जनता को झूठे सपने दिखला कर सत्ता पर आसीन होने के बाद तमाम मर्यादाओं को ताक पर रखकर सत्ता की हवस और अपने विस्तार या गुणगान में मस्त हो गई है।

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