Sunday, 12 March 2017

काश सत्ता पाने जैसा प्रयास जनसेवा को भी किया जाता ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

सब ठीक ठाक हो गया , वरमाला उन्हीं के गले में पहना दी। फिर भी वही पुराना डर मन में इस बार भी है। आज़ादी के बाद से सभी यही वादा करके उनसे भाग्य विधाता बनते रहे हैं कि हम अपने सुख की खातिर नहीं आये तेरे द्वारे पर बरात लेकर , हमारा मकसद तो तुझे मालिक बनाना है , सब कष्ट मिटा हर ख़ुशी तुझे देना चाहते हैं। काश जितनी कड़ी मेहनत नेता चुनाव जीतने और सत्ता हासिल करने को करते हैं , उतनी जनता की समस्याओं को दूर करने को करते तो आज कोई समस्या बाकी ही नहीं होती। मगर वो क्या करे बोल भी नहीं सकती ऐसे बंधन में जकड़ी गई है खुद ही बार बार। ये अजब रिवायत है उसकी दशा द्रोपती से भी खराब है , घूंघट में दुल्हन और चेहरा छुपाये दूल्हा , बाद में कोई और तय करेगा किस के नाम की वरमाला पहनाई थी। इक हरियाणवी कथा भी है दुनिया में बेबस दो ही हैं एक कन्या और दूसरी गाय , कन्या का पिता जिस को चुनता है उसकी हो जाती चुप छाप , और गाय का मालिक जिस के हाथ रस्सी दे देता उसी के साथ चल देती। जनता क्या है गरीब पिता की बेटी या गाय , शायद दोनों। सोचने लगी पूजा अर्चना तो मैं भी हर दिन करती रही फिर भी मेरी विनती कभी किसी भी भगवान देवी देवता खुदा यीसु वाहेगुरु ने स्वीकार नहीं की। सत्तर साल से बदहाली में जीती रही हूं , और ये बड़े बड़े नेता लाखों करोड़ों रूपये खर्च कर जो पूजा हवन आदि करते , करोड़ रूपये का चंदन मंदिर में दान दे आते सत्ता मिलते ही , उनको सब देता रहता भगवान भी। पूछूंगी इन से आप भ्र्ष्टाचार मिटाने की बात करते हैं , क्या भगवान भी धनवान की सुनता है। गरीब कहां से लायें इतना पैसा जिन को दो जून रोटी भी नसीब नहीं होती। मगर तीन साल से देश की जनता खामोश है , उसे भी अगले पांच साल इसी तरह चुप रहना है। खुद वरमाला डाली है तो फिर जैसा भी है उसका सम्मान करना है , उसका निरादर करना घोर अपराध है। वो अगर निरादर भी करे तब भी उसको अधिकार है , मुझे सहना है। मैं धरती हूं सब सहना जानती हूं , ये आकाश की तरह हैं आज़ाद हैं , आकाश क्या है इक सीमा मात्र है नज़र की। जाने ये कैसे लोग हैं जो जानते हैं इस सच को कि आखिर आदमी को  दो गज़ ज़मीन ही मिलती है। बहादुर शाह ज़फ़र जैसे बादशाह को अपने वतन में वो भी नहीं मिली इसी का ग़म था उनको। हर शासक और अधिक की चाह में दौड़ता रहता है।

No comments: