अक्टूबर 04, 2021

POST : 1544 मर गया , खाते पर लिख दिया { सबक चाचा चाय वाला } डॉ लोक सेतिया

   मर गया , खाते पर लिख दिया  { सबक  चाचा चाय वाला } 

                     डॉ लोक सेतिया 

     मुझे याद रहता है लोग भूल जाते हैं लेन देन हिसाब किताब क़र्ज़ उधार की बातों को। लेकिन जब भी पता चलता है किसी के निधन का तब उस से गिले शिकवे नाराज़गी से लेकर आपसी मतभेद और वादा नहीं निभाना जैसी बातों पर पूर्ण विराम लगा देता हूं।  हम जब दिल्ली में रहते थे क्लिनिक के नज़दीक चाय वाला खोखा लगाता था कोई , जिसको लोग चाचा कहते थे उसकी आदत थी जिनका बकाया वापस नहीं आता अपनी कॉपी पर उसके हिसाब पर लिख देता था मर गया। कई दुकानदार कहते चाचा बताओ क्या बकाया है चुकाना है ज़िंदा रहते मर गया लिखवाना नहीं चाहते हैं। मैंने कोशिश की है जिस किसी से लिया है उधार या क़र्ज़ लौटाना है समय पर और व्यवहार में हुई गलतियां भूल की क्षमा मांगनी है समय रहते ताकि किसी के मन में कोई खराब भावना नहीं बनी रहे। आज इस पर लिखना ज़रूरी लगा जब किसी के निधन की खबर पता चली। जिस घटना ने आपके जीवन को बड़ी क्षति पहुंचाई हो उसको भुलाना आसान नहीं होता है। बात 1983 दिसंबर की है , किसी राजनेता को उसी जगह विधानसभा उपचुनाव लड़ने को दफ्तर बनाना था जहां मैंने अपना कारोबार शुरू किया था कुछ महीने पहले ही। बड़े शरीफ समझे जाते नेता को अनुचित नहीं लगा कोई काम कर रहा जगह किराये पर लेकर कारोबार करता है उसको परेशान कर खुद महीने भर को जगह देने को विवश करने की बात करते। मैंने समझाया ये संभव नहीं धंधा चौपट हो जाएगा लेकिन शासक दल के नेता को मनमर्ज़ी की आदत होती है जो जैसे भी हो साम दाम दंड भेद आज़माते हैं। जब नहीं मानी बात तो तुरप का पत्ता उनके पास था उनका बेटा मेरा सहपाठी और कुछ दिन पहले जिस बैंक में कार्यरत उस से क़र्ज़ लिया था मैंने कारोबार करने को। 

दोस्त बन बन कर मिले मुझको मिटाने वाले। आया मेरे पास दोस्ती की लाज रखने को विनती की आपको जगह खाली नहीं करनी है बस महीने के बचे दिन अपने कारोबार की जगह के अंदर से ख़ास ख़ास लोगों को जाने का रास्ता देना है थोड़ा इंडोर बंद कर। अगर आपका कोई नुकसान होगा तो ज़िम्मेदार होंगे भरोसा रखो। विश्वास कर लिहाज़ किया और दो दिन बाद किसी गुंडे अपराधी की तरह साज़िश कर उसके कज़न भाई ने मेरी अनुपस्थिति में मेरा सब फिटिंग फ़र्नीचर ढांचा तोड़ फोड़ डाला। मुझे घर से मेरा कर्मचारी बुलाने गया मगर मेरे पहुंचने तक जिसको क़त्ल करना था कर के चंपत हो चुका था। शाम को मैं बदहाल बेबस घायल और इस अपने शहर में असहाय अकेला अपने सहपाठी से मिला और कहा आपने वादा किया था देख लो कितना बर्बाद कर दिया है। उसने कहा ये जिसने किया है मेरा भाई है पिता का चुनावी कार्य कर रहा है बेहद अनुचित है मगर आप अभी इस विषय पर कोई कठोर कदम मत उठाना अन्यथा पिता को चुनावी नुकसान होगा , जो हुआ ठीक नहीं किया जा सकता , लेकिन आपकी भरपाई और भविष्य की सुरक्षा मेरा कर्तव्य है। लेकिन अपनी कही बात कभी निभाई नहीं उस ने। उसको शायद एहसास नहीं रहा जीवन भर अपनी बात और वादा नहीं निभाने एवं मेरी ज़िंदगी की तबाही पर क्षमा मांगना भी ज़रूरी नहीं समझा। उनके पिता चुनाव जीत गए मगर उन्हें अपने अनुचित आचरण पर कोई शर्मिंदगी नहीं हुई दिखाई दी। बदले की भावना आदत नहीं अन्याय सह कर भी खामोश रहता रहा। कभी मैंने अपने साथ अन्याय करने वालों से कभी अनुचित व्यवहार नहीं किया बल्कि जतलाया तक नहीं कि आपने मुझे अच्छाई के बदले क्या दिया है। ऐसे लोग पाप अन्याय ज़ुल्म करने पर खेद नहीं जताते हैं धार्मिकता का चोला पहन समाज सेवा का आडंबर अपनी दौलत से जो अनुचित ढंग से अर्जित की होती है करते रहते हैं। बड़े दानवीर समाजसेवक होने का दिखावा करने वाले झूठे और अत्याचारी होते हैं। शायद ऊपरवाला सब हिसाब रखता है वहां कोई चालाकी काम नहीं आती होगी सब उस पर छोड़ना उचित है।

पिछले जन्म अगले जन्म की बात नहीं जानता मैं मगर तीन लोगों ने जो किया उसको पाप अपराध से बढ़कर अमानवीय कृत्य समझता हूं। उनके दुनिया से जाने के बाद अपने मन याददास्त से उस गुनाह को मिटाना पड़ता है। ये वास्तविक घटना है सच्ची कहानी या हादिसा हुआ मेरे साथ उसको लेकर इक नज़्म लिखी थी डायरी पर 1983 के हादिसे के नाम उसको दोहराता हूं। ये उस घटना का असर है जो मुझे किसी राजनेता पर भरोसा करना कभी ठीक नहीं लगता है। राजनेता बेरहम और मतलबी ही नहीं अहंकारी और अत्याचारी भी होते हैं। अंत में वही नज़्म। 

बड़े लोग ( नज़्म ) डॉ  लोक सेतिया

बड़े लोग बड़े छोटे होते हैं
कहते हैं कुछ
समझ आता है और

आ मत जाना
इनकी बातों में
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं।

इन्हें पहचान लो
ठीक से आज
कल तुम्हें ये
नहीं पहचानेंगे

किधर जाएं ये
खबर क्या है
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं।

दुश्मनी से
बुरी दोस्ती इनकी
आ गए हैं
तो खुदा खैर करे

ये वो हैं जो
क़त्ल करने के बाद
कब्र पे आ के रोते होते हैं। 


 

अक्टूबर 01, 2021

POST : 1543 ग़रीब भगवान भरोसे , रईस सरकार भरोसे ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

ग़रीब भगवान भरोसे , रईस सरकार भरोसे ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

ये राजनीति का मंच है दर्शक अंधेरे में रहते हैं सच कभी नहीं दिखाई देता झूठ का खूबसूरत दिलफ़रेब नज़ारा सामने रहता है। नाटक एक साथ कितनी जगह खेला जाता है दिल्ली से पंजाब उत्तर प्रदेश ही नहीं जाने कहां कहां पटकथा लिखी जाती है। राजनैतिक दलों में हंसी ठिठोली होती रहती है बंदरबांट का झगड़ा बढ़ते बढ़ते पता ही नहीं चलता कब घर की दीवारों में दरार से बाहरी लोग तांक झांक कर चटखारे लेने लगते हैं। जो खुद अपने दल में सामान्य कहलाता है विरोधी दल में उसी बात को अफ़सोसनाक और देश राज्य समाज के हित को ठेस पहुंचाने वाली गंभीर बात कहा जाता है। इस सिरे से उस दूसरे छोर तक सभी राजनीतिक दल और नेता इक थाली के चट्टे बट्टे हैं। सरकार किसी भी दल की हो जानती मानती और आचरण करती है कि गरीब के लिए भगवान है तकदीर संवारने को सरकार को अपनी गरीबी और रईसों की भूख मिटानी होती है। शासक वर्ग नेता अधिकारी कर्मचारी सभी अपने लिए सब पाने क्या छीन लेने की सोच रखते हैं देने को उनके पास कुछ नहीं होता है। झूठे वादे छल फरेब खुदगर्ज़ी इनके झोले में यही सब रहता है जनता समाज देश को देने को। उनकी कही हर बात जो खबर समझी जाती है खुद इनके मन में उन बातों का कोई महत्व नहीं होता है। आपने अक्सर सुना होगा राजनीति में कोई हमेशा का दोस्त होता है न कोई दुश्मन वास्तव में राजनीति और सरकार में दोस्ती दुश्मनी साथ साथ चलती रहती हैं वास्तव में कोई किसी का नहीं सभी सत्ता धन दौलत ऐशो-आराम की खातिर कुछ भी करते रहते हैं। 
 
चलो आधुनिक युग की इक कथा लिखते हैं , अपने क़ातिल को खुदा समझते हैं। दर्द और ज़ख़्म मिला जिनसे उन्हीं से मरहम और दवा मांगते हैं। नासमझ लोग किस से क्या मांगते हैं मौत के सौदागर से ज़िंदगी का फ़लसफ़ा मांगते हैं। सच्ची घटना है बेगुनाह को बेरहम पुलिस ने खुले आम क़त्ल किया , मरने वाले के करीबी को शिकायत दर्ज नहीं करवाने का मशवरा दिया पहले समझाया अदालत में इंसाफ मिलता नहीं तारीख़ मिलती है। यकीन करना गरीब लोग समझाने से समझ जाते हैं कारोबारी अपना गणित लगाते हैं। सरकार की चौखट पे सर झुकाते हैं जांच का भरोसा और मनचाही मुराद पाते हैं। शोकसभा में सभी खेदजनक घटना क़त्ल होने को बतलाते हैं अफ़सोस सच्ची बात भूल जाते हैं अपने परिजन की मौत के बदले जो पाकर संतुष्ट होते हैं उसकी आत्मा को कितना तड़पाते हैं। जाने इंसाफ किसको कहते हैं समझौता सौदेबाज़ी और ज़िंदगी की कीमत हर किसी के पास तराज़ू है न्याय की बात कौन करते हैं। सरकार जांच करवाएगी बात आपको समझ नहीं आएगी पुलिस खुद दिमाग़ लड़ाएगी भविष्य में क़त्ल कैसे करना है जुर्म किस किस पर धरना है ख़ुदकुशी साबित करना है या हादिसा बताना है सवालों के हल खोज लाएगी। क़त्ल की खबर चार दिन बाद वारदात टीवी सीरियल में मनोरंजन करवाएगी। सरकार दाग़ी पुलिस वालों की सूचि बनाएगी ज़रूरत पड़ने पर उन्हीं से अपराध करवाएगी। 
 
पुलिस न्यायपालिका सरकारी अधिकारी सबका इस्तेमाल सत्ताधारी करते हैं जो आदेश जनाब शासक से नौकरशाह कहते हैं। राजनेता निष्पक्ष जांच सरकारी विभाग को ईमानदारी से फ़र्ज़ निभाने नागरिक को निडर होकर आज़ादी से जीने जैसी बुनियादी बातों को कहां मानते हैं। अपने शासक होने के अहंकार में करते जाते हैं जो भी ठानते हैं। शपथ संविधान की उठाई थी नहीं इक पल भी निभाई थी अपराधियों से नज़दीकी बढ़ाई थी उलझन खुद और उलझाई थी। राजनीति में रहा बाक़ी ईमान नहीं है सरकार सब कुछ है भगवान नहीं है। सोचते हैं गरीब बेबस लोग उनका भी किया जाए क़त्ल परिवार को मिले पैसा रोज़गार मरना काम आएगा आजकल जीना है बेकार। कितना अच्छा होता है पुलिस अदालत सरकार का बढ़ता अत्याचार मौत का व्यौपार बन गया कारोबार विपक्ष को चाहिए सिर्फ इक हथियार वर्ना उनका कोई नहीं यार बस वोटों से है प्यार। आत्मा नहीं पूछती कभी सवाल क्या ज़िंदगी छीनने वाले को पकड़ेगा कोई कानून का जाल। आदमी को सामान बना दिया है जिनको उस से नहीं मिलेगा क़त्ल होने से जो मिलता रहता जीते हुए उनको मुआवज़ा दिया है जो मर गया उसने जीकर हंसना मुस्कुराना था उसकी आत्मा को भटकना है देखना सबको क्या मिला किसको गिला है। बड़ा अजीब दोस्तो ये सिलसिला है बाहर से सख़्त अंदर से पिलपिला है। 
 
इक खबर खिलाड़ी की खेल की है खुद हिटविकेट होने का तमाशा है राजनीति मंदिर का बताशा है। लंगड़ी लगाई सीढ़ी हटाई लिफ्ट लगाई बाप को बात समझ नहीं आई भाई को मिली जब सत्ता की लुगाई भाई ने ठोकर लगाई ठिकाने अक़्ल आई। कुनबा सारा बंटने लगा है ऊंठ पहाड़ से डरने लगा है हर कोई बना तमाशबीन है संपेरा बजा रहा बीन है। इंट से इंट बजानी है विकेट खोकर अभी सेंचुरी लगानी है कॉमेडी वाला दरवाज़ा भी खटखटाया है शायरी से चाटुकारिता कर सकते हैं हर हसीना पर मर सकते हैं। किया था क़त्ल तीस साल पहले किसको इंसाफ मिला नहले पर पड़े दहले। बात कातिल सच इंसाफ की करता है लगता है जुर्म अपने पर हंसता है। ढोकने की बात दोनों करते हैं राम से कौन डरे वाहेगुरु से कौन डरते हैं। अब यहां शरीक ए जुर्म सभी हैं टीवी अखबार सोशल मीडिया वाले असलियत नहीं दिखाते हैं जो भी सरकार सत्ता में होती है उसकी डफली बजाते हैं करोड़ों का विज्ञापन कारोबार पाते हैं। सच के झंडाबरदार बने फिरते हैं अर्थी सच की खुद उठाते हैं। ये सभी मिट्टी के खिलौने हैं भगवान हैं जतलाते हैं। देश की बदहाली के गुनहगार ये भी हैं विशेषाधिकार पाकर इठलाते हैं पुलिस अधिकारी नेता सभी से दोस्ती रखते हैं खूब मलाई खाते हैं। कहने को बाकी बहुत फ़साने हैं पर विराम अभी लगाते हैं।

सितंबर 28, 2021

POST : 1542 गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया

गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया 

दो लोग दो बातें दो भिन्न भिन्न सोच को दर्शाती हैं। बात फ़िल्मी जगत की है बात उसूलों की है। ताजमहल फ़िल्म के लिए साहिर लुधियानवी को गीत लिखने को अनुरोध किया गया क्योंकि तब फ़िल्मी गीतकारों में उनका नाम का सिक्का चलता था उनकी लेखनी के कायल सभी लोग थे। मगर उन्होंने मना कर दिया था पैसे को ठोकर लगाने का कारण था उनकी लिखी ग़ज़ल फ़िल्म की खूबसूरत नज़्म ताजमहल शीर्षक की। भला ये कैसे हो सकता है कि ये लिख कर कि मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझको , बज़्म-ए -शाही में गरीबों का गुज़र क्या मअ'नी। सिर्फ इसलिए कि उनके पास दौलत थी अपनी मुहब्बत की निशानी बनाने को उनका इश्क़ महान था ये मज़ाक है उन मुफ़्लिस प्यार करने वालों से जिनके पास तश्हीर का सामान नहीं था। ये लिखने के बाद ताजमहल को मुहब्बत की निशानी बताना खुद से बेईमानी होती। ये बात याद आई जब अमिताभ बच्चन जी से किसी ने किसी विज्ञापन में काम करने पर सवाल किया और उनका जवाब था पैसे के लिए करना उनकी विवशता है अर्थात तथाकथित सदी का महानायक कहलाने वाला बाज़ार का बिकाऊ सामान है। पैसा मिले तो समाज को हानिकारक संदेश देने में कोई संकोच नहीं इसलिए कि वो नहीं करते तो कोई और भाजी मार जाता। आजकल करोड़पति बनाने का खेल खिला रहे हैं वही पुराने जानकर विशेषज्ञ बनकर आ रहे हैं उनके सभी जवाब विवरण सहित सही मिलते हैं ख़ास अथिति शुक्रवार आते हैं कभी नहीं हारते जीत कर हर सप्ताह उतनी राशि पाते हैं। ये सब इत्तेफ़ाक़ बार बार होते हैं लोग भगवान समझते हैं जिनको उनके निराले रंग भाते हैं शानदार ढंग से उल्लू बनाते हैं। 
 
सेंट्रल विस्टा रिडेवलपमेंट प्रोजेक्ट आधुनिक ताजमहल की तरह है शहंशाह ख़ास विमान से अमेरिका से घर वापस आते हैं सीधे मुआयना करने पहुंच इतराते हैं। क़र्ज़ लेकर घी पियो सबको समझाते हैं सरकार बड़े लोग होते हैं हिसाब किताब नहीं सोचते मनचाही मुराद पाते हैं। क्या समझा था ये क्या साबित हुआ देशवासी मन ही मन पछताते हैं जिस देश में करोड़ों लोग भूखे नंगे बदहाल हैं राजनेता अधिकारी खूब जमकर खाते हैं जनता को इक नया कार्ड देकर बहलाते हैं। सावन के अंधे हर तरफ हरियाली देख कर झूमते नाचते गाते हैं सत्ताधारी संविधान अदालत सबको ठेंगा दिखाते हैं। ऐसी इमारतों महलों शानदार नज़ारों से बदनसीब जनता का पेट नहीं भरता है जाने किन लोगों की चाहत का सामान है हमसे पूछो बस तो वक़्त रोटी रहने को घर पीने को पानी बुनियादी सुविधाओं का अरमान है। अपने हिस्से कुछ नहीं क्योंकि कुछ ख़ास लोगों को जितना मिलता है थोड़ा लगता है। देश की वास्तविक तस्वीर दिखाने वाला सरकार को राह का रोड़ा लगता है। उनको प्यार है दौलतमंद दुनिया से कितना प्यारा उनको बैंक से क़र्ज़ लेकर चंपत होने वाला भगोड़ा लगता है। ताजमहल की तरह कितनी भव्य आलीशान इमारतें अपनी बुनियाद में शासकों के ज़ुल्मों और बेमौत ज़िंदा लाशों को छुपाये रखते हैं। अब कोई साहिर भी नहीं जो उनकी वास्तविकता पर अपनी कलम से कोई कविता कहानी नज़्म लिखता जिस को पढ़कर शायद कभी इतिहास की कालिख़ का पन्ना कहीं दर्ज होता भविष्य को अंधकार और रौशनी का अंतर समझाने को।
 
 

सितंबर 26, 2021

POST : 1541 स्वर्ग-नर्क मोक्ष और पितृपक्ष ( सत्य की खोज ) डॉ लोक सेतिया

  स्वर्ग - नर्क मोक्ष और पितृपक्ष ( सत्य की खोज ) डॉ लोक सेतिया 

  उलझन क्या है जीवन भर अगले पिछले जन्म की चिंता रहती है , ज़िंदगी यही है जियो अच्छे इंसान बनकर खुलकर कभी समझते ही नहीं। जिन रिश्तों को ज़िंदा रहते निभाना मुसीबत लगता रहा किसलिए अगले जन्म उनकी चाह रखना। सच कहूं तो जिनसे मिलकर खुश नहीं होते जिन्होंने चैन सकून छीन लिया उनसे फिर किसी जन्म में मुलाकात नहीं हो तो अच्छा। अपने स्वार्थ अपनी ज़रूरत अपने अहंकार के अधीन होकर काम समाज को नर्कीय बनाने वाले करते रहे मरने के बाद स्वर्ग मोक्ष या फिर से जन्म लेकर जो नहीं मिला उसको पाने अथवा जो किया नहीं उसको करने की ख़्वाहिश लेकर मरना फज़ूल है। पितृपक्ष को लेकर क्या क्या नहीं सुनते कहते समझने की कोशिश ही नहीं करते हैं। इक मंदिर बना हुआ है जहां मानते हैं महाभारत के बाद अपने भाई बंधुओं को युद्ध में मारने के बाद उनकी आत्माओं की मुक्ति का अनुष्ठान किया गया। राज की लालसा या कहने को धर्म की स्थापना की खातिर जिनको मौत के घाट उतारा उनके लिए ये भावना कहीं खुद अपने भीतर के बोझ और समाज में अपनी छवि को धूमिल होने से बचने का ढंग था। सबको अपने अच्छे बुरे कर्मों का फल मिलना विधि का विधान है तो कोई बदल नहीं सकता।
 
बाप दादा की मौत के बाद श्रद्धांजलि सभा में उनकी आत्मा के परमात्मा में विलीन होने को शब्द कीर्तन आदि कर लिया तब भी संशय क्यों उनकी आत्मा के भटकते रहने का। जब किसी कर्मकांड पर भरोसा नहीं तब उसको परंपरा निभाने और लोकलाज दिखावे को करने का औचितिय क्या है। सबसे अजीब बात ये है कि ऐसा करवाने का उपदेश देने वाले गीता जैसे धर्मग्रंथ को समझाने वाले अपनी मौत के बाद समाधि स्थल आश्रम मठ बनवाने की इच्छा जताते हैं। जीवन भर धर्म उपदेश पूजा अर्चना समाज को कल्याण का मार्ग दिखाते रहे जो उनको अपनी आत्मा की मुक्ति और परमात्मा से मिलान का भरोसा होना चाहिए , फिर जिस संसार को मिथ्या बताते रहे उसी में अपनी पहचान की चिंता अज्ञानता होगी। लेकिन जब कोई धार्मिक कर्मकांड पूजा अर्चना जैसे कार्य धन दौलत दान दक्षणा पाने को करता है तब उसको ईश्वर की भक्ति उपासना नहीं बल्कि वेतन लेकर काम करने जैसा समझा जा सकता है। तभी ऐसे साधु संत आपको अच्छे कर्म सच्चाई भलाई की राह चलने से जीवन सार्थक करने की शिक्षा को छोड़ वो सब करने की बात कहते हैं जिन से खुद उनका भला हो। 
 
चिंतन करने पर दो बातें समझ आती हैं , अगर स्वर्ग मोक्ष पाना चाहते हैं तो अपने जीवन में भलाई अच्छाई सच्चाई की राह चलें झूठ छल कपट का आचरण छोड़ कर। अन्यथा ऐसा संकल्प अपने अंतर्मन में करें कि अगर फिर से कोई जन्म मिले तो जो कर नहीं पाये उसको करना है। अभी तो स्वर्ग नर्क मोक्ष की  व्यर्थ की चिंता में अपना जीवन बर्बाद नहीं करें।  

 

सितंबर 22, 2021

POST : 1540 गठबंधन सरकार से विवाह संबंध तक ( हंसते - हंसाते ) डॉ लोक सेतिया

गठबंधन सरकार से विवाह संबंध तक ( हंसते - हंसाते ) डॉ लोक सेतिया 

समझ का फेर है अन्यथा विधाता के निर्णय में होती कभी नहीं इक पल की देर है माना साफ नज़र आता अंधेर ही अंधेर है सरकार क्या कमाल है सब कुछ बेहाल बदहाल है किस्मत की बात नहीं बिन बादल हुई बरसात नहीं अंधे के हाथ लगी बटेर है। वक़्त वक़्त की बात है दिन अंधेरे हैं जगमगाती रात है दिल्ली राजधानी है अजब करामात है सेवक महल में रहता मालिक को मिला फुटपाथ है। राजा है जिसकी नहीं रानी है उसकी रोज़ नई कोई कहानी है बिल्ली मौसी शेर की खो गई नानी है बस इतनी सी परेशानी है। शेर और बुढ़िया की सुनी कभी कहानी है बात समझने की है आपको समझानी है शेर से सभी डरते थे इंसान उसका शिकार कर लेता था उसने ईश्वर से इंसान की भाषा समझने का वरदान हासिल कर लिया और इंसान की बात सुनकर निडर होकर गांव बस्ती जाने लगा। इक झौंपड़ी से इक बुढ़िया की आवाज़ आती सुनाई देती है बड़बड़ाती है मेरा गधा धोबी वापस देने नहीं आया ज़मींदार के घर मिट्टी पहुंचानी है रात होने को है। मैं ज़मींदार से नहीं डरती मेरे सामने शेर भी आये तो नहीं डरती सुनकर शेर हैरान हो जाता है। बुढ़िया को शेर दिखाई देता है अंधेरे में समझती है मेरा गधा है। शेर दहाड़ता है तो बुढ़िया कहती है शेर समझने लगा खुद को मैं तुझको तेरी औकात बताती हूं और उसके कान पकड़ उस पर मिट्टी लदवाती है और ज़मींदार के घर गिरवाती है। शेर की पीठ टूट जाती है और भाग जाता है। इस नीति कथा की शिक्षा है की भीतर से डर कर आधी लड़ाई पहले ही हार जाते है , यही हालत सरकार जनता को लेकर है और पति पत्नी को लेकर भी। 
 
  कोई कहानी उपन्यास नहीं है ये बड़ी लंबी महाकथा है जिस के हर अध्याय का गंभीर और गहरा अर्थ है। आदमी का जीवन से ताकत का विवश कमज़ोर से निरंतर संघर्ष है। दुनिया की संरचना में कोई नहीं बड़ा छोटा था सब आज़ाद थे खुश थे आबाद थे ख़ुदग़र्ज़ी ने कयामत ढाई है भूलकर प्यार की पढ़ाई नफरत इतनी बढ़ाई है दुश्मन लगता प्यारा दोस्त से नहीं मिलने की कसम खाई है। सत्ता का खेल सांडों की लड़ाई है दलों की राजनीति में खेत खलियान की शामत आई है। सरकार बनाकर हर कोई पछताया है पाया नहीं धेला इक जो था जेब का रुपया गंवाया है। जंग है शतरंज है खेल मगर जारी है जनता की विनती है फरमान सरकारी है सत्ता दुनिया की सबसे बड़ी बिमारी है लाईलाज रोग है चारागर की लाचारी है। इश्क़ वाली भी मुश्किल बड़ी भारी है दवा देने से दर्द बढ़ने की लाचारी है। शादी करना मज़बूरी नहीं है खाना नहीं खाना लड्डू मर्ज़ी है पछताना ज़रूरी है ज़रूरी नहीं है। खुद क़ातिल को मसीहा बनाते हैं सरकार बनाकर नई मुसीबत बुलाते हैं शासक अपनी मनमानी चलाते हैं बाकी सब पर हुक्म चलाते हैं। कायदे कानून बनाए जाते हैं पर कसम खाई थी न्याय सत्यनिष्ठा की भूल जाते हैं। कायदा कानून कायम रखने को जो भी विभाग बनाते हैं उनकी बात मत पूछो ऐसे पेड़ हैं जो आग बरसाते हैं। शासक वर्ग मौज उड़ाते हैं और आम नागरिक शिक्षा स्वास्थ्य सेवाओं गरीबी भूख जैसी बुनियादी समस्याओं की बदहाली से तड़पते हुए जीते हैं मर जाते हैं। सभी नये शासक स्वर्ग के ख़्वाब दिखलाते हैं जन्नत ज़िंदा रहते क्या कभी  कोई पाते हैं। चोर लुटेरे अपराधी निर्दोष साबित होते हैं और बेगुनाही की सज़ा शरीफ लोग पाते हैं। न्याय-व्यवस्था समानता मौलिक अधिकार कहने भर को खोखले आदर्श हैं वास्तव में कहीं नज़र नहीं आते हैं। दुनिया भर के लोगों ने सरकार बनाई है परेशानी दूर क्या होती और बढ़ाई है। आजकल सबसे बड़ी समस्या खुद सरकार है अंधी बहरी लूली लंगड़ी बेबस लगती है मगर वास्तव में दोधारी तलवार है। भारत देश की सरकार जाने किस युग का अवतार है सच की बात नहीं होती झूठ की जय-जयकार है सिर्फ इक इश्तिहार है।
 
विषय को थोड़ा बदलते हैं फ़ितरत को जो बदलते हैं अपने आप को छलते हैं सोचते हैं खूबसूरत दुनिया बसाएंगे फूल ही फूल खिलाकर हंसेंगे मुस्कुराएंगे गुलाब को नहीं पहचानते हैं शबनम को बारिश मानते हैं। गुलाब में कांटे छिपे रहते हैं चुभन होती है तो चिल्लाते हैं अश्क़ चुपके चुपके बहाते हैं। अकेलेपन से कभी घबराए थे कोई साथी ढूंढ कर लाये थे जश्न मनाए थे गीत गाये थे डोली बरात सब सजाये थे। चार दिन की चांदनी रात होती है अंधेरे मिलते हैं रौशनी की बात होती है। निभाना बड़ा मुश्किल लगता है दामन छुड़ाना भी नहीं चाहते हैं वो सुबह कभी तो आएगी वो सुबह कभी तो आएगी इंतज़ार उम्र भर करते हैं। लोग क्या कहेंगे इस से डरते हैं आहें चुपके चुपके भरते हैं वो भी क्या दिन थे जब आज़ाद परिंदे थे बंद पिंजरे में याद करते हैं। पति बनकर राजा बाबू गुलाम हुए पत्नी बन रानी बन राज करने के ख़त्म अरमान हुए दोनों को शिकायत दोनों को मुहब्बत भी है साथ और दूर की मुसीबत भी है। न जाने किसने विवाह संबंध की रस्म बनाई थी क्या उसका कोई ख़सम था क्या उसकी कोई लुगाई थी। गुड्डे गुड़ियों का खेल लगता था अच्छा शायद बड़े बूढ़ों ने की चतुराई थी बचपन से मन में चाहत जगाई थी यौवन आया मत मारी गई सामने कुंवां था पीछे गहरी खाई थी। किसी दार्शनिक ने कथा सुनाई थी जिस दिन हुई किसी की सगाई थी सब लोग चुटकला समझ हंस दिए कौन समझता पीर पराई थी। 
 
भगवान जोड़ियां बनाता है ये झूठ है जो सबको भाता है किसी पर लिखा कोई नाम नहीं सबका आगाज़ है अंजाम नहीं। कौन किसका भाग्य-विधाता है अपने मुकद्दर का हर कोई खाता है विवाह शादी करवाने वाला भी हमने देखा अकेला रह जाता है। जीवन साथी जब लोग चुनते हैं तब कभी नहीं सोचते क्या करते हैं हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती खुद क्या हैं क्या बताते हैं सच से किसलिए घबराते हैं। साथ रहना है खुश भी रहना है तो समझना समझाना ज़रूरी है क्या हर सुख दुःख में निभाना चाहते हैं ये बंधन इक विवशता मज़बूरी है स्वभाव प्यार आदर दोनों को दिल से होना ज़रूरी है। जन्म जन्म का रिश्ता कहते हैं शर्तों की क्यों बात होती है कितना दिखावा कितना तमाशा क्या भला मेल मुलाकात होती है। सबने कितने मापदंड बनाये हुए हैं पढ़ाई लिखाई शक़्ल सूरत धन दौलत ऐशो-आराम की चाहत ये सभी ख़्वाब की बातें हैं क्यों हक़ीक़त को सब समझते हैं। कोई भी इंसान मुकम्मल नहीं होता है आधा आधा बाक़ी रहता है सभी को मिलकर साथी को पूरा करना होता है। हम एक दूसरे को आज़माते हैं जो मिला उसको समझते नहीं नहीं मिला उसका अफ़सोस जताते हैं। 
 

Vector Illustration - Separate, together road sign. EPS Clipart gg64650021  - GoGraph


सितंबर 21, 2021

POST : 1539 दुनिया की सबसे बड़ी दौलत ( बेटी का प्यार-विश्वास ) डॉ लोक सेतिया

 दुनिया की सबसे बड़ी दौलत ( बेटी का प्यार-विश्वास ) डॉ लोक सेतिया 

     11 साल पहले मुझे बेटी ने जाने क्या सोचकर प्यार आदर विश्वास का एहसास दिलवाता ये अनमोल प्रमाणपत्र दिया था दुनिया का सबसे अच्छा पिता होने का। शायद अन्य कोई ईनाम पुरुस्कार धन दौलत मैंने अर्जित नहीं की जीवन भर में। ऐसा नहीं कि मैंने अपने बच्चों बेटी बेटे को सब कुछ दिया हो बल्कि ज़िंदगी में हमेशा संघर्ष करते हुए सभी अपनों को जितना देना चाहता था नहीं दे पाया जिसका एहसास मुझे रहता है। शायद इक बेटी ही इस तरह भावना को समझ सकती है और खुले मन से इज़हार कर सकती है अन्य कोई नाता इतना उदार नहीं हो सकता जो नहीं मिला जो सब उसको भूलकर जितना भरपूर कोशिश कर दिया किसी ने उसका मोल समझना। अनुपम खेर की इक फ़िल्म आई थी जिस में इक बेटी अपने पिता को निराश जीवन से निकालने को उस पर भरोसा करती है और जब तमाम लोग उसका इम्तिहान लेते हैं और असफल साबित करने की भरसक कोशिश करते हैं लेकिन अनुपम खेर कहते हैं उनको आज सिर्फ बेटी पूजा की नज़र में खुद को सही साबित करना है और किसी की परवाह नहीं कौन क्या समझता है। याद नहीं बचपन से आज तलक कोई ऐसा ईनाम पुरुस्कार प्रमाणपत्र मिला हो कोई चाहत ही नहीं रही खुद को ख़ास समझने की। आम हूं और आम होने पर रत्ती भर भी हीनभावना मन में रही है ऐसा इसलिए क्योंकि मैंने देखा है हर कोई खुद को ऊंचा साबित करने की कोशिश में अपने को बौना साबित कर कर रहा है। मेरा ऐसा कोई मकसद कभी नहीं रहा है कुछ चाहत रही है तो यही कि कोई मुझे जैसा मैं हूं वैसा स्वीकार करे और अपना समझे। आपस में असहमति विचार का मतभेद होते रहने पर भी अपने संबंध पर अटूट विश्वास रखना वास्तविक मज़बूती होती है नाते रिश्ते की। बेटी के दिए इस उपहार से बढ़कर कोई दौलत दुनिया की हो नहीं सकती है और मेरा वादा है बेटी के भरोसे को हमेशा बनाये रखना। शायद खुद मैं दुनिया का सबसे अच्छा पिता बन नहीं सकता मगर मेरी बेटी दुनिया की सबसे प्यारी बेटी है हमेशा रहेगी। 
 

 

सितंबर 14, 2021

POST : 1538 भटक रही अजनबी राहों में ( हिंदी की बात ) डॉ लोक सेतिया

  भटक रही अजनबी राहों में ( हिंदी की बात ) डॉ लोक सेतिया 

सुबह सुबह शहर की सड़क किनारे फुटपाथ पर चलते चलते मुझे मिली तो मैंने पहचाना ही नहीं। शिकायत नहीं की तब भी कहने लगी कोई बात नहीं सूरत नहीं पहचानते तो क्या हुआ प्यार तो मुझी से करते हो। हिंदी दिवस मनाते हो सबको शुभकानाएं भेजते हो जानते हो मुझे कहां से कहां ले आये हैं मेरे अपने मगर भाषा का दर्द हिंदी लेखक नहीं समझेगा तो और कौन समझ सकता है। शहर शहर गली गली सभा आयोजित की जाएगी मुझे जाने क्या क्या संबोधन देकर पुकारेंगे मगर मुझे बुलाना भूल गए होंगे और अनचाही सी वहीं किसी आखिरी कतार में कोने में सिमटी बैठी मैं सोचती रहूंगीं हर बार की तरह क्या ये मेरी बात की जा रही है। हिंदी से हिंदी लिखने वालों को ही नहीं देश दुनिया भर को कितना मिला है भाषाओं को कला को व्यौपार को आपसी संबंधों से लेकर मानवता तक को समृद्ध किया है मगर क्या किसी ने मुझे थोड़ा भी एहसास दिया है अपनेपन का। सब उपयोग करते हैं जानते नहीं पहचानते नहीं मुझे अपना मानते नहीं। हिंदी भावनाओं में बहकर भी उदास निराश नहीं थी हंसती मुस्कुराती हुई सबको गले लगाती चलती जा रही थी। हिंदी को मिलकर लगा कोई अथाह समंदर अपनी गहराई में कितना कुछ समाये हुए है अपनी आगोश में आये हर किसी को झोली भर भर अनमोल रत्न देती रहती है। किसी मां की तरह बच्चों पर सर्वस्व लुटाती हुई ममता से लबालब भरी सबको अपने आंचल की छांव में बिठाकर वात्सल्य से अभिभूत करती लोरी गाती मधुर सपनों की नींद में परियों की कहानी सुनाकर सब दुःख दर्द मिटाती। 
 
हिंदी सबकी है कोई पराया नहीं हिंदी के लिए सबको समझना होगा हम हिंदी के कौन हैं और हमारा हिंदी से क्या नाता है। सोशल मीडिया फिल्मकार कथाकार विज्ञापन से लेकर टीवी सीरियल रियल्टी शो और नृत्य संगीत तक सभी बिना हिंदी क्या कुछ भी कर सकते हैं। हिंदी ने अपनाया है सभी को भले किसी ने उसको अपना समझा हो या बेगाना। भाषा सभी जोड़ती हैं आपस में मगर हिंदी की तरह घुल मिल जाना पानी और दूध की तरह ख़ासियत सब में नहीं होती है। ये ऐसी महिला है जो माता पिता भाई बहन सास ससुर ननद देवर क्या गली मुहल्ले तक से निभाती है खुद अपनी पहचान खोकर बेटी पत्नी बहु मां बन जाती है। कोई उसकी कीमत समझे या नहीं उसके बिना गुज़ारा किसी का नहीं होता है। चलो आज उन सभी से जाकर मिलो गले लगाकर बात कर जिनसे पाया है जाने कितना लेकिन देने की बात भूल गए हैं। हिंदी की तरह कई रिश्ते हैं जिन में चाहत की प्यास अधूरी रही है क्योंकि उन्होंने सभी को सब दिया बदले में चाहा कुछ भी नहीं। ये हिंदी दिवस इक भाषा का नहीं विश्व भर को प्यार अपनत्व देने का उत्स्व बन जाए तो कितना अच्छा होगा। 

                           हिंदी दिवस की शुभकामनाएं। 



सितंबर 11, 2021

POST : 1537 रौशन सितारों के घने अंधेरे ( पीतल की चमक ) डॉ लोक सेतिया

 रौशन सितारों के घने अंधेरे ( पीतल की चमक ) डॉ लोक सेतिया

बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। शुरआत कल रात के तथाकथित शानदार शुक्रवार केबीसी एपिसोड की बात से करते हैं। सामान्य लोग ख़ास समझे जाने वाले लोग यहां भी हैं चार दिन आपके एक दिन उनके अपने वर्ग के लिए। सामान्य वर्ग कोशिश करता है सालों साल किस्मत से पहुंचता है खेल का खिलाड़ी बन कर शहंशाह के सामने और तलवे चाटने तक कुछ भी करता है बड़ी शख़्सियत से मिलने को समझता है खुदाई मिल गई लेकिन उच्च वर्ग वाले शानदार ढंग से बुलाया जाता है सब अलग भव्य दिखाई देता है। ये माजरा क्या है दो महमान आये ख़ास मकसद से पैसा पाने केबीसी खेल से बड़े लोग बड़े इरादे। फरहा जी को इक छोटे बच्चे को करोड़ों रूपये की दवा बस कुछ दिन में दिलवानी है फाउंडेशन बन गया छह करोड़ जमा भी हो गए केबीसी से मिलने कुछ लाख हैं लेकिन रास्ता बन सकता है जाने कितने करोड़ जमा होने का। अमिताभ बच्चन जी समझाते हैं देश के एक करोड़ लोग दस दस रूपये देते हैं तो दस करोड़ हो जाएंगे। कोई नहीं समझता जिनको कुछ शब्द बोलने थोड़ा अभिनय कर दिखाने के सच्चे झूठे विज्ञापन के लाखों से करोड़ों तक मिल जाते हैं उनको दस बीस करोड़ जमा करने को कहीं जाने की क्या ज़रूरत है। वास्तव में माजरा टीवी शो और ख़ास लोगों की आपसी कारोबारी सहमति का है फायदा दोनों का है। 
 
दीपिका पादुकोण जी अपनी मानसिक परेशानी की बात करती हैं चकाचौंध रौशनी में रहने वाले अवसाद अकेलापन निराशा से पीड़ित हो सकते हैं क्योंकि जिस आधुनिक समाज में ऐसे लोग रहते हैं उस में मौज मस्ती झूमना नाचना ख़ुशी मनाना चाहते हैं तो तमाम लोग मिलते हैं तनाव की तनहाई की ख़ालीपन की बात समझने को किसी को फुर्सत नहीं होती है। नाम पैसा शोहरत आपको ऐसे दोस्त या अपने जो हर हाल में साथ निभाते हैं नहीं दिला सकता है बल्कि उनसे दूर करता है। क्योंकि जानी मानी शख़्सियत बनते हर कोई उनसे फ़ासला बना लेता है कि कहीं कोई उनसे किसी मतलब से मिल लाभ नहीं उठा ले ये धारणा बन जाती है। उनकी माता जी को अपनी बेटी का रोना देख कर समझ आया जैसे वो सहायता मांगती हुई लगी तब शायद यही सही लगा कि अपनी बेटी से ज़िंदगी की परेशानी सांझा करने को कहने से अधिक उसको सलाह दी किसी मनो-चिकित्सक से मिलने की। अब उनको कोई कैसे समझाए की आपकी फाउंडेशन किसी सामान्य नागरिक को क्या समझा सकती है। ख़ास बड़े धनवान लोग विशेषज्ञ मनो-चिकित्सक से बड़ी फीस देकर उपाय जान सकते हैं जिन करोड़ों लोगों से आपको कितने करोड़ की कमाई होती है उन्हें खुद अपनी ज़िंदगी की उलझनें सुलझानी पड़ती हैं क्योंकि गरीबी बदहाली के शिकार पीड़ित से हर कोई बचकर निकलता है। जबकि आप बड़े लोग वास्तविक शुभचिंतक से बचकर रहते हैं। 
 
सवाल समस्या की चर्चा करने का होता तो अनुचित नहीं था लेकिन जब सवाल दुःख दर्द परेशानी को भी इक इक खेल तमाशा बनाने का हो तो उसको मानसिक दिवालियापन समझ सकते हैं। शायर सुरेश भारती नादान की कलम से आभार सहित शब्द उधार लेकर समझते हैं , कहते हैं नादान जी :- 

           रौशनी से जो मकां भरा-भरा लगा , तुम कहो कुछ भी मुझे वो मकबरा लगा।

           जब मिला नादान तो रोता हुआ मिला , बज़्म में देखा उसे वो मसखरा लगा।

KBC 13: Deepika Padukone, Farah Khan performed 'Ek Chutki Sindoor' act with  Big B!

सितंबर 09, 2021

POST : 1536 ओ नादान तू बन जा भगवान ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   ओ नादान तू बन जा भगवान ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

दार्शनिकता की बात है समझना कठिन नहीं है थोड़ा सोचो ज़रा सा समझो वो जो कोई भी है किसी भी नाम से जाना जाता है विधाता ईश्वर ख़ुदा वाहेगुरु परमात्मा अल्लाह यीसु करता क्या है। तथाकथित ऊपरवाला किसी से पूछता नहीं किसी को बतलाता नहीं जब जैसा चाहता है अच्छा भला खराब करता चिंता नहीं करता दुनिया वालों को कैसा लगता है। मगर हर कोई उसकी दी परेशानी की बात उसी से जाकर कहता है रहम की भीख मांगता है। तुमने ऐसा क्यों किया कहने का साहस कभी कोई नहीं कर सकता। आदमी आदमी से रिश्ता निभाता रहता है तब तक जब तक आस रहती है कभी काम पड़ेगा तो साथ देगा मगर जब महसूस होता है अमुक व्यक्ति भविष्य में किसी काम में सहायक नहीं हो सकता उस से किनारा कर लेते हैं। आदमी की बात चेहरे के हाव-भाव बता देते हैं उसके पास बचा नहीं कुछ बांटने को पर भगवान को देख कर कोई नहीं समझ पाता कि उसके पास क्या है और उसके मन की मर्ज़ी क्या है। भगवान भले देता कुछ भी नहीं लेकिन उसको देख लगता है सामने खड़े व्यक्ति को आशिर्वाद दे रहा है। कभी उसके हाव भाव चेहरे के देख समझ नहीं सकते चाहता क्या है। अच्छा साहूकार इनकार नहीं करता बहाना बनाकर टालता है और जिस पर भरोसा होता है सूद सहित समय पर लौटाने का उसका अंगूठा लगवा बही पर नकद उधार दे देता है। भगवान सब जानता है आदमी मांगता है लेकर वापस करना याद नहीं रखता इसलिए जो इंसान अच्छा लगता है उस पर मेहरबान होता है ऊपरवाला। उसकी अपनी मौज है सच्चे फांसी चढ़दे वेखे झूठा मौज मनाये लोकी कहंदे रब दी माया मैं कहंदा अन्याय , की मैं झूठ बोलिया की मैं कुफ़र तोलिया। 

सरकार भी भगवान की तरह होती है दिखाई नहीं देती बस सरकार है सब विश्वास करते हैं और सरकार भी सब कर सकती है लेकिन भगवान की तरह करती कुछ भी नहीं किसी के लिए जो भी करती है सिर्फ खुद की शान बढ़ाने को करती है। हर सरकार चाहती है लोग उसके सामने हाथ जोड़ भिखारी की तरह खड़े रहें और उसको जिनको देना है उन्हीं को देकर समझती है सबको सब मिल गया है। अमीरों को अमीर गरीबों को बेबस बनाना शासक होने सत्ता और सरकार का अहंकार होता है हम सरकार हैं हम जो करें हमारी मर्ज़ी जनता को सर झुककर स्वीकार करना चाहिए। राजा कभी भगवान नहीं होता है राजनेता कभी मसीहा नहीं होते हैं मगर चाटुकार लोग उनका गुणगान कर उनको भगवान होने का एहसास करवाते रहते हैं। मगर सत्ता जाते ही उनके होश ठिकाने लग जाते हैं शासक वास्तव में खुद सबसे भूखे नंगे भिखारी होते हैं ऐसे भिखारी जिनकी झोली कभी भरती नहीं है। जनता की सेवा देश समाज की भलाई की बातें भोले भाले लोगों को बहलाने का माध्यम हैं कथनी अलग करनी विपरीत होते हैं। 
 
ओ नादान आम आदमी तू भिखारी नहीं है भिखारी को राजा बनाकर पछताता है कभी नहीं देखा क्या तेरा बही खाता है। ठोकर खाकर भी समझ नहीं आता है क्यों भगवान की तरह सरकार पर भरोसा कर खाली दामन घर वापस लौट आता है। खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले , खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है। 
 स्पर्धा परीक्षा मित्र मंडळ - ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले  ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है | Facebook

सितंबर 07, 2021

POST : 1535 समंदरों की गाथा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         समंदरों की गाथा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

पहले पहले शुरुआत में ये सभी के सभी तपता हुआ रेगिस्तान हुआ करते थे पानी को तरसते और रेत का अंबार। उनकी आरज़ू तभी से विशाल समंदर बनने की रहती थी जैसे कोई बरसाती नाला मिला इन्होंने उसको अपने भीतर समा लिया। धीरे धीरे तालाब हुए और कोई करिश्मा कर जाने कितनी नदियों को अपनी तरफ आकर्षित उनको अपने में विलीन करते गए। धन दौलत नाम शोहरत बड़े होने की हैसियत पाकर खुद पर गर्व करने लगे और जिन से सब पाकर विशालता पाई उन्हीं का तिरस्कार करने लगे। समंदर कभी किसी से संबंध नहीं निभाते हैं उनसे दूर रहना अच्छा होता है उनके करीब जाते ही दरिया नदिया अपना अस्तित्व खो बैठते हैं। समंदर किसी का उपकार नहीं मानते हैं उनको लगता है हमारी शरण में आना सबकी ज़रूरत है चाहत है विवशता है। आखिर समंदरों को छोड़कर उनसे बचकर कोई जाएगा कहां उनसे बचना आसान नहीं क्योंकि समंदर का मिजाज़ बदलता है तो उनकी लहरें सीमा की परवाह नहीं कर तूफ़ान लाकर तबाही ला सकती हैं। समंदर में खज़ाना है मोती हैं भंडार है सब जाते हैं कुछ पाने की चाह में डूब कर गहराई समझ आती है नसीब वाले बचते हैं मिला किसको कितना और क्या क्या खोकर कोई नहीं समझ पाता है। हर समंदर खुद प्यासा होता है उस से किसी की प्यास नहीं बुझ सकती कभी। समंदर अपने भीतर अनगिनत राज़ छुपाए रहते हैं उनकी थाह पाना मुमकिन ही नहीं है। समंदर का खारा पानी बदल बनकर बरसता है मगर बारिश का पानी तालाब नदिया से मिलकर आखिर बहता बहता फिर समंदर में वापस मिलकर मिठास खोकर खारापन अपना लेता है। 
 
पर्वत की ऊंचाई और समंदर की गहराई दोनों अलग अलग हैं। शासक सत्ताधारी बड़े नाम वाले ख़ास लोग दिखाई पहाड़ जैसे देते हैं मगर वास्तव में किरदार उनका छोटा होता है उनको नीचे वाले इंसान इंसान नहीं लगते हैं। अक्सर इंसान की लाश उनके पांव नीचे की ज़मीन बनी होती है। समंदर की ख़ामोशी तूफ़ान आने का संकेत हो सकती है तो उनकी लहरों का शोर अंदेशा लगता है अनहोनी घटना का भय पैदा करती हुई। शोर की खामोशी से मुलाक़ात और रौशनी का अंधेरों से रिश्ता कुछ उसी तरह का संबंध है जैसा महल का झौंपड़ी से अमीर का गरीब से सरकार का जनता से। एक का होना दूसरे का अस्तित्व बनाता है बिना झौंपड़ी महल की शान नहीं रहती है गरीब हैं तभी अमीरों की अमीरी कायम है जनता का आम होना सरकार को सरकार होने का एहसास दिलाता है। अन्यथा सरकार दाता नहीं भिखारी है और आम लोग नेताओं अधिकारियों का अनचाहा बोझ ढोने को विवश हैं। घोड़ा कभी घास से दोस्ती नहीं कर सकता है राजनेता घोड़े हाथी शेर की तरह हैं उनका अधिकार जंगल पर जिस तरह ताक़तवर का कमज़ोर पर ताकत आज़माने से समझा जाता है देश की राजनीति में सत्ता का संविधान से छीनते हैं राजनेता शासक वर्ग। हमने कानून अदालत संस्थाएं बनाई हुई हैं लेकिन उनकी अहमियत कठपुतलियों जैसी बन जाती है। जनता की चीख पुकार उन तलक नहीं पहुंचती क्योंकि सरकार ने उनको ऐसे भवनों में बंद किया होता हैं जहां बहरी आवाज़ सुनाई दे नहीं सकती और चकाचौंध रौशनी में बैठकर निर्णय करने वाले निगहबान करने वाले अंधेरे से परिचित नहीं होते हैं। 
 
हम सभी कैफ़ी आज़मी की नज़्म में बतलाये गए अंधे कुंवे में कैद लोग हैं जो कुंवे के अंदर से आवाज़ देते रहते हैं , हमें आज़ादी चाहिए , हमें रौशनी चाहिए। लेकिन जैसे ही कोई बाहर निकालता है तो हम बाहर की खुली हवा से घबरा जाते हैं रौशनी से आंखें चुंधिया जाती हैं और आज़ादी से डरने लगते हैं। और फिर खुद ही उसी अंधे कुंवे में छलांग लगा देते हैं। और दोबारा शोर मचाने लगते हैं हमें आज़ादी चाहिए , हमें रौशनी चाहिए। हमने अपनी दुनिया को उसी कुंवे तक सिमित किया हुआ है और कुंवे के मेंढक खुद को समझते हैं यही दुनिया है।

सितंबर 05, 2021

POST : 1534 बेअसर आंसू-आहें अनसुनी फ़रियाद ( पढ़ना-लिखना ) डॉ लोक सेतिया

बेअसर आंसू-आहें अनसुनी फ़रियाद ( पढ़ना-लिखना ) डॉ लोक सेतिया 

कितनी बार वही सवाल मन में आता है बात तमाम चिंतन करने वालों की लिखने समझने वालों की है। जितने भी विचारक हुए सभी ने समाज की बातों को जाना समझा और अलग अलग तरह से कोशिश की अपने समय के समाज को बदलने की। पांच सौ हज़ार साल पहले लोग शिक्षित नहीं थे सोचने समझने की सीमा थी तब जानकारी हासिल करना कठिन था जीवन की समस्याओं को समझने की ज़रूरत ही नहीं महसूस होती थी। विधाता भाग्य और बने बनाये सामाजिक तौर तरीके मूल्यों मान्यताओं को अपनाना नियति लगती थी। मगर महान समाज सुधारक साधु-संतों सभी ने समाज को बदलने उचित राह चलने और नीति कथाओं बोध कथाओं से सही और गलत का फर्क समझाने की कोशिश की जिस से आसानी से जीवन की वास्तविकता को लोग समझ सकें और जानकार विवेक से सच्चाई अच्छाई के मार्ग पर चलना सीखें। और लगता है तब शायद अनपढ़ सीधे सादे लोग समझने लगते थे और ज़िंदगी समाज को बदलने की चाहत रखते हुए समय के साथ बदलाव करते रहे। आसान नहीं था सदियों की मान्यताओं परंपराओं को छोड़कर नई सोच को अपनाना मगर दो सौ साल पहले बड़े बड़े विचारक अपनी कलम से नई परिभाषा लिखने लगे थे। अन्याय से टकराने और सच और मानव कल्याण समानता आज़ादी की बुनयादी बातों को महत्व देने लगे थे। साहित्य सृजन का मकसद कोई नाम धन दौलत पाना कदापि नहीं था उन सभी की रचनाओं में दुनिया के तमाम लोगों के दुःख दर्द परेशानियों की बात होती थी। कुछ भी जो गलत होता है क्यों होता है और उसको कैसे बंद किया जाये और जो होना चाहिए उसकी शुरुआत की जानी चाहिए सिर्फ यही चाहते थे कोशिश किया करते थे। 
 
आजकल लोग कहने को पढ़ लिखकर जानकार बन गए हैं भले किताबी ज्ञान वास्तविक ज़िंदगी में किसी काम नहीं आता हो फिर भी सोचने समझने से लेकर तर्क वितर्क करने लगे हैं। सोशल मीडिया से जानकारी सच्ची झूठी हासिल कर खुद को समझदार और जानकार मानते हैं लेकिन हैरानी और विडंबना की बात ये है कि जो पढ़ते हैं सबको समझाते हैं लाजवाब ढंग से शानदार संदेश भेज कर किसी और की क्या बात कहें जब खुद उन्हीं पर उन बातों का रत्ती भर असर होता नहीं है। आजकल की ही घटनाओं की बात को ध्यानपूर्वक समझने सोचने से पता चलता है। टीवी पर किसी कलाकार की मौत की घटना से हर कोई विचलित दिखाई देता है अनुमान लगाता है क्या हुआ क्योंकर हुआ कैसे हुआ और क्या होता तो अच्छा होता। टीवी पर किसी शो में भावुक हो जाते हैं दर्शक और आयोजक क्षण भर को। पलकें भीगती हैं टिशू पेपर से पौंछते हैं और पल बाद अगले दृश्य में नये सीरियल में ठहाके लगाते हैं। संवेदनाएं औपचारिकता बनकर रह गई हैं। समझ नहीं आता जो नज़दीक नहीं जिन से नाता मनोरंजन और समय गुज़ारने या पसंद करने का है उनकी घटनाओं से परेशान विचलित होने वाले वही हम लोग खुद अपने देश समाज गांव शहर घर परिवार दोस्तों संग संग रहने वालों को लेकर विरक्त और संवेदनारहित बन जाते हैं। अपने पास किसी को बदहाल देख जानना ही नहीं चाहते कोई किसी परेशानी में है तो कैसे हम सहायक बन सकते हैं। ऐसे समय हम जिसकी समस्या हो उसी को दोषी समझने लगते हैं पर्दे पर अनजान अजनबी से सहानुभूति और करीब रहने वालों से उदासीनता दो अलग अलग किरदार हम निभाते हैं अफ़सोस असली दोनों ही नहीं होते हैं। हमारा किरदार बदल जाता है जब हम खुद परेशानी चिंता और समस्या में घिर जाते हैं तब जिनसे उम्मीद रखते हैं दिलासा देने और सुःख दुःख बांटने की उनको फुर्सत नहीं होती है व्यर्थ के दुनियादारी के अनावश्यक कार्यों से। मगर मिलने आते हैं रस्म निभाने को भीड़ का इक हिस्सा बनकर और तब संवेदनाएं बनावटी दिखावे की लगती हैं। फरहत अब्बास शाह कहते हैं बदल गए मेरे मौसम तो यार अब आये , ग़मों ने चाट लिया ग़मगुसार अब आये। ये वक़्त इस तरह रोने का तो नहीं लेकिन , मैं क्या करूं कि मेरे सोगवार अब आये। 
 
यही होता है ज़िंदगी भर जिनकी खबर तक नहीं लेते कभी याद नहीं आती कभी बात करना मिलना ज़रूरी समझा नहीं फोन पर कॉल नहीं करते बस व्हाट्सएप्प पर संदेश भेजते रहते हैं दुनिया से चले जाने पर शोकसभा में जाकर फूल चढ़ाते हैं। अंत में इक लघुकथा मेरी लिखी बहुत साल पुरानी है। 
 
 

               फुर्सत नहीं ( लघुकथा ) डॉ लोक सेतिया

     बचपन के दोस्त भूल गये थे महानगर में रहते हुए। कभी अगर पुराने मित्र का फोन आ जाता तो हर बार व्यस्त हूं , बाद में बात करना कह कर टाल दिया करते। कहां बड़े शहर के नये दोस्तों के साथ मौज मस्ती , हंसना हंसाना और कहां छोटे शहर के दोस्त की वही पुरानी बातें , बोर करती हैं। लेकिन जिस दिन एक घटना ने बाहर भीतर से तोड़ डाला तब यहां कोई न था जो अपना बन कर बात सुनता और समझता।

    महानगर के सभी दोस्त कहां खो गये पता ही नहीं चला। तब याद आया बचपन का पुराना वही दोस्त। फोन किया पहली बार खुद उसे अपने दिल का दर्द बांटने के लिये। तब मालूम हुआ कि वो कब का इस दुनिया को अलविदा कह चुका है। पिछली बार जब उसका फोन आने पर व्यस्त हूं कहा था तब उसने जो कहे थे वो शब्द याद आ गये आज। बहुत उदास हो कर तब उसने इतनी ही बात कही थी ,

         " दोस्त शायद जब कभी तुम्हें फुर्सत मिले हमारे लिये तब हम ज़िंदा ही न रहें "।

    तब सच्चे मित्र को नहीं पहचाना न ही उसकी भावना को समझा , उसका हाल पूछा न उसका दर्द बांटना चाहा तो अब उसको याद कर के आंसू बहाने से क्या हासिल। 

 

अगस्त 31, 2021

POST : 1533 किन बातों को अपनाना या छोड़ना ( विरासत ) डॉ लोक सेतिया

  किन बातों को अपनाना या छोड़ना ( विरासत ) डॉ लोक सेतिया 

लगता है जैसे तमाम लोग मानते हैं कि हमारी सभी पुरानी ऐतहासिक धार्मिक किताबों की कहानियां और पुरातन धारणाएं महान हैं और उनको फिर से अपनाया जाना चाहिए। सोशल मीडिया पर बाढ़ आई हुई है सच्ची झूठी मनघडंत बातों की और उपदेश देते हैं हमको वापस उस ज़माने को लाना है। मगर अगर हम ध्यानपूर्वक सोचें तो उन्हीं कथाओं कहानियों में बेहद अनुचित अतार्किक और देश समाज की भलाई के खिलाफ आचरण किया जाता रहा है। वास्तविकता सभी जानते हैं बीता ज़माना पुरानी बातें तौर तरीके लौटते नहीं कभी। यकीनन हम बीते हुए कल की तारीख को वापस नहीं ला सकते तो हज़ारों वर्ष सदियों पुरानी चीज़ों को फिर दोहराना संभव नहीं है। जीवन में भी अतीत को दोहराया नहीं जा सकता है हां वर्तमान को बेहतर बनाने को अतीत और पुराने ज़माने से सीख लेकर नया किया जा सकता है। शायद कोई ऐसे युग में जीना नहीं चाहेगा जिस में आधुनिक समय में उपलब्ध साधन सुविधा नहीं हो पाषाण युग मानवता और सामाजिक संरचना का कोई निशान नहीं था जब। क्या हम अपने घर में परिवार में बाप दादा की सभी पुरानी चीज़ों को हमेशा को संभाल रख सकते हैं शायद अधिकांश चीज़ों का कोई महत्व नहीं रहता है उनको रखना घर को कचरे का ढेर बनाना हो सकता है। हम हर वर्ष घर की सफाई करते हैं और अनुपयोगी वस्तुओं को निकाल देते है नया लाकर घर को सजाते हैं। माता पिता की याद उनकी दी गई शिक्षा को मन में रखना अच्छा है मगर क्या हम अपनी आने वाली संतान को उसी तरह से पालन पोषण करना उचित समझते हैं जैसा उस समय किया जाता रहा था। कहावत है ठहरा पानी खराब हो जाता है बहता पानी होना अच्छा है समय के साथ नदी में पानी बहता रहता है तालाब का पानी भी बदलना होता है। बदलना कुदरत का नियम है सभ्यता भी बदलते समय के साथ परिवर्तित होती रहती है पुरानी सभ्यता के अवशेष तलाशना माना आदमी की आदत होती है लेकिन उसको फिर से स्थापित किया नहीं जाता है। 
 
कभी ध्यान से समझना क्या जो सब पुरानी कथाओं कहानियों में पढ़ते सुनते रहे हैं सब लाजवाब था , नहीं उस में भी अन्याय अत्याचार भेदभाव और बिना तर्क बड़े ताकतवर लोग अपनी मर्ज़ी से नियम बनाते लादते थे। महिलाओं गरीबों अपने अधीन व्यक्ति से बेहद अनुचित अमानवीय आचरण किया जाता था। राम रावण से कौरव पांडव युद्ध तक कितनी आपत्तिजनक बातें हुई जिनको वापस लाना ठीक नहीं होगा। वास्तव में इतिहास और धर्म की कथा कहानियां लिखने वालों ने अपनी खुद की आस्था और विश्वास को स्थापित करने सही और गलत को दरकिनार करते हुए किसी को नायक किसी को ख़लनायक साबित करने के लिए मनमर्ज़ी से मापदंड बनाकर अपना मकसद हासिल किया है। वास्तविक ज्ञान आपको अपने विवेक से काम लेकर मिलता है और जब कोई खुद को उस समय में रखकर विचार करेगा तब समझ आएगा जो उस युग में कोई किसी से करता रहा हमारे साथ होता तो क्या होता। सिर्फ इसलिए कि किसी किताब में लिख दिया गया है इस पर शंका नहीं कर सकते उचित नहीं लगता बल्कि ऐसा लिखने वाला खुद को बचाने की कोशिश करने को हमको अंधविश्वास और अज्ञानता में डालना चाहता है। अन्यथा सांच को आंच नहीं और सत्य को कसौटी पर खरा साबित होना ही चाहिए। हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती और अनमोल हीरे जवाहरात की पहचान उनकी खरेपन की जांच से की जाती है। विवेकशीलता का अर्थ है हमको किसी बात को पढ़कर सुनकर विचार कर समझना चाहिए उसकी वास्तविकता और उपयोगी होने को लेकर अन्यथा हम शिक्षित हो सकते हैं जानकार नहीं। 

 

अगस्त 27, 2021

POST : 1532 बिना रानी कहानी नहीं ( किस्सा राजा का ) { व्यंग्य } डॉ लोक सेतिया

बिना रानी कहानी नहीं  ( किस्सा राजा का ) { व्यंग्य } डॉ लोक सेतिया 

कोई महबूबा होती है तभी मुहब्बत की निशानी ताजमहल बनता है अमर होने को निशानी रह जाती है । राजा आखिर राजा होता है शासक बनकर मन की बात करने से चैन नहीं मिलता , हसरत बाक़ी है इसिहास में उसकी अलग कहानी शामिल होनी चाहिए । सज धज शानो शौकत खूब मौज मस्ती जी भर कर मनमानी सारी दुनिया को घूमकर देखा फिर भी कैसा खालीपन ज़िंदगी में रह गया जाता नहीं सब आधा आधा लगता है । बात कहते हैं तो आधा सच आधा झूठ मिलकर झूठ का पुलिंदा बन जाता है । दरबारी लेखक महिमा गुणगान लिखना करना जानते हैं शासक की मर्ज़ी की आत्मकथा लिख देते हैं जिस में नज़र थोड़ा आता है ढकना अधिक पड़ता है । बीस साल शासन करने के बाद उनकी चाहत यही है कोई उनकी भी ऐसी कहानी लिखे जो ज़माना सदियों तक भूल नहीं पाये । कितने अच्छे साहित्यकारों से चर्चा की और सभी ने समस्या एक ही बताई जब तक शामिल रानी नहीं बन सकती आपकी कहानी नहीं । अविवाहित शासक भी हुए हैं मगर उनकी भी इक मुहब्बत अवश्य होती थी उनका जूनून उनका मकसद कुछ करने का आज़ादी हासिल करना समाज को अच्छा बनाने जैसे मकसद बड़े होते थे । सिर्फ कुर्सी से प्यार बेजान चीज़ों से लगाव अपनी विवाहिता पत्नी घर परिवार को छोड़ना बगैर कोई महान मकसद लिए लिखने को कहानी का विषय हो नहीं सकता है । सवाल आएगा राजा की पत्नी रानी बनकर नहीं जोगन बनकर भी नहीं रही खुश भी नहीं उदास भी नहीं अलग नहीं होकर भी पास भी नहीं ऐसा क्यों हुआ । कोई आरोप नहीं जुर्म नहीं सज़ा जीवन भर पाती रही इस वास्तविकता को छोड़ना मुमकिन नहीं है । माना सत्ता होने से सब मुमकिन हो जाता है मगर चांद पर दाग़ स्वीकार किया जाता है सूरज कहलाने को चेहरे पर धब्बा नहीं । 
 
राजा की आरज़ू है इक शानदार ऊंचा विशाल गगन को छूता भवन बनाया जाये जिस में सिर्फ इक उसी की खूबसूरत तस्वीरें सजाई गईं हों । चाहे कितने तरह के लिबास में लाखों तस्वीर किसी व्यक्ति की किसी चित्रशाला में लगाई जाएं दर्शक को अधिक समय तक लुभा नहीं सकती हैं । हर किसी के साथ कोई संगी साथी होना ज़रूरी है । आपने खुद को सबसे ऊपर सबसे बड़ा दिखलाने की खातिर अकेला और तन्हा कर लिया है लाखों की भीड़ में भी आप खुद को अजनबी महसूस करते हैं । कोई नाटक कोई फिल्म अकेले किरदार से बन नहीं सकती है कोशिश करते रहे हैं लोग खुद ही नायक निर्देशक पटकथा लेखक बन फिल्म बनाने की अंजाम दर्शक भी सिर्फ वही बनकर रह गए । आपकी ज़िंदगी में प्यार मुहब्बत की कोई दास्तां नहीं है केवल खुद को खुदा समझने का झूठा अहंकार रहा है । जो बाकी लोगों की अहमियत को स्वीकार नहीं करते हैं खुद उनकी कोई अहमियत रहती नहीं है । आपकी ज़िंदगी इक किस्सा बनकर रह गया है जिसको किसी किताब में दर्ज नहीं किया जा सकता है किस्सों में सच्चाई काम कपोल कल्पना अधिक होती है । कहीं खुद आप ज़िंदगी को किस्सा समझने की भूल कर पछता तो नहीं रहे । रानी का वजूद नहीं समझने वाले राजा की कोई कहानी बनती नहीं है । एक चुटकी सिंदूर की कीमत क्या होती है राजाजी आप कभी नहीं समझोगे । ईश्वर का आशीर्वाद होता है एक चुटकी सिंदूर , सुहागन के सर का ताज़ होता है एक चुटकी सिंदूर , हर औरत का ख़्वाब होता है एक चुटकी सिंदूर । 
 
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अगस्त 25, 2021

POST : 1531 ख़ुशी की तलाश में ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

           ख़ुशी की तलाश में ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया    

पढ़ने से पहले समझ लो ख़ुशी पाने की बात यहां नहीं हो रही है। खुश रहना जिनको जीवन का मकसद लगता है ख़ुदगर्ज़ लोग होते हैं भौतिक वस्तुओं से आनंद की अनुभूति होती है। खुश रहने के तौर तरीके अंदाज़ समझाने वाले संदेश भेजने वाले बहुत मिलते हैं ख़ुशी क्या होती है शायद उनको खुद मालूम नहीं नाचना गाना मौज मस्ती करना घूमना फिरना अच्छा लगता है ख़ुशी देता है ऐसा नहीं है। ख़ुशी कोई बाज़ार में बिकता सामान नहीं होता है अपने भीतर से उपजा एहसास होता है। अगर हमारे आस पास समाज में असमानता अन्याय भूख गरीबी जैसी समस्याएं हैं मगर हम जश्न मनाते हैं सुःख सुविधा साधन पाकर तब हमारी ख़ुशी मानवता की भावना को समझे बिना झूठी खोखली और दिखावे की अस्थाई पल दो पल की है बस ज़रा सा झौंका आकर उसको कभी भी दुःख दर्द परेशानी में बदल सकता है। ख़ुशी ऐसा एहसास है जो हासिल करने से नहीं बांटने देने से मिलता है सभी के दुःख दर्द परेशानियां समझना उनका एहसास करना अपना समझ उनको मिटाने की कोशिश करना सच्ची मानसिक ख़ुशी देता है। बिना कोई स्वार्थ सबकी सहायता करना कोई नाम शोहरत उपकार करने की चाह नहीं रखते हुए मानवीय संवेदना की खातिर हर किसी की भलाई की कामना रखना ख़ुशी पाने का वास्तविक ढंग है। ख़ुशी इक मासूम बच्ची की तरह है जिसको जन्म देने में महीनों इंतज़ार करने के बाद अपने भीतर पलना पड़ता है और असहनीय पीड़ा झेल कर जन्म देना होता है। हर ख़ुशी छोटी से बड़ी होती जाती है देखभाल करने से संभालने से प्यार से हर समस्या से बचा कर रखने से। मगर हमने ख़ुशी को समझा नहीं जाना नहीं पहचाना नहीं एवं धन दौलत नाम शोहरत भौतिक चीज़ों को पाने को खुश रहने का तरीका मान लिया है। अनुचित ढंग से छल कपट से धोखा देकर विवश कर जालसाज़ी द्वारा हासिल ख़ुशी वास्तविकता उजागर होते ही परेशानी दुःख दर्द की वजह बन जाती है। चोर डाकू लुटेरे पकड़े जाने पर मुजरिम ठहराए जाते हैं गुनाह की सज़ा मिलती है मगर जिनको बिना महनत अनुचित कार्य से धन दौलत नाम शोहरत मिल भी जाती है उनकी खुद की अंतरात्मा ख़ुशी अनुभव नहीं होने देती और अधिकांश लोग खुश होने का आडंबर दिखावा करते हैं ख़ुशी को अनुभव नहीं कर सकते हैं। 
 
रईस लोग बड़े धनवान लोग शासक बनकर ऐशो आराम पाने वाले पल पल जो मिला है उसको खोने का डर उनको चिंतित किये रहता है खुश नहीं रहने देता तभी जिनको बहुत अधिक हासिल है उनकी और ज़्यादा पाने की चाहत की हवस मिटती नहीं और वास्तव में वो सबसे गरीब होते हैं। हमने देवता और दानव की कथाएं कहानियां पढ़ी सुनी हैं , आदमी जब अपने पास जितना है किसी और को देता है ज़रूरतमंद को तब वो इंसान देवता बन जाता है। मगर दानव होते हैं जो किसी से उसका सब छीन लेते हैं अपनी इच्छा कामना की खातिर। देवता देते हैं राक्षस लेते हैं यही अंतर है अच्छे बुरे होने का , खेद की बात है आधुनिक समाज के मापदंड और नैतिक मूल्य आदर्श बदलते बदलते गलत को सही समझने लगे हैं। तेज़ चलने आगे बढ़ने की दौड़ में हमने पतन को उन्नति का नाम दे दिया है। जितना नीचे गिरते हैं लगता है ऊंचाई पर हैं और सबको पीछे छोड़ने में खुद अपनी ज़मीन से कट जाते हैं। 
 
आपको धर्म समाज की शिक्षा ने कितने कर्तव्य कितने क़र्ज़ गिनाये होंगे माता पिता से लेकर तमाम लोगों के लिए आभारी होने और उनका उपकार चुकाने की बातें। लेकिन कभी सोचा है जिस धरती पर रहते हैं जिस समाज से हमको कितना कुछ मिलता है उसका कोई क़र्ज़ हमपर बाकी रहता है चुकाने को। अपना घर परिवार संतान के इलावा देश समाज से जीवन भर कितना बिना मांगे बगैर शर्त मिलता रहा उनको कुछ वापस देना याद रहा ही नहीं। जिनके पास बहुत है उनको देना चाहिए उनको जिनके पास कुछ भी नहीं क्योंकि विधाता ने धरती हवा पानी प्रकृति सभी के लिए बराबर बनाई है जिन्होंने अपने हिस्से से बढ़कर हासिल किया है औरों का अधिकार छीन रहे हैं। सिर्फ कहने को सबका भला विश्व का कल्याण हो व्यर्थ की बात है जब हम सिर्फ अपनी ख़ुशी अपनी ज़रूरत को समझते हैं मतलबी बनकर अन्य लोगों के लिए असंवेदनशील हो जाते हैं। इस युग का आदमी अनगिनत लाशों के ढेर पर खड़ा उल्लास और अट्हास का प्रदर्शन कर हैवानियत का कार्य कर रहा है। मुट्ठी भर लोगों की हंसी के नीचे तमाम लोगों की आहें चीखें दबी हुई हैं। ख़ुशी चाहते हैं तो ऐसा समाज बनाना होगा जिस में सभी एक समान हों छोटा बड़ा ऊंचा नीचा ख़ास आम जैसा भेदभाव नहीं हो। 

 

अगस्त 21, 2021

POST : 1530 शानदार अंत की अभिलाषा ( अजीब दस्तान ) डॉ लोक सेतिया

   शानदार अंत की अभिलाषा ( अजीब दस्तान ) डॉ लोक सेतिया 

यही टीवी सीरियल के पर्दे पर नज़र आया अंतिम एपिसोड में सब चंगा हो गया है। हर बात का खुलासा हो गया सभी राज़ खुल गए पूरी तस्वीर साफ़ हो गई शुरुआत से अनगिनत बार सिर्फ गलत और अनुचित आचरण करने वाला खलनायक पल भर में बदल गया माफ़ी मांगने लगा अपने किये पर पशेमान होता दिखाई दिया। अर्थात अनहोनी घट रही थी राक्षस अपना स्वभाव बदल देवता बन गया। कहानी लिखने वाले के पास कुछ भी बचा नहीं अंत करना ही विकल्प हो गया। कल उसी समय कोई और नया धारावाहिक शुरू होगा शुरआत लाजवाब होगी बाद में बोझिल दास्तान आखिर में अंत वही सब उलझन सुलझती हुई।
 
 वास्तविक जीवन में भी ठीक यही होता है। कोई कितना अकेला होकर जिया दुनिया से विदा होने के बाद शोक मनाने वाले बहुत चले आते हैं काश लोग जानते तो कब से मरने की ख़्वाहिश करते। बात क्या है कि मशहूर लोगों के घर , मौत का सोग होता है त्यौहार सा। गुड़िया गुड्डे को बेचा खरीदा गया , घर सजाया गया रात बाज़ार सा। डॉ बशीर बद्र जी की ग़ज़ल कितनी सच्ची है इतनी अच्छी बातें इतना अपनापन कहां नज़र आता है मतलबी दुनिया में अफ़सोस की घड़ी बिछुड़ने की कम मुलाक़ात की ज़्यादा लगती है। इक अजीब बात ज़रूर होती है शोकसभा में जिसकी तस्वीर पर पुष्प चढ़ाते हैं सभी उसकी बात शायद कोई करता है हर कोई हज़ार बातें करता है। न जाने क्यों लोग आकांक्षा करते हैं उनकी शोकसभा शानदार होनी चाहिए जबकि खुद देख नहीं सकते उनकी चर्चा कोई नहीं करता। रिश्ते नातों की कितनी बातें होती हैं उनके बहाने से लोग अर्से बाद मिलते हैं अपनी अपनी बात करते हैं। ख़ुशी भी दुःख दर्द भी असली नहीं लगते हैं अब सब खोखला खाली खाली लगता है भीड़ में आदमी की शख़्सियत खो जाती है।   
 
 धार्मिक सभाओं में उपदेशक वक्ता दोहराते हैं उन्हीं बातों को असंख्य बार , कहते हैं आप नाम नहीं जपते धार्मिक स्थल जाते नहीं भगवान की उपासना करते नहीं। जाने इतनी भीड़ मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे तमाम धार्मिक शहरों में किस तरह दिखाई देती है। लोग एक नहीं सभी धार्मिक जगहों पर दर्शन ईबादत पूजा अर्चना को जाते हैं किनको शिकायत है लोग नहीं धार्मिक आस्था पर चलते हैं। ईश्वर उनको कैसे बताते हैं मेरी भक्ति का उपदेश अभी थोड़ा है शायद इतना अधिक होने लगा है कि उसकी कीमत घट गई है। आदमी पल पल चिंता में रहता है कोई बात गलत नहीं हो जाए लेकिन हज़ार नज़रें उस पर गढ़ी हुई होती हैं जो हर क्षण उसकी कमियां तलाश करती रहती हैं। कोई खुद अपनी गलती नहीं देखता है। अधिकांश लोग अपनी भूल गलती क्या अपराध तक को अनुचित नहीं समझते हैं। औरों पर तलवार ताने हुए हैं खुद को आईने में नहीं देखते हैं। 
 
  विडंबना की बात है कि धार्मिक जगहों पर रिश्वत देकर पहले दर्शन करने से लेकर चढ़ावे और दानराशि की चर्चा होती है आस्था विश्वास और भक्ति भावना को कोई नहीं जानता समझता। भवसागर से पार लगाने की बात कहने वाले मोह माया में डूबे हैं खुद दीपक तले घना अंधकार है। लिखने से पहले मिटाना पड़ता है जो मनघडंत अतार्किक लिखा हुआ है। सोच की मानसिकता की स्लेट अथवा पट्टी को साफ करना होगा लिखावट ऐसे शब्दों में हो जिसको पढ़ा और समझा जा सके। बिना अर्थ समझे रटना किसी काम का नहीं होता है। सही मार्ग की तलाश करनी ज़रूरी है कब तक कोल्हू के बैल बनकर उसी दायरे में घूमते रहेंगे आंखों पर अंधविश्वास की पट्टी बांधे , जहां हैं वहीं रहेंगे। 

 

अगस्त 08, 2021

POST : 1529 हां मैं शून्य हूं ( शुरुआत से आखिर तक ) डॉ लोक सेतिया

    हां मैं शून्य हूं ( शुरुआत से आखिर तक ) डॉ लोक सेतिया 

यही सच है सबने मुझे ज़ीरो समझा है हीरो बनना भी नहीं चाहता क्योंकि हीरो नायक कहलाने को बेताब लोग भी होते भीतर से खोखले हैं। ज़ीरो की कीमत कोई नहीं समझता मगर शून्य की अहमियत समझना बेहद ज़रूरी है आपकी संख्या में जोड़ने घटाने से अंतर नहीं पड़ता फिर भी बड़े काम का होता है एक के बाद लगाने से दस बना देता है तो करोड़ से गुना करने पर करोड़ को ज़ीरो भी बनाता है। जब तलक अपने मुझे जाना समझा पहचाना नहीं आपके जीवन का गणित उत्तीर्ण नहीं हो सकता है। विश्व का आदि और अंत शून्य ही है संसार की हर शय का यही अफसाना है शून्य से आना शून्य में विलीन हो जाना है। मुझे आपको अपनी कहानी नहीं सुनानी आपको आपकी कथा से मिलवाना है। 
 
बात उनकी करते हैं जिनकी संख्या असंख्य समझी जाती है बड़े लोग धनवान शासक अधिकारी राजनेता उपदेशक उद्योगपति शिक्षक विद्वान महान कहलाने वाले। सौ साल जीने के बाद आखिर शुरुआत के भार के मिट्टी बनकर रह जाते हैं। सिकंदर खाली हाथ आये थे खाली हाथ जा रहे कह जाते हैं। छोटा सा आकार लेकर आये थे विस्तार पाकर आकाश तक पहुंचे मगर मिट्टी से मिट्टी तक का सफर ज़िंदगी है। शायद इस से बड़ा मज़ाक कोई नहीं हो सकता कि हर कोई जीते जी मरता है सोचता है मौत के बाद ज़िंदा रहना है। जब हमीं न रहे तो रहेगा मज़ार क्या , पागलपन है मरने के बाद ख़त्म कहानी की चर्चा करते हैं ज़िंदगी की सच्ची कहानियों को नहीं समझते हैं। आपने जीवन भर जो भी किया अपने मकसद की खातिर किया कभी कुछ भी बिना स्वार्थ किया ही नहीं कभी अपने पराये की बात कभी कोई विवशता का बहाना बनाकर मानवता के कर्तव्य को अनदेखा किया। आपको बदले में कुछ चाहिए कोई सुख कोई सुविधा कोई मोल अन्यथा क्यों किसी को कोई सहयोग देना , मानव होना मानवता की राह चलना पड़ता है। आदमी इंसान नहीं बना कभी हैवान कभी शैतान बन जाता है। सिर्फ खुद की खातिर जीना ज़िंदगी का मकसद नहीं हो सकता है जीना सार्थक होता है जब आदमी आदमी के काम आये अन्यथा हमारा होना नहीं होना एक समान है। 
 
मुझे शून्य होना अच्छा लगता है किसी को बदले में कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती है। सभी को उपलब्ध होता हूं हमेशा जब ज़रूरत हो उपयोग कर सकते हैं। आपकी संख्या बढ़ जाएगी मुझे अपने पीछे खड़ा कर और इक बार नहीं बार बार कर सकते हैं। शून्य को बेकार मत समझो उसको अपना लो , हां शून्य हूं मैं। तकरार छोड़ो मुझसे प्यार कर लो। बस एक बार मेरा भी ऐतबार कर लो।


जानिए संख्या शून्य /"0" का रहस्य! - Who Discovered Zero And It's  Significance – Vigyanam

जुलाई 24, 2021

POST : 1528 चाय की कहानी उसकी ज़ुबानी ( अजीब दास्तां ) डॉ लोक सेतिया

 चाय की कहानी उसकी ज़ुबानी ( अजीब दास्तां ) डॉ लोक सेतिया 

चाय की चुसक्कियां लेते लेते लिख रहा हूं सामने भरी प्याली में गर्म गर्म चाय है इस हाथ टाइपिंग उस हाथ कप लिए। ये ज़रूरी था चाय की शर्त थी बस हम दोनों सबसे अलग इक साथ होंगे तभी अकेले में खुलकर बातें होंगी। चाय जैसी कोई नहीं है हुई नहीं होगी भी नहीं कभी भी। चाय इंसान इंसान में भेदभाव नहीं करती है जाने किसने झूठ कहा है चाय की प्याली और होंटों के बीच का फ़ासला इतना है कि कभी कभी सालों लग जाते हैं और प्याली के लबों तक पहुंचने में कितने जोख़िम हैं। चाय चाह का नाम है जहां चाह वहां राह होती है चाय से बिगड़ी बात बन जाती है सर्दी की धूप में चाय पीना लुत्फ़ और बढ़ा देता है तो गर्मी में गर्म चाय ठंडक पहुंचाती है। पत्नी महबूबा दिलरुबा इक प्याली चाय से मान जाती है सुबह की चाय ताज़गी लाती है शाम की चाय आशिक़ाना बनाती है। चाय की चाहत कम नहीं होती कभी ज़िंदगी भर साथ निभाती है बिछुड़ों को मिलाती है सब के मन को भाती है। खुद अपनी ज़ुबानी कहानी चाय सुना रही है कोई केतली रसोई में गुनगुना रही है खुशबू बाहर तलक जा रही है पड़ोसी को जैसे बुला रही है। 
 
मैं नहीं बदली दुनिया बदलती रही है प्याली कभी गलास कभी मग कभी लोटा भर कर कटोरी में डालकर पीना हज़ार ढंग बदले हैं पीने पिलाने वालों ने मेरा मिजाज़ नहीं बदला अंदाज़ नहीं बदला। मेरा साथ छोड़ा प्लेट प्याली का जोड़ा बिछुड़ा प्याली का अकार बदलता रहा मग का भरोसा नहीं कभी कितना बड़ा कितने संगी साथी कभी अकेला अलग अलग हुआ मगर मुझसे जुदा होकर नहीं रहा खुश कभी भी। कॉफी से मेरा कोई झगड़ा नहीं है कड़वाहट मिठास का रिश्ता होता नहीं है मुझे पीने वाले कभी बेवफ़ा नहीं होते हैं ये बात बतानी है कोई लफड़ा नहीं है। बिस्कुट से नाता मेरा सदियों पुराना है नमकीन से भी मुझको रिश्ता निभाना है बारिश में मौसम हो जाता सुहाना है कड़ाही संग टबलर मिल जश्न मनाना है गर्म पकोड़े चाय का रहता ज़माना है। चाय पीने को घर पर बुलाया है शायद मम्मी को बेटी की शादी का ख्याल आया है। चाय ने कितने संबंध बनाये हैं कारोबार कितने लोगों ने चाय साथ साथ पीकर बढ़ाए हैं। कौन है जिसने मुझे नहीं आज़माया है जब कोई नहीं देता साथ चाय ने निभाया है। 
 
पीने को बोतल शराब की भी कितनी हैं शर्बत कितने हैं और सबको लुभाती ढंडी रंग बिरंगी अनगिनत नाम की बाज़ारी जिस्मफ़रोश हैं बर्बाद करती हैं। लस्सी दूध को छोड़ सभी आदमी का सत्यानाश करती हैं। चाय पर कोई ऐसा इल्ज़ाम नहीं है दुनिया में कोई मेरा हमनाम नहीं है। चाय मुहब्बत का पैगाम देती है दोस्तों को बिठाती है साथ चाहे जिस जगह हो भूले नहीं ऐसा ईनाम देती है। घर की होटल की चायखाने की ढाबे की किसी चलते फिरते चायवाले की महंगी नहीं सस्ती नहीं बस गर्माहट देती है ठंडे रिश्तों को पल भर में नया करती है। प्याली खुद नहीं पीती बुझाती है चाह सबकी चाय की मस्ती है शहर गली बस्ती है। चाय के दुनिया में दीवाने बहुत हैं इक इक प्याली को याद अफ़साने बहुत हैं। चाय गर है साथ याराने बहुत हैं कहने को कई महंगे नज़राने बहुत हैं पर चाय की प्याली तूफ़ान खड़े करती है घर घर में रहती है सब चुपके से कहती है पीकर गाओ दिलकश तराने बहुत हैं। चाय की प्याली भी जिनको मिलती नहीं वही समझते हैं कितनी बड़ी कीमत है उसकी। ये मेरी चाय की प्याली नहीं है कहकर ढंडी आह भरते हैं अक्सर लोग।

You're my cup of tea drink sticker - TenStickers

जुलाई 22, 2021

POST : 1527 भगवान बेचते सब पैसे के पुजारी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   भगवान बेचते सब पैसे के पुजारी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

झूठ बोलते हैं अदालत में शपथ खाकर सच बोलने की संविधान की शपथ उठाकर धज्जियां उड़ाते हैं। हम सच नहीं कहते झूठ से पर्दा हटाते हैं जो देखते हैं उसकी असलियत समझते समझाते हैं। इधर उधर से ढूंढकर मुद्दे लाते हैं सिक्का नहीं उछालते नहीं किस्मत आज़माते हैं राज़ की बात भरी महफ़िल में कहते हैं बेआबरू होकर निकाले जाते हैं। खेल पैसे का है पैसा भगवान है कथा कहानी हक़ीक़त फ़लसफ़ा है। शुरुआत करते हैं टीवी पर इक नया विज्ञापन चल रहा है गांव के लोग बात कर रहे हैं स्कूल की ईमारत की हालत खराब है कुछ करना होगा सरकार ने हाथ खड़े कर दिये हैं। जब तलवार मुकाबिल हो अखबार निकालो आजकल कोई नहीं कहता क्योंकि अखबार टीवी चैनल खुद बंदर के हाथ उस्तरा बन गए हैं बंदर बांटता है बिल्लियां रोटी खाने की आस लिए बंदर का गुणगान करती हैं। कुछ मुहावरे की नकल की तरह उपाय ढूंढते हैं और निर्णय किया जाता है मुनादी करवाई जाती है केबीसी को फोन लगाओ गांव के समझदार सब उल्लू बन जाओ। लगता है सरकार ने अमिताभ बच्चन को ज़िम्मा सौंपा है हमसे नहीं होता आप केबीसी से विकास की गंगा लाओ जनता को समझाओ खाली दिमाग शैतान का घर होता है सबके दिमाग में कचरा भर कर उलझन को सुलझाओ नहीं सुलझती और उलझाओ। बस 15 सवाल हैं ज़िंदगी मौत का सवाल नहीं है कोरोना को छोड़ो धमाल नहीं मिसाल नहीं है। आपके सामने ऑप्शन होते हैं किधर जाना है सही दिशा कौन सी है दिमाग़ कहता है जिधर सभी जाते हैं उसी डगर चलना ठीक है दिल है कि मानता नहीं और आत्मा भटकती है कोई अलग रास्ता बनाने को चिंतन करती है लेकिन रटी रटाई बात याद आती है सत्य की खोज की ज़रूरत नहीं है आगे बढ़ना है तो जो जवाब पैसा दिलवाता है उसी को लॉक करना होगा। कपिल शर्मा के कॉमेडी शो में सही जवाब का शोर मचाकर बच्चा यादव मंच को हिलाकर रख देता है। अमिताभ बच्चन और टीवी शो वाले खुद अपनी असलियत नहीं जानते दुनिया भर की जानकारी समझदारी की बातें करते हैं। दुनिया से जाना है खाली हाथ सबको मगर क्या कमाल है कुत्तों को खिलाते हैं जानवर से प्यार करते हैं इंसान को इंसान नहीं समझते आदमी आदमी को भूनकर खाने लगे हैं। दुष्यन्त याद आने लगे हैं घर मिल रहा जहां तहखानों से तहखाने लगे हैं। महल वालों के अंदाज़ नज़र आने लगे हैं घर वही है रहने वाले लोग वही हैं दरवाज़े अलग अलग होने लगे हैं करीब होकर दूर जाने लगे हैं बात करने से बचते हैं मिलने जुलने से कतराने लगे हैं। अपने भीतर शिकवे शिकायत बैर नफरत छुपा नकाब चेहरे पर लगाकर मुस्कुराने लगे हैं। 
 
सत्तावाले सोने चांदी के कलम भिजवाने लगे हैं जो बात लिखवानी है लिखवाने लगे हैं। सच की बात करने वाले झूठ के कदमों में सर झुकाने लगे हैं। टीवी सीरियल फिल्म गाने समाज को गलत दिशा दिखाने लगे हैं ज़मीर बेचने वाले धन दौलत कमाने लगे हैं। लोग खोटे सिक्कों को बार बार आज़माने लगे हैं। संसद विधानसभा में देश समाज की समस्याओं की चर्चा छोड़कर माननीय कहलाने वाले आपस में टकराने लगे हैं चाय की प्याली में तूफ़ान उठाकर अपनी ताकत को आज़माने लगे हैं। शून्यकाल में सवाल खड़े हैं जवाब खाली कुर्सियां हैं कौन सुनता है चीख पुकार आम लोग रोते बच्चे भूखे सो जाने लगे हैं। खड़ा हूं आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए , सवाल ये किताबों ने क्या दिया मुझको। धुंवा बनाके फ़िज़ा में उड़ा दिया मुझको , मैं जल रहा था किसी ने बुझा दिया मुझको। नज़ीर बाकरी जी की ग़ज़ल जगजीत सिंह की आवाज़ में हर लफ्ज़ हक़ीक़त है आज भी।
 

 


जुलाई 20, 2021

POST : 1526 कुछ करना था कुछ कर बैठे ( सच के दर्पण में ) डॉ लोक सेतिया

  कुछ करना था कुछ कर बैठे ( सच के दर्पण में ) डॉ लोक सेतिया 

ढूंढने से जो नहीं मिला जीवन भर अचानक सामने खड़ा दिखाई दिया कहीं ये कोई ख़्वाब तो नहीं। नहीं ये सपना नहीं हक़ीक़त सामने नज़र आई मुझे बिल्कुल शीशे की तरह साफ जिसको तलाश किया इधर उधर मिला भी तो खुद अपने पास और इतना पास कि कोई फ़ासला नहीं था दोनों में ज़रा भी। मैंने चाहा उस से पूछना बहुत कुछ कितने सवाल मन में उठते रहे ज़िंदगी भर मगर कुछ भी कहने से पहले उसने सब कुछ बता दिया जैसे किसी परीक्षा में हर सवाल का जवाब लिखा हुआ हो। आधुनिक समय में होता है आपको सही और गलत का निशान लगाना होता है झट से पहले से दिए कॉलम में। पर यहां सोचने की ज़रूरत नहीं थी सही का निशान लगा हुआ था जैसे ऐसा गलत है साफ बताया हुआ था। आपको समझने में आसानी हो इसलिए आपको तमाम उलझनों समस्याओं परेशानियों चिंताओं का कारण भी समाधान भी बता देता हूं बस आपको हां या नहीं सच या झूठ जो उचित लगता है बोलना है खुद से खुद ही बात करनी है। आत्मचिंतन उसी तरह है जैसे हम आप अपनी मन की बात सोशल मीडिया पर लिखते हैं सोचते हैं लोग नासमझ हैं उनको समझाना ज़रूरी है खुद कभी नहीं समझा क्या समझना क्या समझाना है। ध्यान से पढ़ना खुली किताब को बिना समझे पन्ने नहीं पलटते जाना जैसे साल बढ़ते गए संख्या बढ़ी हम वहीँ रहे जहां थे। 
 
   क्या कुछ भी वास्तव में उस तरह का है जैसा होना चाहिए दुनिया में सब कुछ जैसा है कोई नहीं मानता कि बढ़िया है। लेकिन हम जिस चीज़ को अच्छा नहीं समझते बदलते रहते हैं अपने खुद की खातिर घर वाहन साज़ो-सामान खराब छोड़ बेहतर चुनते हैं हासिल करते रहते हैं। लेकिन जिस दुनिया में रहना है उसको अच्छा और सुंदर बनाने की जगह और भी खराब करते रहते हैं। किसी और ने नहीं हमने बर्बाद किया है इस कभी बड़ी खूबसूरत रही दुनिया को और कैसा बनाया है जैसा बनाना कदापि नहीं था। सरकार राजनेता अधिकारी न्यायपालिका पुलिस सुरक्षा शिक्षा स्वास्थ्य सेवा यहां तक कि धर्म भगवान समाजसेवा तक सभी जैसा होने चाहिएं उस के उल्ट हैं। धन दौलत शोहरत सुख सुविधा के पीछे भागते रहते हैं इक रेगिस्तान में मृगतृष्णा की तरह चमकती रेत को पानी समझ और मर जाते हैं प्यास से। प्यास बुझ सकती थी अथाह सागर था पास हमने जिसको देखा नहीं मुहब्बत इंसानियत और दोस्ती अपनेपन को छोड़ खुदगर्ज़ी को मकसद बना लिया है। 
 
कोई रिश्ता कोई संबंध सच्चा और निस्वार्थ नहीं बनाया है हमने सब को खराब किया है जो नहीं भाया उसको भी संवारा नहीं मिटाना चाहा है। बनाना नहीं सीखा बने बनाये को ख़त्म करना यही किया है। विधाता जो चाहता है हमने उसके विपरीत किया है मनमानी की है और विधि से मिला जो हम नहीं चाहते थे। जिस दिन अपनी मर्ज़ी छोड़ विधाता की मर्ज़ी को समझ सही आचरण करने लगे बदले में जिसकी हमको चाहत है विधाता वही देगा। बस हम उस से होड़ लगा बैठे हैं जिस के सामने अपना कोई बस नहीं चलता और बेबस हैं। हम खुद को नहीं बदलते विधाता को उसकी दुनिया को बदलना चाहते हैं। मगर किया क्या है दुनिया बनाने वाले की हर चीज़ को हमने चाहा है अपनी मर्ज़ी की बनाने को बदलने में जैसा था उस से खराब किया है। शायद ध्यानपूर्वक देखना होगा क्या ये सब जैसा होना चाहिए उसके उल्ट नहीं है जैसे सफ़ेद और काला रंग। लेकिन हमने कालिख़ को दाग़ को छुपाने को सब कुछ काले रंग में रंग दिया है। इतना ही नहीं हम काले रंग झूठ आडंबर और सभी गलत बातों को स्वीकार कर अपना लिया है। राह ही गलत चलते रहे हैं तो जिस मंज़िल की चाह थी मिलती कैसे और हम अपनी खूबसूरत मंज़िल से इतना दूर होते गए हैं कि हमारी राहें  भी खो गई हैं। 
 
सामने सच खड़ा हुआ है सच ही ईश्वर है और सच के दर्पण में सब कुछ दिखाई दिया है। कुछ करना था कुछ कर बैठे। ज़िंदगी का घड़ा भरता नहीं है जितना पानी डालते हैं रिसता जाता है जीवन को बहते दरिया की तरह बनाते तो प्यास बुझाते सबकी कुछ फूल खिलाते इक गुलशन था ये दुनिया इसको बर्बाद नहीं करते बचाते सजाते और सब पाने से अच्छा था कुछ दे कर जाते। 
 
 Money Quotes in Hindi: मैं पैसा हूँ - Afroj.In

जुलाई 15, 2021

POST : 1525 कल्याणकारी मोदीमंत्र ( नवीनतम अध्याय ) डॉ लोक सेतिया

   कल्याणकारी मोदीमंत्र ( नवीनतम अध्याय ) डॉ लोक सेतिया 

आखिर मैंने उनको मना ही लिया उनके शिखर तक पहुंचने के निराले ढंग अजब तौर तरीके और अचूक निशाने पर लगने वाले रहस्यमयी बाणों का भेद खोलने को जनहित विश्वकल्याण की दुहाई देकर। आपको यहां तलक पहुंचने में सबसे अधिक महत्वपूर्ण योगदान किस का रहा है पहले ये सवाल करना लाज़मी था। क्या जनता का संपर्क संगठन का भरोसा या दल का समर्थन इसके लिए पहली सीढ़ी साबित हुआ। ताली बजाते हुए हंस कर कहने लगे इतना भी नहीं जानते हर कामयाब व्यक्ति के पीछे किसी महिला का हाथ होना लाज़मी है। मेरी धर्मपत्नी अगर चाहती तो मुझे अपने बंधन से मुक्त नहीं होने देती और मैं दाल रोटी कपड़ा मकान घर का सामान जमा करने में भटकता रहता। लेकिन उस महान आदर्शवादी नारी ने मुझे किसी झंझट में नहीं डाला मुझ पर गुज़ारा मांगने तक को मुकदमा नहीं किया। सोचो अगर अलग अलग रहने से विवाह बंधन से छुटकारा पाने को पंचायत का अथवा अदालत का दरवाज़ा खटखटाती तो मैं जितने साल खैरात मांग कर गुज़र बसर करता रहा इन चक्करों में फंसकर ज़िंदगी बिताने को मज़बूर हो सकता था। आज भी मेरे शासक बनने के बाद उस औरत ने कभी अपना अधिकार नहीं चाहा है जो कानून संविधान भी उसको इनकार नहीं कर सकता है। बात पते की लगी तो मैंने कहा किसी महीने मन की बात करते रेडियो पर उनका धन्यवाद या आभार ही जता देना उचित था किया नहीं किसलिए। उन्होंने कहा ये पति - पत्नी का आपसी मामला है इसको राजनीतिक चर्चा से अलग रखना चाहिए। 
 
ठीक है जैसा आपकी मर्ज़ी मगर आपके कितने मंत्र आये-दिन सुनते हैं कुछ ख़ास ऐसे सभी की भलाई के लिए बताओ। उन्होंने कहा मुझे जानवरों से बड़ा लगाव है प्यार है उनसे सीखने को बहुत मिलता है। बिल्ली और कुत्ता दो जीव हैं जिनको लोग पालते हैं मगर उनका सवभाव अलग अलग है सोच बिल्कुल उल्टी है। कुत्ते को कोई खिलाता पिलाता है रहने को जगह देता है उसको आराम से सोने को बिस्तर कपड़े देता है तब कुत्ता समझता है ये मेरा भगवान है मुझे सब देता है। इसलिए अपने पालने वाले के पांव चूमता है दुम हिलाकर उपकार मानने का इज़हार करता है। लेकिन यही सब बिल्ली को मिलता है तो उसको लगता है मैं भगवान हूं तभी ये मुझे खुश करने को रात दिन कोशिश करता है। बिल्ली जो मिलता है उसको अधिकार समझती है और कुत्ता उसी को उपकार समझता है। सियासत में ये दोनों महत्वपूर्ण सबक सिखलाते हैं। कुत्ते को हड्डी खिलाते हैं बिल्ली से दूध को बचाते हैं छिपाते हैं मुश्किल खड़ी तब होती है जब चूहे बिल्ली कुत्ते शेर दोस्ती निभाते हैं। ऐसा होता है जब चुनाव करीब आते हैं। लोमड़ी को सरे गुर आते हैं गिरगिट भी रंग बदलने में पीछे रह जाते हैं हम राजनेता मगरमच्छ हैं चबाते नहीं निगल जाते हैं लोग हमको बार बार आज़माते हैं। धोखा खाते हैं पछताते हैं सब सम्मोहित करने वाले मंत्र बस मुझी को आते हैं। असली बात आपको समझाते हैं बात कहते हैं बात से मुकर जाते हैं अच्छे दिन लाने की बात थी जानते हैं कैसे कैसे हालात दिखलाते हैं। किया जो जो छुपाते हैं जो कर नहीं सकते उसके सपने दिखलाते हैं बिना कुछ भी करे कर दिया का शोर मचाते हैं जब लोग समझने लगते हैं उनको भारतमाता की जय देशभक्ति जैसे नारों से उलझाते हैं हारी बाज़ी को जीतने वाले बाज़ीगर कहलाते हैं।

जुलाई 09, 2021

POST : 1524 दर्शक ताली बजाओ मदारी बंदर नचाओ ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

इक बस वही खिलाड़ी सब अनाड़ी ( सत्ता की बाज़ी ) डॉ लोक सेतिया 

ये उनकी राजनीति है उनके लिए खेल बदलते हैं मैदान बदल जाते हैं मगर मर्ज़ी उनकी रहती है। धर्मराज जुए में सब को दांव पर लगाते हैं हर बाज़ी हार जाते हैं फिर भी सच्चे अच्छे कहलाते हैं। उनके हाथ देश की बागडोर है सारी की सारी दुनिया चोर है उनकी बात और है दिल पर भला चलता किस का ज़ोर है। मन की बात करते हैं झूठ कहते हैं सब उनका झूठ सबसे बड़ा सच कहलाता है रोज़ बात से मुकरते हैं। आपको कुछ समझ नहीं आ रहा है कोई आपको देशभक्ति का सबक पढ़ा रहा है अपनी धुन में कोई दरवेश भजन सुनाता चला जा रहा है मधुर स्वर सुन कितना मज़ा आ रहा है। खुले आकाश से राजदरबार तक किसी मॉल से मल्टीप्लेक्स और थियेटर तक उसका तमाशा है आपकी हर निराशा उसकी बन जाती आशा है आदमी नहीं है इक बताशा है मिलने की आशा है। उसके हाथ हज़ार हैं सारी दुनिया में उसके यार हैं किस लिए लोग बेज़ार हैं। बर्बादी के जितने भी आसार हैं उनकी सत्ता के सभी अचूक हथियार हैं। अपनी अपनी कहानी है बिल्ली शेर की नानी है जनता की नादानी है जिसने बदहाल किया उसकी भी समझी मेहरबानी है। चलो इस किताब को खोलते हैं खामोश अल्फ़ाज़ कभी बहुत कुछ बोलते हैं राज़ की बात खोलते हैं उनको सच के तराज़ू में तोलते हैं। जिनकी शोहरत के चर्चे हैं आमदनी से बढ़कर जिनके खर्चे हैं उन का क्या क्या हिसाब है लिखा बही खाता में सौ खून माफ़ है। हर अध्याय मुक़्क़मल है समझना चाहो तो कोई नहीं मुश्किल है। 
 
पहला अध्याय। मैं आज़ाद हूं। अमिताभ बच्चन की पुरानी फिल्म है पर्दे से असलियत में कर दिखाया है किसी संपादक ने झूठा किरदार बनाकर अपनी कल्पना से सभी पाठकवर्ग को उल्लू बनाया है। रोज़ जिस नाम से कॉलम पढ़वाया है कोई नहीं बस इक साया है अचानक कोई भूखा बेबस नज़र आया है जिसने सड़क से फेंका झूठा सेब चुपके से उठाया है। उसकी मज़बूरी का फायदा उठाया है खूब खिलाया है और पैसे देकर झूठ बोलने का अनुबंध करवाया है। मैं आज़ाद हूं , सबसे दावा कर अमिताभ बच्चन से मिलवाया है। किरदार अभी तक सदी के महानायक निभाते हैं हर फिल्म में झूठा किरदार शिद्दत से निभाते हैं मालामाल होते जाते हैं। आपको करोड़पति बनने की राह दिखाते हैं खेल खेल में पैसा बनाते हैं समझदारी उसको बतलाते हैं। आजकल कितने लोग आपको जुआ खेलने को ललचाते हैं टीवी पर खेलो और जीतो विज्ञापन में उल्टी पट्टी पढ़ाते हैं ये गुमराह करने वाले नायक समझे जाते हैं। 
 
सबसे बड़ा खिलाडी। अध्याय दो। खोटा सिक्का उसने चलाया है कुछ भी नहीं आता फिर भी सब में हाथ आज़माया है। कभी शतरंज की बिसात बिछाई है जनता मोहरे हैं बादशाह की मौज मस्ती है सत्ता की खुमारी छाई है। हर कोई दुश्मन है हर कोई भाई है बस उसकी मुहब्बत और जंग की लड़ाई है जिस में सब जायज़ है कौन सच्चा आशिक़ कौन हरजाई है। चाल उसकी है मात खाई है मगर क्या लाजवाब की चतुराई है उसने बिसात पलटी है हारी बाज़ी जिताई है। अब कोई खेल नया खेलेगा ताश की बाज़ी में हार जाएगा पुलिस बनकर वापस ले लेगा। उसने ताश के पत्तों का महल बनाया है बस हवा का झौंका कहीं से आया है बिखर गए सभी पत्ते हैं। अभी नहीं समझे बड़े कच्चे हैं उनके सामने बूढ़े भी बच्चे हैं। सरकार कोहलू के बैल जैसी है चलती रहती है अपने दायरे में नहीं किसी मंज़िल पर पहुंचती है उसकी आंखों पर बंधी खुदगर्ज़ी की पट्टी है। खराब है मगर अपनी महबूबा है ज़ुल्म ढाये फिर भी प्यार आता है उनको करना हर वार आता है उनकी सूरत पे प्यार आता है। शोहरत की बुलंदी की बात मत पूछो हर घड़ी इश्तिहार आता है। उनको नींद नहीं आती है खबर उनको सच्ची नहीं भाती है उनकी शोहरत घटती जाती है जान जाती है रूह थरथराती है। 
 
        (  अभी जारी है किताब का अगला अध्याय अगली पोस्ट पर। )
 

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जुलाई 07, 2021

POST : 1523 तस्वीर तेरी दिल में ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

       तस्वीर तेरी दिल में ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

आशिक़ आशिक़ होते हैं महबूबा की तस्वीर दिल में छुपा कर रखते थे कभी ज़माना था। किसी शायर ने कहा था कुछ हसीनों के खतूत कुछ तस्वीरें बुताँ बाद मरने के मेरे घर से ये सामां निकला। अब उनको क्या मालूम था कितनी हैं अब तलक और कितनी अभी और बनानी हैं। बड़े दिलवाले लोग मुहब्बत बांटने में किफ़ायत नहीं किया करते हैं। आधुनिक युग है आशिक़ी का रोग छोटी उम्र में लग जाता है शायद कोई बचना चाहता है कोई नहीं बच पाता है। सोशल मीडिया ने झूठी मुहब्बत की कितनी कहानियां बनाई बिगाड़ी हैं फेसबुक पर बाज़ार सजा हुआ है सच्ची मुहब्बत की झूठी तस्वीरों का। किसी सिरफिरे ख़ाली दिमाग़ शैतान का घर बंदे ने फेसबुक पर इक पेज बना डाला है सब पेज लाइक करने वालों को जिस किसी से मुहब्बत हुई उसकी बात तस्वीर के साथ शेयर करने को कहा है। खुद को बदनसीब बताया है क्योंकि उनकी ज़िंदगी में जो भी मिलती रहीं उनकी तस्वीर पास नहीं है लिखते हैं तस्वीर तेरी दिल में बसाई है। कोई वक़्त था लड़के अपने ख़ाली बटुए में तस्वीर रखते थे बस तस्वीर से बात करते थे उसको कहने से डरते थे। वहीं से कुछ टुकड़े आशिक़ों के दिल के बिखरे पड़े हैं लाया हूं आपको दिखाने को क्या ज़रूरी है हर मुहब्बत की अमर कहानी कोई लिखे जाने कितने बेनाम अनजान बदनाम आशिक़ सच्चे नहीं झूठे ही सही दुनिया में हुए हैं। इधर शायरी लिखने वालों ने खूबसूरत तस्वीर साथ लगाई है मिलती बधाई है। आपने अपनी कहानी क्या किसी को बताई है तौबा तौबा ये प्यार की रुसवाई है , देखा कोई पढ़ कर लज्जाई शर्माई है। 
 
     बचपन की मुहब्बत को दिल से न भुला देना , पोस्ट पर तस्वीर गुलाब के फूल की नहीं किसी भंवरे की लगाई है। समझ नहीं आई बात इतनी साफ समझाई है भंवरा बड़ा नादान रे , बगियन का महमान रे , फिर भी जाने ना जाने ना जाने ना कलियन की मुस्कान रे। किसी लड़की की फेसबुक वाले लड़के ने किसी की तस्वीर फेसबुक से लेकर उसकी तस्वीरों का गुलदस्ता बनाकर क्या कमाल किया है। बस जिसकी तस्वीर है उसी को नहीं पता कौन है उसने कि इसने ब्लॉक किया है। सोनम बेवफ़ा नहीं है किस्सा भूला नहीं है हर कोई उसकी गवाही देता था , सोनम ने अपनी बात लिखी है बस यही बताया है नाम पर मत जाना असली नहीं है बाकी सब सच है। सबसे लाजवाब बात इक महिला ने लिखी है जिस से सच्चा प्यार हुआ कभी इकरार नहीं इज़हार नहीं किया उसके लिए ज़िंदगी भर घर-बार नहीं किया उसके नहीं रहने पर उसकी नाम की माला जपती है खुद को मीरा कहती है राधा कहती है। जिस देश में गंगा बहती है कितनी फ़िल्मी कहानियां कितनी नायक नायिकाओं के किस्से लिखे हुए हैं। साहिर की बात से लेकर रेखा हेमा की कितनी कहानियां पढ़ कर लगता है मुहब्बत का तमाशा किसी मेले की नौटंकी में दिखाया जा रहा है। 
 
  सबसे बड़ी सच्ची मुहब्बत रूहानी होती है किसी ने ख़ुदा से ऊपरवाले से इश्क़ की कहानी लिखी है। पढ़कर किसी ने वीडियो बना डाला है कोई बादशाह किसी को खुले आसमान के नीचे मिट्टी से खेलते देख सोचता है इस के पास घर नहीं पहनने को कपड़े नहीं खाने को कुछ नहीं है। उस से कहता है मेरे साथ मेरे महल में चलकर रहो आपको सब मिलेगा जो भी मांगोगे। क्या मेरी चार शर्त मानोगे मुझे साथ ले जाना चाहते हो तो बताओ। बादशाह ने कहा कोई मुश्किल नहीं मेरे लिए बोलो क्या क्या शर्त है। उसने कहा मुझे सब खाने को देना मगर खुद आपको कुछ भी नहीं खाना पहली शर्त है , बादशाह ने कहा ये छोड़ और क्या है शर्त बताओ। उसने कहा मुझे शानदार लिबास पहनने को देना खुद नहीं पहनना , तीसरी शर्त मुझे चैन से सोने देना खुद कभी नहीं सोना होगा , और चौथी शर्त है मुझे छोड़कर कभी इक पल भी कहीं नहीं जाना। बादशाह बोले आप ही बताओ कोई भी ऐसा कैसे कर सकता है। मुझे अपने राज का सब कुछ कामकाज करना है कैसे कर सकता हूं।  उसने बताया मेरा ईश्वर ये सब करता है मुझे खिलाता है खुद कुछ नहीं खाता है। मुझे पहनने को कपड़े देता है खुद नहीं पहनता , मैं सोता रहता वो कभी नहीं सोता है , कभी भी मुझे छोड़ कर कहीं नहीं जाता। फिर भी उसका कामकाज उसका दुनिया का सब काम नियमित होता रहता है दिन रात हवा पानी मौसम कुदरत सभी रुकते नहीं हैं। सोचना आपको किसी तस्वीर की ज़रूरत नहीं होगी कोई ईमारत कोई मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा गिरजाघर ज़रूरी नहीं उस से मुहब्बत सबसे सच्ची मुहब्बत है। माला फेरना गिनती करते रहना जैसे कर्म की अहमियत नहीं है। 
 
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