मेरे ब्लॉग पर मेरी ग़ज़ल कविताएं नज़्म पंजीकरण आधीन कॉपी राइट मेरे नाम सुरक्षित हैं बिना अनुमति उपयोग करना अनुचित व अपराध होगा । मैं डॉ लोक सेतिया लिखना मेरे लिए ईबादत की तरह है । ग़ज़ल मेरी चाहत है कविता नज़्म मेरे एहसास हैं। कहानियां ज़िंदगी का फ़लसफ़ा हैं । व्यंग्य रचनाएं सामाजिक सरोकार की ज़रूरत है । मेरे आलेख मेरे विचार मेरी पहचान हैं । साहित्य की सभी विधाएं मुझे पूर्ण करती हैं किसी भी एक विधा से मेरा परिचय पूरा नहीं हो सकता है । व्यंग्य और ग़ज़ल दोनों मेरा हिस्सा हैं ।
दिसंबर 05, 2020
POST : 1419 सावधान ये ख़तरनाक मोड़ है ( गुलामी की जंज़ीरें ) डॉ लोक सेतिया
दिसंबर 04, 2020
POST : 1418 नेगिटिव अच्छा पॉज़िटिव ख़राब ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
नेगिटिव अच्छा पॉज़िटिव ख़राब ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
दिसंबर 03, 2020
POST : 1417 राज़ की बातें छुपा कर रखना ( महिलाएं मत पढ़ना ) डॉ लोक सेतिया
राज़ की बातें छुपा कर रखना ( महिलाएं मत पढ़ना ) डॉ लोक सेतिया
दिसंबर 01, 2020
POST : 1416 ख़ुशी चाहते हैं मिलते हैं दर्द ( फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया
ख़ुशी चाहते हैं मिलते हैं दर्द ( फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया

नवंबर 30, 2020
POST : 1415 गुरु ग्रंथ साहिब , स्वरूप संरचना और सिद्धांत ( पुस्तक से कुछ अंश ) लेखक :- जगजीत सिंह जी
गुरु ग्रंथ साहिब , स्वरूप संरचना और सिद्धांत ( पुस्तक से कुछ अंश )
लेखक :- जगजीत सिंह जी।
प्रकाशक :- फर्स्ट एडिशन 67 एल जी एफ कैलाश हिल्स , नई दिल्ली - 110065
पुस्तक से कुछ चुनिंदा अंश लिए हैं जो इस तरह हैं :-
" सब सिखन को हुक्म है गुरु मानिओ ग्रंथ "
" एक पिता एकस के हम बारिक " गुरु नानक का मिशन वर्गरहित समाज की स्थापना।

नवंबर 29, 2020
POST : 1414 छड़ियां दी महफ़िल ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया
छड़ियां दी महफ़िल ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया
POST : 1413 जनसेवकों के लिए न्यूनतम समर्थन वेतन तय हो ( बात लाख टके की ) डॉ लोक सेतिया
जनसेवकों के लिए न्यूनतम समर्थन वेतन तय हो ( बात लाख टके की )
डॉ लोक सेतिया
नवंबर 26, 2020
POST : 1412 इक भगवान की इक सोशल मीडिया की दुनिया ( आठवां सुर ) डॉ लोक सेतिया
इक भगवान की इक सोशल मीडिया की दुनिया ( आठवां सुर )
डॉ लोक सेतिया
नवंबर 24, 2020
POST : 1411 उपन्यास क्या लघुकथा तो होती ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया
उपन्यास क्या लघुकथा तो होती ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया
नवंबर 22, 2020
POST : 1410 आपको कब किस पैथी से ईलाज करवाना चाहिए ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया
आपको कब किस पैथी से ईलाज करवाना चाहिए ( आलेख )
डॉ लोक सेतिया
नवंबर 21, 2020
POST : 1409 महिमा लॉक डाउन की ( खेल करोड़पति का ) डॉ लोक सेतिया
महिमा लॉक डाउन की ( खेल करोड़पति का ) डॉ लोक सेतिया
महानायक कहलाते हैं कोई किसी को कॉल करता है तो उपदेश दे रहे हैं अभी आप घर बैठे खेलिए जब तक उपचार नहीं कोई तकरार नहीं। आप खुद घर बैठ ठाठ से रह सकते थे कोई दाल रोटी की चिंता नहीं थी हिसाब नहीं लगाया कितना धन बैंक खाते में जमा है। आयु भी वरिष्ठ नागरिक वाली है लोग भले कहते रहें आपकी जवानी का क्या राज़ है। बड़े और महान लोग जो आपको समझाते हैं खुद नहीं समझते कभी। हर सवाल पर इसको उसको उनको लॉक किया जाये पूछते हैं कर देते हैं आप खुले में सांस लेते हैं। घर एक नहीं कई बंगले हैं चैन घर में नहीं उस जगह मिलता है जहां धन दौलत की बारिश हो। नसीब वाले हैं शासक की तरह शान भी रखते हैं गुणगान भी करवाते हैं और भगवान भी बन जाते हैं। तुलसीदास की नहीं आधुनिक काल के राम की कथा सुनाते हैं झूमते हैं नाचते नचवाते हैं खुद पर इतराते हैं। सात करोड़ का सवाल है सोचकर जवाब देना दोहराते हैं। घर बैठे भी आमदनी होती रहती है फिर भी करोड़पति खेल से दिल बहलाते हैं टीवी चैनल से मिलकर धंधा चलाते हैं। आपको दो गज़ दूरी हाथ धोना है ज़रूरी पाठ पढ़ाते हैं बहती गंगा है मनोरंजन और तकदीर आज़माने का खेल जुआ मत कहना समझदारी बतलाते हैं।
सबसे पहले लॉक डाउन लक्ष्मण जी ने रेखा बनाकर समझाया था इस से बाहर निकलोगी तो रावण बनकर कोरोना अपहरण कर सकता है। सोने का भाव महंगा है लेकिन आपको हिरण चाहिए सोने का पहले सुरक्षित रहने का उपाय जान लो अन्यथा सोने की लंका मिलेगी फिर भी खुश नहीं रहोगी। आदमी को नसीब दो गज़ ज़मीन भी होती नहीं है क़फ़न तक नापकर देते हैं फिर भी कितना कुछ और चाहिए। बंद ताले में कितना धरा रहेगा तिजोरी का खज़ाना और बैंक बैलेंस साथ जाता नहीं जिनको मिलेगा उनकी काबलियत पर भरोसा रखते तो हज़ार झूठ वाले धंधे जाने किस किस को ठगकर लूटकर रईस बनने की ज़रूरत नहीं पड़ती। सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है गायक मुकेश गीतकार शैलेंदर संगीत शंकर जयकिशन फिल्म तीसरी कसम। सच बोलना मुश्किल नहीं होता लेकिन सच बिकता नहीं बाज़ार झूठ से चलता है। अदालत भी गवाही सबूत पर फैसला करती है और गवाह झूठी गवाही देकर कमाई करते हैं सबूत घड़ने को देश की पुलिस सीबीआई का कोई सानी नहीं है टीवी चैनल कल्पना करने में बेमिसाल हैं जो नहीं हुआ खबर बन सकता है और जो हर जगह घटता है खबर में नहीं होता है।
बैंक और सोने के गहने का विज्ञापन से लेकर भुजिया खाने तक सभी मुनाफ़ा कमाने के काम आते हैं। जब किसी को बोलने के पैसे मिलते हैं तो उसको वही बोलना होता है जो बाज़ार वाले चाहते ख़रीदार को पसंद आये सच है चाहे झूठ या फिर छलने की बात । फोन पर समझाते हैं हर उलझन को सुलझाते हैं सोचते हैं लोग नासमझ हैं बार बार समझाते हैं ज्ञान की गंगा जिधर मर्ज़ी बहाते हैं। लालच बढ़वाते हैं फिर लोभ मोह माया छोड़ने का संदेश भी सिखलाते हैं। सप्ताह के दिन तक गिनते गिनवाते हैं दुनिया में लोग खाली हाथ आते हैं खाली हाथ वापस जाते हैं ये जो मोह माया से बचने की राह दिखाते हैं अपने दिल पर काबू नहीं रख पाते हैं। हर सप्ताह किसी वास्तविक सामाजिक कार्यकता को कर्मवीर नाम से बुलवाते मिलवाते हैं कमाल है दर्शक फिर भी असली और नकली का अंतर समझ नहीं पाते हैं। ऐसे लोग जब देश समाज की दुर्दशा पर दर्द भरी वास्तविकता बतलाते हैं कभी कभी महानायक दांतों तले उंगली दबाते हैं हैरानी जतलाते दिखलाते हैं मगर शायद ही सोचते हैं खुद जो खेल खेलते खिलवाते हैं क्या वास्तव में कोई सही दिशा दिखलाते हैं। बदनसीब बाल मज़दूरों शोषण की शिकार महिलाओं और करोड़ों लोगों की जीवन की वास्तविक समस्याओं की बात जानकर शायद भूलकर किसी फ़िल्मी कहानी की तरह अपने बोलो डायलॉग की तरह मख़मल के बिस्तर पर चैन से सो जाते हैं। करोड़पति खेल टीवी शो नहीं इक सुनहरे सपनों का जाल है जानते हैं मगर कभी अपने खेल की सच्चाई समझाने वाले सवाल किसी से पूछे नहीं जाते हैं।
सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है
न हाथी है ना घोड़ा है,
सजन रे झूठ मत बोलो,
न हाथी है ना घोड़ा है,
सजन रे झूठ मत बोलो
तुम्हारे महल चौबारे,
अकड़ किस बात की प्यारे
अकड़ किस बात की प्यारे,
सजन रे झूठ मत बोलो,
भला कीजे भला होगा,
बही लिख लिख के क्या होगा
बही लिख लिख के क्या होगा,
सजन रे झूठ मत बोलो,
लड़कपन खेल में खोया,
बुढ़ापा देख कर रोया
बुढ़ापा देख कर रोया,
सजन रे झूठ मत बोलो,
न हाथी है ना घोड़ा है,
सजन रे झूठ मत बोलो,
नवंबर 19, 2020
POST : 1408 शहंशाह का डरावना ख़्वाब ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
शहंशाह का डरावना ख़्वाब ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
नवंबर 18, 2020
POST : 1407 कुछ कहते नहीं समझते हैं ( दिल ए नादां ) डॉ लोक सेतिया
कुछ कहते नहीं समझते हैं ( दिल ए नादां ) डॉ लोक सेतिया
उस दुकानदार ने समझा ये साधारण सा दिखता आदमी कहां जानता होगा आधुनिक शब्दों के अर्थ और अपने ज़रूरत की चीज़ को इस्तेमाल करने का तरीका समझ जानकारी। कहने लगा अंकल जी आपको लिख कर दे रहा जब कोई पूछे बस ये दोहरा देना। मैंने विचार ही नहीं किया कि वो जैसा सोच रहा है मैं उतना नासमझ नहीं और इंटरनेट और आधुनिक ज़रूरत की चीज़ों की जितनी जानकारी चाहिए रखता हूं। अच्छा लगा अपने कारोबार को चलाने को ही सही वो युवक शिष्टाचार निभाना और सहायता करना चाहता है। शायद कुछ लोग ऐसे में चुप नहीं रहते बोलते हैं मुझे नासमझ मत समझना आता है ये सब करना और भी बहुत कुछ जो तुम नहीं जानते मगर मैं आसानी से करता हूं। कोई चीज़ समझ नहीं आती तो पूछने में संकोच नहीं करता न इस को लेकर रत्ती भर शर्मिंदगी महसूस होती है कि बहुत कुछ मुझे पता नहीं है। शायद कितना कुछ मुझे पता है उस युवक को क्या खबर जब उसको मेरी पहचान बस उतनी पता है जितनी मेरे आधार कार्ड पर दर्ज है। बहुत बार ऐसा होता है मगर लगता नहीं किसी को कुछ कहना ज़रूरी है न मुझे खराब लगती है किसी की बात बल्कि विचार करता हूं उसको क्या मालूम मेरा परिचय और काम क्या है।
जो मुझे जानते हैं सोचते हैं मुझको मुझसे ज़्यादा समझते हैं वास्तव में कभी नहीं समझते कि ये जो कहने को बहुत साफ कहता लिखता है उसके भीतर कितना कुछ कितनी गहराई में छिपा हुआ है जिसे किसी और को बताना दिखलाना तो क्या खुद भी भूल जाना चाहता है भूले से भी मन में लाता नहीं दिल की बात। न जाने कब से उसने दुनिया को अपनी बात समझाना छोड़ दिया है मान लिया है दुनिया को कहां फुर्सत किसी को समझने की लोग हर किसी को परखते हैं जांचते हैं अपनी ज़रूरत के तराज़ू के पलड़े में अपनी खुदगर्ज़ी के बाट से तोलना चाहते हैं। कोई उनको कैसे समझाए कि उसने अपनी खुदी को कभी किसी को बेचना मंज़ूर ही नहीं किया है। खाली जेब होकर भी इस अनमोल दौलत को खोया नहीं है किसी भी हालात में।
कोई नहीं जान पाया कि वो कभी औरों के हाथ की कठपुतली बनकर नहीं रह सकता है। सबके बीच सभी के साथ होकर भी खुद अपना संग कायम रखता है अकेला होकर भी खुद अपने साथ होता है। कभी किसी को छोड़ता नहीं मगर किसी से साथ मांगना भी उसकी आदत नहीं है। ऐसे लोग कितना दुःख दर्द कितने ऐसे अनुभव खुद अपने आप से भी छिपाए रखते हैं समझते हैं ये दुनिया वाले चालाक बनते हैं मगर वास्तव में हैं बड़े ही भोले और नादान जो इतना करीब होकर भी उनको देख जान समझ पाते नहीं। कारण यही है कि जब कोई मानता है जो उसको पता है केवल वही वास्तविकता है वो कुछ भी किसी से समझना ज़रूरी नहीं समझता है और हम लोग चाहते हैं कुछ और गहराई से समझना सभी को खुद अपने आप को भी। मैं कोई गहरा समंदर जैसा अपनी गहराई किसी को बता नहीं सकता खामोश नज़र आता अनगिनत तूफ़ान अपने में लिए रहता हूं लोग लहरों की तरह अठखेलियां करते हैं मेरे साथ और मुझे आनंद का अनुभव होता है। जिनको तैरना नहीं आता उनको मेरे किनारे खड़े होकर नज़ारा देखना होता है लेकिन उनको मेरी पहचान उतनी ही होती है जितनी आस्मां के चांद सितारों बादलों और उन परिंदों की होती है जो बिलकुल मुझ जैसे उड़ान भरते भरते किसी पल आंख से ओझल हो जाते हैं।





