राहे जन्नत से हम तो गुज़रते नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 'तनहा '
राहे जन्नत से हम तो गुज़रते नहीं
झूठे ख्वाबों पे विश्वास करते नहीं ।
बात करता है किस लोक की ये जहां
लोक - परलोक से हम तो डरते नहीं ।
हमने देखी न जन्नत न दोज़ख कभी
दम कभी झूठी बातों का भरते नहीं ।
आईने में तो होता है , सच सामने
सामना इसका सब लोग करते नहीं ।
खेते रहते हैं कश्ती को वो उम्र भर
नाम के नाखुदा , पार उतरते नहीं ।
झूठे ख्वाबों पे विश्वास करते नहीं ।
बात करता है किस लोक की ये जहां
लोक - परलोक से हम तो डरते नहीं ।
हमने देखी न जन्नत न दोज़ख कभी
दम कभी झूठी बातों का भरते नहीं ।
आईने में तो होता है , सच सामने
सामना इसका सब लोग करते नहीं ।
खेते रहते हैं कश्ती को वो उम्र भर
नाम के नाखुदा , पार उतरते नहीं ।
मोड़ , आते रहेंगे , हमेशा यहां
पर किसी मोड़ पर हम ठहरते नहीं ।
कर के वादा मुकर सब ही ' तनहा ' गए
हम वो हैं जो कभी भी बदलते नहीं ।
1 टिप्पणी:
Bdhiya ghazal sir
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