Sunday, 28 October 2018

काली पहाड़ी के पीछे ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       काली पहाड़ी के पीछे ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

      कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है इधर उधर तथाकथित महानयक उपदेश देते हैं। जो भी चाहिए सब ऑनलाइन ऐप्प पर मिलता है। खलनायक ने आज़ादी को अपने कब्ज़े में कर लिया है और सोशल मीडिया पर खुलेआम घोषणा की है जिसको आज़ादी को आज़ाद करवाना है फिरौती देकर ले जाये। जगह वही जो हर हिंदी फिल्म में रही है काली पहाड़ी के पीछे। शोर मच गया है गब्बर सिंह ज़िंदा है और उसने बंधक बना लिया है हमारी आज़ादी को। हर चैनल अपने ढंग से बहस करवा रहा है , कोई अफवाह बता रहा है कोई वीडियो दिखा रहा है। सरकार अभी तथ्य पता लगा रही है उसकी कड़ी निगाह पल पल की घटना पर है। लोग फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर दहाड़ रहे हैं अपने अपने ज्ञान बघार रहे हैं। गूगल पर तलाश की जा रही है वो काली पहाड़ी , पहाड़ ही पहाड़ हैं हरियाली है रंग बिरंगे पत्थर हैं टूटी फूटी सड़कें हैं टेड़े मेड़े रास्ते हैं कुछ रेत वाले टीले भी हैं जो पहाड़ जैसे लगते हैं। काली पहाड़ी मिल नहीं रही है , चलो उसी महानयक से पता करते हैं उसने कई बार अपनी फ़िल्मी नायिकाओं को बचाया है। हंस कर सवाल उड़ाया है जवाब दिया है काली पहाड़ी काली ही है ऐसा कब किसी ने कहा आपको। आप जिस किसी पहाड़ी को काली पहाड़ी नाम देकर बुला सकते हैं। मेरी हर फिल्म में महानगर की सीमा पर जंगल और काली पहाड़ी होती थी आपने अपने गांव शहर में कोई जंगल कोई पहाड़ रहने दिया हो तो दिखाई देती काली पहाड़ी। फिर भी उनकी ऐप्प ने इक काली पहाड़ी ढूंढ ही ली। अब समस्या ये है कि उसका अगला भाग किधर है और पिछले कौन सा है। पूरी गोलाई में ऑनलाइन तलाश किया तो हर तरफ से इक जैसी दिखाई देती है। समस्या खड़ी हो गई है कि पहाड़ी के एक तरफ कोई देश है दूसरी तरफ कोई दूसरा देश है और दोनों देशों से हमारा संबंध बिगड़ा हुआ है। हम उन दोनों देशों को बता भी नहीं सकते कि हमने उस पार आकर अपनी आज़ादी को छुड़वाना है। सर्जिकल स्ट्राइक भी नहीं की जा सकती क्योंकि आज़ादी को खतरा है। 
                           अभी तक आपको ये काल्पनिक बात लग रही है तो चलो आपको आपकी वास्तविकता दिखाते हैं। घर की छत पर खड़े पकड़ो पकड़ो चिल्लाते हैं डरते हैं बाहर निकलना तो दूर छत से नीचे भी नहीं आते हैं। गुंडे बदमाश आतंकवादी जब चले जाते हैं आप तब सोशल मीडिया पर अपनी बनाई वीडियो वायरल कराते हैं और अपनी कायरता पर इतराते हैं। चोर चोर का शोर मचाते हैं मगर ऐसा कर चोरों का हौंसला बढ़ाते हैं। शेरदिल हैं सोशल मीडिया के पर शाम को घर में दुबक जाते हैं अंधेरे में अपने ही साये से डर जाते हैं घबरा कर भूत भूत चिल्लाते हैं। बात को और नहीं बढ़ाते हैं आईये आपको काली पहाड़ी की कथा की असलियत समझाते हैं। हम लोग समझते हैं हम अपनी सरकार बनाते हैं मगर दो दिन बाद खुद ही बतलाते हैं किस दल की किस नेता की सरकार है समझते समझाते हैं। उसके बाद हम सभी पछताते हैं मगर नेता लोग नाचते गाते जश्न मनाते हैं। जो कोई अधिकार की बात करता उसको आंखें दिखाते हैं। सत्ता पाकर सभी नेता एक जैसे हो जाते हैं , खलनायक बनकर आज़ादी को हमारी छीन कर अपना बंधक बनाते हैं। पांच साल किस तरह शासन चलाते हैं आज आपको सामने दिखाते हैं , क्या आपको हर दिन विज्ञापन नज़र आते हैं। मगर विज्ञापन की रोटी पानी भूख प्यास तो नहीं मिटाते हैं। धोखा देते हैं नेता हम धोखा खाते हैं। अब साफ सीधी बात पर आते हैं। सब पुरानी कहानियां दोहराते हैं , पहले वो करते थे अब ये कर दिखाते हैं।
          जो भी मुख्यमंत्री बनता है या प्रधानमंत्री बनाया जाता है , हर सप्ताह कभी इधर कभी उधर जाते हैं। मकसद देश या राज्य की वास्तविकता समझना या देखना नहीं होता है , अपनी महत्वाकांक्षा अपना वर्चस्व अपना विस्तार बस यही ध्येय बन जाता है। सच तो ये भी है इनको समाज की असलियत से नज़रें चुराना होता है सावन के अंधों को हर तरफ हरा भरा दिखाना होता है। आम जनता से बात होती नहीं है विरोध करने की अनुमति मिलती नहीं है। अधिकारी सब काम छोड़ इनके दल के आयोजन और सरकारी आयोजन का भेद भूल जाते हैं। सत्ताधारी नेताओं की आये दिन की सभाओं पर सरकारी साधन बर्बाद किये जाते हैं। कोई नियम कायदा नहीं लागू होता है। हर दिन अधिकारी कर्मचारी अनावश्यक सभाओं में लगे रहते हैं अपना कर्तव्य छोड़ कर। हम लोग उनकी तमाम गलत बातों पर खामोश रहते हैं सवाल नहीं करते क्या इसे जनता की सेवा कहते हैं। नेता जब जिस भी शहर जाते हैं कुछ लोग अधिकार मांगने नहीं खैरात लेने की तरह जाते हैं। अपना स्वार्थ पूरा होने पर खुश हो जाते हैं , बाकी हर तरफ कितना गलत है भूल जाते हैं। बड़ी बड़ी बातें करते हैं मगर इतना नहीं हिसाब लगाते हैं ये नेता आए दिन हमारा पैसा अपने मकसद को फज़ूल उड़ाते हैं।
         सत्ता पाकर आज़ादी पर डाका किसने डाला है देश का यही सबसे बड़ा घोटाला है। हर नेता को अपने दफ्तर में रहकर काम करना चाहिए। अपने बड़ी बड़ी कंपनियों के चलाने वालों को कभी इस तरह बेकार आते जाते देखा है , हर शहर उनका कारोबार है अधिकारी नियुक्त हैं सब काम की जानकारी लेते हैं। अगर इस तरह अपने अधिकारीयों कर्मचारियों को अपने आने जाने के आयोजन पर लगाएं और पैसा उड़ाएं तो कंगाल हो जाएं। मगर यहां नेता अधिकारी देश और जनता के धन को समझते हैं चोरी का माल है जितना खा जाओ सब हलाल है। इतना बड़ा देश इतने संसाधन होते भी घाटे में इसीलिए जाता है क्योंकि हर शासक लूटता है और लुटवाता है। लूट के माल का कोई भी नहीं रखा बही खाता है। अभी भी नहीं समझा जो अनाड़ी है , आपके सामने जो है यही काली पहाड़ी है।
         

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