जुलाई 07, 2019

POST : 1148 नाम बदलने से बदलेगा नसीब ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     नाम बदलने से बदलेगा नसीब ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

         खोजने पर भगवान मिलते हैं तो हर समस्या का उपाय मिलना क्या बड़ी बात है । बजट को बहीखाता नाम देने का अर्थ गहरा है हम नासमझ लोग समझते समझते इस नर्क से किसी और दुनिया के नर्क चले जाएंगे । जिन को धरती पर स्वर्ग मिला है उनकी ऊपर भी जगह आरक्षित है । आरक्षण ऊपर तक पहुंचा हुआ है आज से नहीं कितनी सदियों से वर्ग वर्ग का कानून बना हुआ है । नाम बदलने से राशिफल बदलता है सरकारी ऐलान है आपको स्वीकार करना होगा । ये बजट नहीं है उनका बहीखाता है । जिसने लिखा था नाम में क्या रखा है उसने भी लिख कर अपना नाम साथ हस्ताक्षर किये थे ताकीद के साथ । ये अजीब दास्तानें हैं उलझनें सुलझाने से और उलझती जाती हैं । उनका कहना है कि सूटकेस बदनाम बहुत है तभी उन्होंने उसकी जगह बहीखाता लाने का निर्णय किया है माता जी ने सुझाव दिया था ऐसा करने का । फिर उस बाहरी आवरण को भगवान के दर्शन भी करवाने का काम किया है । आगे भगवान को देखना है क्या कैसे करते हैं । लोग पहले से जानते थे देश भगवान भरोसे है अब सरकार भी खुद पर नहीं ऊपर वाले पर यकीन कर चलती है । अब कोई उनको बताएगा बदनाम सूटकेस नहीं लोग रहे हैं रिश्वत देने लेने वाले । अगर फिर भी बदनामी की बात की जाये तो लालाजी की बहीखाता की बदनामी मुन्नी की बदनामी से बढ़कर रही है । खराबी सूटकेस में नहीं होती न ही बहीखाते में खराबी होती है । खराब नियत लोगों की होती है , मगर कहने का अधिकार उनका है हम तो सुन सकते हैं समझने की कोशिश कर सकते हैं ।

      थोड़ा थोड़ा समझने की कोशिश कर रहे हैं । मिसाल के तौर पर धर्म की किताबों को ऐसी भाषा में लिखते थे जो आम लोग नहीं पढ़ सकते न उनको पढ़ने की अनुमति होती है । धर्म की दुकानदारी करने वाले जब जैसे उसका अर्थ निकाल आपको उल्लू बना सकते हैं । धर्म कोई भी हो उनके अनुसार कोई बहीखाता नाम का हिसाब लिखने का कीमती सामान होता है जिस में पाप-पुण्य लेना-देना जैसे दो शीर्षक रहते हैं । साहूकार की बही हो सरकार का बजट या धर्म वालों का गणित आपको समझ नहीं आना चाहिए तभी धंधा बढ़ता है । धर्म वाले लिखते हैं हम करें तो सौ गुनाह माफ़ कोई और करने को सोचे भी तो सज़ा का हकदार । कोई तर्क की बात करना अपराध है ये उनका बनाया नियम उनकी मर्ज़ी से है । उनका धर्म का तराज़ू है मगर तोलने को बाट कई हैं जैसे चाहते वज़्न बताने की सहूलियत रहती है । सरकार को कोई किताब मिल गई है जो अनहोनी को संभव करने का दावा करती है बस आंख बंद कर भरोसा करो जो कहते हैं करते जाओ । कल्याण होगा विश्वास रखना है कल्याण नहीं होने पर शक किताब पर नहीं उपाय बताने वाले पर नहीं खुद पर शक करो कि हमसे ही कोई भूल चूक हुई होगी । दक्षिणा की बात मत करना ये विचार मन में लाना ही अधर्म है धर्म पर अविश्वास है तभी आपको हासिल कुछ नहीं होता है । बजट की बात और थी बहीखाते की अलग है सरकार कहती है बेघर लोगों को घर बनाने को क़र्ज़ लेना फायदे का होगा मगर घर खरीदना है तो मकान की कीमत के साथ बिजली का बिल रख रखाव का खर्च भी जोड़ कर सरकारी दक्षिणा वसूली जाएगी । अर्थ आपको समझ कभी नहीं आने वाला है ये बच्चों की डंडे से पिटाई की तरह है मास्टरजी से लेकर पिताजी तक करते हैं आपकी भलाई के नाम पर । पिटाई से बच्चे सुधरते हैं या ढीठ और बेशर्म बनते हैं अभी शोध जारी है ।

हर शहर में कोई न कोई खुद को असली लाल किताब वाला बतलाता है । अब पहली बार सामने दिखाई दी है लाल किताब लाल रंग के सुंदर कपड़े में लिपटी हुई । सब ने देखा मगर कोई समझा नहीं सरकार ने भी राज़ को राज़ रहने दिया । लाल किताब दुनिया का सबसे बड़ा खज़ाना है जिस में सब का भाग्य लिखा हुआ है लाल किताब वाले आपकी हर समस्या का समाधान कर सकते हैं । मैं जानता हूं इक ऐसे ही लाल किताब वाले को जिसके पिताजी लाल किताब से भविष्य बांचने का काम किया करते थे । फेसबुक पर भी बहुत लोग खुद को लाल किताब धारी होने का दावा करते हैं । पहले लाल किताब के दर्शन करते हैं ।


लाल किताब है या नहीं होती है इस पर संशय नहीं रहा है । सरकार के पास सुरक्षित है अर्थात सरकार खुद अपना भाग्य जैसा चाहती है बना सकती है आपको अपना भाग्य बदलवाना है तो बाकी सब को भूल कर असली लाल किताब जिसके पास है उसके पास चले जाओ । अभी भी अगर आपको नहीं समझ आया करिश्मा कैसे हो रहा था तो फिर कभी नहीं समझोगे । आज आपको लाल किताबी उपाय बताते हैं मगर आज़माना नहीं क्योंकि लाल किताब जिसके पास होती है वह खुद लाल सियाही से उपाय लिख कर देता है । लाल किताब देख कर आपको पिछले जन्म की और अगले जन्म की भी बात बताई जा सकती है । लाल किताब को संसद में लाना सबके सामने सब की जानकारी से छुपाकर संभव नहीं था मगर अब उनकी सरकार है जिनको लेकर सब मुमकिन है का दावा किया जाता रहा है । जब लाल किताब पास हो तब नामुमकिन भी मुमकिन हो जाता है ।

लाल किताब को लाल कपड़े में लपेटने का असर होता है कि धार्मिक किताब की तरह उस पर शक या सवाल करना गलत माना जाता है ।  अभी कोई नहीं जानता कि ये लाल किताब अभी तक कहां थी किस के पास थी । क्या देश की सरकार पिछले इतने साल तक इसकी अवेहलना करती रही या बेकार समझती रही । या फिर पहले देश के सत्ताधारी को नास्तिक होने का भी दोषी घोषित किया जा सकता है ऐसा बताकर कि हमने इसको दबे हुए खज़ाने की तरह खोजा है । मगर जब इस को खोलकर पढ़कर सुनाया गया तो किसी को समझ नहीं आया इसको बजट नहीं बहीखाता सही जो भी नाम दे दिया जाये इस से सबको सब कुछ मिलेगा कब कैसे । सरकार दावा करती है कि उसने देश ही नहीं सब दुनिया की हर समस्या का हल पा लिया है । शायद भूख गरीबी बेरोज़गारी आपसी भेद भाव ही नहीं राजनीति से अपराधियों का ख़ात्मा तक इस से मुमकिन होगा सरकारी बात पर भरोसा किया जाये अगर । मगर अभी आतंकवाद को लेकर पड़ोसी देश पर निर्भर करता है क्योंकि लाल किताब सीमा पार कोई वार नहीं कर सकती है । पांच साल बाद अब सरकार ने आंकलन किया है कि लाल किताब का उपाय शायद सही ढंग से नहीं किया गया था तभी कोई फ़ायदा नहीं हुआ बल्कि घाटा ही घाटा है बढ़ते बढ़ते कंगाली में गीला आटा है सरकार बेबस है लाचार है लेकिन कभी नहीं मानती अपनी हार है नया बजट संसद में पेश करने को तैयार है । किसी को खीर हलवा पूरी किसी को रोटी संग अचार है । जनता का जिया बेकरार है उसको मिलता पुराना इश्तिहार है झूठा फटा हुआ अख़बार है । 

जुलाई 06, 2019

POST : 1147 जल कैसे बचाया जा सकता है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   जल कैसे बचाया जा सकता है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

   पानी बचाओ पानी व्यर्थ नहीं करो विज्ञापन देने से भाषण देने से कोई मैराथन दौड़ का तमाशा करने से कुछ भी नहीं होगा। पानी भारत में अभी भी कम नहीं है लेकिन जितना ज़रूरत है उस से अधिक खर्च नहीं फज़ूल बर्बाद किया जाता है। सबसे पहली बात देश की राज्यों की सरकारें इस को लेकर हद दर्जे की उदासीन हैं लापरवाही है समाज हित की आपराधिक अनदेखी तक। चांद पर जाने और जाने कितने ऐसे अनावश्यक कार्यों आडंबर करने पर धन खर्च करने से पहले अगर देश भर में साफ़ पीने का पानी उपलब्ध करवाने को महत्व देते तो शायद ये विकराल समस्या नहीं सामने आती। आपको क्या लगा मेरी बात में कोई विरोधाभास है जब पानी ही नहीं तो सबको साफ पानी मिले कैसे। चलो इक कल्पना करते हैं क्या कैसे संभव है। 

चौबीस घंटे साफ पानी की सप्लाई :-

अगर हर किसी को साफ पीने का पानी चौबीस घंटे देने का कार्य सरकारी विभाग करते तो किसी को भी घर दफ्तर बाज़ार में पानी जमा करने को टैंक नहीं बनवाने होते। विकसित देशों में पहला काम यही किया गया है जबकि कई देशों में पानी की उपलब्धता हमसे बहुत कम थी या कठिनाई से मिलता है पानी। यकीन करें अगर जलघर से पानी बिना बाधा लगातार सप्लाई किया जाये तो केवल उतना ही जल खर्च होगा जितना चाहिए। हर किसी को बिजली की मोटर नहीं लगवानी पड़ती और बिजली की भी बचत होती। कितनी बिमारियां स्वच्छ जल नहीं मिलने से होती हैं उन की भी समस्या हल हो सकती थी। कभी विचार करना आपको नल से ताज़ा पानी मिलता लगातार तो कोई ज़रूरत नहीं होती जमा करने की सीधे ज़रूरत होने पर नल से जितना चाहते उतना ही लेते। 

तालाब नदियों झरनों की सुरक्षा :-

बारिश में कितना पानी व्यर्थ जाता है कभी हर जगह गांव शहर जलभराव को तालाब हुआ करते थे। घर नहीं डूबते थे जितना अधिक पानी बरसात का होता तालाब से खाली ज़मीन पर जाता कुछ रहता बचा हुआ कुछ धरती के नीचे चला जाता। अब खाली जगह छोड़ी नहीं कहीं भी कच्ची जिस से पानी धरती के भीतर जाकर नीचे का जलस्तर ऊंचा करता उल्टा हमने धरती के नीचे से पानी का सीमा से बढ़कर दोहन कर इतना नीचे कर दिया है कि निकालने को फिर बिजली और उपाय करते हैं जो और कठिनाई पैदा करते हैं। 

अनुचित अनावश्यक निर्माण :-

सब से अधिक ये अपराध हर सरकार ने किया है और करती जा रही हैं। सरकारी विभाग के पास कर्मचारी के आवास और दफ्तर को बहुत जगह हुआ करती थी जिस का काफी हिस्सा खुला भी रखते थे। आपने देखा होगा सरकारी भवन और नगरपरिषद या नगरपालिका के दफ्तर कितने खुले हुआ करते थे। आमदनी बढ़ाने को या आधुनिक बनाने को खाली जगह को निर्माण कर लिया गया। आप के लिए नियम हैं सरकारी विभाग को अपने ही नियम तोड़ने से कोई नहीं रोक सकता है। कहने को भारत गरीब देश है और अभी भी करोड़ों लोगों के पास घर नहीं हैं जबकि सरकार के पास हर गांव हर शहर में इतने भवन और इमारतें बनी हुई हैं जिनका उपयोग भी शायद कभी ही किया जाता है। कई देशों में सरकारी इमारतों को बेघर लोगों को रात को ठहरने को उपलब्ध करवाने का चलन है। लेकिन हमारे देश में कोई सरकारी किसी भवन या इमारत को उपयोग करना चाहे तो अधिकारी आसानी से अनुमति नहीं देते मगर खुद उनको कोई आयोजन करना होता है तो जनता के पार्क से लेकर सड़क तक उनके आधीन होते हैं। सरकारी अधिकारियों को बड़े बड़े बंगले और तमाम सुविधाओं के साथ उनकी कॉलोनी की हरियाली को पानी की सप्लाई पहल के आधार पर होती है। संविधान का सबको समानता का अधिकार अधिकारी नेता सत्ताधारी अपने बड़े बड़े बंगलों में रहने से उपहास बनाते हैं।

नदियों पहाड़ों की सुरक्षा :-

पानी मिलता है पहाड़ों से बर्फ पिघलने से और नदियों से कितनी तरह से , झरने बरसाती नदी नाले कुदरत ने हमेशा से उनकी स्वछता को बरकरार रखने का उपाय किया हुआ है। हमने कभी घूमने फिरने की कारोबारी तरीके से आर्थिक फायदे की खातिर उनकी सुरक्षा को दांव पर लगाया है। कहीं पहाड़ को काटकर निर्माण करने को कहीं धार्मिकता को लेकर नदियों को नुकसान पहुंचाया तो कभी नदी की राह पर बहाव को अपनी सुविधा से बदलने का काम छेड़ छाड़ की तो जगह जगह अपनी गंदगी नदी में डालकर उसको गंदा नाला बना दिया है। तथाकथित आधुनिक विकास करते हुए हमने विनाश ही किया है। समाज और सरकार की उपेक्षा और सीमा से अधिक मनमानी व लापरवाही का नतीजा है कि आज हम उस दशा को पहुंचे हैं जहां हमें अपने तौर तरीके बदलने की ज़रूरत है मगर हमने आदत बना ली है मर्ज़ी से उपयोग करने की कुदरत की हर चीज़ को जिसे छोड़ना मुश्किल है और नहीं छोड़ेंगे तो प्यास सामने साफ दिख रही है।

पानी पर सभी का हक :-

सरकार अपने पर जिस तरह बेतहाशा धन साधन सुख सुविधा पाने और ऐशो आराम पर खर्च करने को अनुचित नहीं समझती जबकि जिस देश में भूख गरीबी हो एक एक नेता को इतना सब मिलना गुनाह समझा जाना चाहिए क्योंकि ये देश के राजा या शासक मालिक नहीं जनसेवक हैं। पानी भी उनको हिस्से से बढ़कर मिलना अमानवीय आपराधिक कार्य है। राजनेताओं को किसी भी बात पर वोटों की राजनीति करने में कोई संकोच नहीं होता है। पानी कुदरत का उपहार है अपने उसको भी बांटने का काम किया है और सब जानते हैं कैसे राजनेता अपनी ज़मीन पर खेती की सिंचाई या औद्योगिक उपयोग को मनमाने तरीके से पानी लेते नहीं छीनते हैं।

 शबाब ललित की ग़ज़ल है :-


अन-गिनत शादाब जिस्मों की जवानी पी गया

वो समुंदर कितने दरियाओं का पानी पी गया 

नर्म सुब्हें पी गया शामें सुहानी पी गया

हिज्र का मौसम दिलों की शादमानी पी गया 

मेरे अरमानों की फ़सलें इस लिए प्यासी रहीं

एक ज़ालिम था जो कुल बस्ती का पानी पी गया 

ले गए तुम छीन कर अल्फ़ाज़ का अमृत-कलस

मैं वो शिवशंकर था जो ज़हर-ए-मआ'नी पी गया 

दुष्यंत कुमार कहते हैं :-

यहाँ तक आते आते सूख जाती हैं कई नदियां 

मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा।




POST : 1146 शायरी वैश्या के कोठे से संसद तलक ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  शायरी वैश्या के कोठे से संसद तलक ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   जिनको महफ़िल के आदाब नहीं मालूम उनसे गुफ़्तगू करना फज़ूल होता है। मैंने पिछले कई सालों से टीवी पर खबरें और बहस देखना छोड़ दिया है अख़बार भी कभी चार छह मंगवाता था दिन भर पढ़ता रहता अब एक ही मंगवाता हूं सरसरी नज़र डालता हूं पढ़ने की ज़रूरत नहीं होती सब वही पहले सा होता है। कल आधा बाकी बजट संसद में पेश किया गया नहीं देखा नहीं सुना बिना पढ़े ही इक रचना लिखी खबर का शीर्षक देख कर ही। ये मशहूर होना है कि बदनाम होना कहा जाये जो इधर ग़ज़ल शायरी जिसे बड़ी मुश्किल से वैश्या के कोठे से उतार कर दुष्यंत कुमार जैसे शायरों ने इंसान और इंसानियत के आम ज़िंदगी के सरोकार से जोड़ा था वापस बेदिल बेअदब राजनेताओं की मंडी में लाई गई है बिना उसकी मर्ज़ी के। हर दिन कोई नेता किसी शायर के शेर का क़त्ल करता है किसी ग़ज़ल की आबरू तार तार करता है। कल संसद में क्या हुआ होगा आपको कोई ज़हमत नहीं उठानी पड़ेगी बस शायर राजेश रेड्डी की शायरी के इस वीडियो को समझना होगा केवल सुनने की बात नहीं है। बड़े आसान शब्दों में सीधी सच्ची खरी बात कहते हैं , सुनिए उसके बाद चर्चा करते हैं। 


पहली ही ग़ज़ल समझाती है। 
 
चलेगा चार दिन सिक्का तुम्हारा , 
फिर उसके बाद क्या होगा तुम्हारा। 
 
बड़े होकर है जीना जाहिलों में ,
 धरा रह जाएगा बस्ता तुम्हारा। 

हो सकता है जो अदबी उसूलों से वाक़िफ़ नहीं इसको भी कहें कि शोहरत की बात है बदनाम होकर भी नाम होने की चाहत रखने वाले लोग और होते हैं। दुनिया के बाज़ार से अलग रहने वाले राजेश रेड्डी जैसे वास्तविक शायरी कहने वाले शायर तो साफ कहते हैं। 

ये कब चाहा कि मैं मशहूर हो जाऊं , 
बस अपने आप को मंज़ूर हो जाऊं। 
 
मेरे अंदर से गर दुनिया निकल जाये , 
मैं अपने आप में भरपूर हो जाऊं। 
 
न बोलूं सच तो कैसा आईना मैं , 
जो बोलूं सच चकनाचूर हो जाऊं।

उनकी हर ग़ज़ल का शेर आज भी आपको हक़ीक़त लगेगा समझोगे अगर। 

अब क्या बताएं टूटे हैं कितने कहां से हम , 
खुद को समेटते हैं यहां से वहां से हम। 
 
क्या जाने किस जहां में मिलेगा हमें सुकून , 
नाराज़ हैं ज़मीं से खफ़ा आस्मां से हम। 
 
मिलते नहीं हैं अपनी कहानी में हम कहीं , 
गायब हुए हैं जब से तेरी दास्तां से हम। 
 
अब तो सराब ही से बुझाने लगे हैं प्यास , 
लेने लगे हैं काम यकीं का गुमां से हम। 
 
क्या जाने किस निशाने पे जाकर लगेंगे कब , 
छोड़े तो जा चुके हैं किसी की कमां से हम। 
 
ग़म बिक रहे थे मेले में खुशियों के नाम पर , 
मायूस होके लौटे हैं हर इक दुकां से हम। 

( सराब कहते हैं रेगिस्तान की चमकती हुई रेत को मृगतृष्णा जो पानी लगती है होता नहीं पानी )

शायरी लाजवाब हुनर है ग़ालिब को गुरुर था बादशाह का तख़्तो ताज़ छिन्न सकता है उनसे उनका हुनर कोई नहीं छीन सकता है। मगर ये राजनेता और दुनिया के ऐसे तमाम लोग जिनको दर्द से कोई एहसास ही नहीं बड़े बेदर्द होकर देश की जनता से ज़ालिमाना ढंग से पेश आते हैं उनके मुंह से ऐसी ग़ज़ल का शेर और शायरी सुनकर लगता है जैसे कदाचार करता है किसी नाज़ुक बेबस अबला के साथ। ग़ज़ल की नाज़ुकी उसकी पहचान है इधर जो शायर मंच पर ग़ज़ल को कहते नहीं पढ़ते हैं चिल्ला कर शोर करने की तरह उनका भी जुर्म कम नहीं है। बाज़ारू बिकने की चीज़ नहीं है ग़ज़ल , कहां दर्दे दिल की बात कहां नाम पैसा शोहरत और आयोजक की बढ़ाई करने की सलीका जो किसी ज़माने में दरबारी कवि अपनाते थे ख़िताब और मांहवार पेंशन पाने को। अब तो सोशल मीडिया पर इश्क़मिजाज़ी और ख़ुदपरस्ती के लिए अच्छे शेरों को तोड़ मरोड़ कर कचरा करने का गुनाह लोग करने लगे हैं। अगर उनको ये शायरी से मुहब्बत लगता है तो फिर ये प्यार भी वहशीपन वाला है ज़बरदस्ती से किसी को अपना बनाने की नाकाम कोशिश करना गुनाह है। 

मनवीय संवेदनाओं को महसूस करने को दर्द को भावनाओं को व्यक्त करने को लिखे कलाम को ऐसे लोग बोलते हैं जिनकी संवेदनाएं ही मर चुकी होती हैं इस से अधिक विडंबना की बात भला क्या होगी। आपको अगर यही अच्छा लगता है तो नकली की वाह वाह करना छोड़ इन झूठे दोगले लोगों के किसी के चुराए शेर को सुनकर तालियां बजाने से बेहतर है अच्छी शायरी की किताब लेकर पढ़ना या उनकी वीडियो ऑडियो संगीत को सुनिए। बनावटी माल नकली सामान बाज़ार में बाक़ी कोई कम था जो शेरो शायरी को भी ले आये हैं। संसद पहुंच कर ग़ज़ल को लगता होगा फिर वापस वैश्या के कोठे पहुंच गई हूं। 

याद आया कहावत भी है वैश्यावृति और राजनीति दुनिया के दो सबसे पुराने पेशे हैं और दोनों में बहुत समानता भी है। वैश्या की मुहब्बत हर किसी को मिलती है पैसे से उसी तरह से राजनेताओं का प्यार भी जनता से देश से मतलब पाने को ही होता है। चलते चलते।

जुलाई 05, 2019

POST : 1145 बजट है अबके बही खाता ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     बजट है अबके बही खाता ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

चलो कुछ बदलाव तो हुआ अबके देश की सरकार का बजट लाल रंग के सूटकेस की जगह लाल कपड़े में लिपटा हुआ दस्तावेज़ बन पेश किया बही खाता नाम देकर । लालजी का बहीखाता बदनाम रहा है उस में लालजी का जमा बढ़ता रहता है कर्जदारों का क़र्ज़ कम ही नहीं होता असल से ब्याज ज़्यादा होता जाता है । सरकार या देश का बजट वास्तव में कभी मुनाफे वाला नहीं हुआ भले उसके पास कमी किसी तरह की नहीं होती है। लाख करोड़ से कम की बात करना लगता है चिल्लड़ की बात है । घाटा ही घाटा है और घाटे को बढ़ाने को ही विकास कहते हैं । टीवी अख़बार बेकार समझने समझाने की नाकाम कोशिश करते हैं जबकि सच में पेश करने वाले को भी खबर नहीं होती इस जादू के पिटारे से कौन सा जिन्न निकलने वाला है । कागज़ पर लिखा हुआ बताते हैं कभी भी काम आ सकता है । पहले लिख बाद में दे भूल पड़े तो कागज़ से ले , दुकानदार अपने बच्चों को पहला सबक यही देते थे । सरकार बजट पेश करते हुए लिखती है किस किस को इस साल कितना देना है और किस किस से कैसे कितना वसूलना है फिर भी कहीं से क़र्ज़ उठाना भी होगा ये बताया नहीं जाता बस कहते हैं इस साल घाटा बढ़कर इतना हो जाएगा । ये घाटा कौन देगा बराबर करने को कोई नहीं बताता कोई नहीं सवाल करता है । चादर जितनी है पांव उतने बढ़ाने की कोई बात नहीं चादर को खींच तानकर फैलाने को जाल बुनते हैं । सरकार को कभी भूखे नहीं सोना पड़ता है बेघर भी नहीं होती कभी सरकार उसकी शानो शौकत भी बढ़ती जाती है शासक लोग और विपक्षी दल के लोग भी खुद अपने लिए जितना चाहते खुद ही बढ़ा लेते हैं । कर की वसूली और आमदनी बढ़ाने को देश की संपदा बेचने का भी रास्ता होता है अलीबाबा चालीस चोर की कथा का आधुनिक संस्करण यही है । चोरों की नगरी है राजधानी और खज़ाना ऐसा है जिस का ताला बंद होता नहीं कभी खुला रहता है । सरकारी गोदाम का अनाज चूहे खाते रहते हैं सड़ता भी रहता है मगर भूखे लोगों तक पहुंचाने की फाइल खो जाती है चूहे कुतर जाते हैं ।

जो किसी ने नहीं सोचा सरकार को पता चल गया है , लालजी की बही का सच समझते सब हैं समझ पाए नहीं लोग । बही के कागज़ लाल रंग की जिल्द में इक सफ़ेद रंग के धागे से पिरोये हुए होते हैं । बही को बांधे रखते हैं मगर खोलने को धागे को निकाल कर किसी का खाता निकाल उस कागज़ को फाड़ने या निकालने से कोई दूसरा बीच में रखने की सुविधा होती है । पन्ना नंबर सही रखना कोई कठिन काम नहीं सब मुमकिन है । आधुनिक काल में सरकारी साइट्स या ऐप्स पर कुछ अपलोड करने के बाद डिलीट करने का विकल्प रहता है । कहीं आपको यहां बजट की जानकारी तो नहीं चाहिए थी पढ़ने को , क्या होगा उस से दिल बहलाओगे जन्नत का ख्वाब समझकर । जिनको मिलना है उनको इसकी ज़रूरत नहीं है उनकी पसंद और ज़रूरत पहले से सरकार पूछ चुकी होती है । कल कोई आपको रेखा खींच कर दिखाएगा पैसा कितने फीसदी किस को मिलेगा किस तरह से आएगा । बजट बनाने के बाद भी कभी आंबटित राशि खर्च नहीं हो सकेगी अड़चन एक नहीं सौ हैं तो कहीं बजट में नहीं शामिल सरकार की मर्ज़ी से खर्च करने को उपाय भी होता है । बजट किसी और काम को आंबटित था उसको किसी और को देने को कागज़ पर लिखने भर की देरी है आदेश है पहले से सब सही करने को बैठे हैं । सही करना मतलब ठीक करना नहीं होता है हस्ताक्षर करने को कहते हैं , कहते थे कभी किसी दल का कोई लिखित हिसाब किताब नहीं था । खाता न बही केसरी जो कहे वो सही ये हर सत्ताधारी का हिसाब है नाम कोई और होता है असली तिजोरी की चाबी जिसके पास वही मालिक होता है ।

आजकल के युवा नहीं जानते कभी पुरानी फिल्मों में सूदखोर की बही बड़ी बदनाम हुआ करती थी । गोपी फिल्म में गोपी साहूकार की दुकान पर नौकरी करते हुए लालजी की बही के पन्ने फाड़ने लगता है तो कोई सवाल करता है पता भी है कौन से पन्ने फाड़ने हैं और गोपी कहता है जो फाड़ने हैं वही फाड् रहा हूं । अब कोई गोपी नहीं है जो साहस करे और जिन पन्नों को फाड़ना चाहिए फाड़ने का काम करे । मगर कहते हैं दुनिया घूमती हुई वापस उसी जगह पहुंच जाती है जहां से चलना शुरू किया था । ऑनलाइन बैंकिंग तक पहुंचने के बाद वापस पुराने बही खाते पर आने का कुछ महत्व अवश्य है । इसको आप प्रतीकात्मक समझ सकते हैं सिंबॉलिक शब्द उपयुक्त होगा । आजकल सरकार देश की हो चाहे राज्य की खज़ाना लूटने वालों के और खैरात बांटने वालों में तकसीम होता है बाकी सभी के लिए बाबा जी का ठूल्लू बचता है ।
 
 Union Budget 2024 briefcase to budget bahi khata story and connection with  businessman | Budget 2024: बजट की पोटली को अब क्या कहते हैं भारतीय  व्यापारियों से इसका क्या है नाता?

जुलाई 04, 2019

POST : 1144 जो बोओगे वही काटोगे ( सामाजिकता की बात ) डॉ लोक सेतिया

 जो बोओगे वही काटोगे ( सामाजिकता की बात ) डॉ लोक सेतिया

 विषय का विस्तार बहुत है , चिंता का अंबार बहुत है। निरर्थक की बहस नहीं है समझने को सार बहुत है। सब पहले यही समझते हैं हमने अपनी संतान को अच्छी परवरिश दी है बड़े होकर समझेंगे हमारी उलझन को। किसी और की बात सुनते हैं पढ़ते हैं कि ऐसा हुआ क्या कर दिया तो दिल में पहली बात आती है खुद उन्होंने भी यही किया होगा शायद अपने बड़ों के साथ। मगर ऐसा होता नहीं है हर माता पिता अपनी संतान को अपनी हैसियत से बढ़कर नहीं है पास वो भी उपलब्ध करवाना चाहते हैं। बच्चों की बिना अर्थ की तुतली आवाज़ को भी सुन कर ख़ुशी महसूस करते हैं उनको बढ़ावा देते हैं फिर भी वही बच्चे बड़े होने पर माता पिता की बातों को अनावश्यक उपदेश कहकर अनसुना करते हैं कभी खिल्ली उड़ाते हैं और समझते हैं हम पढ़ लिख कर आधुनिक समाज को जानते हैं इनको खबर नहीं दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है। तमाम बच्चे समझते हैं हमने माता पिता को पैसा कमा कर दिया सब सुख सुविधा उपलब्ध करवाते हैं इस से बढ़कर उनको क्या चाहिए। बस उनको इतना सा ही तो समझाते हैं जैसा हम सोचते हैं आप वैसा किया करो। रिश्तों का संबंध कभी शर्तों पर नहीं कायम रहता है माता पिता संतान को किसी अनुबंध में बांधकर नहीं रखते हैं कि आपको बदले में इस तरह करना होगा। मगर फिर भी बड़े होकर हर बच्चे को लगता है मुझे जितना मिला थोड़ा है और माता पिता को भी शिकायत होने लगती है इसकी उम्मीद नहीं की थी। यही बात घर से बाहर समाज की है और देश को लेकर भी इक निराशा दिखाई देती है जिस जिस से जो अपेक्षा है पूरी नहीं होती हर कोई समझता है मैं जो भी करता हूं ठीक करता हूं। अपने आप से बाहर निकल कर समझते हैं जो कड़ी घर से शुरू होती है पूरे समाज और देश को जोड़ती हुई निर्धारित करती है हम क्या क्यों कैसे हैं। 

हमने संतान को बड़े होकर क्या करना है क्या बनकर दिखाना है कैसे आधुनिक ढंग से जीना है कितना धन किस किस तरीके से जोड़ना है नाम शोहरत पाने को क्या करते हैं दुनियादारी की समझ देते हैं। अच्छे इंसान बनने की सच कहने के साहस की ईमानदारी की कर्तव्य की बातें सिखाना शायद हम सोचते हैं बड़े होकर खुद सीख जाएंगे बच्चे। हमने बहरी परिवेश कपड़े पहनने अच्छे नज़र आने की बात समझाई मगर भीतर मन से सुंदर होने का सबक पढ़ाया नहीं या खुद हमें भी नहीं पढ़ाया गया था। हम चाहते हैं जो बनाना उसको बनाने को पहले बहुत कुछ करना भी था जो किया ही नहीं। हमने बचपन से सभी से अनावश्यक मुकाबला करने की सोच बना ली थी और अपनी संतान को तुम औरों से किस बात में कम हो सबसे बढ़कर समझदार हो की भावना को स्थापित किया और बढ़ावा दिया है। अपनी गलती को समझना तो क्या स्वीकार भी नहीं करना ऐसी आदत बनाने के दोषी हम खुद हैं। मैं ये हूं मैं वो हूं जाने हर किसी को खुद को बेकार इक अहंकार कैसे आ जाता है जो बाहर हर किसी को अपने से कमतर समझते समझते घर में भी सब से काबिल होने का गुरुर पैदा कर देता है। स्वाभिमान की बात और होती है आत्मसम्मान की कीमत नहीं समझते हम मतलब को गधे को बाप कहना पड़ता है ये धारणा बना ली है। जिन विकसित देशों में जाकर व्यवस्था और सब बड़े छोटे बराबर होने को देख हम तारीफ करते हैं खुद अपने देश और समाज में आचरण करते हुए उस तरह नहीं चलते हैं। मनमानी और मतलबपरस्ती की आदत को हमने समझा है अवगुण नहीं खासियत है अपनी बुरी बात को अच्छा साबित करना चाहते हैं। 

कितने अच्छे स्कूल कॉलेज की पढ़ाई कितना अच्छा कारोबार हो जो सबसे महत्वपूर्ण है नैतिक आचरण जो जैसा है उसी तरह का नज़र आना और गलती करने पर पछतावा या भूल का सुधार करने का हौंसला रखना कोई सोचता ही नहीं इनके बिना आदमी विवेक शून्य बनकर ऐसा समाज बनाता है जो संवेदना से रहित है। ऊपर चढ़ने की चाहत में राह उचित अनुचित का विचार करते ही नहीं हैं। आधुनिकता और झूठी दिखावे की सभ्यता ने हमसे जो बेहद मूलयवान था छीन लिया है जो दिया है वो सच कहा जाये तो किसी काम का नहीं है। हीरा खोकर पत्थर जमा करने का काम करते हैं हम लोग। मगर सब जानते समझते ऐसा होने कैसे देते हैं हम , कारण है कि हम चिंतन नहीं करते अपने बारे न देश समाज के बारे। कोई कौन होता है हमें उपदेश देने वाला हम सही हैं या गलत उनको क्या लेना देना। खुद अपने आप से डरते हैं खुद को आईने में देखने का साहस नहीं करते। जब किसी से कोई शिकायत रखते हैं तब क्या सोचा कभी औरों को भी हमसे कितनी शिकायत हो सकती हैं। जब हम मज़बूर होते हैं तब समझते हैं बेबसी का दर्द क्या है लेकिन जब हर किसी की विवशता पर हंसते हैं मज़बूर होने पर किसी का शोषण करते हैं भूल जाते हैं इंसानियत क्या है।

      नाम मुहब्बत प्यार के अपनेपन के हैं फिर भी इन में सब कुछ होता है मधुर संबंध मिलना बड़ा कठिन है। लोग हैं जो निभाए जाते हैं जैसे कोई बोझ ज़िंदगी ने सर पर रख दिया है ढोना मज़बूरी है। हर रिश्ते की कुछ कीमत होती है जो चाहे अनचाहे चुकानी पड़ती है। रिश्ते बनाते नहीं हैं बने बनाये मिलते हैं और निभ सके चाहे न निभे निभाने पड़ते हैं। दिल का दिल से कोई नाता होता भी है सच कोई नहीं जानता बात दिल की कहते हैं दिल से पूछो दिल की दिल ही जानता है। दर्द से दिल भरा होता है फिर भी मिलते हैं हंसते मुस्कुराते हुए ये चेहरे हैं कि मुखौटे हैं जो क़र्ज़ की तरह होटों पर हंसी रखनी होती है और अश्कों को छुपकर किसी कोने में बहाना होता है अकेले अकेले। दुनिया भर में कोई कंधा सर रख रोने को नहीं मिलता कोई आंचल पलकों के भीगेपन को पौंछता नहीं है। दर्द देते हैं अश्क मिलते हैं रिश्ते क्या कोई ख़ंजर हैं जो घायल करना जानते हैं मरहम लगाना नहीं आता है। ये जो सुनते हैं हमदर्दी के साथ निभाने के नाते किस दुनिया की बात है इस दुनिया में तो नहीं मिलते खोजते रहते हैं जीवन भर। मुझे अकेला छोड़ दो कौन है जो ऐसा कहना नहीं चाहता पर कहा नहीं जाता है कहने पर सवाल होते हैं। जब आपको साथ चाहिए आप अकेले होते हैं भरी महफ़िल में और जब कभी आपको अकेले रहना होता है भीड़ लगी रहती है। कोई तकलीफ हो लोग आते हैं हालचाल पूछने को मगर ज़ख्मों को छेड़ कर दर्द बढ़ा जाते हैं , रिश्ते हैं रिश्तों की रस्म निभा जाते हैं। ज़रूरत होती है बुलाओ भी नहीं आ सकते पर बिन बुलाये भी चले आते हैं कितने अहसां जताते हैं।  
 
  बेगानों ने कहां किसी को तड़पाया है ये किस्सा हर किसी ने सुनाया है जिसको चाहते हैं उसी ने बड़ा सताया है। दर्द देकर कोई भी नहीं पछताया है हर अपने ने कभी न कभी सितम ढाया है। रिश्ते ज़ंजीर हैं रेशम की डोरी नहीं हैं हर किसी का इक पिंजरा है बंद रखने को कैद करने को। रिश्ते आज़ादी नहीं देते हैं जाने कितने बंधन निभाने होते हैं हंसते हंसते तीर खाने पड़ते हैं। कोई नाता नहीं जो खुली ताज़ा हवा जैसा हो जिस का कोई खुला आकाश हो पंछी की तरह उड़ने को फिर शाम को घौंसले में लौट आने को। कितनी शर्तों पे जीते मरते हैं सच नहीं कहते इतना डरते हैं , बात झूठी करनी पड़ती है करते हैं। सुलह करते है फिर फिर लड़ते हैं। मतलब की दुनियादारी है हर रिश्ता नाता बाज़ारी कारोबारी है हर पल बिकती है वफ़ादारी है कितनी महंगी खरीदारी है। भीड़ है हर तरफ मेला है जिस तरफ देखो इक झमेला है कोई बवंडर है कि तूफ़ान कोई ये जो इतना विशाल रेला है। जीना किसने दुश्वार किया है हर किसी को गुनहगार किया है कभी छुपकर कभी सरेबाज़ार किया है। अपने भी तो रिश्तों का व्यौपार किया है खोने पाने का हिसाब हर बार किया है। कितने रिश्तों ने परदा डाला है कितनों ने शर्मसार किया है। ये रिश्ते हैं कि पांव की बेड़ियां हैं हाथ पकड़े हैं कि लगी हथकड़ियां हैं। ज़िंदगी भर जिसको निभाया है हुआ फिर भी नहीं अपना पराया है इक बार नहीं सौ बार आज़माया है। अब नहीं मिलती धूप के वक़्त कहीं भी छाया है। इक गीत याद आया है। 
  
       आज आगे की बात करते हैं। इक कहानी जैसी बात है दो अजनबी मिलते हैं जान पहचान होती है। कोई कहता है अकेला हूं मुझे साथ लेते चलो। चलना है तो चल सकते हो मेरे साथ लेकिन मैं नंगे पांव पैदल चलता हूं और बस चलते जाना है बने बनाये रस्ते पर नहीं खुद अपनी राह बनाता हूं। तुम जब तक साथ चल सकते हो चलना जब थक जाओ रुक जाना तेज़ जाना हो आगे बढ़ जाना कोई शर्त नहीं साथ निभाने की जितना साथ चल सकते हैं चलना जब नहीं निभे तो अलग हो जाना किसी शिकायत गिले शिकवे के। तुम को मेरी राह कठिन लगेगी कभी तो चले जाना अपनी मर्ज़ी की राह पर अलविदा कहकर। मुझे नहीं आता है दिखावे की दुनियादारी निभाना और मुझे औरों को भी साथ लेकर चलना है खुद आगे बढ़ने को किसी को राह में नहीं छोड़ना है। धन दौलत महंगे उपहार नहीं हैं खाली जेब है और खुश रहता हूं जिस भी हाल में , मिलते हैं लोग बिछुड़ते रहते हैं यादें बनकर रह जाते हैं। आज तुम मुझे कोई कीमती उपहार देना चाहते हो कल मुझसे चाहोगे बदले में शायद नहीं दे पाऊं ये जो तुम नहीं लेना चाहता दे रहे हो यही अमानत है जब भी चाहो लौटा दूंगा मगर मुझे रिश्तों में हिसाब करना नहीं आता है। बहुत कुछ है जो एक साथ रहते मिलता है जिसको धन दौलत से तोला नहीं जा सकता है। कुछ भी नहीं छुपाया था सब बताया था अपनी विवशता अपनी सोच और अपने मकसद को लेकर भी। अचानक सवाल करने लगे आपकी कोई बात मुझे मंज़ूर नहीं है और मज़बूरी को अविश्वास समझ लिया अब और नहीं आपके साथ चलना संभव है। ठीक है जितना साथ चले अच्छा है। ये इक पंजाबी की कविता या ग़ज़ल की बात है। कोई झूठ नहीं कोई हेरा फेरी नहीं मगर मंज़िल अपनी अपनी जाना है तो किसी मोड़ पर राह बदल सकती है। हम लोग रिश्तों को इक कैद बना लेते हैं दोस्ती या प्यार या कोई भी नाता हो चाहते हैं अपनी शर्तों पर साथ निभाना है लेकिन दिल से कोई ऐसा नहीं कर सकता है। घर को पिंजरा मत बनाओ रिश्तों को जंजीर बनाकर साथ जकड़ने से रिश्ता इक बोझ बन जाता है। कोई मिलता है तो किसी मोड़ पर अलग भी होना पड़ता है ऐसे में बिछुड़ने का दर्द हो मगर गिले शिकवे कर जो मधुर नाता रहा उसको कड़वी याद बनाना उचित नहीं है।

          जीवन खोने और खो कर पाने का नाम है। हम पाना सब कुछ चाहते हैं खोने को तैयार नहीं होते है। सभी कुछ आज तक किसी को नहीं मिला है। जो मिला उसको लेकर खुश नहीं होते और जो नहीं मिल सका उसको लेकर दुःखी रहते हैं। दोस्ती रिश्तों के संबंध में देना है तो बदले में पाने की शर्त रखकर मत दो क्योंकि जितना भी मिलेगा आपको कम लगेगा जितना दिया वो बहुत अधिक लगता है। जब पलड़े में तोलने लग जाते हैं तो दुनियादारी होती है अपनापन प्यार मुहब्बत नहीं बचता है। फिर आपको बार बार जतलाना पड़ता है किसी को चाहते हैं जबकि जतलाने की बताने की ज़रूरत होनी नहीं चाहिए। 

 

जुलाई 03, 2019

POST : 1143 शोर की ख़ामोशी से मुलाकात ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     शोर की ख़ामोशी से मुलाकात ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

जिसकी लाठी उसकी भैंस की तरह सत्ता पास है सबसे अच्छा होने का शोर खुद उनका है। उनसे पहले भी जो नहीं बोलने की पहचान से जाने जाते हैं दो बार सत्ता पर रहे हैं। उनको लेकर हैरान भी परेशान भी थे और अपनी हर किसी को अपमानित करने की आदत से मज़बूर भी इसलिए संसद में मज़ाक उड़ाने को कह दिया था। आपसे सीखना है राजनीति के हम्माम में भी इतने घोटालों के बाद आपके दामन पर इक छींटा तक नहीं नज़र आया। क्या ग़ुसलख़ाने में भी रेनकोट डाल कर नहाते हैं। कौन बताये उनको ईमानदारी का कोई रेनकोट आपके बाजार में नहीं मिलता है। मौन रहे थे अच्छा किया वाहियात किस्म की बात पर जवाब नहीं देना ही समझदारी है। मगर अब खुद को सबसे अच्छा कहलाने वाले समझ नहीं पा रहे हमने देश की अर्थव्यवस्था को जिस बदहाल हालत में पहुंचा दिया है उस से बाहर निकलने का कोई रास्ता बचा भी है। तब याद आया कभी उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को बचाने का कार्य किया था वित्तमंत्री बनकर। राजनेताओं को शायद शर्म नहीं आती किसी को अपमानित करने के बाद अवसर आने पर गले मिलकर मतलब की बात करने की। और भले लोग अपनी शराफ़त को छोड़ते नहीं हैं घर आये महमान का आदर किया करते हैं। पहले अपनी बनाई वित्तमंत्री को मिलने भेजा औपचारिक नहीं थी मुलाकात तैयारी थी अपनी डूबती नैया को किस तरह बचाया जाये ये ज़रूरी सबक किसी और से नहीं सीखने का जोखिम उठाया जा सकता। असली किया धरा सब खुद का है और नासमझी में मनमानी करते करते देश की अर्थव्यवस्था की कश्ती को बीच मझधार ले आये हैं। माझी शब्द सुना होगा पतवार थामे कश्ती को पार लगाने का काम करते हैं उर्दू भाषा में उसको नाखुदा कहते हैं , इक शेर है " नाखुदा को खुदा कहा है तो फिर , डूब जाओ खुदा खुदा न करो "। परवीन फ़ाकिर की ग़ज़ल है। मेरी भी इक ग़ज़ल है चलो पेश करता हूं।

  ग़ज़ल डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

हमको ले डूबे ज़माने वाले ,
नाखुदा खुद को बताने वाले।

देश सेवा का लगाये तमगा ,
फिरते हैं देश को खाने वाले।

ज़ालिमों चाहो तो सर कर दो कलम ,
हम न सर अपना झुकाने वाले।

उनको फुटपाथ पे तो सोने दो ,
ये हैं महलों को बनाने वाले।

तूं कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं ,
मेरी अर्थी को उठाने वाले।

तेरी हर चाल से वाकिफ़ था मैं ,
मुझको हर बार हराने वाले।

मैं तो आइना हूँ बच के रहना ,
अपनी सूरत को छुपाने वाले। 
 
 
    जिनको हमने नाखुदा समझा था वही हमको ले डूबे हैं। बात हो रही थी शोर की मुलाकात की ख़ामोशी के साथ। ख़ामोशी नहीं जाती है उस तरफ शोर ही है जिसको ख़ामोशी की ज़रूरत पड़ जाती है। मगर क्या कहा होगा शोर ने क्या जवाब मिला होगा ख़ामोशी से बताएगा कौन ख़ामोशी बता नहीं सकती और शोर को बताना नहीं मंज़ूर। फिर भी कल्पना करते हैं। 
 
  आप आये घर हमारे खुदा की कुदरत है हम कभी आपकी शान को कभी हमारे घर की सादगी को देखते हैं। आपको तो पहले के सभी खराब लगते हैं फिर क्यों ज़हमत उठाई हमारे पास आने की जब नवरत्न आपके दरबार में हैं आपके बनाये हुए। अपने सुनते हैं सरकारी संचार की भारत संचार निगम लिमिटेड कंपनी जिसकी जायदाद तीन लाख करोड़ है उसको 950 करोड़ में अपने कारोबारी दोस्तों को बेचने का विचार कर रहे हैं।
सरकारी विमान कंपनी को भी आप निजी हाथों में सौंपना चाहते हैं। घर का सामान संभालना नहीं आता या अपने खास लोगों को सस्ते में बेचना चाहते हैं ताकि छींटों से बचे रहें और जी भर कर बौछारों से खुलकर नहाने का लुत्फ़ भी उठाते रहें। इतना तो समझते हैं लोग कि देश की आर्थिक बदहाली का आपके दल का विश्व की सबसे अमीर राजनीतिक पार्टी बनने का कोई नाता अवश्य है। आगे कब क्या करना है पता नहीं।
 कल शायद देश की हालत को भी बिगाड़ कर किसी को ठेके पर देने की बात सोचने की नौबत आ जाये। आपने पिछले पांच साल में बेतहाशा धन बर्बाद किया है विदेशी दौरों से देश भर में अपने गुणगान को जमकर शोर मचाने पर। अच्छे दिन की जगह बुरे दिन कोई और नहीं लाया है कम से कम पचास साल पहले मर चुके व्यक्ति को अपने अपकर्मों का दोष नहीं दे सकते हैं। पांच साल और मिल गए  हैं आपको जो मर्ज़ी करने को कोई आपको कुछ नहीं कहने वाला है। आपको हैरानी नहीं हुई ख़ामोशी ये सब बोलती रही और शोर चुपचाप सुनता रहा भला कैसे। मगर यही होता है ख़ामोशी बिना आवाज़ जो समझा देती है शोर ऊंची ऊंची आवाज़ करने के बावजूद नहीं समझा सकता है। 
 
      आखिरकार शोर करने वाले को कहना ही पड़ा अपने सच कहा था हालत जितनी आपको आशंका थी उस से भी बढ़कर चिंतनीय दशा तक खराब हो चुकी है। आपको नज़र आता है मैंने कितना खूबसूरत लिबास पहना है मगर सच कहूं खुद को महसूस करता हूं जैसे राजा नंगा है कहानी जैसी हालत नहीं हो। कोई सच बताता ही नहीं सब घबराते हैं सच कहा तो सूली चढ़ा दिया जायेगा मगर आपको सच बोलने से कोई रोक नहीं सकता है। अब आप मुझे सच सच बताओ मैंने जिस को पहना हुआ है क्या वो पोशाक जैसा सब लोग शोर मचा रहे हैं मेरी रथयात्रा पर पुष्प वर्षा कर रहे हैं वास्तव में पहनी हुई है , कहीं मेरी हालत हम्माम में कुछ भी नहीं पहने व्यक्ति जैसी तो नहीं लग रही है। ख़ामोशी मुस्कुराई और धीमे से बताया आपकी जिस्म वाली पोशाक तो लाजवाब है आपके भीतर की वास्तविकता ढकी छिपी है मगर देश की अर्थव्यवस्था की दशा को कब तक देश की जनता से छिपाओगे आखिर सामने आनी ही है। आपको नेक सलाह कभी किसी की भाती नहीं है जिसने भी दी अपने उसी को किनारे लगा दिया। नाखुदा होने का दावा किया था अब डूबने के आसार बने हैं तो खुदा खुदा करने से बात नहीं बनेगी। भगवान उसी को बचाता है जो खुद कोशिश करते हैं बचाने की। आपको तो आदत है जानकर कश्ती को मझधार में ले जाने की तूफ़ान से खेलने की आदत खतरनाक होती है। इक ग़ज़ल भी है सुनोगे जाने से पहले अच्छी है। 
 

जीवन मृत्यु फिल्म की है और धोखे से जालसाज़ी से किसी बेगुनाह को सज़ा दिलवाले वाले लोगों को अंजाम तक पहुंचाती है कहानी। इशारा समझ सकते हैं काफी है।   


POST : 1142 क्या ज़िंदा हैं सभी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

      क्या ज़िंदा हैं सभी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

       पहले अपनी बात कहता हूं जी रहा हूं मगर वास्तव में जीना नहीं आया अभी तलक मुझे। बेकार गाता रहा हमेशा ही , किस तरह जीते हैं ये लोग बता दो यारो , हमको भी जीने का अंदाज़ सिखा दो यारो। किसे आता है सलीका जीने का जो सिखलाता। सब लोग सूखे तालाब किनारे बैठे हैं प्यास लेकर नाता निभाने को। जब बहुत अधिक बोलने लगे कोई तो उसको खामोश रहने की सलाह देते हैं लेकिन चुप रहना क्या आसान है उसके लिए जिस के भीतर तूफान मचलते रहते हैं भंवर लिए फिरता है कदम कदम अपने साथ। कुछ इसी तरह सोचकर समझ आया जितना लिखा किसी काम का नहीं है अब विराम लेकर थोड़ा याद रखने के काबिल काम का लिखना बेहतर है। लिखना भी खुद पढ़ना भी खुद है किस को बिना मतलब की बात पढ़ना सुनना पसंद है बात करते हैं तो भी कोई मकसद छिपा रहता है। अब जब मरने की तैयारी करनी चाहिए हसरत जाग उठी है थोड़ा सा हम भी जी कर देख लेते। किसी ने कहा था मौत के बाद जीना है तो दो काम हैं करने को , या कुछ कर जाना लिखने के लायक या फिर लिख जाना पढ़ने के काबिल। अपने आप पर गर्व नाज़ करना फज़ूल है अभी तो नाज़ करने जैसा कुछ भी नहीं किया है। आज़ादी की चाहत में कैदखाने की दिवारों को और ऊंचा करते रहे हैं जाने किस डर से और समझते रहे यही सुरक्षा की ज़रूरत है।

  इधर समस्या खड़ी हो गई है , सरकार को पता चला है देश में जनसंख्या में कुछ गड़बड़ है। नोटबंदी की तरह अचानक घोषणा की गई है सबको अपने ज़िंदा होने का हल्फनामा जमा करवाना होगा कुछ दिन के अंदर और इक दस्तावेज़ हासिल करना होगा ये घोषणा करने का कि हां अमुक नाम का व्यक्ति मरा नहीं है। ज़िंदा होने की बात फिर भी साफ नहीं लिखी जाएगी क्योंकि ज़िंदा होने का भरोसा नहीं किसी का भी। सांस चलती है दिल धड़कता है विवेक काम नहीं करता उसको ज़िंदा नहीं कहते हैं मरने की राह पर मदहोशी की बात है। जाने कितनी चलती फिरती लाशें हैं जिन में ज़िंदगी होने का कोई एहसास नहीं होता है। जी रहे हैं मगर जीते हैं मर मर कर मुर्दों की तरह से , फर्क इतना है लोग खुद अपनी अर्थी को उठाये फिरते हैं। सीने पर बोझ लिए सांसों की गिनती करते वक़्त गुज़रते हैं। 

    इस से पहले कि आप घर से निकल पड़ें समझ लेना ज़रूरी है ज़िंदगी के अलामात क्या हैं। पहला काम आपको अपने भीतर झांकना है कोई आत्मा ज़मीर नाम का है भी या नहीं। बेच तो नहीं बैठे किसी को किसी दिन जाने अनजाने में। एक्स रे अल्ट्रासाउंड से आधुनिक उपकरण है जो आपके सामने पाते ही घोषित करेगा आपका ज़मीर है या नहीं है। नहीं समझे तो आईना सामने रखकर देखना , मन का दर्पण आपको साफ सच बता देगा। उस के बाद जाना किसी डॉक्टर से जांच करवाने लेकिन ख्याल रखना उस डॉक्टर के पास ज़िंदा होने का आत्मा और ज़मीर के सुरक्षित और स्वस्थ्य होना का दस्तावेज़ है तभी अन्यथा उसको अपने साथ किसी और के पास लेकर जाना। ज़िंदा नज़र आना और ज़िंदा होने का फर्क होता है संवेदना रहित गतिमान व्यक्ति बिना भावना या एहसास के बस इक मशीन है। मशीन खुद नहीं करती कुछ भी जिस के हाथ मशीन होती है उस की मर्ज़ी से चलती फिरती काम करती है। जैसे कोई वाहन किसी चालक की इच्छा से आता जाता है , हम किसी को इंसान नहीं इस्तेमाल की चीज़ समझते हैं और उसकी पसंद नापसंद नहीं समझते पूछते जानते समझते। जो हम चाहते हैं उस से करने की उम्मीद करते हैं। कोई काम आप करना नहीं चाहते करना पड़ता है वेतन पाने को नौकरी का सवाल होता है तब आदमी आदमी नहीं रहता मशीन हो जाता है।

    कहने को आपका शहर देश या गांव है मगर जैसा होना चाहिए होता नहीं है आपको बेगानापन लगता है। लोग भागते रहते हैं देश विदेश घूमते हैं चार दिन सैर करने को लाजवाब जगह भी हमेशा रहने को कभी लगता है मज़बूरी है। जिस जगह आपको हमेशा रहकर ख़ुशी मिले उस जगह आपका घर होना मुमकिन नहीं होता है। घर अपना नहीं किराये का भी हो तब भी आपको अपनी मर्ज़ी से रहने की अनुमति मिलना ज़रूरी नहीं होता मिल ही जाये। घर क्या कमरे का कोई इक कोना आपका अपना हो अपने अनुसार रहने को और कोई आपके हंसने रोने नाचने गाने झूमने पर अंकुश नहीं लगा सकता हो तो खुल कर जीने का लुत्फ़ लिया जा सकता है। दुनिया के नियम कानून आपको जीने नहीं देते और मरने की भी मनाही होती है फिर भी कहते हैं इस ढंग से जीना है उस ढंग से जीना सही नहीं है। आज़ाद होना चाहते हैं सभी मगर किसी दूसरे को आज़ादी देने को कोई तैयार नहीं होता , और किसी का मनमर्ज़ी से जीना क्यों आपको खराब लगता है।

      और होंगे जिनको चिंता रहती है मौत के बाद लोग याद रखें मुझे , मैंने तो चाहा है लोग भूल जाएं मुझे भी मेरी सभी खताओं को भी। किस किस का मुजरिम नहीं हूं क्या किया है ऐसे जीता रहा जैसे कोई हर दिल इक गुनाह करता है। कुछ भी नहीं है मुझ में याद रखने के काबिल और कोई हसरत नहीं बाद मरने के याद करे कोई , हसरत है थोड़ी फुर्सत मिले इजाज़त मिले ज़माने की तो पल दो पल जीकर देखा जाये ज़िंदगी किसे कहते हैं। मरने के इंतज़ार में सांसे की गिनती को जीना नहीं कहते हैं।

   

जुलाई 01, 2019

POST : 1141 हमारे दल में शामिल होना है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   हमारे दल में शामिल होना है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

    सब जिधर जा रहे हैं गया राम भी उधर जाना चाहते हैं। बुलावा मिलना कठिन नहीं है जानते हैं जब नाम आया राम से गया राम हुआ था उन्हीं की मेहरबानी थी जो सौदेबाज़ी करवाते हैं। सत्ता पाने को विधायक संसद की ज़रूरत हो तब माल मिलने के साथ खाने को दूध मलाई भी मिलती है। मगर बाद में सरकार बन जाने के बाद मामला उल्टी गंगा बहाने की तरह भी होता है। अभी जिस दल में हैं उसका राहुकाल चल रहा है पंडित जी ने दल बदलने को सलाह दी है। बीच के दलाल से बात की तो मुलाकात तय होने पर मिलने आए हैं। 

आईये आपका स्वागत है बड़ी देर कर दी मेहरबां आते आते। गया राम बोले जी मैं तो गया ही था घर वापस आने को ही। भूलसुधार करना चाहता हूं दिल तो हमेशा से यहीं पे था , बस राजनीतिक विवशता के कारण जिधर चुपड़ी रोटी मिलती है दिल मचल जाता है। अब उस दल में रोटी भी जली हुई बेस्वाद बंटती है कोई मीठा नमकीन का सवाल ही नहीं। पेट का सवाल है भूखे भजन नहीं होता तो देश सेवा की राजनीति कैसे संभव है। लोगों से झूठ कह सकते हैं जिस जगह सत्ता का महाझूठ चलता है उस जगह हम जैसे लोगों का झूठ टिक नहीं सकता तभी साफ सच सच कहना उचित है। हर कोई इधर कोई विचारधारा बदलने से नहीं आया है। और अब आपकी भी विचारधारा बदल गई है उसी दल की नकल बन गई है जिसको हराया था। नाम बदला है दल का आधे लोग उसी दल से लाये हैं आप भी। आपके दल में शामिल होने को जो करना है करने को तैयार हूं।

   आपको और कुछ भी नहीं करना है अपनी पिछली सारी पढ़ाई इतिहास की धर्मं की भुलाकर जैसी हम चाहते हैं पढ़नी है और दोहरानी है। कल तक आपका आदर्श कोई और था अब आपको उसी को खराब बताना है उसे मतलबी और देश समाज का विरोधी साबित करना है और हमारे दल के नेता को देश का नहीं दुनिया का सबसे अच्छा और महान व्यक्ति घोषित करना है। आपको हमारी पाठशाला में पढ़ना है समझना है हर बात को नये ढंग से।  दिल आत्मा रुह से बदलाव कभी आसानी से नहीं आता है , कोई भी और ऐसा नहीं कर सकता न किसी ने किया है जो हम करना जानते हैं। हमारे दल में शामिल होते ही आप आदमी इंसान नहीं इक मशीन बन जाओगे जिसका तार या बटन हमारे हाथ होगा। कठपुतली बनकर इशारों पर चलना है तुम मशीन हो जाओगे तो अच्छा बुरा नहीं समझना सोचना जो करने को निर्देश दिया मशीनी मानव बन करना होगा। वोट देने से कोई बात कहने तक। हैरान नहीं हो जाना हमने कंप्यूटर या फोन की तरह प्रोग्रामिंग करना सीख लिया है जो भी दल में शामिल होता है उसका जिस्म नहीं बदलता भीतर का सब बदल जाता है। पिछले सब फॉरमेट कर मेम्मोरी से मिटा कर अपना सॉफ्टवेयर डाल देते है और सब उसी ढंग से सोचने समझने लगते हैं।

शामिल होने वाले दल की किताब का पहला सबक पढ़ रहा है गया राम। धर्म की बात साफ है हमारा धर्म सत्ता की राजनीति करना है जिस में सब जायज़ है चोरी हेराफेरी झूठ फरेब जो जब ज़रूरत हो। कोई दुविधा मन में नहीं रखनी क्या भला क्या बुरा है। हर धर्म की बात भाषण तक अमल करने को कोई भी धर्म अपना नहीं है। धर्म इक सीढ़ी है ऊपर चढ़ने की इस के सिवा कुछ भी नहीं , पाप पुण्य हमारे लिए बराबर हैं। जितने पुराने नायक हुए हैं हमने उनको सत्ता की शतरंज की बिसात पर मोहरे बनाकर अपनी चाल चलनी है। गांधी का नाम काम की चीज़ है उनका अहिंसा का विचार किसी काम का नहीं है हमारा मतलब धार्मिक उन्माद फैला कर हल होता है तो भीड़ की हिंसा पर ब्यानबाज़ी करनी है और उसे बढ़ावा देना है। हम जा रहे हैं जिधर उधर इक अंधी गली है और भविष्य क्या होगा कोई नहीं देख पा रहा मगर हमारा नेता मानता है हमारी आंखों को मोतियाबिंद हो गया है वास्तविकता की रौशनी से हमारी आंखे चुंधिया सकती हैं। हमने घने अंधकार को रौशनी का नाम देकर महाभारत के धृतराष्ट्र की तरह निर्णय करने हैं और जिनकी आंखों की रौशनी बची हुई है उनको गंधारी की तरह अपनी आंखों पर दलगत स्वार्थ की पट्टी बांध का रहना है। सब हमारे साथ हैं भीष्म पितामह मौन हैं गुरु द्रोणाचार्य बेबस हैं कोई सत्ताधारी को सही गलत नहीं बता सकता है। सब के सब सत्ता के सिंहासन से बंधे हुए हैं खामोश हैं। गीता की बात नहीं कहनी रामायण की नहीं समझनी महाभारत का अंजाम नहीं सोचना बस आदमी से इक संख्या बन जाना है।

    भगवान कहीं नहीं है इक छलावा है हम जिसे भगवान मानते हैं वही हमारा भगवान खुदा मसीहा है और जिसको ईश्वर का दर्जा रुतबा दिया उस पर शक नहीं करते सवाल नहीं किया जाता। उसकी जय जयकार से हमारा कल्याण होता है। जैसे किसी पर वशीकरण या कोई जादू असर कर गया हो गया राम पल भर में बदल गये हैं और शिष्ट भाषा आचरण को त्याग अहंकार और भड़काने की भाषा बोलने लगे हैं। उनको लगता है यही दल उनके लिए सब कुछ है हमेशा से इसी के रहे हैं किसी दूसरे दल का नाम तक नहीं जानते हैं। आरती गाने लगे हैं तुम्हीं हो माता पिता तुम्हीं हो तुम्हीं हो बंधु सखा तुम्हीं हो सामने सुनहरे फ्रेम में जड़ी तस्वीर दल के एक ही महान नेताजी की है। नतमस्तक हैं खैरात से झोली भर गई है खली आते हैं सब झोलियां भर भर जाते हैं बताते हैं।

जून 30, 2019

POST : 1140 बेनाम चिट्ठी बिना पते की ( आरज़ू ए दिल ) डॉ लोक सेतिया

   बेनाम चिट्ठी बिना पते की ( आरज़ू ए दिल ) डॉ लोक सेतिया 

( जो नहीं जानते उन्हें बताना लाज़मी है कि मेरी आदत रही है अक्सर ख़त लिख कर रखता हूं किसी को पढ़ाने के वास्ते । 

ख्वाब है कि कोई है जो मेरी तरह लिखता होगा मेरे ख़तों के जवाब भी ऐसे ही । 

कई दिन बाद फिर दिल कुछ कहना चाहता है सुनता कोई नहीं , लिख के रखता हूं जब कभी वो सपने का अपना मिलेगा तो दे दूंगा पढ़ने को । )

मेरे अनाम दोस्त ,

आज इतनी सी बात बतानी है कि इक छोटी सी आरज़ू है दिल में अभी तलक भी। ज़िंदगी को जीना चाहता हूं खुद अपने साथ रहकर बगैर किसी बंधन किसी कैद किसी ज़ंजीर के मर्ज़ी से। अभी हैं कुछ बाकी काम दुनियादारी के फ़र्ज़ निभाने को रहते हैं उनको पूरा कर लूं तभी बिना कोई बोझ क़र्ज़ का सीने पर लिए जी पाऊंगा भले एक साल ही सही ज़िंदगी से मोहलत मिले तो सही। जाने किस किस ने अपनी बही खाते में मेरे नाम क्या कुछ बकाया लिखा हुआ होगा। मेरे पास तो किसी का कुछ भी जमा नहीं है मगर तकाज़ा है हर किसी का लेनदारी का जो इनकार नहीं किया जा सकता है। नहीं मालूम ज़िंदगी को कितनी ऐसी शर्तों में किस ने जकड़ा हुआ बनाया है बड़ा कठिन हिसाब है ये दुनिया का जिस में क़र्ज़ का पलड़ा भारी रहता है रिश्तों नातों दोस्ती के तराज़ू के पलड़े में। लाख कोशिश करने पर भी बराबर नहीं होते हैं। बाट भारी हैं उठाये भी नहीं जाते आसानी से बड़ी मशक्क़त से कोशिश करने पर भी सांस फूलती है और घायल होने का डर रहता है। 

आंखे हैं कि नज़र धुंधली होती जाती है पास से भी कुछ नज़र नहीं आता कोई आवाज़ ठीक से सुनाई भी नहीं देती और जो कहता हूं कोई सुनता नहीं सुन भी ले तो समझ नहीं पाता लोग कहते हैं मुझे बात कहनी नहीं आती शायद भूल गया हूं दुनिया से संवाद करने का तौर तरीका। साफ सीधी खरी बात भी लोग कहते हैं बेकार की बात है किस युग किस ज़माने की है ये बात। आजकल इन बातों का कोई मतलब नहीं रह गया है तुम भी निकलो इस अपनी ख्वाबों की दुनिया से बाहर। मगर ये बाहरी दुनिया मुझे कब रास आई है बड़ी बेदिल और बेरहम दुनिया है डराती है दूर से ही पास जाने का साहस ही नहीं होता मुझसे। 

  चमकती हुए रेत सी है ये दुनिया और मैं भागते भागते तक गया हूं आराम करना चाहता हूं थोड़ा रुककर किसी पेड़ की छांव में ठंडी हवा के झौंके से किसी ममता की गोद में किसी के आंचल को ढककर सो जाने का मन है। चलने की ताकत बची नहीं है कुछ देर को चैन मिल जाये तो फिर आगे की राह चलने का इरादा करना है मगर अब के कोई कारवां कोई काफ़िला साथ नहीं रखना। अब अकेले खुद के साथ अपनी मंज़िल को तलाश करना है। मौत से पहले ज़रा सा जीना चाहता हूं , सभी का हिसाब चुकता करने के बाद मुमकिन है इतनी फुर्सत मिले ज़िंदगी से। 

 मेरा खत पढ़ कर उनको सुनाना जो नहीं पढ़ते हैं , जिनको सुनाई नहीं देता उनको समझा सको तो समझा देना। जिनको मतलब समझ नहीं आता उनको उनके हाल पर छोड़ देना। तुम समझ लो तो शायद तुम्हारे नाम लिखी चिट्ठी है नाम नहीं जनता पता नहीं मालूम मुझे फिर भी पहुंचेगी किसी दिन किसी तरह से। जवाब लिख सको तो लिखना मुझे भेजना भी कितने अरसे से इंतज़ार है। 

तुम्हारा दोस्त 

लोक सेतिया। 


 



POST : 1139 कुआं मेंढक खुद को समंदर समझना ( सच केवल सच ) भाग दो - डॉ लोक सेतिया

      कुआं मेंढक खुद को समंदर समझना ( सच केवल सच ) 

                           भाग दो   -      डॉ लोक सेतिया


बात फिर से शुरू करते हैं ग़ालिब की इक ग़ज़ल के शेर को दोहराते हुए। हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है , तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़े गुफ़्तगू क्या है। दो सौ साल पहले कोई बादशाह के दरबार में स्थापित शायर अपने सिवा किसी को बराबर नहीं समझता था शेरो सुखन की महफ़िल में। इशारा था आप ही बताओ ये कैसी तहज़ीब है जो जानते समझते हुए भी किसी को जतलाना कि उसकी कोई पहचान नहीं है। होते हैं ऐसे लोग जो कहने को बरगद जैसे विशाल होते हैं लेकिन उनकी छाया किसी पौधे को उगने पनपने नहीं देती है। तमाम राजनैतिक दलों में ऐसा वर्चस्व स्थापित कर लेते हैं सत्ता की बागडोर हाथ लगते ही राजनेता कई मगर जब कोई खुद को खुदा समझने लगता है उसकी खुदाई रहती थोड़े दिन ही है। इतने विशाल देश का संविधान किसी को ऐसा करने की अनुमति नहीं देता है। सबसे अनुचित होता है कुछ नहीं करते हुए सब कुछ करने का दिखावा करना। राजनीति की मछली हर तलाब को गंदा करने पर तुली है लोग राजनीति को समझते नहीं उसकी चाल का शिकार होकर आपस में नफरत झगड़े बिना तथ्य की बहस करने लगे हैं।

     सोशल मीडिया पर हर राजनेता की एक नहीं अनेक फेसबुक और व्हाट्सएप्प्प ट्विटर अकाउंट हैं मगर छल की बात है कि कोई भी नेता खुद नहीं है उसके नियुक्त लोग वेतन लेकर उनके नाम से आपसे संवाद करते हैं और हर बार संवाद करने वाले लोग बदल जाते हैं जैसे किसी नौकरी पर आठ घंटे की सेवा करना होता है। कोई कोई कभी खुद भी एक फेसबुक पर रहता है मगर हर अपने नाम की फेसबुक या सोशल मीडिया अकाउंट पर पढ़ कर लगता है खुद को सच्चा भला और ईमानदार घोषित करना मकसद है। जो वास्तव में नहीं हैं जो कभी होना चाहते नहीं हैं उसका दिखावा करते हैं। दोस्ती नहीं करनी उनको दोस्त बनकर आपको अपनी चिकनी चुपड़ी बातों में लाना है। जाने कितने लोग नासमझी करते हैं जो इन को लेकर कौन बनेगा विधायक सांसद खेलते रहते हैं। इक मंच जो आपस में संवाद स्थापित करने का अपने विचार अभिव्यक्त करने की जगह था झूठ चालाकी और मतलब का माध्यम बन गया है। आपको लगता है आपके राज्य के राजनेता से दोस्ती है पहचान है मगर होता ये है कि व्हाट्सएप्प पर हर दो दिन बाद कोई आपसे अपना परिचय मांगता है नाम पूछता है। मुझे हैरानी होती है जब मेरी भेजी हर पोस्ट पर मेरा नाम लिखा रहता है शीर्षक में ही फिर भी सवाल किया जाता है भाई कौन हैं आप। ऐसे लोगों को क्या समझ सकते हैं या समझा सकते हैं उनके ग्रुप्स हैं बने हुए उनकी महिमा का गुणगान करने को।

         सोशल मीडिया पर हर कोई भली बातें सुंदर संदेश देता है उपदेशक बनकर सच्चाई और धर्म का सबक सिखलाता है चाहे खुद कैसा भी हो। मगर जनता को ठगने को हर खलनायक मसीहा होने का दावा करता नज़र आता है फेसबुक व्हाट्सएप्प पर। खुद को चालाक समझना ठीक है आपकी चाल चालाकियां लोग नहीं समझ पाते वो भी अपनी जगह मगर इरादा सत्ता पाकर देश की संम्पदा की लूट का और दावे देश भक्ति जनता की सेवा करने की भावना के ये तो हद से आगे बढ़ना है। अच्छा बनकर दिखाना कोई नहीं चाहता मगर हर कोई कहलाना चाहता है तुम से अच्छा कौन है। बड़े धोखे हैं इस राह में कभी मुहब्बत प्यार को लेकर कहते थे अब सोशल मीडिया को लेकर कहना पड़ता है। हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है। आपको जो भी राजनेता अपने लगते हैं वो किसी के भी होते नहीं हैं कल किसी दल के नेता को आदर्श बताते थे उनके अनुयाई बने फिरते थे आज दलबदल कर सुर बदले हुए हैं। जिनको गली देते थे उनकी वंदना करते नज़र आते हैं उनके चरण धोने से चरणों में नतमस्तक होने तक सब करते हैं और कल जिसे अपना खुदा कहते थे आज उसी को पापी अधर्मी बताते लाज नहीं आती। दोगलापन नहीं उस से बढ़कर गिरगिट से जल्दी रंग बदलने वाले इंसान नहीं हो सकते। सत्ता की हवस ने अंधा और पागल किया हुआ है विचार का कोई मतलब ही नहीं है। ये राजनीति की लंका है जिस में हर कोई बावन गज़ का है मगर ये चमकती हुई लंका खालिस सोना की क्या पीतल की भी नहीं हैं जंग लगे हुए लोहे पर सोने के रंग से पुताई की हुई है।

अब इस को लेकर लिखना समय बर्बाद करना है अधिक क्या कहा जाये आखिर में पुरानी कहावत की बात याद कर लेते हैं। कहते हैं राजनीति और वैश्यावृति दुनिया के दो सबसे पुराने पेशे हैं और दोनों में बहुत समानताएं हैं। कानूनन जिस्मफ़रोशी अपराध है मगर ईमान बेचा जा सकता है राजनीति करने की छूट है उस में झूठ कपट छल धोखा सब की इजाज़त है पता चलता है तो हम हैरान नहीं होते कह देते हैं ये तो राजनीति की बात है अर्थात गंदी बात है। ये समाज कहता है भली बातें करना सीखो मगर करता है गंदी बातें दिन भर गंदी राजनीति छाई रहती है दिलो दिमाग पर। गंदी बातों में आनंद मिलता है अच्छी बातें सुनकर लोग बोरियत महसूस करते हैं। जैसे हर कोई प्यार इश्क़ मुहब्बत में तारीफ खूबसूरती की करते हुए भीतर भावना कुत्सित वासना की रखते हैं किस लिबास में कौन किसी की अस्मत लूटना चाहता है किसी का ऐतबार नहीं है। इस दौर में हर कोई राम का रूप धारण किये है मगर लोकतंत्र की सीता का अपहरण करने की फ़िराक में है यही सार है अपने आज की राजनीति की वास्तविकता को ब्यान करना हो अगर।   
 

 

जून 29, 2019

POST : 1138 कुआं मेंढक खुद को समंदर समझना ( सच केवल सच ) भाग एक - डॉ लोक सेतिया

       कुआं मेंढक खुद को समंदर समझना ( सच केवल सच ) 

                          भाग एक -    डॉ लोक सेतिया 

 अपनी हैसियत को लेकर मुगालते में रहने वाले लोग भी होते हैं। बात चाहे किसी भी समाज की हो ऐसे लोग मिलते हैं जो जतलाते हैं अगर दुनिया कायम है तो उन्हीं के दम से है। किसी और की क्यों खुद अपनी बात करता हूं मैं क्या हूं कुछ भी नहीं मुझसे पहले कितने डॉक्टर भी और लेखक भी हुए हैं जिनके सामने मेरी कोई बिसात ही नहीं है साहित्य की दुनिया के समंदर में मेरा अस्तित्व किसी कतरे से भी कम है न होने जैसा। कई लोग हुए हैं अभी भी होंगे जिनको लगता है हिंदी साहित्य की शान उनसे है जबकि हिंदी ही नहीं अन्य भी भारतीय भाषाओं का साहित्य बहुत समृद्ध रहा है। जिनको किसी और भाषा का साहित्य उच्च कोटि का लगता है उन्हों भारतीय ग्रंथों को समझा तो क्या पढ़ा ही नहीं है। महाभारत जैसा काव्य ग्रंथ रामायण जैसा दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा , गीता की संक्षेप की बात और सार की बात अनुपम है तो गुरु ग्रंथसाहिब किसी भी अन्य धर्म से अलग अपनी मिसाल है तभी उसको प्रकट गुरु समझने को कहा गया है। टैगोर का लिखा साहित्य अभी सारा छप नहीं सका है ग़ालिब मीर कबीर रहीम रसखान और रूहानियत के कवि खय्याम से लेकर लंबी सुचि है हम बस उनकी रचनाओं को जानते हैं थोड़ा बहुत। फिर भी हैं जो आज खुद को समझते हैं साहित्य के हस्ताक्षर हैं। बात किसी और की करनी है मगर मगर पहले अपने भीतर झांकना उचित था और मुझे ये स्वीकार करने में रत्ती भर संकोच नहीं है कि मैं कुछ भी नहीं हूं इक तिनके से कम हैसियत है जो तेज़ आंधी की बात क्या ज़रा सी हवा भी उड़ाकर जिधर चाहे ले जा सकती है। अब आगे आजकल की बात। 

मोदी को लेकर बड़ा शोर है उन्होंने देश की शान बढ़ाई है जैसे उनसे पहले देश बेनाम था और उसकी अपनी कोई पहचान नहीं थी कोई विरासत नहीं थी। ये इस महान देश की महत्ता महान परंपरा विरासत को भूलना है। ठीक जैसे कुछ लोग आज़ादी को गांधी जी की उपलब्धि समझते हैं जबकि गांधी इक चेहरा थे विचारधारा का जो अहिंसक तरीके से देश की लड़ाई लड़ रहे थे और करोड़ों लोगों को अपने साथ खड़ा करने का काम कर दिखाया था मगर साथ ही कितने ही और भगत सिंह बोस जैसे भी लोग अपनी अपनी तरह से आज़ादी की जंग में शामिल थे। बर्तानिया सरकार के साथ समझौता या संधि होने से सारा श्रेय उनको नहीं दिया जा सकता है और अभी भी देश की जनता उनको महानायक मानती है गांधी नेहरू के योगदान को समझ कर भी उनकी कुर्बानी को याद रखते हैं दिल से आदर से। कुछ लगाव है जो आज भी उनके नाम से ही हमारा खून दौड़ने लगता है इक भावना का संचार करता है देशभक्ति का जज़्बा पैदा करता है। हज़ारों साल का अपना गौरवशाली इतिहास है और जाने कितने शासक हुए हैं जिनका योगदान कोई भूल नहीं सकता है। वो चाहे कोई मुस्लिम शासक हों या सिक्ख राजा उन्होंने हिंदुस्तान को सभी धर्म के लोगों को जोड़ने और उनका कल्याण करने तथा न्याय का आदर्श स्थापित करने का कार्य ईमानदारी और निष्पक्षता से किया ताकि हर कोई खुद को सुरक्षित महसूस कर सके। विश्व के देशों से पहले हमारा देश बेहद समृद्ध रहा है आर्थिक रूप से भी और ज्ञान विज्ञान को लेकर भी हम दुनिया को ज्ञान बांटने का काम करते रहे हैं। 

कई विदेशी अंग्रेजी शासकों ने हमारे इस बेहद समृद्ध भंडार को दरकिनार कर अपनी शिक्षा और नीतियों को लादने का काम किया और हमारे कुछ लोग जो शासक वर्ग और अभिजात वर्ग से थे उनकी चाल को समझने में नाकाम रहे और देश को गुलामी की जंज़ीरों में जकड़े जाता देख किनारे खड़े रहे। उनको अपने लिए पैसा तमगे उपाधियां और ख़िताब इतने भाए कि उनकी आंखें ही नहीं सोच भी कुछ भी नहीं देख रही थी। ऐसे लोगों की गलतियों और स्वार्थ से देश दो सौ साल गुलाम रहा है। मगर हमने इक़बाल की बात को शायद नहीं समझा है कि कुछ बात है जो हस्ती मिटती नहीं हमारी बरसों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा। आज कुछ लोग शायद अपने स्वार्थ में अंधे होकर ऐसा शोर करते हैं जैसे किसी एक नेता के आने से देश का परिचय विश्व से हुआ है। हम नहीं समझते राजनीति का खेल हमेशा से सत्ता और ताकत और लूट का तरीका रहा है जो भी देश हमसे दोस्ती के रिश्ते रखते हैं उनका खुद का मतलब होता है कोई आर्थिक या वैश्विक राजनीति से जुड़ा स्वार्थ छुपा होता है। जो भी देश आगे बढ़ते हैं अपने दम पर लगन से महनत से बढ़ते है किसी और देश से खैरात लेकर नहीं। खैरात पाने वालों का अंजाम सामने है पड़ोसी देश को देख सकते हैं , जब तक मतलब था ज़रूरत थी उपयोग करना था उसको कितना कुछ दिया और जब मतलब के नहीं समझते तो मझधार में छोड़ते हुए समय नहीं लगाया है। 

   केवल बातों को भाषण को सुनकर किसी को महान मत समझना ऐसा शेख चिल्ली होने को कितने हो सकते हैं वास्तविक नायक कहने में नहीं कर दिखाने में यकीन करते हैं। ध्यान से समझोगे तो उनकी कही बात वास्तविकता में सच नज़र नहीं आती है। लेकिन हम जिन टीवी अख़बार वालों से प्रभावित हो जाते हैं वो खुद क्या हैं अपने खुद को सबसे बेहतर हैं का खुद ही तमगा देते हैं। कहते हैं हमारे चाहने वाले सबसे बढ़कर हैं जब कि उनकी इसी बात को नापसंद करने वाले उनसे परेशान हैं उनको नहीं खबर। कई लोग ऐसे होते है जिनको खुद को बाज़ार में ऊंचे दाम बेचना आता है और आपके सामने हैं कोई योग की दुकानदारी करता है कोई किसी खेल को पैसा बनाने का जरिया तो कोई अभिनय को शोहरत दौलत पाने का माध्यम बना नज़र आता है उनसे बड़ा कोई नहीं हुआ है मगर ये छल है और उनसे अधिक काबिल लोगों को किनारे करने भूल जाने का काम है। 
 
                   ( अभी विषय अधूरा है बाकी बात अगली पोस्ट पर )

 

जून 28, 2019

POST : 1137 आग बरसाने वाले पेड़ ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      आग बरसाने वाले पेड़ ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   दुष्यंत कुमार अब बताओ हम कहां जाएं। आपको दरख्तों के साये में धूप लगती थी और कहने लगे चलो यहां से चलते हैं और सदा के लिए। आजकल जो पेड़ पूर्वजों ने छांव देने को फल की आस रखकर लगाए थे उनके पत्ते तक आग बरसाने लगे हैं। जिसको गुलशन कहते थे वही तपता रेगिस्तान बना डाला है उन लोगों ने जो मसीहाई का मुखौटा लगाकर आए थे और कहते थे हम इस धरती को जन्नत बना देंगे। दोजख़ भी क्या इस से बुरा होगा कोई इस नर्क को देख कर लोग जीने से घबराते हैं। बड़ी अजीब तहज़ीब के लोग हैं जो भगवान देवी देवताओं के नाम का शोर मचाते हुए ज़ालिमाना ढंग से इंसाफ का नाम लेकर क़त्ल करते हुए खुद को भगवान और धर्म के बंदे बताते हैं लेकिन हैं शैतान और शर्मसार करते हैं हैवानियत तक को भी। 

संविधान को समझते हैं सत्ता पाने तक काम की चीज़ है उसके बाद उनका अपना वहशीपन उनका कायदा कानून निज़ाम का दस्तूर सब कुछ है। और कहते ही नहीं समझाते हैं उनको देशभक्त और अच्छा भी बताना होगा नहीं तो आपका जीना दुश्वार मरना मुहाल हो जाएगा। ये दावा करते हैं कहीं अंधेरा नहीं है और अंधकार के ही पुजारी हैं बस्तियां जलाते हैं दूर से तमाशा देखते हैं जलाकर और सोचते हैं यही रौशनी है। घर को जलाने लगे हैं ये कैसे चिराग़ हैं जो रौशनी के नाम पर धुआं बांटने का काम करते हैं। कौन है जिसको इतिहास में जगह पानी है और शोहरत समझते हैं नाम बदनाम होने को भी। खलनायकी के कायल होने लगे हैं लोग और भले-मनसाहत को ठेंगा दिखाने को ताकत मानते हैं। सिंहासन पर राज है अंधकार का कारोबार करने वाले का उसका काम ही रौशनी के नाम पर अंधेरा बेचना है। जाँनिसार अख्तर जी की बात सामने है। जब मिले ज़ख्म तो क़ातिल को दुआ दी जाये , है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाये। आजकल लोग लिखते कम हैं पढ़ते बिल्कुल भी नहीं है जानकर होने का दावा करते हैं और जो सबक सीखा नहीं कभी खुद उसका उपदेश देते हैं। 

गधे को बाप बनाने की भी कोई हद होगी मगर जब सत्ता की खातिर कत्ल बलात्कार के गुनहगार को शासक संत कहने लगे तो समझना होगा मंदिर किसी कातिल का बनवाना उनकी मंशा थी और आगे इरादा क्या है कोई नहीं जानता है। ख़ुदपरस्ती की आदत इंसान को इतना भी खराब करती है कि भले बुरे का भेद नहीं समझ पाते हैं लोग। जो उनकी ज़ुबान से निकले वही झूठ सबसे बड़ा सच है और बाकी हर सच हर वास्तविकता जो सामने है उसका होना ही नहीं स्वीकार है अर्थात इसी का नाम सरकार है। ये राजनीति है या धोखे  का झूठ का कारोबार है जिसको कहते हैं इनायत है दरअसल अत्याचार है। हर युग के ज़ालिम को रहता अहंकार है हो रही नाम की हर तरफ जय जयकार है। दहशत से छीनता जो नहीं होता वो प्यार का हकदार है किसी को भी नहीं लेकिन इनकार का अधिकार है। ये सही गलत से भला किसको सरोकार है हर दीवार पर चिपका उनका इश्तिहार है , अब नज़र आती नहीं किसी को कोई दरार है। याद आता फिर दुष्यंत कुमार है। उनको कुछ भी कहना नहीं , कुछ भी कहना बेकार है। उन पर चढ़ा हुआ सत्ता का खुमार है। इस पार भी है वही शायद यही उस पार है। जनता खरबूजा बन कटती है सत्ता की तीखी कतार है ये कहलाती राहत की भरमार है। जो भी कहो पहले कहो कहना भी अब बेकार है। दो ग़ज़ल सुनते पढ़ते हैं सर धुनते हैं जब जीते हुए ज़िंदा लाश की तरह हो गए हैं संवेदनाशून्य समाज के कायर लोग हैं हम सभी।


  धुआं धुआं बस धुआं धुआं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा' 

धुआं धुआं बस धुआं धुंआ
न रौशनी का कहीं निशां। 
 
हैं लोग अब पूछते यही
कहां रहें जाएं तो कहां। 
 
बहार की आरज़ू हमें
खिज़ा की उसकी है दास्तां। 
 
है जुर्म सच बोलना यहां
सिली हुई सच की है ज़ुबां। 
 
जला रहे बस्तियां सभी
नहीं बचेगा कोई मकां। 
 
न धर्म कोई न जात हो
हमें बनाना वही जहां। 
 
उसी ने मसली कली कली
नहीं वो "तनहा" है बागबां।

दर्द अपने हमें क्यों बताये नहीं - लोक सेतिया "तनहा"

दर्द अपने हमें क्यों बताये  नहीं ,
दर्द दे दो हमें ,हम पराये  नहीं।

आप महफ़िल में अपनी बुलाते कभी ,
आ तो जाते मगर , बिन बुलाये  नहीं।

चारागर ने हमें आज ये कह दिया ,
किसलिए वक़्त पर आप आये नहीं।

लौट कर आज हम फिर वहीं आ गये  ,
रास्ते भूल कर भी भुलाये  नहीं।

खूबसूरत शहर आपका है मगर ,
शहर वालों के अंदाज़ भाये  नहीं।

हमने देखे यहां शजर ऐसे कई ,
नज़र आते कहीं जिनके साये  नहीं।

साथ "तनहा" के रहना है अब तो हमें ,
उनसे जाकर कहो दूर जाये  नहीं।

( चारागर :::: डॉक्टर )          ( शजर ::::: पेड़ )

जून 27, 2019

POST : 1136 अरे ओ आस्मां वालो ( ज़माने से अपनी बात ) डॉ लोक सेतिया

  अरे ओ आस्मां वालो ( ज़माने से अपनी बात ) डॉ लोक सेतिया 

  आपको पढ़ना है पढ़ लेना नहीं पढ़ना तो आपकी मर्ज़ी है। समझाना क्या है समझना क्या है बस थोड़ा सा ज़माने वालों की दुविधा को मिटाना चाहता हूं। कोई उपदेशक नहीं खुद को कोई भला या बड़ा आदमी नहीं समझता सब जैसा इंसान ही हूं मगर शायद आपकी दुनिया से बहुत अलग सोच वाला बन गया या बनाया है बनाने वाले ने। जैसा लोग समझते हैं आलोचक नहीं हूं मैं लिखना मेरी आदत ही नहीं ज़रूरत भी है चाहत भी और लिखना सच को सच झूठ को झूठ मेरी विवशता है। ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर , कबीरा खड़ा बाज़ार में सबकी मांगे खैर। अदावत नफरत मेरे पास है नहीं किसी के लिए भी और जो है शायद इस दुनिया के काम का नहीं है। कोई ऊंचे ख्वाब कोई आकाश के ऊंचाई वाले सपने नहीं हैं धरती पर चैन से सादगी से और आराम से रहना चाहता हूं किसी को क्या उलझन है मुझसे नहीं जानता।

    आपकी दुनिया इक बाज़ार है जिस में लोग अपने दर्द बेच कर ख़ुशी खरीदना चाहते हैं और मुझ जैसे लोग हैं कुछ जो औरों के दर्द को अपना समझते हैं। दर्द से मुहब्बत है दर्द से घबराते नहीं हैं लेकिन दर्द की दुकान नहीं लगाते बेचते खरीदते नहीं हैं हो सके तो किसी का दर्द बांटने का काम करते हैं। आपकी दुनिया की दौलत मेरे पास नहीं है बस इक खज़ाना है दोस्ती इंसानियत भाईचारे का हर किसी के लिए। जिनको शोहरत की बुलंदी पर खड़ा होना है उनसे बचता हूं इसलिए कि मुझे ऊंचाई से घबराहट होती है पांव ज़मीन पर रखना चाहता हूं उड़ने को मेरे ख्याल बहुत हैं जो आज़ाद हैं। किसी पहाड़ पर चढ़कर अपनी ऊंचाई बढ़ाने का कायल नहीं हूं। मुझे दर्द मिले हैं मिलते हैं और दर्द से परेशानी नहीं होती है थोड़ी राहत मिलती है डर लगता है जब कोई ख़ुशी कुछ पल को आती है पास चली जाती है खुशियां ठहरती नहीं अधिक देर तक जानते हैं सभी। दर्द का रिश्ता बड़ा अच्छा होता है दर्द कहते है खुद दवा बन जाता है ग़लिब कहते थे मुश्किलें मुझ पर इतनी पड़ीं कि आसां हो गईं। अब तो घबरा के कहते हैं कि मर जाएंगे , मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे। मौत से घबराकर जीना नहीं छोड़ सकते है सच कहूं तो मुझे हमेशा से लगता है मौत तो दरअसल इक सौगात है , हर किसी ने इसे हादिसा कह दिया।

      आपको नहीं समझ आती मेरी बातें तो छोड़ दो समझना कोई मज़बूरी नहीं है। मेरा रास्ता अपना है मेरी मंज़िल और है आपको अपनी मर्ज़ी की राह चलने की आज़ादी है मुझे अपनी राह जाने दो कोई टकराव नहीं है। हो सकता है किसी मोड़ पर कोई चौराहा आये अपनी राहें मिल जाएं या मिल कर फिर किसी तरफ मुड़ रही हों तब दुआ सलाम करने की औपचारिकता निभा लेना। मुमकिन हो तो जैसे आप हैं उस तरह रहें मगर मुझे भी रहने दें जैसा भी अच्छा बुरा मैं हूं। ग़ालिब की तरह कोई परसाई का दावा मैं भी नहीं करता हूं। अब इक रचना लिख कर बात को विराम देता हूं भले बात पूरी नहीं हुई है आधी कही है आधी बाकी रह गई किसी और दिन कहने को।

मेरे दुश्मन मुझे जीने की दुआ न दे (  ग़ज़ल  ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

मेरे दुश्मन मुझे जीने की दुआ न दे
मौत दे मुझको मगर ऐसी सज़ा न दे।

उम्र भर चलता रहा हूं शोलों पे मैं
न बुझा इनको ,मगर अब तू हवा न दे।

जो सरे आम बिके नीलाम हो कभी
सोने चांदी से तुले ऐसी वफ़ा न दे।

आ न पाऊंगा यूं तो तिरे करीब मैं
मुझको तूं इतनी बुलंदी से सदा न दे।

दामन अपना तू कांटों से बचा के चल
और फूलों को कोई शिकवा गिला न दे।

किस तरह तुझ को सुनाऊं दास्ताने ग़म
डरता हूं मैं ये कहीं तुझको रुला न दे।

ज़िंदगी हमसे रहेगी तब तलक खफा
जब तलक मौत हमें आकर सुला न दे। 

जून 26, 2019

POST : 1135 लंबी ख़ामोशी से पहले कहना है ( फ़लसफ़ा ज़िंदगी का ) डॉ लोक सेतिया

       लंबी ख़ामोशी से पहले कहना है ( फ़लसफ़ा ज़िंदगी का ) 

                                डॉ लोक सेतिया 

  अभी नहीं अभी तो कुछ कहा ही नहीं चुप होने की बात नहीं कहो ख़ामोश होने से पहले मुझे कुछ दिल की बात कहने दो। फ़ोन पर चेतावनी मिलती रहती है आजकल सोच समझ का कुछ कहना सरकार संदेश भेजती है बताने को कानूनी भाषा जो समझ नहीं आती किसी को फोन का उपयोग सोच समझ कर करें सरकार की नापसंद की बात पर अंजाम भुगतने को तैयार रहना। लिखा जो भी हो मतलब निकलता यही है। सब लोग भी डराते हैं क्या मुझे डर नहीं लगता , अब क्या कहूं डर किस बात का है। डर यही है कि किसी दिन हमेशा को खामोश होना ही है उस से पहले जो चाहता हूं कह तो लूं। अभी तो कुछ भी नहीं कह पाया अच्छी तरह से बस हर दिन अल्फ़ाज़ निकलते हैं फुसफुसाहट बनकर रह जाते हैं आवाज़ बनकर सुनाई नहीं देते बहरे समाज को निज़ाम को। सच बताऊं फिर आज सोचा था नहीं लिखा जाएगा नहीं बोला जाएगा जो कहना है अल्फ़ाज़ मिलते ही नहीं है बस यूं की कागज़ काले करने से फायदा क्या है। आज बताऊं मुझे क्या लिखना बाक़ी है क्या है जो कहना है कह नहीं पाया कहा नहीं जाता या कोई भी दिखाई नहीं देता जिस से कहूं जो सुने भी और समझे भी। अभी तलक किसी को मेरी कही बात समझ आती नहीं है कहता हूं जो समझते हैं सब लोग उसके उलट ही अर्थ निकाल कर। सुबह सैर पर जाता हूं यूं ही कोई गीत सुन कर गुनगुनाता रहता हूं अच्छा लगता है चैन मिलता है दिल को राहत भी। आज नहीं लिखने की बात थी फिर मन में ऐसे में अचानक फैज़ अहमद फैज़ की नज़्म इक़बाल बानो की गाई हुई सुनकर याद आया अभी मकसद पूरा कहां हुआ है अधूरा है कुछ लिखना रह गया है कुछ है जो कहना है लंबी ख़ामोशी से पहले। 

    न मैं फैज़ बन सकता हूं न मुझे ग़ालिब होना है दुष्यंत कुमार भी नहीं होना मुमकिन। थोड़ा थोड़ा सब है मुझ में मिला हुआ नानक भी कबीर भी रहीम भी रसखान भी। फैज़ की तरह आरज़ू है देखने की उस दिन को जिसका वादा है। जब सब ताज उछाले जाएंगे सब तख़्त गिराए जाएंगे और राज करेगी आम जनता जो तुम भी हो और मैं भी हूं। मेरा कहा मानोगे यही गीत नज़्म रोज़ सुना करो सीने में इक आग जलती रहेगी जो दुष्यंत कुमार कहते हैं हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए। जाँनिसार की याद आई ऐसे में , जल गया अपना नशेमन  तो कोई बात नहीं , देखना है कि  अब आग किधर लगती है। सारी दुनिया में गरीबों का लहू बहता है हर ज़मीं मुझको मेरे खून से तर लगती है। ये सब अपनी अपनी मशाल जलाकर दे गए हैं हम सब को। ऐसी मशाल जो बुझती नहीं लाख बुझाने की कोशिश करे कोई हाक़िम। बहुत कोशिशें की गईं नहीं बुझा पाए उनकी शमां को , नहीं रोक पाए उनकी आवाज़ को बंद करने को किसी कैदखाने की ऊंची दीवार से भी। ज़फ़र का दर्द अपनी ज़मीन से बिछुड़ कर भी छिपाया नहीं जा सका आज भी याद है , लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में। रूह तक जाती है टीस बनकर उनकी ग़ज़ल की बात। 

मुझे लिखना है या कि बनाना है इक प्यार का जहां इक शहर मुहब्बत का जिस में किसी को किसी से बैर नहीं हो कोई नफरत नहीं करे किसी से अदावत की कोई बात नहीं हो। यही चाहा है कोई महल नहीं धन दौलत की चाहत नहीं कोई शोहरत की आरज़ू भी नहीं बस थोड़ा प्यार अपनापन हमदर्दी का ज़रा सा स्पर्श मिल जाये। कुछ पल को जीने को ज़िंदगी की ज़रूरत है उसके बाद मौत से तो इश्क़ करना ही है। कौन जाने जन्नत की चाह में मर के भी दोजख़ ही नसीब हो , ये माना ये दुनिया मेरी चाहत की दुनिया नहीं है पराई पराई सी है। फिर भी मुझे यहीं इसी में तलाश करनी है कोई दुनिया अपनी भी हो जो। अब भी रुख्सत होने से पहले कोई इक गीत कोई ग़ज़ल कोई नग्मा कोई कहानी मुहब्बत की कहनी है जो जाने के बाद इक दिया बनकर कोई चिराग़ बन कर उजाला करे हमेशा हमेशा को। शायद इतने घने अंधकार में जुगनू की तरह टिमटिमाता हुआ मेरा थोड़ा सा वजूद इक उम्मीद बनकर किसी को रास्ता दिखलाता रहे। आपकी नफरत की जंग की भेदभाव की दुनिया से थोड़ा छुटकारा मिल जाता तो लिख लेता अपना गीत दोस्ती मुहब्बत प्यार का। इसी बहाने की गीत भी गाता गुनगुनाता चलूं आपको सुनाता हुआ।  पर जो लिखना रह गया है बाकी है उस का इंतज़ार करना ज़रूर शायद थोड़ा विलंब से फिर भी होगा यादगार ऐसा दिल कहता है। 

 गीत प्यार का गुनगुनाऊं ( गीत ) डॉ  लोक सेतिया

गीत प्यार का गुनगुनाऊं कैसे।

लोग पूछते हैं तुम्हारी बातें
याद कौन रखता हमारी बातें
आसमां पे तुमने बसाया है घर
मैं तुम्हें ज़मीं पर बुलाऊं कैसे।
गीत प्यार का ......................

खुद से खुद को जब दूर करना चाहा
और ग़म से घबरा के मरना चाहा
मौत ने मुझे किस तरह ठुकराया
आज वो कहानी सुनाऊं कैसे।
गीत प्यार का ........................

छोड़ कर मुझे लोग धीरे धीरे
चल दिए कहीं और धीरे धीरे
साथ साथ चलने के वादे भूले
रूठ कर चले जब मनाऊं कैसे।
गीत प्यार का .....................

कब वफ़ा निभाई यहां दुनिया ने
हर रस्म उठाई यहां दुनिया ने
जिस्म भी हुआ और दिल भी घायल
ज़ख्म आज सारे दिखाऊं कैसे।
गीत प्यार का गुनगुनाऊं कैसे।