सियासत बोझ बनती जा रही है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
सियासत बोझ बनती जा रही है
विरासत आपको समझा रही है ।
नज़र तिरछी हुई सत्ता की देखो
लो सबको याद नानी आ रही है ।
भरोसा अब नहीं कोई भी बाकी
हक़ीक़त देख कर पछता रही है ।
जो शोले राख में दहके हुए हैं
उसे वो रौशनी बतला रही है ।
हुआ क्या हाल ' तनहा ' देश का है
फसल को बाड़ चरती जा रही है ।

2 टिप्पणियां:
फसल को बाड चरती👌👍
Wahhh👌👍
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