अगस्त 23, 2026

POST : 2115 दोस्त कोई मिला नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

       दोस्त कोई  मिला नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

 
दोस्त कोई  मिला नहीं
इस जहां से गिला नहीं । 
 
कौन शिकवा करे भला 
जब रहा सिलसिला नहीं । 
 
चल रहे सब अलग अलग  
एक भी  काफ़िला नहीं । 
 
अपना अपना नसीब है 
फूल दिल का ख़िला नहीं । 
 
हार सब आंधियां गईं 
एक पत्ता हिला नहीं । 
 
कल इमारत बुलंद थी   
आज साबुत शिला नहीं । 
 
देख ' तनहा ' उधर ज़रा  
बच सकेगा किला नहीं ।  
 

 
 
 
 
 
 
  

1 टिप्पणी:

Sanjaytanha ने कहा…

Wahh sab bdhiya sher......Chal rhe sab kafilaa nhi