दोस्त कोई मिला नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
दोस्त कोई मिला नहीं
इस जहां से गिला नहीं ।
कौन शिकवा करे भला
जब रहा सिलसिला नहीं ।
चल रहे सब अलग अलग
एक भी काफ़िला नहीं ।
अपना अपना नसीब है
फूल दिल का ख़िला नहीं ।
हार सब आंधियां गईं
एक पत्ता हिला नहीं ।
कल इमारत बुलंद थी
आज साबुत शिला नहीं ।
देख ' तनहा ' उधर ज़रा
बच सकेगा किला नहीं ।

1 टिप्पणी:
Wahh sab bdhiya sher......Chal rhe sab kafilaa nhi
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