न जाने ये कैसी नस्ल आ रही है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
न जाने ये कैसी नसल , आ रही है
बिना बीज वाली फ़सल आ रही है ।
जहां से थे आये , वहीं जा रहे हैं
वो देखो हमारी अजल आ रही है ।
अमानत तुम्हारी , संभालो इसे अब
ज़माने की नीयत बदल आ रही है ।
उसे याद कोई दिला दो , वो वादा
ज़माने की नीयत बदल आ रही है ।
उसे याद कोई दिला दो , वो वादा
कहा कल था उसने वो कल आ रही है ।
सभी ख़्वाब देखो , हक़ीकत न देखो
सियासत यही ले के हल आ रही है ।
बहारों को लाने खिज़ा जा रही है
सभी ख़्वाब देखो , हक़ीकत न देखो
सियासत यही ले के हल आ रही है ।
बहारों को लाने खिज़ा जा रही है
लगेंगे अभी चार - पल आ रही है ।
अजब तौर देखो ज़माने का ' तनहा '
बिना काफ़िये की ग़ज़ल आ रही है ।
बिना काफ़िये की ग़ज़ल आ रही है ।
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