नवंबर 11, 2012

POST : 226 न जाने ये कैसी नस्ल आ रही है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

न जाने ये कैसी नस्ल आ रही है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '


न जाने ये कैसी नसल , आ रही है 
बिना बीज वाली फ़सल आ रही है । 
 
जहां से थे आये , वहीं जा रहे हैं  
वो देखो हमारी अजल आ रही है ।
 
अमानत तुम्हारी , संभालो इसे अब 
ज़माने की नीयत  बदल आ रही है ।

उसे याद कोई दिला दो , वो वादा 
कहा कल था उसने वो कल आ रही है ।

सभी ख़्वाब देखो , हक़ीकत न देखो  
सियासत यही ले के हल आ रही है ।

बहारों को लाने खिज़ा जा रही है 
लगेंगे अभी चार - पल आ रही है ।
 
अजब तौर देखो ज़माने का ' तनहा '
बिना काफ़िये की ग़ज़ल आ रही है । 
 

 
 
 
 


 

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