Tuesday, 22 September 2020

माल मालामाल हैं कंगाल ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       माल मालामाल हैं कंगाल ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   सब जानते थे समझते थे जानकर अनजान बने हुए थे अब कैसे कहें दुनिया भर की खबर रखने वाले इतने मासूम और भोले थे कि उनके साथ मिलने जुलने मुलाकात साक्षात्कार लेने से उनकी शोहरत का गुणगान उनकी तथाकथित दानवीर समाजसेवा एनजीओ की चर्चा करने वाले आंखे होते अंधे बने हुए थे गांधारी की तरह अपने स्वार्थ की पट्टी जो बांधनी मज़बूरी थी। हैरान हैं कि ये हंगामा हुआ कैसे इक अभिनेता की मौत का हादिसा भूत बनकर फिल्म नगरी पर काला साया बनकर छा गया है। सच आधा ही सही सामने आ गया है समझने वालों को बहुत समझ आ गया है। जो खड़े थे बड़ी ऊंचाई पर उनका सर चकरा गया है धुआं सा आंखों के सामने आ गया है। थाली में छेद नहीं है छलनी में हज़ार छेद हैं छुपे हुए जाने कितने नाम हैं किस किस के भेद मतभेद हैं। शब्दों का चलन कितना बदल गया है कभी कॉलेज में लड़के लड़कियों को माल कहते थे आपस में इशारे की भाषा में आजकल अभिनय करने वाली महिलाएं माल चाहती हैं नशे में झूम लूं मैं का कमाल चाहती हैं। धमाल मालामाल की नई मिसाल चाहती हैं। हाल अच्छा है करना बदहाल चाहती हैं अपने हुस्न को अपने जलवों को करना जमकर इस्तेमाल चाहती हैं बस चुपके चुपके सबसे छुपके नहीं हो कहीं सवाल चाहती हैं कभी कभी बस बवाल चाहती हैं। जो भी है हो बाकमाल चाहती हैं। 
 
         पाकीज़ा की साहिबजान और उमराओ जान जैसे किरदार फ़िल्मी नहीं असली होते थे कभी शहर के बाहर कोई बस्ती नाच गाने की जिस्मफ़रोशी का खुलाबाज़ार सजता था। बड़े बड़े धनवान ज़मीदार रईस और शराफ़त की नक़ाब ओढ़ने वाले छुपकर दिल बहलाने आते थे किसी को अपना बनाते थे निशानी कोई छोड़ जाते थे। फिर जब बूढ़े हो जाते थे किस्से बहुत याद आते थे औरों को नसीहत देने को अपनी सच्ची कहानी किसी अजनबी की कहकर सुनाते थे। दर्द की दास्तां नहीं है मौसम है आशिक़ाना गुनगुनाते थे सपनों में खोकर अभी तो मैं जवान हूं अभी तो मैं जवान हूं सोच कर किसी को शर्म आती थी वो घबराते थे। उस बदनाम बस्ती उस सदाबहार रौशनी के बाज़ार में लोग मिलते थे पहचान लेते थे दुआ सलाम करने से बचते थे ये राज़दार बनकर इक दूजे के राज़ कभी नहीं किसी को बतलाते थे मिलकर जिस थाली में खाते उस में छेद नहीं करते की बात निभाते थे। कितने शरीफ़ लोग शान से जीते थे शान से मर जाते थे कभी अनाथ कभी बेचारी बेबस महिला को आसरा देने को कोई घर बनवाते थे किसी को संचालिका बना कोई क़र्ज़ चुकाते थे। 
 
    ये वही नगरी है जिस में साधना ख़ामोशी नया दौर नया ज़माना जैसे सार्थक कहानियों की फ़िल्में बनाते थे। कागज़ के फूल बहु बेगम धूल का फूल साहब बीवी और ग़ुलाम दो बदन हक़ीक़त शहीद उपकार जैसी हर फिल्म दर्शक को संदेश देती थी बहारें फिर भी आएंगी की आशा जगाते थे। दौलत शोहरत और ताकत मिलने से उसी नगरी में नग्नता और अपराध को महिमामंडित करने से हिंसा का पाठ पढ़ाने वाले किरदार निभाकर कोई महानायक कोई सबसे अधिक कमाई करने वाला अभिनेता बन गया है। उनके पास दीवार फिल्म के डॉयलॉग की तरह पैसा धन दौलत शोहरत ही नहीं सत्ता और राजनीति की ताकत भी है बस इक चीज़ नहीं बची है इमान और ज़मीर आदर्श और नैतिकता उनके लिए किसी और के लिखे बोल हैं जिनको बोलना है चेहरे पर मासूमियत लाकर तालियां बजवाने को। अधिक कहने की ज़रूरत नहीं है शीशे के महलों के भीतर शानदार क़ालीन बिछे हैं जिनके नीचे छिपी गंदगी किसी बाहर वाले को पता नहीं चलनी चाहिए आखिर में मेरी इक ग़ज़ल का इक शेर पेश है। 

                     सब से बड़े मुफ़लिस होते हैं लोग वही ,

                       ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं।