कुछ ख़त जो , बेनाम रखे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
कुछ ख़त जो , बेनाम रखे हैं
पढ़ ले जो ,उसके नाम रखे हैं ।
आंचल में इनको भर लेना
मोती जो ये तमाम रखे हैं ।
जिनको खरीद सका न ज़माना
अब खुद ही बेदाम रखे हैं ।
जिनको खरीद सका न ज़माना
अब खुद ही बेदाम रखे हैं ।
उन पे नहीं अब कोई परदा
राज़ वो सब खुले-आम रखे हैं ।
पत्थर चलने की खातिर भी
शीशे वाले मुकाम रखे हैं ।
खुद ही अपनी रुसवाई के
हमने चरचे आम रखे हैं ।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें