मार्च 09, 2025

POST : 1950 गहरी नींद में सोया हुआ शहर ( खामोशियां ) डॉ लोक सेतिया

     गहरी नींद में सोया हुआ शहर  ( खामोशियां  ) डॉ लोक सेतिया

 पत्थरों के घर पत्थर वाले ही ख़ुदा हैं आदमी भी पत्थर दिल हैं यहां मौसम कभी उस तरह से नहीं बदलता है जिस तरह से लोग जल्दी - जल्दी किरदार बदलते हैं । सच कहा जाए तो अभी तक इस शहर की कोई ख़ास अलग अपनी पहचान नहीं बन सकी है , ज़मीन ही से जीवन मिलता है लेकिन शायद धीरे धीरे उस से कट रहें हैं लोग अर्थात अपनी जड़ों से रिश्ता कमज़ोर होता गया है । कोई शायद ही ऐसा दिखाई दिया है जिस को कहा जा सके की शहर का नाम रौशन किया है । लगता है इतनी उपजाऊ धरती पर इक बंजर समाज रहता है , सिर्फ पूर्वजों की कमाई ज़मीन जायदाद और अर्जित शोहरत पर गर्व करना इतराना उस को और ऊंचाई पर ले जाने को कभी कुछ भी नहीं करना अधिकांश की आदत है । खुद अपने ही मुंह से अपनी बढ़ाई करना इस शहर के बड़े धनवान लोगों की रिवायत बन चुकी है , शहर गांव समाज को कुछ योगदान देना कोई नहीं चाहता सभी झूठी शोहरत पाने को व्याकुल रहते हैं । मुखौटे पहने रहते हैं ख़िज़ाब लगाए रहते हैं हंसते हुए कितने दुःख दर्द छिपाए रहते हैं । 
 
  चारागर बीमार हैं अध्यापक रहते लाचार हैं , जिधर भी देखते हैं इश्तिहार ही इश्तिहार हैं । शिक्षा स्वास्थ्य रोज़गार उद्योग की दशा इस शहर में आज भी पिछड़ी हुई है , कुछ भी आवश्यकता होने पर आपको बाहर जाना पड़ता है । कोई भी संस्था नहीं जिसे सभी की भलाई की चिंता हो , अपने वर्ग जाति  आदि को लेकर कुछ संगठन हैं जिनका सिमित दायरा रहता है । इतने सालों में यहां की राजनीति कुनबे कुटंब से बाहर नहीं निकली है और खेद जनक विषय है कि बहुत लोग चाटुकारिता अथवा सत्ताधारी राजनीतिक दलों को पैसा देकर ही बदले में कोई पद हासिल करते रहे हैं । साहित्य को लेकर शहर उदासीन है और जो लिखते हैं वो भी किसी आवरण में छुपे खुद को बंधक बना सुरक्षित समझते हैं इसलिए कोई उच्च कोटि की रचनात्मकता नहीं सामने आई है । पढ़ने को कोई सार्वजनिक पुस्तकालय नहीं है कुछ हैं जो शिक्षा संस्थानों से जुड़े हैं जिन में अधिकांश छात्र ही जा पाते हैं । सामाजिक बुराईयों से अपने अधिकारों तक इस शहर में इक ख़ामोशी है । तथकथित शरीफ़ अमीर लोग अपने घर खेत में गरीब मज़दूर को बंधुआ समझ जब चाहे जैसा अनुचित आचरण करते हैं लेकिन धार्मिक संस्थाओं के सर्वेसर्वा बन सभ्य कहलाते हैं । किसी को रुलाते उनको कभी खेद नहीं होता ज़ुल्म को इंसाफ़ समझते हैं । 

पत्रकारिता की बात की जाए तो तालाब का ठहरा हुआ पानी जैसी है कोई गतिशीलता नहीं है , गुटबाज़ी तो सभी जगह होती है लेकिन यहां सभी अख़बार सरकारी अधिकारियों राजनेताओं से मधुर संबंध रखते हैं और उनकी भाषा में खबरें लिखते हैं । कभी कभी कोई सामाजिक समस्या की चर्चा होती है जब कोई पत्रकार उस से प्रभावित होता हो , अन्यथा जनता की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं होता है । निडर निष्पक्ष सच की पत्रकारिता कभी हुआ करती थी जो कब कहां खो गई कोई नहीं जानता । सत्ताधारी नेताओं और जब जो भी प्रशासनिक अधिकारी होते हैं उनका गुणगान महिमामंडन करते हैं सभी स्थानीय पत्रकार । अपने अधिकारों को लेकर संघर्ष की सीमा प्रशासन सरकार को पत्र भेजने तक रहती है । धर्म को लेकर विशेष अवसर पर काफी आयोजन होते रहते हैं और अनगिनत गुरु शिष्य की परंपराएं हैं लेकिन कोई भी धर्म उपदेशक कभी आचरण में सत्य ईमानदारी को कुछ नहीं कहता है सभी को भजन कीर्तन दान देने अपने मंदिर आश्रम का विस्तार करने की आवश्यकता रहती है । गरीब दीन हीन की सहायता कोई नहीं करता सभी को अपने नाम किसी जगह लिखवाना होता है दान देने के बदले में । 

अमीर रईस लोगों का शहर होने पर भी साधरण नगरवासियों की परेशानियों समस्याओं में कोई सामने नहीं दिखाई देता है । इंसानियत की बात इस शहर में कोई नहीं करता है हैवानियत भी शर्मिंदा होगी इधर कभी आकर देखे तो । आस्तिक होने का दम भरते हैं मगर भगवान से नहीं डरते , ऊपरवाला देखता है कभी इंसाफ़ करेगा कौन जाने ये सच है या ढाल है मनमानी करने वालों की । शहर की विशेषता है कि शाम ढलते ही अधिकांश लोग शराब और खाने पीने के शौक़ीन हैं , क़र्ज़ उठा कर भी मौज मस्ती करने वाले धनवान लोग देखे हैं कंगाल होते हुए भी और कंगाली से मालामाल होते हुए भी किसी राजनीति की शतरंज की बाज़ी से । समझदार चतुर लोग तमाम मिलते हैं लेकिन ढूंढने पर कोई आदर्शवादी कथनी करनी में एक जैसा शख़्स नहीं मिलता है । बौद्धिक दरिद्रता की मिसाल कहला सकता है मेरा ये शानदार शहर यहां सामाजिक संस्थाएं बनती हैं सिर्फ खुद कुछ लोगों की भलाई करने को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल होने को अभिशप्त हैं । 
 
 याद आती हैं  कुछ बातें अक्सर यहां  , ऐसे कितने संगठन बनाये जाते रहे कोई मकसद को लेकर लेकिन वो भटक गए अपनी राह से और कुछ लोग उनका उपयोग अपने स्वार्थ पूरे करने को करने लग गए । शायद सभी जगह ऐसा होने लगा है कि लोग समाज को कुछ देना नहीं चाहते अपितु पाना चाहते हैं समाज सेवा के नाम पर , मेरा शहर भी ऐसा ही है ।  वास्तव में लगता है मेरा शहर बहुत गहरी नींद में सोया हुआ है , कोई हलचल कभी नहीं होती इस में बेशक दुनिया में सौ तूफ़ान आते रहें , इक वीरानगी है जिसे लोग शांति समझते हैं । ये
किसी एक शहर की नहीं हर शहर की यही कहानी है प्यास ही प्यास है भागते रहते हैं रेगिस्तान में चमकती हुई रेत है समझते हैं जिसको पानी है ।










2 टिप्‍पणियां:

Sanjaytanha ने कहा…

👌👍 पत्रकारिता ठहरा हुआ पानी....नेताओं का गुणगान👌👍

Sanjaytanha ने कहा…

👍👌