सितंबर 18, 2012

POST : 144 सभी को दास्तां अपनी बयां करना नहीं आता ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

     सभी को दास्तां अपनी बयां करना नहीं आता ( ग़ज़ल ) 

                           डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

सभी को दास्तां अपनी ,  बयां करना नहीं आता
कभी आता नहीं लिखना , कभी पढ़ना नहीं आता ।

बड़ी ऊंची उड़ाने लोग भरते हैं , मगर सोचें
जमीं पर आएंगे कैसे अगर गिरना नहीं आता ।

कभी भी मांगने से मौत दुनिया में नहीं मिलती
हमें जीना ही पड़ता है , अगर मरना नहीं आता ।
 
हमेशा दौड़ने वालो , रुको ठहरो कभी सोचो  
सभी को साथ लेकर आपको चलना नहीं आता ।

हमें सूली पे चढ़ने का , नहीं लगता ज़रा भी डर 
हक़ीक़त जानकर यूं ही गुमां कहना नहीं आता ।
 
ख़ुशी के सौ बहाने , लोग कैसे ढूंढ लेते हैं  
परेशां देख कर दुनिया को खुश रहना नहीं आता ।

तमाशा बन गए  ' तनहा '  तमाशा देखने वाले
तमाशे मत दिखाएं  खुद जिन्हें  बनना नहीं आता । 
 

 

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