अगस्त 25, 2012

POST : 80 हुआ जीना यहां मुश्क़िल तुम्हीं इम्दाद कर दो ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

         हुआ जीना यहां मुश्क़िल तुम्हीं इम्दाद कर दो ( ग़ज़ल ) 

                    डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

हुआ जीना यहां मुश्क़िल तुम्हीं इम्दाद कर दो
मिटा कर हर निशां मेरा मुझे बर्बाद कर दो ।

नहीं सुनता ख़ुदा अपनी सदा बेक़ार जाती 
तुम्हीं इक दिन हमारे वास्ते फ़रियाद कर दो ।

हमारी जान लेकर हम पे इक अहसान कर दो 
हमें इस जिंदगी की कैद से आज़ाद कर दो ।

अकेला छोड़ कर हमको चले जाओ यहां से  
ख़ुशी अपने लिए ढूंढो हमें नाशाद कर दो ।
 
मुझे दुश्मन समझ कर दोस्त दुनिया को बना लो   
ज़माने को हमारा आप भी नक़्क़ाद कर दो ।

नहीं कोई कसम देते मगर इतना है कहना
मिलेंगे फिर कभी किस दिन यही मीआद कर दो ।
 
बड़ा ही ख़ूबसूरत देश ' तनहा ' था हमारा  
हमारे मुल्क़ में फिर से वही इतिहाद कर दो ।   
 

 
 
 


 


 
 

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