जुलाई 31, 2026

POST : 2097 दास्तानें ज़िंदगी ( कहानी संग्रह ) डॉ लोक सेतिया { कहानियों की पूरी पुस्तक पढ़ सकते हैं }

      दास्तानें ज़िंदगी ( कहानी संग्रह ) डॉ लोक सेतिया

              ( कहानियों की पूरी पुस्तक पढ़ सकते हैं )  

 

    जीवन के सफर पर मिलती बिछुड़ती राहों की दास्तानें ( भूमिका )

   ज़िंदगी चलती रही धीमे कदम कभी दौड़ते फिसलते हुए। कितने काफ़िले बनते गए , कितने मोड़ गुज़रते रहे , हमराही रास्ता बदलते हुए अपनी खट्टी मीठी यादें छोड़ते रहे और बनती रही दास्तानें। मेरी लिखी कहानियां कल्पना और वास्तविकता का मिश्रित आकार हैं । अधिकांश कहानियां आस पास घटती रही घटनाओं को कल्पना से बुनकर क्या होता है क्या हो सकता था और क्या होना चाहिए था इसी उथल पुथल से सोच गुज़रती रही। जैसे किसी सुनसान झुलसते रेगिस्तान में कोई ओएसिस ढूंढना या पथरीली चट्टानों में पगडंडी बनाना। उलझनों से घबराना नहीं  उलझनों को सुलझाने की तरकीब तलाशना। सभी कहानियां वास्तविक जीवन से जुड़ी हैं बस उन सभी में मेरा कोई अस्तित्व नहीं बचा है हर कहानी अपने आप में संपूर्ण है मेरा किरदार शामिल होने नहीं होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। मैं किसी की कहानी का महत्वपूर्ण भाग नहीं बन पाया जिस किरदार को निकाल देने से कहानी कहानी नहीं रहती। अपनी सभी कहानियों में मुझे खुद अपना अस्तित्व दिखाई नहीं देता है नेपथ्य में रहकर सबकी ज़िंदगी की दास्तां सुनाता रहा हूं। 
 
 

                 1      कीमत घर की ( कहानी ) 

फिर वही पुराना ज़ख्म हरा हो गया है। सालों बाद फिर घर से बेघर होना पड़ रहा है। काश मेरा घर कालोनी की मुख्य सड़क पर न होता , अंदर किसी तंग गली में होता , जहां बाज़ार वाले इतनी बड़ी कीमत न लगा पाते कि मैं उसे बेचने को विवश हो जाता। कितनी मेहनत से कितने प्यार से इस घर को मैंने बनाया था। इसका आँगन , पेड़ पौधे , हरी हरी बेलें जिन्हें सजाने में वर्षों तक दिन रात लगा रहा हूं। कितने साल लग गये थे मुझे ये छोटा सा घर बनाने में ,एक एक पैसा जमा कर एक एक इंट लगा कर कैसे बनाया था इस घर को ये कोई दूसरा कभी नहीं समझ सकता। आज जो लोग कह रहे हैं कि ये ख़ुशी की बात है जो तुम्हारे घर की कीमत इतनी हो गयी है कि  इस पैसे से तुम नई कालोनी में इस से बहुत बड़ा वा शानदार घर बना सकते या खरीद सकते हो , वे इस बात को नहीं समझ सकते कि मेरे लिये अपना घर क्या है और घर में और मकान में कितना अंतर है। घर बिक सकता है , खरीदा नहीं जा सकता। मकान खरीदना तो आसान है , उसे घर बनाने में उम्र बीत जाती है। अब मेरे पास बाक़ी उम्र ही कितनी है।

             पचास साल का नाता है इस घर से। देश के बंटवारे के बाद विस्थापित होकर जब इस शहर में आये थे तो सोचा भी न था कि कभी कहीं दोबारा अपना घर बना कर फिर से खुशहाल हो रह सकेंगे। फिर गली , मोहल्ला ,पास पड़ोस ,संगी साथी बन जायेंगे। फिर सब मिल जुल कर सुख दुःख बांटेगे , अपनापन नज़र आने लगेगा और धीरे धीरे विस्थापित होने की बात भूल कर जीने लगेंगे। पचास सालों में इस घर में बच्चों की किलकारियां गूंजी हैं , बच्चे खेलते खेलते बड़े हुए हैं , बरातें आईं हैं , डोलियाँ उठी भी  हैं बेटियों की और डोलियाँ आई भी हैं नयी दुल्हनों को लेकर। इस सब की गवाह है इस घर की दीवारें और गलियां। पचास सालों में यहाँ रहने वाले सभी लगने लगा है एक परिवार का हिस्सा हैं हम जैसे। सब के बच्चे अपने लगते हैं , हर घर का आँगन , हर इक खिड़की , इक इक दरवाज़ा पहचानता है हमें , हमारी हर आहट को। गली की एक एक इंट से पहचान है जैसे। क्या अब फिर कभी कहीं ऐसा कोई घर हम सभी बना सकेंगे। आजकल नयी विकसित हो रही आबादी में , जहां किसी को किसी से बात करने तक की फुर्सत नहीं , ऐसा घर कैसे बन सकता है वहां।

       क्यों मेरे इस घर का मोल इतना अधिक हो गया है कि सभी को लगता है इसको बेच देना ही बेहतर है। हम सभी के लगाव की प्यार की अपनेपन की कीमत कुछ भी नहीं। इंट पत्थर और लकड़ी से बने मकान की कीमत क्यों आदमी और उसकी कोमल भावनाओं से ज़्यादा हो गई है जो सभी अपने अपने घर यहाँ से बेच कर किसी दूसरी जगह जाने लगे हैं। पैसे की ताकत ने सब को कितना विवश कर दिया है , आज मुझे भी वही करना पड़ रहा है। कितना सोचा था कि भले बाकी लोग बेच दें मैं कभी नहीं बेचूंगा घर अपना। यहीं जीने यहीं मरने की ख्वाहिश अधूरी ही रहेगी। करते करते पूरी की पूरी कालोनी ने एक बाज़ार का रूप ले लिया है , अब तो यहाँ चैन से रहना मुश्किल लगने लगा है। बाज़ार का शोर ,भीड़ भड़ाका , वाहनों का चोबीस घंटे गुज़रना , इस सब ने क्या से क्या कर दिया है। लगता है अब शांति और चैन नहीं मिलेगा कभी , इतने पैसों से भी हम वो नहीं हासिल कर सकेंगे कभी फिर से। अब वो साहस भी नहीं बचा कि  किसी वीरान जगह को फिर से आबाद कर सकें। कितनी बार कोई घर बनाता रहे और उसको छोड़कर जाने का दर्द सहता रहे। 

         दोनों बेटे कहते हैं कि उनको अपने अपने दफ्तर के , अपने कारोबार की जगह के नज़दीक फ्लैट लेना है। बेटी को भी अपना अलग घर बनाना है सास ससुर से अलग जिसमें पति पत्नी रह सकें। मेरी धर्म पत्नी भी हर माँ की तरह सोचती है कि अपना क्या है हम कैसे भी कहीं भी रह लेंगे मगर बच्चों को जो भी चाहिए उनको दिलवा सकें। मैं भी सोचता हूं , कितना जीना है अब , रह लेंगे कहीं भी किसी तरह। बच्चों को उनके अपने घर तो बनवा देते हैं। डीलर हिसाब लगा कर सब समझा गया है , इस एक घर को बेचकर हम तीन फ्लैट खरीद सकते हैं। अब मेरे पास दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा , चाहूं न चाहूं , यही करना ही होगा। हमें प्रसन्नता होगी कि  सब बच्चों के अपने घर बन गये हैं। उन तीनों के फ्लैटों में हम बाकी उम्र शायद यही तलाश करते रहें कि  इनमें हमारा अपना घर कौन सा है। डीलर बता रहा था कि जल्दी ही इन फ्लैटों के भी दाम आसमान को छूने लगेंगे। मेरी तो यही कामना है कि कभी किसी के घर की कीमत इतनी भी न बढ़ जाये कि वो उसमें रह ही न सके , उस अपने घर को बेचने को मज़बूर हो जाये। कम से कम मेरे बच्चों को बेघर होने के दर्द का तो कभी एहसास नहीं हो। दुआ कर रहा हूं। आमीन।

                          2       रास्ते का दर्द ( कहानी ) 

अनिल का स्टोर मुख्य सड़क पर है। सड़क की दूसरी तरफ पार्क है बहुत बड़ा। पार्क के पीछे का वह मकान काफी दूर है और इतनी दूरी से किसी को ठीक से पहचाना नहीं जा सकता। मगर उस घर की बालकनी पर जब से अनिल ने उस लड़की को देखा है तब से उसका ध्यान उसी तरफ रहने लगा है। क्या ये वही है ,अनिल सोचता रहता है , क्यों उसे देख कर वो बेचैन हो जाता है , क्यों उसके दिल की धडकनें बड़ जाती हैं। दूर उस बालकनी से वो एकदम उसी जैसी नज़र आती है , बस उसका पहनावा बदला हुआ है और नई नवेली दुल्हन सा लगता है। क्या उसने विवाह कर लिया है , वह भी उसके स्टोर के ठीक सामने वाले घर में। नहीं वो मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकती , अनिल सोचने लगता है। हो सकता है ये कोई और हो जो दूर से उस के जैसी लगती है या फिर ये उसका प्यार है जो दूसरों में अपनी प्रेमिका की छवि देख रहा है। वो इतने दिनों से स्टोर पर क्यों नहीं आ रही है। मगर उन दोनों में कभी प्यार के वादों -कसमों जैसी कोई बातें भी तो कभी हुई नहीं , फिर क्यों उसको विश्वास है की वह भी चाहती है मुझे। हो सकता है ये उसका एकतरफा प्यार ही हो। क्यों रोज़ सुबह स्टोर पर आते ही उसकी नज़र सामने के मकान की बालकनी में उसे तलाश करने लग जाती है। अगर ये वही है तो किसी न किसी दिन वो कभी तो फिर से आएगी स्टोर पर। अपने मन में इक उम्मीद जगाता है अनिल। लेकिन अब क्या हासिल हो सकता है जब उसने चुपचाप किसी दूसरे से शादी रचा ली है। ऐसे में तो मेरा उसके बारे सोचना भी अनुचित बात है , अनिल एक अपराधबोध से ग्रस्त हो जाता है। काश ये वो न होकर उसके साथ मिलती जुलती कोई अन्य ही हो। उदास और परेशान रहने लगा है अनिल , काम में आजकल मन ही नहीं लगता उसका। कभी कभी सोचता है कि कुछ ही दूर उस मकान के करीब जा कर उसको ठीक से देख कर पहचान ले , बात करे उसके साथ जाकर। मगर ये छोटा सा रास्ता वह तय नहीं कर पा रहा , लगता है ये कुछ कदम की दूरी इतनी अधिक है जिसको अनिल तमाम उम्र में तय नहीं कर सकेगा।

        वह बेहद खूबसूरत है , उसकी आवाज़ में मधुरता है बातों में भोलापन। हर दिन आया करती है अनिल के स्टोर पर , कभी खरीद कर कुछ ले जाती है तो कभी फिर से वापस करने आ जाती है। अक्सर इधर उधर की बातें कर समय बिताने लगती है। अनिल को ऐसा लगता है कि वो मुझसे मिलने ही आती है। वो उम्मीद करता है कि इक दिन वो खुद अनिल से अपने प्यार का इज़हार भी करेगी। कितनी बार चाहा है अनिल ने अपने मन की बात उसको कह दे , मगर वो अपनी बातों में इस कद्र उलझाये रहती है कि अनिल कभी कुछ कह ही नहीं पाता। जिस दिन वो नहीं आती स्टोर पर ,अनिल को सब सूना सूना सा लगता है। तब सोचता है कि उससे उसका नाम पता तो पूछ लिया होता , या उसका कोई फोन नम्बर होता तो उसके न आने और ठीक ठाक होने की जानकारी तो ले पाता। लेकिन उससे कभी ये हो नहीं सका। किसी ग्राहक का नाम पता पूछना , विशेषकर लड़की का , जाने उसको असभ्यता ही लगे और वो स्टोर पर आना ही छोड़ दे , जो अनिल कभी नहीं चाहेगा। एक दो बार अनिल ने अपने दिल की बात पत्र में लिख कर रख ली थी , सोचा था दे देगा उसको ,मगर जब वो आई तो पत्र देने का सहस नहीं जुटा पाया था। लेकिन जिस तरह वो खुल कर उसके साथ दोस्ती की बात कहती है , उससे कोई भी समझेगा कि उनमें गहरी जानपहचान और आपसी समझ है , जो दो प्यार करने वालों में होनी चाहिए। इतने दिनों से परिचित हैं लेकिन अनिल को उसका नाम तक मालूम नहीं , शायद वो भी उसे उसके नाम से अधिक स्टोर के नाम से ही पहचानती हो।
      और एक दिन वो फिर से अनिल के स्टोर पर आ ही गई थी , नई नवेली दुल्हन जैसी गहनों से सजी हुई। अनिल को समझ नहीं आ रहा था कि उसको देख कर , उसके स्टोर पर आने पर खुश हो या उसे विवाहित देख कर उदास। मगर अनिल को अच्छा लगा था आना उसका , कितने दिनों से इस पल का इंतजार कर रहा था। बहुत दिन बाद आई हैं स्टोर पर , पूछ ही लिया था अनिल ने। हाँ मेरी शादी तय हो गई थी , इतने दिन उसी में ही व्यस्त रही हूं। मगर आया करूंगी रोज़ अब , आपके स्टोर के सामने वो पार्क के पीछे जो गुलाबी रंग का घर है , वही तो मेरी ससुराल है , अब वही मेरा घर है आपके सामने ही। कितने दिनों से आपके स्टोर पर आने की बात दिल में थी ,अपने पति महोदय से भी कहा कि चलकर आपका धन्यवाद तो कर आयें। मेरा धन्यवाद किसलिए , हैरानी से पूछा था अनिल ने। वह कहने लगी क्योंकि इतने दिनों तक आपका ये स्टोर ही तो हमारे प्यार की मंजिल का रास्ता रहा है। रोज़ मुलाकात करने के लिए हम दोनों ने आपके स्टोर का उपयोग किया है। मैं रोज़ यहाँ उनका इंतज़ार किया करती थी और जब वो सामने अपने घर से बाईक पर बाहर निकलते तब मैं बाहर चली जाया करती सड़क पर और वे मुझे ले जाया करते अपने साथ। आप क्या जानते नहीं , मैं इसीलिए ही तो आया करती थी आपके स्टोर पर। उसकी बात सुन अनिल को झटका सा लगा था , वो सोचता रहा कि उसको मिलने आया करती है हर दिन जब कि उसे तो इसका इस्तेमाल करना था अपने प्रेमी से मिलने के लिए। ये जानकर अनिल को अच्छा नहीं लगा था , खुद पर गुस्सा आ रहा था , कितना मूर्ख हूं जो इतने दिन ऎसी गलत फ़हमी दिल में पाले रहा , क्या क्या सपने देखता रहा। अनिल को खामोश देख कर वो बोली थी , क्या सोचने लगे , मुझे शादी की मुबारिकबाद भी नहीं दोगे। शायद आप नाराज़ हैं क्योंकि हम दोनों आपको अपनी शादी में बुलाना ही भूल गये थे। नहीं ऎसी कोई बात नहीं आपको बहुत बहुत बधाई हो विवाह की ,मेरी शुभकामनायें आप दोनों पति पत्नी के लिए हमेशा रहेंगी। वैसे आपके पति महोदय का नाम क्या है ,मिलवाना किसी दिन मुझसे उन्हें। हैरानी की बात है हम इतने दिनों से इक दूजे को जानते हैं मगर मुझे आज तक आपका नाम भी मालूम नहीं है , कभी न मैंने ही पूछा न ही आपने बताया कभी। मेरा नाम है अलका और मेरे पति का नाम कमल है , वो बोली थी। आपका नाम क्या है मैंने भी नहीं पूछा कभी आपसे ,बस अनिल स्टोर के नाम से जानती हूं आपको , हंसकर कहा था उसने। मेरा नाम अनिल ही है अपने नाम पर ही रखा है स्टोर का नाम मैंने। अच्छा चलती हूं ,अब तो मिलते ही रहेंगे , जाते जाते उसने कहा था , मेरा नाम याद रखियेगा , अलका कमल। कभी शाम को हमारे घर आना , आपकी मुलाकात हो जायेगी कमल से भी।
      अनिल समझना  चाहता है कि वो क्या है एक चलता फिरता हुआ इन्सान जिसमें दिल है भावनाएं हैं या कोई स्टोर है कारोबार का जहाँ कोई किसी काम से ही नहीं बिना काम अपने किसी मतलब से भी आ जा सकता है। उसको लगता था अलका की चाहत है वो , मंजिल है अलका की ,लेकिन अलका के लिए वो सिर्फ एक स्टोर था , एक रास्ता था उसका अपने प्यार की मंजिल को पाने के लिए। और ये सच है कि मंजिल से सभी प्यार किया करते हैं , कोई भी रास्तों से प्यार नहीं किया करता कभी। हर कोई रास्ते को जल्द से जल्द तय कर लेना चाहता है ताकि मंजिल को पा सके। यही है रास्तों का मुकद्दर। काश कि वो किसी का रास्ता नहीं उसकी मंजिल होता। रास्ते का दर्द कभी नहीं समझा है किसी भी मुसाफिर ने आज तक।

                        3     आस्मां और भी हैं ( कहानी ) 

वाणी चाहती थी तीन सौ किलोमीटर का यह सफ़र जल्द पूरा हो जाये और वह अपने भाई केशव से मिल कर सारा हाल जान सके। जब से सुशील अर्चना को वहां अकेला छोड़ कर चुपचाप चला गया था तभी से उसे अर्चना को लेकर डर सा लगने लगा था। क्या करेगी कैसे जियेगी , कहीं कुछ गल्त न कर ले ,वाणी के मन में कई दिनों तक यही चिंता रही थी। मगर तब भी वह अर्चना को झूठी तसल्ली देती रहती थी , दिलासा देती रही थी कि जल्द ही सुशील वापस आ जायेगा ,अपनी भूल स्वीकार कर लेगा। दो साल से वे साथ साथ रह रहे थे एक ही घर में। वाणी और उसके पति आलोक ने उन्हें कभी मात्र किरायेदार नहीं समझा था , भले वो ऊपर की मंज़िल के एक कमरे के सैट में किराये पर रह रहे थे तब भी लगता था मानो चारों एक परिवार के सदस्य ही हों। बच्चे भी सुशील अर्चना को चाचा चाची कहते थे और उनसे बेहद लगाव रखते थे।
 
       जब कभी अर्चना और सुशील में कुछ अनबन होती थी तब वाणी ही उन्हें समझा बुझा कर एक करने का काम करती थी। उनके हर झगड़े का अंत आलोक वाणी के साथ उनके घर पर रात का खाना खा कर होता था। आलोक बेहद कम बात करता था , क्योंकि वो नहीं चाहता था कि अर्चना या सुशील को लगे कि  कोई उनके निजि जीवन में दखल देने लगा है।  मगर वाणी समझती थी कि वो दोनों उसके छोटे भाई बहन जैसे हैं और उन्हें खुश देख कर उसे प्रसन्नता होती थी। वाणी ने उन दोनों को कई बार प्यार से समझाया था कि छोटी छोटी बातों को तूल दे कर आपसी प्यार , पति पत्नी के रिश्ते को बिखरने न दें।  दोनों उसकी बात समझ भी जाया करते।वाणी को कुछ कुछ पता चल गया था कि उन दोनों में बच्चा पैदा करने की बात पर कुछ मतभेद उभर आये  हैं। उसने खुद उनको कितनी बार कहा था इस बारे विचार करने को। जाने ऐसी क्या बात हुई जो अचानक सुशील अर्चना को अकेला वहां छोड़ कर वापस अपने माता पिता के घर चला गया था और जब कुछ दिन तक नहीं लौटा तो अर्चना भी चली गई थी। जाते जाते कह गई थी अर्चना को , दीदी तुम्हारा स्नेह कभी भुला नहीं सकूंगी। मैं सुशील को मनाने को जा तो रही हूं , मगर जाने क्यों लगता नहीं फिर कभी अब लौट कर वापस आना हो पायेगा। ऊपर कमरे में थोड़ा घर का सामान जो मेरा नहीं सब आपका ही है प्यार से दिया हुआ ,
मैं नहीं लौट सकूं तो उसे मेरी याद मेरा आदर स्नेह समझ रख लेना। बिना सुशील के वो मेरे किस काम का है अब। नम आंखो से चली गई थी अर्चना अलविदा कह कर , बेहद निराश होकर। तब वाणी को समझ नहीं आया था कि क्या करे , क्या रोक ले उसे। काफी सोच विचार करने के बाद उसने अपने भाई को फोन कर बता दिया था कि पहले सुशील चला गया था वापस और अब अर्चना भी चली गई है , मुझे चिंता हो रही है आप वहां देखना सब ठीक हो सके अगर तो अच्छा है वर्ना दो जीवन बर्बाद हो जाएंगे। तुम चिंता मत करो मैं सब देख लूंगा , सब ठीक हो जायेगा , केशव ने फोन पर कहा था उसे दिलासा देते हुए।
    वाणी याद कर रही थी दो वर्ष पूर्व उसके बड़े भाई केशव का फोन आया था कि सुशील व अर्चना ने प्रेम विवाह किया है अपने अपने परिवार की मर्ज़ी के खिलाफ जा कर। दोनों इस शहर को छोड़ जा रहे हैं , वहां आएंगे तुम्हारे पास , अपना समझ कर रख लेना उनको घर में थोड़े दिन। ताकि अपनी नौकरी , घर बसाने आदि का प्रबंध कर सकें। मगर जब वो दोनों आये तो महमान नहीं घर का हिस्सा ही बन गए थे। वाणी के पति आलोक ने उन दोनों की नौकरी का प्रबंध करवा दिया था और उन्हें ऊपर की मंज़िल पर रहने को जगह भी दे दी थी। पहले एक साल तक वो दोनों बहुत खुश नज़र आते थे , हमेशा हंसते मुस्कुराते से लगते ,जैसे प्यार के गगन में उड़ रहे हों एक साथ। फिर न जाने क्या हुआ था , जैसे किसी की नज़र लग गई हो। आये दिन किसी न किसी बात पर तकरार होने लगी , आपस में उलझते रहते ज़रा ज़रा सी बात को लेकर। कभी खाने की बात तो कभी दफ्तर से वापस समय पर आने की बात पर बहस हो जाया करती थी। कामकाजी जोड़ों की सामान्य सी घटनाएं लगती थी। घर , दफ्तर के तनाव ,कभी पैसे की तंगी , कभी जल्द बहुत कुछ हासिल कर लेने की इच्छायें उनको इक दुसरे से दूर करना लगी थी। तब सुशील बार बार कहता कि उसने भूल की है अर्चना से प्रेम विवाह कर के। शायद घबरा गया था जीवन की कठिनाईयों को देख कर। अर्चना ऐसी बातों से जब निराश हो जाया करती तब वाणी उसे समझती कि चिंता मत करो धीरे धीरे सब ठीक हो जायेगा। मगर सब ठीक नहीं हो सका और उनके मतभेद समाप्त नहीं हो सके थे। वाणी ने कभी नहीं सोचा था कि प्यार करने वाला ये जोड़ा ऐसी बातों के कारण कभी बिछुड़ भी जायेगा।
     कल जब उसने अपने भाई केशव को फोन किया तभी पता चला कि उन दोनों ने आपसी सहमति से तलाक लेने के लिये अदालत में अर्ज़ी दे दी है और कुछ महीने बाद वो सदा के लिये इक दूजे से अलग हो जायेंगे। उनका विवाह का पवित्र बंधन समाप्त हो जायेगा हमेशा हमेशा के लिये।वाणी अपने भाई के घर बहुत दिन से नहीं जा पाई थी जब अर्चना व सुशील के तलाक की बात सुनी तो उससे रहा नहीं गया। अगले ही दिन आलोक से कह कर वो अपने मायके अपने भाई के घर जाने को चल पड़ी थी।क्या वाणी उनके तलाक को रोक पायेगी ,
वो नहीं जानती क्या होगा। बस एक बार उन दोनों से मिलने को व्याकुल है और अपने बच्चों को घर पर ही आलोक के पास छोड़ आई है ,जल्द वापस आने की बात कह कर।

       केशव ने घर पहुंचने पर वाणी को जो बताया उसकी कल्पना वाणी ने नहीं की थी कभी। केशव ने बताया कि अर्चना यहां आने के बाद सीधा अपने पति सुशील के माता पिता के घर पर गई थी ,बहुत रोई थी , गिड़गिड़ाई थी ,भीख मांगी थी सुशील से प्यार की मगर उसे कुछ नहीं मिला था वहां तिरिस्कार के सिवा। बड़े बोझिल मन से , थके कदमों से जब अपने खुद के मायके वाले घर पहुंची तो उसे मां ने भी भीतर आने की अनुमति नहीं दी थी , न ही पिता ही क्षमा करने को तैयार हुआ था। जब वाणी के पास जीने का दूसरा कोई भी सहारा नहीं रहा तब उसको अपने केशव अंकल की याद आई थी जिसने कभी उनके प्यार की मंज़िल पाने को आसान बनाया था साथ देकर। केशव ने बताया , वाणी मैं अर्चना की दुर्दशा देख कर दंग रह गया था। मैंने ही उनको दो साल पहले साहस से निर्णय लेने की बात समझाई थी कि  अगर मन में सच्चा प्रेम है तो समाज की परवाह किये बिना प्रेम विवाह कर अपनी मर्ज़ी से अपना जीवन जियो। आज सोचता हूं क्या मैंने सही किया था। जब वापस लौट कर निराश हो अर्चना मेरे पास आई तब मैंने उसकी पूरी बात सुनी थी समझी थी और उसको कहा था कि कभी ऐसा मत समझना कि किसी बड़े का हाथ तुम्हारे सर पर नहीं है। मैं जैसे भी हो सका तुम्हारा जीवन संवारने का कार्य करूंगा , तुम्हारे और सुशील दोनों के परिवार वालों से बात कर के। कोई दे न दे तुम्हारा भाई केशव और तुम्हारी भाभी तुम्हें कभी अकेला बेसहारा नहीं छोड़ेंगे।
   केशव अर्चना को साथ लेकर दोनों परिवार के लोगों से मिला था। उनको बात को शांति से समझने , सुलझाने को कहा था। माना अर्चना ने भूल की थी अपनी मर्ज़ी से विवाह कर के , जिससे आप लोग आहत हुए थे लेकिन वो धोखा खा चुकी है और आपसे अपनी भूल की क्षमा मांग कर आपका प्यार और सहारा चाहती है। केशव ने उनसे सवाल किया था कि आपकी बेटी सड़कों पर दर दर की ठोकरें खाती रहे तो क्या आप खुश रह सकोगे। इससे आपको भी परेशानी भी होगी और आपकी बदनामी भी। आप उसको क्षमा कर घर में आश्रय दे दो , मैं वादा करता हूं इन दोनों की समस्या का सही हल निकाला जा सके। अर्चना के माता पिता को भरोसा दिलाया था कि आप अगर बेटी को फिर से अपना लोगे तो वो आप पर बोझ नहीं आपका सहारा बन कर रहेगी हमेशा।
                           केशव जब सुशील से मिला तो उसे लगा जैसे वो कोई और ही है। उसने सुशील से कहा मैं नहीं जानना चाहता तुम्हारी निजी समस्याएं क्या हैं , कौन सही है कौन गलत है। मैं तुमसे बस केवल इतना जानना चाहता हूं कि क्या तुम्हारे फिर से एक होने की कुछ सम्भावना है। सुशील का जवाब था कि बस उसे अर्चना से तलाक लेना ही है , वह पछता रहा है प्रेम विवाह कर के , ऐसा करने से उसे कुछ भी नहीं मिला है। सुशील ने बताया कि कुछ दिन पहले उसने अपना माता पिता से फोन पर बात की थी और उनको बता दिया था कि मैं पछता रहा हूं व घर वापस आना चाहता हूं। तब माता पिता ने कहा था कि अगर मैं अर्चना को छोड़ दूं सदा के लिये और घर आने के बाद उनकी पसंद की लड़की से शादी कर लूं तो वो मुझे अपना लेंगे। ऐसा करने से ही मुझे ज़मीन जायदाद , और तमाम सम्पति जो अब करोड़ों की हो चुकी है से हिस्सा मिल सकता है। मैं अपनी तंगहाली से परेशान हो चुका हूं और मुझे समझ आ गया है कि प्यार से पेट नहीं भर सकता , दुनिया में बिना पैसे जीना संभव नहीं है। मैं उम्र भर काम कर के नौकरी कर के भी वो सब नहीं प्राप्त कर सकता जो अपने परिवार की बात मानने से मुझे मिल जायेगा। केशव जान गया कि  यहां मामला प्यार का नहीं रह गया अब दौलत का बन चुका है। केशव अर्चना के माता पिता से आकर मिला और उनको सारी बात बता दी थी। केशव ने कहा मुझे लगता है कि अर्चना के भविष्य को ध्यान में रख कर हमें भी उनसे उनकी तरह ही बात करनी पड़ेगी ताकि उसके सुरक्षित जीवन का कुछ प्रबंध कर सकें।
      अर्चना को अचरज हुआ था सुशील की कही बातें सुनकर। क्या हमारा प्यार अब बीच बाज़ार सिक्कों से तोला जायेगा। रो पड़ी थी अर्चना। मगर केशव अंकल और माता पिता ने उसे खामोश करवा दिया था ये कह कर अब हमें वो करने दो जो हम उचित समझते हैं , तुम्हारी भलाई के लिये। सोच विचार हुआ दोनों के परिवारों की आमने सामने बातें हुई। तर्क वितर्क , गर्मा-गर्मी ,आरोप प्रत्यारोप , सब कुछ हुआ लेकिन निष्कर्ष वही , तलाक चाहिये। तब केशव ने कहा मेरा एक सुझाव है ,हालांकि अर्चना ने मुझे ऐसा कहने से मना किया था मगर मुझे उसके पूरे जीवन के लिए सोचकर कहना पड़ रहा है कि अगर आप चाहते हैं आपसी सहमति से जल्द तलाक लेना तो आपको अर्चना के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिये उसके नाम पर दस लाख जमा करवाने होंगे बैक में। अन्यथा कोर्ट कचहरी , पुलिस थाने में फैसला होने में सालों बीत जायेंगे। तब जो आप सोच रहे हैं सुशील का फिर से विवाह करना उसके लिये इंतज़ार करते करते उसकी शादी करने की उम्र ही बीत जाएगी। काफी बहस के बाद तय किया गया कि कुछ दिन सोचने के बाद बताया जायेगा। एक सप्ताह बाद सात लाख देने की बात तय हो गई थी और अगले ही दिन अदालत में अर्ज़ी दे दी गई थी आपसी सहमति से तलाक की।
                       वाणी को ये सब केशव ने बताया तो उसने कहा भइया क्या ये सब अजीब सा नहीं हो गया। प्यार का ऐसा अंजाम तो कभी नहीं सुना मैंने न सोचा था कभी। क्या कुछ लाख रुपये अर्चना के जीवन की कमी को पूरा कर सकते हैं। केशव ने कहा तुम ठीक कहती हो मगर जब हालात बिगड़ जायें तब कुछ खोकर कुछ पाकर कोई समझौता करना ही पड़ता है। तब वाणी ने सवाल किया कि यहां किसे क्या मिला और किसने क्या खोया ज़रा इसपर भी विचार किया जाता। माना सुशील को जो चाहिये उसको वो मिल जायेगा , अपना घर , ज़मीन जायदाद ,धन सम्पति और शायद इक नया जीवन साथी भी। उसके माता पिता को कुछ लाख देकर बेटा मिल गया उनके लिये भी सौदा महंगा नहीं है। अर्चना के माता पिता को कुछ लाख की पूंजी के साथ एक बेटी जो नौकरी कर कमा रही उनका सहारा बन सकती है पा संतोष हो सकता है। मगर अर्चना ने तो अपना सभी कुछ ही खो दिया है। मैं अच्छी तरह जानती हूं अर्चना को ,उसके लिये धन दौलत कोई महत्व नहीं रखते।
न ही कुछ लाख रुपये किसी का जीवन संवार सकते हैं , मेरा मानना है। इस सब में अगर किसी का जीवन बिखर गया है तो सिर्फ अर्चना का। और जो दोषी है इस सब का वो बहुत सस्ते में छूट जायेगा। अर्चना के बारे में सोचकर वाणी की आंखे भर आईं , स्वर उसके गले में अटकने लगा था। मगर अगले दिन वापस भी जाना ज़रूरी था और यहां उसके करने को बाकी बचा भी नहीं था कुछ भी। वाणी मिलने गई थी अर्चना को उसके घर में। उसे देख कर लगा जैसे इन कुछ ही दिनों में वो कई वर्ष बड़ी उम्र की लगने लगी है। उसके साथ बात की तो प्रतीत हुआ कि वो बेहद निराश है जैसे उसके जीवन का अंत हो चुका हो। वाणी ने बहुत ही प्यार से अर्चना से बात की थी , समझया था कि किसी के साथ छोड़ने से सब खत्म नहीं हो जाता , जीवन में आगे बढ़ना ही पढ़ता है , जो बीत गया उसको छोड़कर। वाणी ने जाने से पहले अर्चना को गले लगाकर कहा था , मुझे दीदी कहती हो न , अपनी दीदी पर भरोसा रखना , अभी मैं कुछ नहीं कह सकती , मगर तुम ये सारी औपचारिकतायें समाप्त करने के बाद अपने घर वापस ज़रूर आना। हम मिलकर तुम्हारे लिये एक सुखमय जीवन की तलाश करेंगे। तुम अवश्य आना मेरी बहन , आशाओं की तलाश के लिये।

     घर पहुंच कर वाणी ने अर्चना की पूरी कहानी अपने पति आलोक को बता दी थी। कुछ दिन सोचती रही थी , फिर एक दिन आलोक से पूछा था कि क्या आपके बड़े भाई साहब जो माता जी के साथ रहते हैं और जिनकी उम्र 35 वर्ष हो चुकी है लेकिन अभी तक विवाह नहीं किया है , अर्चना जैसी लड़की को जीवन साथी बनाना चाहेंगे। मुझे लगता है ऐसा उन दोनों के लिये सही रहेगा , आप उनसे और माता जी से पूछना। आलोक ने बड़े भाई और माता जी को अर्चना के बारे सब बता दिया था और वो सहमत हो गये थे। अब वाणी को इंतज़ार था तो अर्चना के आने का और उसको मना लेने का।
               अर्चना का तलक हो गया था और वो वापस चली आई थी उसी शहर में। समझ नहीं पा रही कि  यादों को तलाश करने आई है या यादों से बचने। मगर जो भी उसे लगा था जैसे वो एक घुटन से निकल कर ताज़ी हवा में आ गई है। कुछ दिन बाद वाणी ने अर्चना की मुलाकात आलोक के बड़े भाई साहब से करवा कर अपनी सोच सपष्ट कर दी थी। मगर ये भी कह दिया था की अंतिम निर्णय तुम्हें खुद सोच समझ कर लेना है। इस प्रकार वाणी ने अर्चना को राज़ी कर लिया था अपने जीवन की नई शुरुआत के लिये। केशव ने भी अर्चना के माता पिता को तैयार कर लिया था उसके फिर से विवाह के लिये। अर्चना के जीवन की काली अंधेरी रात का अंत हो चुका है और उसके सामने है नया सवेरा , और उज्जवल भविष्य का नया आस्मां। 

                           4       मुक्ति ( कहानी )

                    पता नहीं किसे ये दुनिया जीने के काबिल लगती होगी , कौन ज़िंदगी को जीता है यहां पर। मैं तो कभी ज़िंदा थी ही नहीं। हां मरती ज़रूर रही हूं हर दिन। मैं तो ये भी नहीं जानती कि इसकी शिकायत किस से करूं। किसे कहूं कि मुझे क्यों जीवन दिया अगर ज़िंदगी ही नहीं दे सकते थे। मां-बाप का भी क्या कसूर था , उन्हें कहां यह मालूम था कि जिस अपनी दुनिया को वो हसीन समझते हैं वो कितनी बुरी है। अब लगता है कि वो कुछ साल जो मां-बाप के साथ बिताये थे , जिनमें कभी दो वक्त पेट भरने को रोटी भी नहीं मिलती थी , तन ढकने को कपड़े भी नहीं होते थे , न कोई रहने का ठिकाना ही था , कभी इधर कभी उधर भटकते रहते थे , जहां मां-बाप को जो काम मिला कर लिया , जब रोटी मिली तो खा ली नहीं मिली तो पानी पी कर ही पेट भर लिया , तब न बचपन का पता था न ही बड़े होने का , तब शायद मैं किसी न किसी तरह ज़िंदा ज़रूर थी। मगर अब तो उन दिनों की यादें भी याद नहीं हैं , मालूम नहीं कब और कैसे मैं बड़ी हो गई और मेरी शादी हो गई। उस बाली उम्र में शादी जैसे गुड्डे-गुड़ियों का खेल ही था कोई। मैंने तो कभी न बचपन देखा न किसी सहेली के साथ कोई खेल ही खेला। बचपन की उम्र बीती भी नहीं थी कि मैं खुद बच्चों की मां बन गई। मां-बाप भूल गये या जाने कहीं खो गये और मैं भी अपने बच्चों में ही खो गई। मुझे जब अपने बच्चे दुनिया में सब से सुंदर , सब से अच्छे और सब से प्यारे लगने लगे तभी समझी कि मुझे भी मेरे मां-बाप इतना ही प्यार करते होंगे। मैंने बहुत कोशिश की कि खुद भूखी रह कर भी किसी भी तरह अपने बच्चों का पेट भरती रहूं। इसके लिये रात दिन काम किया , हर तरह का काम किया मगर फिर आज तक दोनों वक्त बच्चों का पेट नहीं भर सकी। अब तो मैं हर दिन बीमार रहने लगी हूं , अब सोचती हूं मैंने अपने बच्चों को जन्म क्यों दिया। मेरी तरह ये भी नादान हैं , बेबस और मज़बूर हैं। न खाने को रोटी न रहने को ठिकाना , न कोई उम्मीद। पढ़ना लिखना तो सोच भी नहीं सकते , अभी तो ये जानते ही नहीं कि उनकी दुनिया कितनी बेरहम है। यहां आदमी आदमी को खा जाना चाहता है। दूसरे की मज़बूरी का फायदा उठाना चाहता है हर कोई। एक अपना और अपने बच्चों का पेट भरने को क्या क्या नहीं करना पड़ता। मज़दूरी , घरों का काम ,बोझा ढोना ही नहीं जब कोई काम नहीं मिलता तब भीख मांगना क्या मज़बूरी में चोरी तक करने की नौबत आ जाती है।
                                          सब लोग नफरत से देखते हैं हमें , उनको लगता ही नहीं कि हम भी इंसान ही हैं। क्या उसी भगवान ने बनाया है हमें भी जिसने इनको बनाया है , जिनके पास खाने को सब कुछ है , रहने को घर है , पढ़ने को स्कूल , नौकरी - कारोबार सब है। शायद ये जानते होंगे ज़िंदगी किसे कहते हैं और  उसे कैसे जिया जाता है। मुझे तो चक्कर सा आ गया था , शायद दो दिन से भूखी थी , मगर जब आंख खुली तो इस सरकारी अस्पताल में थी। बच्चों ने बताया कि मैं बेहोश हो गई थी और किसी के कहने पर वो मुझे रिक्शा में डाल कर यहां ले आये थे। रिक्शा वाला कोई भला आदमी था जो बिना पैसे लिये मुझे यहां पंहुचा गया था। होश आने पर डॉक्टर साहब ने बताया कि तुम्हारी जांच से पता चला है कि कोई बड़ा रोग है तुमको। बड़े अस्पताल जाना होगा आप्रेशन करवाना होगा जिसके लिये बहुत पैसे चाहिये होंगे ईलाज और दवा के लिये। अभी चार दिन पहले ही बच्चों का बाप काम की तलाश में दूर किसी बड़े शहर गया है , क्या पता अब कहां होगा। जब काम मिलेगा तब चाय वाली दुकान वाले के पते पर पोस्टकार्ड भेजेगा। अगर कहीं रास्ते में रेलगाड़ी में ही पकड़ा गया बिना टिकट तो मज़े से कुछ दिन जेल में पेट भर रोटी खाकर वापस आ जायेगा पिछली बार कि तरह। आदमी का क्या है , कैसे भी रह लेगा। मगर मैं औरत जात , इन छोटे छोटे बच्चों के साथ इस दुनिया में मर मर के जी रही हूं। डॉक्टर साहब बता गये हैं कि तुरंत आप्रेशन नहीं करवाया तो किसी भी समय जान जा सकती है। दिल में तो आता है यही अच्छा है , मौत आ जाये तो मुझे चैन आ जायेगा। लेकिन मैं चैन से मर भी नहीं सकती , मेरे बाद मेरे बच्चों के साथ ये दुनिया क्या क्या नहीं कर सकती। मैं जानती हूं इनको आज तक इन भेड़ियों से किस तरह बचा कर रखा है।
                                    क्या मैं डायन बन गई हूं जो अपने ही बच्चों को मार डालूं। जिन बच्चों को ठोकर भी लगती थी तो मुझे रोना आ जाता था , जब ये बीमार होते तो रात रात भर गोद में लिये जगती रहती थी। जिन बच्चों से हसीन मुझे दुनिया की कोई भी चीज़ नहीं लगती है , उन अपने बच्चों को मैं खुद ही ज़हर दे कर मार डालूं , इसलिये कि मैं मर गई वह कैसे जियेंगे। मेरी तरह उम्र भर रोज़ मरते रहेंगे।  हां जब तक मां बाप ज़िंदा थे मैं भी ज़िंदा थी और जब तक जीती इनके लिये ज़िंदगी तलाश करती रहती। मगर मेरे मरने के बाद ये जिस तरह मरेंगे , मेरे जीने की ही तरह , उससे तो यही अच्छा होगा कि मेरे साथ ही इनको भी मौत आ जाये। यही अच्छा है कि ज़हर रोटी से सस्ता है और एक बार खाने से सभी ज़रूरतों ,सब मुश्किलों से निजात मिल जाती है। ज़िंदगी तो मेरे बस में नहीं रही कभी भी , लेकिन मौत तो हो सकती है। इसलिये मैंने आज अपने साथ अपने बच्चों को भी खिला दिया है। शायद ये ग़म हमारा आखिरी ग़म हो और सब ग़मों से मुक्ति।

              5   इक पतित नारी की जीवन गाथा ( सत्य कहानी ) 

बहुत साल पहले की घटना है , इक पत्रिका में किसी महिला की आपबीती प्रकाशित हुई थी। तब उम्र नहीं थी गहराई से उसको लेकर सोचने की , मगर मैं उस नारी की व्यथा को कभी भुला नहीं सका। जब फेसबुक पर मित्रता के नाम पर अशलीलता का फैला हुआ जाल देखा तब उसको अपनी कल्पना के माध्यम से इक लघुकथा का रूप दिया। आज कुछ कुछ उसी तरह की कहानी लिखने जा रहा हूं जो मुझे लगता है कि बहुत लोग जो फेसबुक पर हैं उनको खुद से जुड़ी लग सकती है। शायद जितना मैं लिख सकता उससे कहीं बढ़कर। चलो भूमिका को छोड़ आपको इक नारी की पीड़ा की उसकी बेबसी की उसके गंदगी में कीचड़ में फसने से रसातल में गिरने की कहानी सुनाता हूं। और उसका अंत जो हुआ वो भी , जो शायद होना ही था , होता ही है , लेकिन जो ऐसा करते हैं वो ये शायद ही सोचते हैं कि किसी दिन उनका बनाया जाल ही खुद उनको फंसा सकता है।
             नीता इक अध्यापिका थी , रौशन शर्मा की बेटी को टयूशन पढ़ाने उसके घर जाया करती थी। उसके घर की आर्थिक दशा उसको ऐसा करने को विवश करती थी। एक दिन जब नीता गई टयूशन पढ़ाने तब घर पर उनकी बेटी और पत्नी नहीं थी और रौशन अकेला था। नीता को रोक लिया था उसने ये बता कर कि बेटी अभी आने वाली है मां के साथ बाज़ार तक गई है। और उस दिन रौशन ने ज़ोर ज़बरदस्ती करके नीता की अस्मत लूट ली थी। अपना सर्वस्व लुटा कर जब नीता बिलख रही थी तब रौशन ने उसको बहुत सारे पैसे जितने शायद वो टयूशन से वर्ष भर में लेती थी देकर कहा था लो मेरी तरफ से कोई उपहार ले लेना। और ये बात किसी से मत कहना वरना तुम्हारी ही बदनामी होगी। नीता ने लिखा था तब अपना नाम बदल कर पत्रिका को कि तब उसको समझ नहीं आ रहा था कि अपनी अस्मत लुटने पर रोये या पहली बार इतने पैसे पाकर खुश हो। रौशन को आता था महिलाओं को चिकनी चुपड़ी बातों से बहलाना। उसने जब अपनी बात का असर होता देखा नीता पर तो कहने लगा मुझसे भूल हो गई है तुम्हारे हुस्न का जादू चल गया था मुझ पर और मैं तुमसे सच में प्यार करता हूं। लेकिन मुझे तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिये थी , कसम खाता हूं अब कभी नहीं करूंगा ऐसा दोबारा। लेकिन अगर तुम चाहोगी तो मैं तुमको जो भी चाहिये देता रहूंगा। तुम ये बात मन से निकल दो कि हमने कुछ गलत किया है , जिस बात से हमको ख़ुशी मिलती हो और किसी का कोई बुरा नहीं उसमें बुराई नहीं है। आखिर अपना तन मन हमारा है , हम जो पसंद हो करें , किसी को बताने की कोई ज़रूरत नहीं , इस तरह रौशन ने नीता को मना लिया था कि इस घटना का ज़िक्र किसी से नहीं करेगी। मगर अभी तक वो कश-म-कश में उलझी थी कि क्या करे क्या नहीं , इसलिये उसने अब किसी के घर जाकर टयूशन पढ़ाना ही बंद कर दिया था। जिनको पढ़ना हो वो उसके घर आ सकते हैं , रौशन चाहता था नीता को अपने जाल में फंसाये रखना इसलिये उसने भी बेटी को नीता के घर टयूशन पर भेजना शुरू कर दिया। नीता चाह कर भी उस घटना को भुला नहीं पा रही थी। मगर फिर उसने अपनी आर्थिक मज़बूरी से विवश हो कर एक दिन रौशन का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था। रौशन उसके घर आता अपनी वासना पूरी करता और नीता को बहुत से पैसे देता। मगर क्योंकि नीता अपने घर पर हमेशा अकेली नहीं मिलती थी इसलिये उसने नीता को अपनी ही एक जगह उपलब्ध करवा दी थी टयूशन का काम करने को। यूं सब को यही मालूम था कि किराये पर ली है जबकि किराया उसको अपना बदन सौंप कर ही चुकाना होता था।
                                          वक़्त बीतता गया और नीता ने खुद को बदल लिया था समय के साथ। अब वो दिखाने को टयूशन का काम करती थी मगर वास्तव में उसी को अपना कारोबार बना लिया था , हर किसी से शारीरिक संबंध बनाना और पैसे लेना। रौशन की बेटी जवानी की दहलीज पर थी और नीता के घर अभी भी नियमित आती जाती थी। नीता उसको कई प्रकार से सहयोग किया करती , उसको परीक्षा में नकल करवाना , उसकी बुरी आदतों को पूरा करने को जब तब पैसे देना। रौशन की बेटी को नीता बहुत प्यारी लगती थी , क्योंकि वो उसको जो चाहती वो करने में सहायता देती रहती थी। शायद कहीं अनजाने में वो अपने साथ उसके पिता द्वारा किये अपकर्म का बदला ले रही थी उसकी बेटी को उसी राह जाते देख कर। अक्सर जब कोई नीता के पास आता तब वो रौशन की बेटी को कुछ अशलील तस्वीरें देखने को , कुछ ऐसे पत्रिकाएं पढ़ने को देकर साथ के कमरे में चली जाती अपना कारोबार करने। तब वो छुप कर दरवाज़े की दरार से नीता को सब करते देखती कितनी बार। और ऐसे में उसने एक दिन नीता को ये बता दिया था कि क्या मुझे ये सब सिखा सकती हैं। और इस तरह रौशन की बेटी ही नहीं और लड़कियों को भी नीता ने उसी जाल में फंसा लिया जिसमें खुद मज़बूरी में फंस गई थी।
                                    रौशन नहीं जनता था कि जिस रास्ते पर उसने नीता को डाला था आज उसकी जवान बेटी उसी राह पर भटक रही है। ऐसे में इक दिन रौशन ने नीता को होटल में आने को कहा तो उसने पूछा क्या मेरी बजाय कोई नई जवान लड़की अगर हो तो आपको क्या चाहिये मैं या वो। और रौशन ने कहा था कि अगर कोई नई और जवान मिल जाये तो अधिक पसंद है। जब होटल के कमरे में नीता अपने साथ उसी की बेटी को लेकर पहुंची तब उसको होश ही उड़ गये। बहुत नाराज़ हुआ वो नीता को बदचलन बताया , नीता ने वही बात दोहराई जो कभी रौशन से उसको कही थी। किसी को भी अपना बदन अपनी मर्ज़ी से किसी को भी ख़ुशी से सौंपने में बुराई नहीं है। जो तुमने किया और मुझे सिखाया वही तुम्हारी बेटी ने भी सीख लिया है , अब तुम लाख चाहो जो हो चुका उसको बदल नहीं सकते। रौशन ने नीता को और अपनी बेटी को वहां से जाने को कह दिया था और ये विनती की थी कि ये सब किसी को नहीं बताना , मैं समझ गया मुझे अपने कर्मों का फल ही मिला है। वो चली आई थी , अगली सुबह होटल के कमरे से रौशन की लाश मिली थी।  उसने ख़ुदकुशी कर ली थी। सुसाईड नोट छोड़ गया था कि अपनी मौत का वो खुद जिम्मेदार है। 

                      6      बिन बरसी बदली ( कहानी ) 

चालीस वर्ष बाद बस में अचानक मुलाकात हो गई राकेश और सुनीता की। कॉलेज में साथ साथ पढ़ते रहे थे , उम्र चाहे बढ़ गई हो तब भी पहचान ही लिया था सुनीता ने राकेश को जो दूसरी तरफ बैठा था। और उठकर उसके पास जाकर कहा था , हेलो राकेश कैसे हो। राकेश भी पहचान गया था सुनीता को , बोला था अरे आप सुनीता जी , नमस्कार , मैं अच्छा हूं आप कैसी हैं। इतने साल हो गये , अचानक आपको मिलकर बहुत ख़ुशी हो रही है। मुझे भी आपको देख कर बहुत ही अच्छा लग रहा है , क्या आप भी दिल्ली जा रहे हैं , सुनीता ने पूछा था। हां दिल्ली में बेटा जॉब करता है , उसके पास जा रहा हूं , रहता अभी भी अपने शहर में ही हूं , राकेश ने बताया था। फिर पूछा था कि आप क्या दिल्ली में रहती हैं आजकल। नहीं , सुनीता बोली थी , मेरी शादी तो राजस्थान में हुई थी और वहीं रहती हूं , छोटी बहन रहती है दिल्ली में , उसके पास जा रही हूं। सुनीता ने कहा था , आप उधर आकर बैठ जाओ मेरे साथ की सीट खाली है , साथ साथ बैठ कर बातें करेंगे। और राकेश सुनीता के साथ जाकर बैठ गया था। कॉलेज की बातें , फिर अपनी अपनी ज़िंदगी की बातें , अपने परिवार की जीवन साथी की बच्चों की बातें इक दूजे से पूछने बताने लगे थे। आपस में मोबाइल फोन नंबर लिये -दिये गये ताकि आगे भी बात होती रहे। यूं ही बात चली तो पता चला कि दोनों ही फेसबुक पर भी हैं , फोन पर ही राकेश ने सुनीता को अपनी प्रोफाइल दिखाई थी और फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट भी भेज दी थी। सुनीता ने बताया था कि वो फेसबुक पर कभी कभी ही रहती है , और उसने पूछा था राकेश क्या आप मुझे अपना ईमेल दे सकते हैं। क्यों नहीं , राकेश ने कहा था , और ऐसे दोनों ने अपना अपना ईमेल दे दिया था। कुछ घंटे कैसे बीत गये थे दोनों को पता तक नहीं चला था , दिल्ली पहुंच कर जब अलग होने लगे तब सुनीता ने पूछा था कि क्या वो ईमेल पर आपस की बातें आगे भी करते रहेंगे। राकेश का जवाब था कि बेशक वो मेल कर सकती हैं और राकेश ज़रूर जवाब दिया करेगा। सुनीता ने ये वादा भी लिया था कि दोनों की दोस्ती की बात इक दूजे तक ही रहेगी।
                                                   राकेश को कुछ दिन बाद सुनीता का भेजा मेल मिला था। सुनीता ने लिखा था , शायद ये बात आपको पहले भी कॉलेज के ज़माने में महसूस हुई हो कि मैं आपको बेहद पसंद करती थी। मगर तब आप लड़के होकर भी नहीं कह सकते थे ये बात तो मैं एक लड़की अगर कहती तो आवारा समझी जाती। फिर भी एक बार मैंने आपकी किताब में एक पत्र रखा था , आपसे किताब मांगी थी और अगले पीरियड में पत्र रख कर वापस भी कर दी थी। मगर उसके बाद इक डर सा था कि कहीं कोई दूसरा न पढ़ ले , तभी कॉलेज का समय समाप्त होते ही फिर आपसे किताब मांग ली थी इक दिन को। सच कहूं वो पत्र मैंने कभी फाड़ा नहीं था , दिल पर लिखा हुआ है आज तक , मालूम नहीं ये बात अब बताना उचित है या अनुचित , मगर इक सवाल हमेशा मेरे मन में रहता रहा है कि अगर मैंने तब वो पत्र आपको पढ़ने दिया होता तो क्या आज मेरी ज़िंदगी कुछ अलग होती और शायद आपकी भी। क्या ये हम दोनों के लिये सही होता। ऐसा बिल्कुल नहीं कि मुझे कोई शिकायत हो अपने जीवन से या किसी से भी , पर यूं ही सोचती हूं कि तुम साथ होते तो क्या होता। खाली समय में जाने कितनी बार ये सवाल मैंने खुद से किया है। पता नहीं आपको याद भी है या नहीं कि एक बार वार्षिक समारोह में मंच पर हमने साथ साथ गीत गाया था। तब जब उसकी फोटो देखी थी तब वो एक ही थी और मैंने आपको कहा था कि ये मुझे लेने दो और आप ने ली हुई वापस कर दी थी मेरे लिये। मेरे पास हमेशा वो फोटो रही है और वो गीत हमेशा गुनगुनाती रहती हूं मैं। राकेश मैंने उस पत्र में लिखा था तुम मेरे सपनों के राजकुमार हो , मरे मन में रहते हो , मुझे नहीं पता कि उसको प्यार कहते हैं या मात्र आकर्षण , मगर वो भावना मैं और किसी को लेकर महसूस की नहीं थी कभी। मैंने आपसे वादा लिया था आपस की बात किसी को नहीं बताने का रास्ते में बस के सफर में तो केवल यही बात बताने के लिये जो जाने क्यों मुझे बतानी भी ज़रूरी थी और पूछनी भी कि आप क्या सोचते हैं इसको लेकर।
                               राकेश ने बार बार पढ़ा था सुनीता की मेल का इक इक शब्द बता रहा था कि उसने जो भी लिखा है सच्चे मन से और साहसपूर्वक लिखा है। राकेश ने सुनीता को रिप्लाई किया था ये लिख कर। मुझे नहीं मालूम कि आपको अब ये सारी बातें मुझे कहनी चाहियें अथवा नहीं , हां इतना जानता हूं कि जो आपने अपने दिल में अनुभव किया उसमें कुछ भी न तो अनुचित था न ही असव्भाविक। अपने मन पर अपनी सोच पर , पसंद नापसंद पर किसी का बस नहीं होता है। इतना ज़रूर मैं भी आपकी ही तरह सच और इमानदारी से बताना चाहता हूं कि मुझे उस दिन आपसे मिलकर बहुत ही अच्छा लगा था और आज ये आपकी बातें पढ़कर भी इक ख़ुशी अनुभव कर रहा हूं। ख़ुशी इस बात की है कि शायद जीवन में पहली बार मुझे ये एहसास हुआ है कि कोई है जो दुनिया में मुझे भी पसंद करता है , चाहता है। नहीं मुझे भी किसी से ज़रा भी शिकवा शिकायत नहीं है , मगर ये भी हकीकत है कि मुझे इस  दुनिया में कभी भी तिरिस्कार और नफरत के सिवा कुछ भी मिला नहीं किसी से। सच कहूं तो मैंने खुद ही कभी सोचा ही नहीं कि मैं भी किसी के प्यार के काबिल हूं। मुझसे हर किसी को शिकायत ही रही है , मैं हमेशा इस अपराधबोध को लेकर जिया हूं कि मुझे जो भी सभी के लिये करना चाहिये वो चाह कर भी मैं कर सका नहीं जीवन भर। इसलिये मुझे यही लगता है कि ये अच्छा ही हुआ जो तुमने वो पत्र मुझसे वापस ले लिया था मेरे पढ़ने से पहले ही। वरना जो भावना आज चालीस वर्ष बाद भी आपके मन में मेरे प्रति बाकी है वो शायद नहीं रह पाती। मैं आपको कुछ भी दे नहीं पाता ठीक उसी तरह जैसे अन्य किसी को नहीं दे सका हूं। शायद किसी को नहीं मालूम कि मैं खुद इक तपते हुए रेगिस्तान की तरह हूं , जो खुद इक बूंद को तरसता रहा उम्र भर वो भला किसी की प्यास कैसे बुझा सकता था। सुनीता आपकी भावना मेरे लिये किसी बदली से कम नहीं है। इसलिये ये अच्छा हुआ जो मैंने आपका वो पत्र नहीं पढ़ा , आपकी ये मेल भी डिलीट कर दूंगा जैसा आपने लिखा है , मगर ये सब अब मेरे भी मन में कहीं रहेगा हमेशा। मैं आपको ये सब लिखने पर क्या कहूं , मैं नहीं समझ पा रहा। धन्यवाद या मेहरबानी जैसे शब्द काफी नहीं हैं। हम जब तक हैं अच्छे दोस्त बन कर ज़रूर रह सकते हैं। मुझे आपको जवाब की प्रतीक्षा रहेगी , काश मैं आपको कोई ख़ुशी दे सकूं मित्र बन कर ही।
                         सुनीता का संक्षिप्त सा जवाब मेल भेजने के थोड़ी देर बाद ही आ गया था , लगता है जैसे उसको इंतज़ार था राकेश की मेल का और पढ़ते ही रिप्लाई कर दिया था।  लिखा था , हो सकता है कि मुझे आपसे कुछ भी हासिल नहीं होता जैसा आपने लिखा है , कारण चाहे जो भी हों। मगर मुझे अफ़सोस है तो इस बात का कि मैं वो बदली हूं जो शायद आपकी प्यास बुझा सकती थी। जो कभी बरस ही नहीं पाई। 

                7   इक हमदर्द अपना  ,  इक हमराज़ अपना  ( कहानी ) 

संदीप आज फिर बहुत उदास है , अकेला है। कितनी बार उसको यही मिलता है , बार बार संदीप किसी से दोस्ती करता है , और बार बार उसको दोस्त कोई नया ज़ख्म दे जाते हैँ। काश आज उर्मिला होती उसका दर्द बांटने को। जब भी परेशान होता है संदीप , उसे याद आ जाती है उर्मिला की वो कसम खुदखुशी न करने की। कभी कभी सोचता है संदीप कि क्या सच में वो इसीलिये जी रहा है या ये इक बहाना है खुदखुशी न करने का। कहीं ऐसा तो नहीं कि वह मरने से डरता है , उसके पास जीने का कोई भी मकसद ही नहीं है , वो बस इसलिये ज़िंदा है क्योंकि ख़ुदकुशी करने का साहस ही नहीं कर पा रहा। उर्मिला की वो कसम केवल इक बहाना है। संदीप को याद है वो दिन जब वो अपनी ज़िंदगी से बेहद निराश हो चुका था और ख़ुदकुशी करने ही वाला था कि उसकी खिड़की के बाहर से किसी ने आवाज़ दी थी उसका नाम लेकर और कहा था कि उसे इक ज़रूरी बात करनी है थोड़ी देर को अपने कमरे का दरवाज़ा खोल दो। बिना कुछ भी समझे संदीप ने आपने कमरे का दरवाज़ा खोल दिया था। उर्मिला बदहवास सी भीतर चली आई थी। आकर बोली थी मुझे जानते तो होगे तुम्हारे घर की साईड वाली गली में ही रहती हूँ मैँ। हां देखा है आपको अक्सर इधर से गुज़रते हुए , संदीप ने कहा था , बतायें क्या बात करना चाहती हैं मुझसे।
                                          उर्मिला ने कहा था क्या आप मेरे साथ फवारे वाले पार्क तक चल सकते हैं , यहां बात करना उचित नहीं होगा। संदीप आपसे निवेदन है कि बस थोड़ी देर मेरे साथ चलकर मेरी बात सुन लो , उसके बाद चाहे जो मर्ज़ी आप कर सकते हैं , मुझे मालूम है आप आज ख़ुदकुशी कर रहे थे। संदीप ये सुन कर चकित रह गया था , बोला था कि आपको कैसे पता चला और आप मेरा नाम भी जानती हैं , मुझे तो आपके बारे कुछ भी पता नहीं है। मेरा नाम उर्मिला है , अब बाकी बातेँ  अगर कहीं बाहर चल कर करें तो अच्छा होगा। और वो दोनों कुछ दूरी पर उस पार्क में चले आये थे। पार्क के सबसे पीछे वाले कोने में जहां सीढ़ियां बनी हुई थी , जाकर बैठ गये थे दोनों। संदीप पूछता उस से पहले ही उर्मिला बोली थी , संदीप जी आपको हैरानी होगी कि मुझे आपके बारे बहुत कुछ पता है। मेरा कमरा आपकी खिड़की के ठीक सामने है और इस तंग गली जो हमारे दोनों घरों के बीच है के बाहर से मैंने कितनी बार आपकी बातेँ सुनी हैं , जब भी आपके दोस्त आपको बिना किसी कारण के बुरा भला कहते रहे और आप चुप चाप सुनते रहे तब मेरी पलकें भीगती रही हैं। ये दर्द मुझे भी मिला है उम्र भर , तभी मैंने आपके दर्द को हमेशा अपना समझा है। जानती हूँ आपको किसी सच्चे दोस्त की तलाश है और ये भी जानती हूँ कि चाह कर भी मैँ वो नहीं बन सकती। मगर मैं चाहती हूँ की हम दोनों इक दूजे के हमदर्द और हमराज़ बन कर , आपस के दुःख - दर्द बांटा करें। मैंने ये पहले भी कई बार कहना चाहा है मगर कभी कह नहीं पाई , आज खिड़की से देखा आपको छत से रस्सी टांगते हुए और ख़ुदकुशी करने की कोशिश करते हुए , तब लगा ये शायद आखिरी अवसर है इक पहल करने का। मैं आज अपना हाथ बढ़ा रही हूं , क्या मेरा हाथ थामोगे मेरे हमदर्द और हमराज़ बनोगे हमेशा के लिये। आपको हो न हो मुझे आप पर पूरा यकीन है कि अगर कोई मेरा राज़दार और हमदर्द बन सकता है तो वो केवल आप ही हैं दूसरा कोई शायद ही मिले जीवन में। संदीप ने खामोशी से थाम लिया था वो हाथ जो उर्मिला ने उसकी तरफ बढ़ाया था। शायद इसकी ज़रूरत आज संदीप को भी बहुत थी। तब उर्मिला ने कहा था कि आज आपको मुझे ये वादा करना ही होगा कि भले कितनी ही मुश्किलें आयें , कितनी परेशानियां हों जीवन में , आप कभी हार नहीं मानोगे जीवन से। मुझे जब भी कोई मुश्किल होगी मैं आपको ज़रूर बताया करूंगी और आप भी मुझसे कभी कोई परेशानी नहीं छिपाओगे। और तब से संदीप और उर्मिला इक ऐसे नाते में बन्ध गये जिसका कोई नाम नहीं था। हां उसके बाद संदीप की खिड़की हमेशा खुली रहती थी , और जब भी दोनों को कोई बात करनी होती दोनों उसी पार्क के कोने में जाकर बैठ जाते और बातें किया करते। संदीप की तरह ही उर्मिला को भी हर किसी से नफरत ही मिली थी बिना किसी कारण। मगर जब से उर्मिला इस बेदर्द दुनिया से चली गई हमेशा के लिये तब से संदीप को उसकी कमी हर पल खलती है। अब उसको जीना और भी कठिन लगने लगा है , उसका अपना तो कोई कभी भी था ही नहीं। मगर इक हमदर्द और हमराज़ तो था , जो काफी था किसी भी हालात में ज़िंदा रहने के लिये।

                    8    बदलते समय की मुहब्बत ( कहानी )            

कहानी सच्ची है केवल नाम बदले हुए हैं। शायद अभी अधूरी है कहानी। लगता है नई कहानी का भी वही पुराना अंजाम ही होगा। ललित कॉलेज में पढ़ता था कुछ साल पहले जब उसको किसी से इश्क हो गया। मिलते रहे दोनों हर शाम , जन्म जन्म तक साथ देने की बातें की आपस में। शिक्षा पूरी करने के बाद ललित ने बाज़ार में अपना गिफ्ट शॉप का कारोबार शुरू कर लिया और प्रेमिका को एक अच्छी सरकारी नौकरी मिल गई। शहर अलग अलग थे दोनों के कुछ किलोमीटर की दूरी थी। अपना कारोबार जमा लेने के बाद ललित मिला अपनी प्रेमिका से जाकर और शादी की बात की उसके साथ। सोच में पड़ गई प्रेमिका क्या करे। उसको इस बीच साथ  जॉब करने वाले सीनियर अधिकारी ने परपोज़ किया था मगर  उसने माता पिता से बात करने को कह दिया था। तब पंद्रह साल पहले सब के पास फोन नहीं था हर दिन सम्पर्क करने को। ललित की मां को जब ललित ने बताया कि उसको किसी से प्यार है तो इकलौते बेटे की खुशी को सब से अधिक महत्व देने वाली ममता भरी मां कैसे नहीं मानती। वो खुद ही चली गई थी रिश्ते की बात लेकर। सोच कर बताने को कहा गया था। सोचना क्या था , जब दोनों इक दूजे को पसंद कर चुके थे। मगर जब प्यार को दुनियादारी के तराज़ू में तोला जाता तब अंजाम यही होता है। प्रेमिका मान गई थी कि माता पिता ठीक  ही कहते हैं कि उसके लिये सरकारी जॉब वाला लड़का ही सही रहेगा। देखने में सुंदर नहीं तो क्या हुआ , और प्यार तो शादी के बाद हो ही जाता है। बीस साल की उम्र का प्यार तो नासमझी में हो जाता है। तब लड़की किसी बेल की जैसी होती है जो सहारा मिले उसी को लिपट जाती है। कोई जवाब नहीं मिला था ललित को न उसकी मां को , वो इंतज़ार करते रहे और पता चला कि उस प्रेमिका की चट मंगनी पट शादी हो गई। ललित ने कोई शिकायत नहीं की थी किसी से , मान लिया था कि प्यार में अपनी नहीं उसकी खुशी देखनी चाहिये जिसको चाहते हो। शायद उसके लिये वही ठीक होगा। मां को भी समझा लिया था कि ये बात कभी किसी को नहीं कहनी है। मां ललित के लिये लड़की , अपनी बहू की तलाश अधूरी छोड़ दुनिया को अलविदा कहने से पहले अपनी ननद को ये काम पूरा करने को कह गई थी।
        ललित को आंटी ने अपना दूसरा बेटा मान लिया था और उसका ध्यान रखने लगी , दो घर थे साथ साथ , बीच की दीवार हटा कर एक बड़ा घर बन गया। आंटी जॉब करती , अपने बेटे की शिक्षा पूरी करवाती रही और ललित को शादी करने को मनाती रही।  ललित को कोई भी पसंद ही नहीं आती थी , आंटी सेवानिवृत हो गई , उसके बेटे की शादी भी हो गई मगर ललित अभी तक कुंवारा ही था। चालीस की उम्र में उसकी पसंद की लड़की मिलना और भी कठिन हो गया। आंटी चाहती थी ललित की बहू आये उसका घर संभाल ले ताकि वो अपने बेटे और बहू के साथ दूसरे नगर में जाकर रह सके। आंटी की इक सहेली को उनकी बहू ने बताया अपनी दोस्त राधिका के बारे में जो उनके राज्य में सरकारी नौकरी करती है और जो बहुत ही सुशील है मगर उसकी शादी नहीं हो पा रही क्योंकि उसकी जन्मकुंडली ही नहीं मिलती जिस किसी को भी पसंद करती जब रिश्ते की बात होती माता पिता से। जब उसने आंटी के भतीजे ललित के बारे बताया तो उसने कहा कि लगता तो दोनों के लिए सही है हां ललित की उम्र सात साल ज़्यादा है जबकि राधिका अपनी उम्र से भी कम की नज़र आती है। उस सहेली ने राधिका की बड़ी बहन को फोन पर बताया था। वंदना अपनी बहन राधिका के लिये ललित को देखने आई थी , उसको पसंद आया था ललित बहुत , वो कुंडली भी साथ लेकर आई थी और इक फोटो भी राधिका का। पंडित जी को फोन पर सब जानकारी देकर वंदना ने कुंडली मिलवा ली थी , जो मिल गई थी। ललित को आंटी ने तैयार कर लिया था और वो गया था राधिका को देखने। दोनों दो घंटे मिले थे अकेले में और खुल कर हर बात की थी , जाने कैसे क्या हुआ कि दोनों को महसूस हुआ था कि यही तो है जिसकी मुझे तलाश है। ललित ने राधिका को कहा था कि अभी हम दोनों सब सोच लें और एक दो बार और मिलते हैं ताकि बाद में कोई बात दिल में नहीं रह जाये , राधिका मान गई थी। मिले थे दो बार , रविवार को ललित आता था मिलने घर से बाहर। कुछ ही दिन में उनको प्यार हो गया था इक दूजे से। घर पर बता दिया था दोनों ने कि हमको रिश्ता मंज़ूर है , लगा बात बन गई है , मगर जो हुआ वो हैरान करने वाला था। पिता को लगा की दूसरे राज्य के शहर विवाह किया तो बेटी की नौकरी का क्या होगा और उन्होंने ये कह दिया ललित की आंटी को कि रिश्ता केवल तभी हो सकता अगर ललित यहां आकर कारोबार करने को राज़ी हो। ये बात आंटी को बिल्कुल भी पसंद नहीं थी कि कोई लड़का ससुराल जाकर रहे।बात बीच में ही रह गई थी।
        मगर ललित को लगा कि एक बार राधिका से बात करनी चाहिये दोस्त बन कर। जब उसने राधिका से पूछा कि क्या कोई रास्ता नहीं है इस समस्या का हल निकालने का। साफ साफ बता दो आपके दिल में मेरे लिये क्या भावना है। राधिका का जवाब था कि ललित जी आपको क्या लगता है मेरे बारे पहले आप मुझे बताओ। ललित ने कहा मुझे आप बेहद पसंद हैं और मैं आपको अपना जीवनसाथी बनाना चाहता हूं। राधिका बोली थी ललित जी मुझे भी आप बहुत ही अच्छे लगते हैं और मुझे भी आपको जीवनसाथी बनाना है। सच कहूं तो मुझे लगता है मुझे प्यार हो गया है आपसे मगर समझ नहीं पा रही थी आपसे कैसे कहूं। आज लगा कि अगर नहीं कहा तो आप मुझे कभी मिल नहीं सकोगे। मुझे अपनी नौकरी की चिंता नहीं है मैं आपके लिये उसको छोड़ सकती हूं मगर अपने परिवार को कैसे समझाऊं मैं नहीं जानती। तब ललित ने कहा था राधिका जी मैं भी इन कुछ ही दिनों में आपको दिलोजान से प्यार करने लगा हूं और आपके लिये सब कुछ कर सकता हूं। मेरा कारबार दस साल पुराना है और स्थापित है फिर भी मैं अगर आप कहोगी तो उसको बंद कर आपके राज्य में किसी शहर में नया फिर से शुरू कर सकता हूं , लेकिन किसी शर्त को मान कर नहीं , आपकी ख़ुशी के लिये। मगर आपके इस शहर को छोड़कर , क्योंकि ऐसा मुझे अनुचित लगता है , आप जिस भी शहर में अपना तबादला करवा लगी मैं वहीं आपके लिये घर खरीद लूंगा। आप अपने मॉम डैड को मना लो। राधिका ने कहा कि आपकी बात सही है और अगर आप मेरे लिये ये सब करने को तैयार हैं तो मुझ से भाग्यशाली और कोई नहीं हो सकती , लेकिन आपको ऐसा करने को विवश करके मैं खुद अपनी ही नज़र में गिर जाऊंगी इसलिये ये बात मैं कभी नहीं होने दूंगी। मुझे आपसे कोई शर्त नहीं मनवानी है मॉम डैड की। शायद अब मेरे प्यार का भी इम्तिहान है और मेरा प्यार स्वार्थी नहीं है। मैं आज ही सब को बता दूंगी कि मुझे आपको छोड़ किसी से भी शादी नहीं करनी है और मुझे अपने इस राज्य में नौकरी नहीं करनी है। हम आपके शहर में दूसरी नौकरी तलाश कर लेंगे। राधिका और ललित ने तभी वंदना दीदी को ये निर्णय बता दिया था ताकि वो घर में बाकी सब को मना सके। ललित और राधिका ने तय कर लिया था कि चाहे जो भी हम दोनों अलग नहीं होंगे। हर रविवार बीच में इक शहर में मिलते रहेंगे , वही प्रेमियों का पुराना बहाना , सतसंग को जाना और प्यार से मिलना।
              ललित ने आंटी को बता दिया था कि राधिका और मैं प्यार करते हैं और हमने तय किया है कि राधिका अपनी जॉब छोड़ देगी और यहां नई जॉब ढूंढ लेंगे हम मिलकर। उधर वंदना ने जब घर पर बताया कि ललित और राधिका इक दूजे को चाहते हैं और ये भी कि राधिका अपनी नौकरी छोड़ने को तैयार है ललित की खातिर। पुरानी सोच के माता पिता ये सुन कर आग बबूला हो गये थे , उनको लगा कि बेटी उनकी मर्ज़ी के बिना शादी करने को कैसे तय कर सकती है। वो अपनी पुरानी बात पर अडिग थे कि रिश्ता तभी हो सकता है अगर ललित उनके शहर में आकर रहने को राज़ी हो। इस तरह बहुत बातें दो परिवारों में होने लगी इक दूजे को अपनी बात समझाने को। वंदना ने ललित की आंटी को कहा था कि आंटी बेशक ऐसा मुझे भी उचित नहीं प्रतीत होता तब भी अगर आप और हमारे मॉम डैड अपनी अपनी बात पर अड़े रहे तो ये दोनों चाह कर भी खुश नहीं रह सकेंगे। फोन पर ही बात हुई थी , आंटी ने कहा था कि उनका मकसद कोई ज़िद नहीं है केवल ललित और राधिका का भविष्य है। आज ललित की बहुत ही अच्छी आमदनी है , चलता हुआ पुराना कारोबार है , कल अगर नई जगह ईश्वर न करे नहीं चल पाया तो परेशानी उन्हीं को होगी। और राधिका को जॉब हम यहां भी दिलवा सकते हैं। मैं आपके मॉम डैड से बात करूंगी और उम्मीद है वो भी समझेंगे। आखिर बेटी को जाना ही होता है पति के घर , आप भी तो उनसे दूर रहती हो अपने पति के साथ। आंटी ने उसी दिन शाम को फोन किया था और राधिका के डैड को कहा था कि मेरे लिये राधिका मेरी बेटी है मैं उसको कोई परेशानी नहीं आने दूंगी , आप ये शर्त छोड़ कर मेरी झोली में डाल दो राधिका को। अब वो मेरी बेटी है। मगर राधिका के माता पिता नहीं माने थे। राधिका के पिता ने कहा था कि आप धर्म को मानने वाली महिला होने की बात करती हैं और किसी से उसकी बेटी ज़बरदस्ती छीन लेना चाहती हैं , क्या ऐसा करना आपको शोभा देता है। आंटी ने कहा था भाई साहब मैं तो दोनों बच्चों की ख़ुशी चाहती हूं तभी आपसे निवेदन किया है , विवश करने का तो सवाल ही नहीं और छीनना तो कदापि नहीं। आपसे ये मेरा वादा है कि मैं कभी आपकी मर्ज़ी के बिना राधिका की शादी ललित से नहीं करना चाहूंगी , उनको ऐसा कोई कदम उठाने को मैं नहीं कह सकती। और ललित अगर चाहे तो कहीं भी राधिका के संग रह सकता विवाह करके , मैं रोकूंगी नहीं उसको , लेकिन जब खुद राधिका ही अपनी जॉब छोड़ना चाहती है तब उसको इतनी तो आज़ादी मिलनी ही चाहिये। आप ठंडे मन से सोच कर फैसला करें यही आग्रह करती हूं।
                      बात वहीं रुक कर रह गई थी , मगर ललित और राधिका हर रविवार मिलते रहे। शायद दोनों ने इसको नियति मान लिया था कि चाह कर भी वो एक नहीं हो सकते थे। फोन पर बात होती रहती थी ये बात ललित की आंटी भी जानती थी और राधिका के मॉम डैड और बड़ी बहन वंदना भी। और इस बीच इक घटना हुई या फिर इक इतेफाक कि जब शाम को राधिका को उसकी ट्रैन पर चड़ा कर ललित बसस्टैंड पहुंचा तब बस निकल चुकी थी उसके शहर जाने वाली , और वो सड़क पर किसी अन्य वाहन की राह देख रहा था। तभी एक कार रुकी थी और उसका मालिक चाय पीने लगा था स्टॉल पर , ललित ने जाकर उनसे पूछा था , अंकल जी आपको किधर जाना है।  मेरी आखिरी बस छूट गई है और मुझे अपने अमुक शहर जाना है , क्या आप मुझे लिफ्ट दे सकते अगर उसी तरफ जाना है। और वो मान गये थे , बताया था कि उनको जिस शहर तक जाना है वहां तक चल सकते और वहां से बस चौबीस घंटे मिलती भी है। रस्ते में इक दूजे को बताया दोनों ने अपना अपना परिचय। वो इक कहानीकार हैं और ललित उनके नाम से परिचित भी था इसलिये उनसे मिलकर ख़ुशी हुई उसको। इस बीच राधिका का फोन आया था , बताने को कि वो घर पहुंच चुकी है , ललित कहां तक पहुंचा है पूछना चाहती थी।  ऐसे में नेटवर्क चला गया और बात बीच में कट गई थी , कार चला रहे व्यक्ति ने पूछा क्या आपकी पत्नी का फोन था , अगर आपके फोन का नेटवर्क नहीं है तो मेरा उपयोग कर सकते हो। नहीं , वो मेरी प्रेमिका है हमारी दोनों की शादी हुई नहीं अभी तलक , मगर शुक्रिया आपका फोन उपयोग नहीं कर सकता न ही ज़रूरत है।  उनको ललित की साफगोई अच्छी लगी थी , उन्होंने कहा था बेटे मुझे आपकी निजि ज़िंदगी से कोई मतलब नहीं है मगर इतना अवश्य समझाना चाहता हूं कि जीवन में सच्चा प्यार पाने को सब कुछ करना चाहिये। ये इसलिये कहता हूं क्योंकि मुझे भी जवानी में किसी से प्यार हुआ था लेकिन मैंने उसका इज़हार तक नहीं किया था इस डर से कि वो इनकार कर देगी। बेशक मैं खुश हूं मेरी शादी हो चुकी है , बीवी अच्छी है , बच्चे हैं जो प्यारे हैं तब भी कभी कभी सोचता हूं कि मुझे उसको न केवल बताना चाहिये था कि मुझे उस से प्यार है बल्कि हर कोशिश करनी चाहिये थी। मैं नहीं जनता मेरी प्रेम कहानी का अंजाम क्या होता , और ये बात मेरी कहानियों में भी झलकती है अक्सर। मगर तुम अपनी प्रेम कहानी को सही अंजाम तक ज़रूर ले जाना। ललित ने कहा था अंकल आपसे मिलकर बेहद अच्छा लगा है , और मैं आपकी बात याद रखूंगा। शायद कभी आप हम दोनों की प्रेम कहानी भी पाठकों तक पहुंचा दो और लोग जान सकें कि आज भी ऐसा प्यार कोई किसी को करता है। अंकल बोले थे आप दोनों बताओगे और मुझे अनुमति दोगे तो ज़रूर लिखने की कोशिश करूंगा , लेकिन ऐसा तभी हो सकता है अगर मुझे सब की हर बात की सही जानकारी हो। ललित ने कहा था कि अपनी प्रेमिका से पूछ कर बतायेगा , सम्पर्क नंबर ले लिया था , उनको दे भी दिया था।
             उन अंकल ने ही फेसबुक की बात भी की थी और बताया था कि बहुत लोग उसपर ही पहचान करते हैं दोस्त बनते हैं। मगर सावधान भी रहना सब सच नहीं होता है , आजकल झूठ बहुत है। जाने क्या सोचकर ललित ने उस दिन अपना फेसबुक अकाउंट शुरू किया था और कुछ अजनबी लोगों को दोस्त बना लिया था। उन्हीं में इक महिला भी थी आशा रानी , उनसे चैट पर बात करते ललित ने अपनी बात बता दी थी। राधिका भी चाहती है और ललित भी तो कोई दूसरा कैसे रोक सकता है आशा जी को ये समझ नहीं आया था , भाग कर शादी कर लेने की सलाह दी थी उन्होंने ललित को। ललित ने अपनी उलझन बताई थी कि अगर मेरी आंटी नहीं चाहती , राधिका के मॉम डैड नहीं चाहते , यहां तक कि जिसने ये सब शुरू किया वो राधिका की बड़ी दीदी भी नहीं पसंद करती वो कैसे सही हो सकता है।   क्या हम अपने प्यार में इतने स्वार्थी हो जायें कि बाकी सभी की भावनाओं की परवाह ही नहीं करें। ललित ने राधिका को भी फेसबुक पर आशा रानी से दोस्ती कर सलाह करने को कहा था , राधिका ने ललित की बात मान ली थी मगर ये भी विचार प्रकट कर दिया था की यूं किसी की बात को बिना समझे नहीं मानेंगे हम दोनों।  जब जो वर्षों से हमें जानते हैं वो भी नहीं समझते कि हमारी भलाई किस में है तो ऐसे फेसबुक की पहचान के लोग कुछ ही दिन में क्या समझ सकते हैं।
           राधिका की बड़ी दीदी ज्योतिष पर यकीन रखती है , उनके पंडित जी ने ललित और राधिका की जन्म पत्री देख कर बताया है कि अभी उन दोनों के दिन ठीक नहीं हैं , जल्द ही अच्छे दिन आने वाले हैं। उन्होंने कोई पूजा करने को भी कहा है और पूजा को बुलाया है वंदना दीदी ने उनको। शायद अब भगवान ही उनको राह दिखा सकता है। राधिका के कॉलेज में उसके साथ शिक्षक पद पर नियुक्त इक दोस्त ने जब देखा कि परिवार के लोग दो प्यार करने वालों को मिलने नहीं देंगे तो उसने चुपके से उनका विवाह पास के शहर में जाकर करवा दिया था। इस बीच राधिका को अचानक पेट दर्द हुआ तो पता चला उसके भीतर इक रसोली है और ऑपरेशन करना होगा , तभी राधिका की बड़ी बहन को भी पति के कहने पर राधिका से अपने देवर के साथ विवाह पिता से करनी पड़ी क्योंकि उसको नहीं मालूम था कि ललित और राधिका अदालत में शादी कर चुके हैं। अपने पति के आदेश पर छोटी बहन की शादी अपने देवर जिसकी पहली पत्नी से तलाक हो चुका था से करने को घरवालों को मना लिया था। लेकिन राधिका ने अपनी मां को वास्तविकता बता दी थी और ललित को छोड़ किसी और से विवाह नहीं करने का निर्णय बता दिया था। वास्तविकता समझ जब पिता भी मान गये और विवाह की बात तय कर दी तो विधि का विधान ऐसे हुआ कि ललित की आंटी का देहांत हो गया और समाज की परंपरा के कारण विवाह साल भर को टल गया।  कुछ महीने बाद राधिका की ललित से सामाजिक रीतिरिवाज़ से फिर शादी हो गई थी और राधिका ने अपनी नौकरी छोड़ ललित के राज्य के इक शहर में नौकरी तलाश कर ली थी। पति पत्नी दो तीन घंटे के सफर की दूरी पर रहने लगे और सप्ताह के अंत में मिलते , आजकल की महिला खुद अपने पांव पर खड़ी रहना पसंद करती है चाहे पति की आमदनी कितनी अच्छी क्यों नहीं हो। साल बाद इक बिटिया घर पर आई तो लगा हर सपना सच हो गया है। मगर फिर अलग अलग रहते हुए दूरियां बढ़ने लगी और संबंधों में दरार आने लगी। मगर कोई भी ऐसा नहीं था जो उनकी समस्या को समझता और सुलझाता। राधिका ने अपनी फेसबुक बंद कर दी थी तीन साल बाद फिर से नई फेसबुक खोली और पुराने फेसबुक दोस्त अंकल से चर्चा की और सब हालात बताये। ये भी बताया कि ललित से रिश्ता समाप्त हो चुका है और बड़ी बहन अभी भी चाहती है उसके देवर से विवाह करवाना। कहना कठिन है कि जिसको अभी समझा जा रहा है सब सुलझ गया है कब तक ठीक है। इक मासूम भोली सी मुहब्बत को जाने कितने इम्तिहान देने हैं बाकी। शुभकामना है इस बार उसका जीवन सुखी और खुशहाल रहे। ललित की नैया अभी भी मझधार में ही है। आखिर में इक बात बताना ज़रूरी है कि प्यार में कोई एक या फिर दोनों कसूरवार हों ऐसा लाज़मी नहीं होता है। उन दो मुहब्बत करने वालों में भी बेवफा कोई नहीं मगर निभाने में कमी दोनों ही से हुई है। सवाल उनसे अधिक इक नन्हीं परी का है शायद।  

                         9        सखी ( कहानी )           

सखी कहकर पुकारा था मैंने इक दिन किरन को। कुछ साल ही रहा हम दोनों का साथ। मगर मुझे मालूम था कि वो मुझसे कहीं ज़्यादा किसी और को चाहती थी वा सब से अधिक खुद को चाहती थी। खुद को चाहना बुरा भी नहीं होता है , भले कोई आपको प्यार करे न करे आप तो अपने आप से प्यार करो। मैं शायद किरन के लिये उन खिलौनो की तरह थी जिनसे वो खेला करती जब भी चाहती और जब मन भर जाये तब उनको छुपा कर अपनी अलमारी में रख देती थी। अपने खिलौनो से बहुत प्यार था किरन को , जाने क्यों उसको लगता था कोई उससे उसके खिलौने छीन लेगा। बस मुझपर विश्वास था कि मैं कभी उसके खिलौने नहीं छीन सकती , वो जानती थी मैं नहीं खेलती कभी भी खिलौनो के साथ। खिलौने क्या मुझे किसी के साथ भी खेलना पसंद नहीं था। मैं तो हमेशा खामोश रहती थी और जो भी कुछ कोई बोलता हो चुपचाप सुना करती थी। अकेले में यूं ही कुछ सोचती रहती और अपनी पसंद के गीत गुनगुनाती रहती थी। रेडियो पर रात दिन पुराने दर्द भरे गाने सुना करती और उन में खुद को महसूस किया करती थी। अक्सर किसी गीत को सुनते मेरी आंखे भर आती थी और मैं सब से छुप कर रोया करती थी। इक और पागलपन किया करती थी मैं , अपना रोता हुआ मुखड़ा दर्पण में देखती और उसको देख और भी अधिक रोना मुझे आ जाता था। मुझे याद है हॉस्टल में किरन के कमरे से बाहर निकल रही थी मैं और मेरी पसंद का गीत , दस्तक फिल्म का रेडियो पर आ गया था। हम हैं मताये कूचा ओ बाज़ार की तरह , उठती है हर निगाह खरीदार की तरह। वहीं बुत बनी खड़ी रह गई थी मैं , मेरी पलकें भर आई थी आंसुओं से , मुझे किरन ने पहली बार रोते हुए देखा था। हैरान थी , पूछने लगी क्या हुआ तुझे पगली , कुछ भी नहीं मैंने कहा था। जानती थी इक पागलपन था वो सपनों की दुनिया बना कर उसी में जीना , खो जाना। किरन जैसे कोई तितली जैसी थी , हमेशा उड़ती रहती इधर उधर , अभी यहां थी अब कहीं और पल भर में। सभी की दुलारी थी वो , बहुत प्यार करते थे सब उसको , हॉस्टल कॉलेज घर में हर जगह। मगर उसकी खुशनसीबी भी अधूरी थी , जिसको वो चाहती थी दिलोजान से वही किरन की ज़रा भी परवाह नहीं करता था। किरन को ये उसकी इक अदा लगती थी , शायद वो मान ही नहीं सकती थी कि कोई उसकी चाहत को भी ठुकरा सकता है। उसका साथ पाते वो सब को भूल जाती थी , भुला सकती थी। हम दोनों का नसीब एक सा था , मैं उसकी सखी थी , उसको अपनी सखी बनाना चाहती थी मगर उसको किसी दूसरे की सखी बनना पसंद था। कई बार मेरे मन में भी ये बात आती थी कि क्यों नहीं मैं किसी और को सहेली बना उससे घुल मिल कर रहती हूं। किया ये भी प्रयास मगर उसकी जगह किसी को नहीं रख सकी।
                     किरन की शादी की बात चल रही थी , उसको कोई लड़का पसंद ही नहीं आता था। मां बाप की लाड़ली बेटी को हमेशा मिलता जो रहा था अपनी पसंद का सभी कुछ। वो लोगों को भी कपड़ों और खिलोनो की तरह रंग और चमक देख पसंद करती थी। उसको देखने जब कभी कोई लड़का और उसका परिवार आता तो मुझे पास बुला लिया करती थी , थोड़ी दूरी पर ही तो मेरा घर। शायद मेरे होने से उसे अपने सुंदर होने का , अच्छे पहनावे का , सब से खुल कर बातचीत करने का आत्मविश्वास बढ़ जाता था। इसलिये कि मैं साधारण नज़र आने वाली हरदम चुप रहने वाली , हमेशा बहुत ही आम से कपड़े पहनने वाली लड़की थी। जाने क्या देख कर किरन को सूरज पसंद आ गया था , मैंने देखा वो शरमा रहा था किसी लड़की की तरह , उसने किरन से कोई सवाल नहीं पूछा था। जैसे सूरज हम दोनों को कनखियों से देख रहा था उससे लगता था किरन का जादू उसपर चल गया था। जब दोनों से पसंद है का सवाल किया गया और हां हो चुकी तब किरन उसको अपने कमरे में लाई थी , और सूरज को मुझसे मिलवाते हुए कहा था ये मेरी सब से प्यारी सखी है। मैं यही जाने कब से सुनना चाहती थी , वो पल मेरे लिये ऐसे था जैसे मुझे पूरी दुनिया ही मिल गई है। मैंने उसको भावावेश में गले लगा लिया था और चूम कर बोली थी मेरी जान हो मेरी सखी , दुआ करती तुम यूं ही खुश रहना। किरन का परिवार इस बात को लेकर खुश था कि उनकी लाड़ली यहीं इसी शहर में रहेगी , सूरज की नौकरी यहीं लगी थी। मुझे भी ख़ुशी थी कि मैं जब भी चाहूंगी मिल सकूंगी उससे। किरन और मैं हमेशा हर नई फिल्म इक साथ देखते थे , किरन की सगाई के बाद आनन्द फिल्म रिजीज़ हुई थी वा मैंने उसको सूरज के साथ प्रोग्राम बनाने को कहा था , उसने मुझे तीन टिकट मंगवा लेने को कहा था , और सूरज को साथ लाने की बात की थी। किरन को घर से अनुमति मिल गई थी सूरज और मेरे साथ सिनेमा जाने की। जाने क्यों किरन के होने वाले दूल्हे के साथ फिल्म देखने को लेकर मैं बेहद उत्साहित थी , मैं खुद जाकर तीन टिकेट एडवांस बुकिंग से ले आई थी। किरन की बात फोन पर सूरज से हो गई थी , सिनेमा हाल पहुंच कर किरन ने बताया था कि उनके पास बॉक्स की टिकट हैं और वो दोनों अकेले बैठ कर उसमें फिल्म देखना चाहते हैं। मैं अलग अकेली ड्रेस सर्कल में बैठ देख लूं , और बाकी दोनों टिकट किसी को बेच दूं। शायद मुझे खुद समझना चाहिये था कि मुझे कवाब में हड्डी नहीं बनना चाहिये। मगर मैं उसकी बात से बहुत नाराज़ हो गई थी और जब वो दोनों अंदर चले गये थे तब मैंने वो तीनों टिकट फाड़ कर फैंक दी थी। दूसरे दिन मैंने किरन से अपनी नाराज़गी जता भी दी थी , उसको इतना ही बोली थी कि जब तुमको अलग बैठ कर फिल्म देखनी थी तो मुझे नहीं बुलाना चाहिये था। वो जान गई थी मैं बिना फिल्म देखे ही लौट आई हूं। किरन ने कहा था कि सच में ये फिल्म तो दोस्त बनाने के विषय पर है और ये उसको सूरज के साथ नहीं मेरे साथ ही देखनी चाहिये थी। उसने मुझसे वादा किया था मुझे खुद साथ ले जा कर आनन्द फिल्म दिखायेगी , मगर हमेशा की तरह वो भूल गई थी मुझसे किया हुआ वादा। मैंने कई साल तक वो फिल्म नहीं देखी थी , जब टीवी पर घर में अकेले बैठ सालों बाद देखी तब आनंद से खुद को मिला कर सोचती रही , लेकिन मेरी किस्मत में कोई बाबू-मोशाय जैसा दोस्त कहां था।
               किरन की शादी हो गई थी , वह बहुत खुश थी। अपने मायके वाले घर जब भी आती , मुझे झट बुला पास लिया करती। मुझे हर बार अपने घर आने को कहती थी , मगर मुझे संकोच होता था बिना कारण कैसे जाऊं। एक दिन अपनी कसम दे गई थी कि ज़रूर उसका घर देखने आऊं। जब किरन ने पूछा कब आओगी तब मैंने यूं ही सरप्राइज देने की बात कह दी थी। और एक दिन यही सोच किरन के घर चली गई थी उसकी ख़ुशी की खातिर। बैल देने पर दरवाज़ा सूरज ने खोला था , आओ अंदर आओ कहकर मुझे घर में प्रवेश करवाया था।  मैंने किरन को बुलाने को कहा था तो सूरज ने बताया कि वो घर के बाकी लोगों के साथ बाज़ार तक गई है आती ही होगी। मैं उठ कर वापस जाने लगी तो सूरज ने रोक लिया था ये बोलकर कि पहली बार आई हैं अपनी सखी के घर बिना कुछ लिये नहीं जा सकती। मैंने कहा था दोबारा फिर आउंगी , तो सूरज ने कहा की आप कोल्ड ड्रिंक पियें इतने में शायद आ ही जाये किरन। मुझे कोल्ड ड्रिंक देकर सूरज अपनी और किरन की शादी की एलबम्ब दिखाने का बहाना बना मेरे करीब आकर बैठ गया था। उसने बार बार मुझे जानबूझकर छूने का प्रयास किया था तो मुझे डर लगने लगा था , मेरी धड़कने बढ़ गई थी और मैं भाग जाना चाहती थी। उठ कर चलने लगी तो सूरज ने मेरा हाथ पकड़ लिया था। उसकी आंखो में वासना देख मैं घबरा गई थी , मगर जाने कैसे साहस कर सूरज को बोली थी आपको ऐसा सोचते हुए भी शर्म आनी चाहिये थी , आपकी बीवी की सहेली आपके लिये बहन जैसी होनी चाहिये। और अपना हाथ छुड़ा बाहर चली गई थी। ये मेरे साथ कभी नहीं हुआ था , मेरा बदन गुस्से से कांप रहा था व ये बात मैं किसी को नहीं बता सकती थी , किरन को बता कर पति पत्नी के नये नये रिश्ते में दरार नहीं डाल सकती थी। मुझे किरन पर गुस्सा आ रहा था कि क्यों मुझे अपनी कसम दी थी बुलाने को , जबकि इसमें उसका कोई दोष नहीं था। दूसरे दिन किरन अपने मायके वाले घर आई हुई थी , मुझे संदेशा भेजा था आने को , इनकार कर दिया था मैंने। कुछ ही देर में वो खुद चली आई थी , मस्ती के मुड़ में थी , उसको नहीं बताया था सूरज ने कि मैं उसको मिलने गई थी उसके घर। मुझे तब लगा किरन को उसके पति की उस हरकत के बारे बताना ही चाहिये , और मैंने उसको सब बता दिया था। बेचैन सी हो गई थी किरन और उसका चेहरा तमतमाया हुआ था , अचानक उसको जाने क्या हुआ कि उसने मुझे कई थपड़ जड़ दिये थे , और बुरा भला कह कर चली गई थी। मैं सन्न रह गई थी , समझ नहीं पा रही थी कि उसको बताना सही था या गल्त। मगर ये सोच लिया था अब कभी मिलना नहीं होगा किरन से ज़िंदगी भर।
              लेकिन अगले ही दिन जब मुझे किरन के नर्वस ब्रेकडाउन होने और अस्पताल में दाखिल होने का पता चला तब मैं खुद को रोक नहीं पाई थी। मुझे देखते ही मुझसे लिपट कर फूट फूट कर रोते हुए अपनी गलती की माफी मांगने लगी , मुझे बिना बात थपड़ मारने की और शायद अपने पति की गलती की भी। मेरे मुंह से अचानक निकल गया था सब भूल जाओ तुम , छोड़ो उस के लिये खुद को दोषी न समझो। जब मैं निकल रही थी कमरे से तब सूरज आया था मेरे पास और बोला था आई एम वेरी सॉरी , मुझसे अपराध बहुत बड़ा हुआ है फिर भी मुझे कर सको तो अपनी प्यारी सखी के लिये माफ कर देना। मुझे कुछ भी कहना ज़रूरी नहीं लगा था। बहुत दिन तक उस एक घटना ने मुझे बेचैन रखा था , लाख कोशिश करके भी उसे भुला नहीं पा रही थी। मुझे दूर अपने शहर से महानगर में जॉब मिली तो शायद इस सब से बचने के लिये मैंने नौकरी कर ली थी। कुछ दिन में मैंने खुद को संभाल लिया था , अपने काम में रात दिन जुटी रहती थी। मुझे पहले भी तनहाई पसंद थी और उस एक घटना के बाद तो किसी से जान पहचान बढ़ाना अच्छा नहीं लगता था। मगर समय के साथ मैं परिपक्व होती गई थी और अब सब से बेझिझक बात कर सकती थी। वो भय मिट गया था कि कोई मुझसे बदतमीज़ी कर सकता है।
      कई सालों बाद अचानक एक दिन मुझे पत्र मिला अपनी सखी किरन का। सूरज को यहां सुपर स्पेशलिस्ट को दिखाना था , मुझे अस्पताल से डॉक्टर की अपॉइंटमेंट लेनी थी और किरन को सूचित करना था। फिर एक बार मुझे पुरानी घटना याद आ गई थी जिससे मेरी दिमाग की नसें तनाव महसूस कर रही थी। मगर किरन को मैं मना नहीं कर सकती थी कभी भी , अब जब वो किसी परेशानी में थी तब तो हर हाल में उसका साथ देना ज़रूरी था। डॉक्टर से समय लेकर सूचित कर दिया था मैंने। किरन और सूरज अपने दो बच्चों को लेकर जब आये थे तब लगा जैसे वो सब भुला चुके हैं , मुझे भी यही करना था तभी साथ रह सकते थे इक परिवार की तरह। उनको अपने दो कमरों के छोटे से घर में रखना थोड़ा मुश्किल तो था मगर सब समझते थे वक़्त की नज़ाकत को। सदा की तरह किरन जो भी मुझसे चाहिये पूरे अधिकार पूर्वक लेती थी , ये भी बातों बातों में बता दिया था कि सूरज की बिमारी पर बहुत पैसा खर्च होने से वो आर्थिक तंगी में है। ऐसे में उनसे स्वाभाविक ही मुझे सहानुभूति हो गई थी। मैंने किरन को कह दिया था कि मेरे पास जो भी राशि जमा है वो जब भी चाहे ले सकती है। कई महीने तक सूरज का ईलाज चलता रहा और जितना भी मुमकिन था मैं खुद ही अस्पताल और दवाओं का खर्च करती रही , लेकिन सूरज की दशा में कोई सुधार नहीं हो सका था। डाक्टरों ने सूरज के दोनों गुर्दे खराब होने की बात बताई थी और किसी अपने को सूरज को अपना एक गुर्दा देकर उसकी जान बचाने की सलाह दी थी। सूरज के परिवार के लोग अलग अलग रहते थे और कोई भी गुर्दा देने को तैयार नहीं हुआ था। किरन चाहती थी किसी भी तरह अपने पति की जान को बचाना मगर उसका गुर्दा सूरज से मैच नहीं हो सकता था। जाने क्यों मैंने अपना गुर्दा देने पर विचार ही नहीं किया था , मुझे ये सोच कर ही अजीब लगा था कि मैं अपने शरीर का कोई अंग उसको दे दूं जिसने मुझे बुरी भावना से छुआ था।
              किरन की उम्मीद टूट रही थी हर दिन , मुझे उसका बुझा बुझा सा चेहरा देख कर घबराहट होने लगती थी , सूरज अस्पताल में दाखिल था , बच्चों को दादा दादी ले गये थे।  मैं और किरन अकेली थी घर में। किरन ने तब मुझे अपने गुज़रे हुए जीवन के बारे बहुत बातें बताई थी। कैसे सब अपनों के होते भी वो अकेली थी। अब भी उसको भरोसा था केवल बचपन की इस सखी पर तभी सूरज को लेकर मेरे पास आई थी। मैंने तभी निर्णय ले लिया था कि अपनी सखी को निराश नहीं होने दूंगी , और अगले ही दिन डॉक्टर से बात कर मैंने अपने सभी टेस्ट करवा लिये थे। सूरज को मेरा गुर्दा मैच कर गया था , हम दोनों का सफल ऑपरेशन हो गया और सूरज को डॉक्टर्स ने पूरी तरह सवस्थ घोषित कर दिया था। कुछ दिन आराम करने के बाद जब वापस जाने लगे तब किरन और सूरज दोनों की आंखों में आंसू छलक आये थे , सूरज की पलकों से पश्चाताप के आंसू और किरन की आंखों से कृतिज्ञता के। मेरी भी आंखें भर आई थी सखी भाव से। जाते जाते सूरज ने कहा था कि क्या मुझे अपना भाई समझ सकती हैं , मैं आपको दीदी बुला सकता हूं। मैंने भी मन से इस पवित्र रिश्ते को स्वीकार कर लिया था और अब मुझे जल्द ही अपनी सखी ही नहीं अपने भाई के घर भी जाना है।

                   10     रसीली ( कहानी इक वेश्या की ) 

             रसीली मर गई भूख से , जाने कितने दिन से भूखी थी रसीली। कोई नहीं जान सका कि वो किस तरह तड़प तड़प कर अपने छोटे से घर में मरी होगी अकेली। उसके मरने के बाद बस्ती के लोगों , कॉलोनी के धनवान लोगों , जो खुद को बड़ा दयालू समझते हैं , और पुलिस वालों ने देखा कि रसीली के घर अनाज का एक दाना तक नहीं था। उसके पर्स में इक पैसा तक नहीं मिला , खाली था। बस्ती वालों ने बताया कई दिन से उसके घर का चूल्हा जलता बहुत कम ही दिखाई दिया था। जब से उसके साथी कमाल , जो हमेशा उसके साथ रहा , का निधन हुआ , तब से रसीली के पास  उसके खरीदार कम ही नज़र आने लगे थे। रसीली की वो खनकती आवाज़ और कहकहों वाली हंसी सुनाई दी ही नहीं कमाल की मौत के बाद।  जाने ये कैसा रिश्ता था उनके बीच , कोई नाम नहीं था उनके नाते का। सारी रौनकें खत्म हो गई थी कमाल के जाने से और एक ख़ामोशी सी छा गई थी रसीली के घर में। रसीली हरदम गुमसुम सी रहने लगी थी , कहीं भी आती जाती नहीं थी , गली से गुज़रती तो लगता कोई लाश चली जा रही है। जाने कैसे अपने ही ख्यालों में खोई रहती थी , मगर तब भी उसकी आंखों में वही चमक थी , कुछ कहना चाहती थी दुनिया से रसीली की नज़रें। अब समझ सकता हूं  उन आँखों में कैसा दर्द था क्या संदेश था , वो बताना ज़रूरी हो गया है मेरे लिये। रसीली भले जिस्म फरोश थी , मगर उसके जीवन में कमाल को छोड़ कोई दूसरा कभी नहीं आ सका था। किसी को साथी बनाना तो क्या अपने पास तक नहीं आने दिया उनको जो चाहते थे उसके प्यार बेचने के कारोबार में सहयोगी बनना। रसीली की ज़िंदगी में कमाल की जगह दूसरा कोई ले भी नहीं सकता था , कोई नहीं समझ सकता था कि रसीली वैश्या का कारोबार करने वाली बाकी औरतों जैसी नहीं थी। वो तो सब को हमेशा खुशियां बांटती रहती थी , प्यार  देती थी बेशुमार जो किसी की प्यास बुझा देता था। कमाल के बाद खरीदार  आते भी कैसे , बिना दलाल के  मिलते कहां हैं , जो भी बस्ती में आता जिस्म बेचने वाली बाकी औरतों के दलाल खड़े रहते थे पटाने को।
                            शहर की सब से पॉश कॉलोनी के ठीक सामने ये बदनाम बस्ती कॉलोनी के आबाद होने से भी पहले की बसी हुई है। खाली सरकारी भूमि पर अपना सर छुपाने को अपने हाथों से बनाये थे अपने अपने घर रसीली जैसी औरतों ने। कब्ज़ा कर बनाई ये बस्ती बदनाम है अवैध कामों के लिये , कॉलोनी वालों ने कितनी बार जतन  किया बस्ती को हटवाने का मगर सफल नहीं हो सके। ये माना जाता है कि जब भी बस्ती को हटाने की कोशिश होती , वैश्यावृति करने वाली औरतें इसको बचा लेती , नेता , अफ्सर , पुलिस वालों का बिस्तर गर्म करके। हर दिन इक दूजे से लड़ने झगड़ने वाली सब इक साथ खड़ी हो जाती ऐसे में। पापी पेट का सवाल जो आ जाता था , मगर तब भी रसीली अपनी ज़िद पर कायम रहती थी , किसी की रातें रंगीन करने कभी किसी के घर , होटल या फार्म हॉउस नहीं जाती थी। उसका कहना था जिसको उसकी ज़रूरत है वो बेझिझक चला आये उसके घर का दरवाज़ा खुला रहता है सब के लिये। जिसको डर लगता हो , शर्म आती हो , या जिसको ये बुरा काम लगता हो वो रहे अपने घर में। रसीली जो भी करती थी उसको उसमें कोई झिझक नहीं थी , कोई ग्लानि या अपराधबोध नहीं था। अपना बदन है जो चाहे करे किसी को कोई ज़बरदस्ती थोड़ा बुलाती है। वो ये गीत हमेशा गुनगुनाया करती थी "प्यार बांटते चलो -प्यार बांटते चलो।
                                      रसीली और कमाल ने ज़िंदगी में इतनी ठोकरें खाई थी कि अब उनको किसी भी मुसीबत से कोई डर नहीं लगता था , उन्होंने कभी भी ये चिंता नहीं की कि अगर बस्ती उजड़ गई तो क्या होगा उनका। जब दूसरे बस्ती वाले घबरा रहे होते थे तब भी रसीली सब को हौसला देती , खिलखिला कर मस्ती भरी बातें किया करती। जिंदादिल थी रसीली। सब से प्यार और अपनेपन से बात करती थी वो। कुछ सालों से वो बिमार सी , मुरझाई सी लगती थी , तब भी उसके घर रौनकें लगी रहती , ठहाकों की आवाज़ गूंजती रहती। कमाल दिन भर उसके लिये खरीदार  ढूंढ कर लाता रहता , वो बहुत आसानी से पहचान लेता था कि कौन अपनी हवस मिटाना चाहता है और उससे बात कर ले आता था रसीली के घर। जो एक बार रसीली के घर आता वो बार बार आता ही रहता ,रसीली की बातों उसके अपनेपन में कोई बाज़ारूपन नहीं होता था। बस्ती की बाकी औरतें अपने पास आने वालों से अखड़पन से बात किया करती थी और जैसे भी हो अधिक पैसा छीन लेना चाहती थी , मगर रसीली को ये पसंद नहीं था। उसने जिस्म भी बेचा मगर पूरी ईमानदारी से। उसका व्यवहार अपने खरीदार  से ऐसा रहता जैसा कोई महमान आया हो उसके घर। ये रसीली के घर ही हो सकता था कि जो भी आया हो उसको कमाल साथ शराब का जाम पेश करता अगर पीता हो और जब खुद खाना खाती तब रसीली महमान  को भी अपने हाथ से बना कर रोटी खिलाती। वहां वैश्या के घर जैसा माहौल नहीं था , ये हिसाब नहीं लगाती थी रसीली कि किसने क्या दिया क्या नहीं। धंधा अपनी जगह और घर आये लोगों से व्यवहार अपनी जगह। आने वालों को वो वैश्या का कोठा नहीं कोई घर लगता था जिसमें उन दो को छोड़ रोज़ नये सदस्य होते थे।  बस्ती वाली कई औरतों ने कमाल पर डोरे डालने का जतन  भी किया कई बार उसको अपना दलाल बनाने को मगर उसकी ज़िंदगी में रसीली के सिवा किसी के लिये भी कोई जगह नहीं थी। बस्ती की बाकी औरतों का साथ देना तो दूर की बात , उनसे बात तक करना जुर्म था कमाल के लिये। रसीली को जब पता चलता किसी ने उसके कमाल पर डोरे डालने का जतन  किया तो वो अपना सवभाव बदल कर चंडी का रूप बन जाती थी। सालों आमने सामने रहते बस्ती वाले और कॉलोनी वाले इक दूजे को अच्छी तरह पहचानते थे। बस्ती वाले कॉलोनी वालों को आते जाते सलाम साहब सलाम मेम साहिब कहते रहते मगर उनके कार्यों को जान कॉलोनी वाले उनसे नफरत करते थे। फिर भी जब कोई मेहनत मज़दूरी का काम होता तब बस्ती वाले कभी इनकार नहीं करते थे , मांगते तक नहीं थे अपनी मज़दूरी , जो कोई दे देता चुपचाप रख लेते। आज सोचता हूँ जिन बस्ती वालों का नाम तक नहीं जानते थे उनसे कॉलोनी वाले किसलिये नफरत करते थे।  कुछ भी बुरा उनके साथ नहीं किया था कभी बस्ती वालों ने। कितनी अजीब बात है कि कॉलोनी में बहुत लोग ऐसे रहते थे जो किसी को धोखा देने , अन्याय करने , अपने से कमज़ोर का अधिकार छीनने जैसे अनैतिक काम करते थे तब भी उनसे कोई नफरत का व्यवहार नहीं करता था। वैश्या तो जिस्म बेचती है ये लोग तो दीन ईमान तक बेचते हैं , क्या ये कम बुरे हैं। जैसे अपराधों का कॉलोनी वालों को भय था वो बस्ती वालों ने कभी किया ही नहीं था। खुद को सभ्य और उनको असभ्य मान कुछ लोगों ने बस्ती वालों को उन अपराधों की भी सज़ा दी जो किया ही नहीं था बस्ती में रहने वालों ने। आज अगर पुलिस का अधिकारी आकर कॉलोनी वालों से इस बारे बात न करता और रसीली के परिवार का सदस्य रसीली की ज़िंदगी की उसकी खुद की प्रेम कहानी सब को नहीं बताता तो किसी को पता ही नहीं चलता रसीली के जीवन की सच्चाई। रसीली ने जब कमाल की मौत की खबर उसके घर वालों को भेजी थी तब उसको नहीं पता था वो रसीली के साथ ऐसा भी करेंगे। कमाल के परिवार वाले आये थे , उसकी लाश को कैंटर में डाल कर ले गये थे। रसीली रोई थी गिड़गिड़ाई थी मगर उसको साथ नहीं जाने दिया था। तुम उसकी विवाहिता पत्नी नहीं हो , तुम्हारा न उसके साथ कोई रिश्ता है न ही हमारे साथ। दुनिया वाले कभी नहीं समझ सकते उनके बीच क्या रिश्ता था और कितना गहरा था। कमाल की मौत के बाद रसीली वो रसीली नहीं रह गई थी , पूरी तरह टूट गई थी बिखर गई थी। अकेली पड़ गई थी ,  और ऐसे बहुत समय जी नहीं सकती थी। अब सोचता हूँ जब भी वो सामने से गुज़रती थी उसकी आंखे क्या कहना चाहती थी सब लोगों से। हमने ये महसूस किया था कि कुछ बोलना चाहती हैं दो आंखें , मगर हमें वो भाषा समझना नहीं आता था और रसीली को वही भाषा ही आती थी। हम यूं कहने को इंसानियत के धर्म की बातें करते हैं मगर क्या कभी जाकर जाना है किसी का दुःख दर्द , पूछा किसी से कभी हाल उसका। बस्ती में जो रहते वो भी हैं तो इंसान ही ,  उनका उनकी मज़बूरी उनकी परेशानी किसी कॉलोनी वाले ने जानी , समझी। इसी कॉलोनी में रहते हैं वो भी जो समाज सेवक होने का दम  भरते हैं ,  कई महिलायें हैं जो महिला शक्ति और महिला उद्धार की बात किया करती हैं। उनको सब मालूम था उनके सामने की इस दलदल के बारे में , नहीं किया किसी ने जतन  उनको इस दलदल से बाहर निकालने का। कॉलोनी वाले बचा हुआ खाना जानवरों को खिलाते हैं पुण्य समझ , कूड़ेदान में भी फैक देते हैं पर इन बस्ती वालों का पेट भरने को नहीं देते। कहते हैं ये गंदे हैं इनको पास नहीं रहने देना , एक बार दिया तो बार बार चले आयेंगे। ऐसे लोग क्या कभी समझ सकते हैं कि  कैसे अपना और अपने अपाहिज साथी कमाल का पेट भरने को रसीली ने अपना बदन वासना के भूखे भेड़ियों के सामने परोसा होगा। कितना दर्द  कितनी पीड़ा झेल विवश होकर।
           पुलिस वालों ने हम सबको ये बताया कि आपके सामने बस्ती में रहने वाली रसीली नाम की औरत की मौत दो दिन पहले ही हो चुकी है और कोई नहीं है जो उसकी लाश को ले कर अंतिम संस्कार कर सकता हो। दो दिन पहले बस्ती में रहने वालों ने रसीली के परिवार को और कमाल के घर वालों को फोन पर बताया तो जवाब मिला था उनका रसीली से कोई नाता नहीं रहा है , वो कब की मर चुकी है उनके लिये। आज जब बदबू होने लगी तब बस्ती वालों ने पुलिस थाने रपट दर्ज करवाई है कि कोई शव सड़ रहा दो दिन से बिना किसी देखभाल के। अब पुलिस को ही उसको लावारिस घोषित कर सब करना होगा , मगर उसके लिये आपको रसीली की पहचान कर कुछ कागज़ी करवाई में सहयोग देना होगा। पुलिस वाले सुन कर हैरान रह गये थे कि जो कब से उनके घरों के सामने रहती थी किसी कॉलोनी वाले को उसका नाम भी मालूम नहीं था। जानते भी कैसे जब वो उनसे बात करना तक पसंद नहीं करते थे। बस्ती वालों ने बताया था एक रिश्तेदार रहता है जो मिलने आता है कभी कभी रसीली से जब कोई मतलब होता है। पुलिस वाले खोज लाये थे उसको मगर उसने भी इनकार कर दिया रिश्ता निभाने से। हमने उसको कहा था कि जो भी बात रही हो वो तुम्हारी अपनी थी , मरने के बाद तो सब भूल कर उसका अंतिम संस्कार कर दो , हम तुम्हें आर्थिक मदद देने को तैयार हैं। हमारी बातों ने उसको विवश कर दिया था रसीली की ज़िंदगी की पूरी दास्तां सुनाने के लिये। बात कई साल पुरानी है।

               वो रसीली ही थी , प्यार के रस से लबालब भरी हुई।  अपना नाम सार्थक करती थी , हमेशा हर किसी से मीठी मीठी बातें करना हंसना खिलखिलाना बचपन से सवभाव था उसका। घर का छोटा बड़ा सदस्य हो , आस पास का कोई चाहे राह से गुज़रता कोई अनजान अजनबी सब से बिना झिझक बात करना हसी मज़ाक करना आदत थी रसीली की। सब का मन मोह लिया करती अपने भोले चेहरे निश्छल व्यवहार और सब के काम में साथ देने से। उसको नहीं पता चला कि कब उसने बचपन से किशोर अवस्था में और फिर जवानी में कदम रखा था। वो अभी भी वैसी ही थी , झूम कर किसी को गले लगा लेना , घुल मिल जाना सभी से बचपन जैसा ही था। घर के लोग चाहते थे उसको समझाना कि वो बच्ची नहीं रही अब और उसको अपने बराबर के युवा लड़कों से थोड़ा दूरी रखनी चाहिये। रसीली नहीं समझ पाई थी कि अपने बचपन के दोस्तों से प्यार से मिलने , बात करने में बुराई क्या है। कोई उसको बिंदास कहता कोई नासमझ कोई बदचलन , मगर रसीली को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था। वो मानती थी कि जब वो कुछ भी गलत नहीं करती तो कोई क्या सोचता है इससे क्या मतलब। रसीली की सहेलियां भी कहती थी उसको , तुझे लड़कों के साथ अकेले कहीं भी आने जाने में क्या डर नहीं लगता है। वो कहती मेरे अपने दोस्त ही तो हैं भला उनसे किस बात का डर। और तब उस अल्हड़पन की बाली उम्र में ही रसीली कब अपना दिल कमाल को दे बैठी उसको भी पता नहीं चला। एक हरदम खामोश रहने वाला अपने में मस्त खोया रहने वाला कमाल उसके दिल और दिमाग पर छा गया कुछ ही दिन की मुलाकातों में जाने कैसे। कुछ दिन छुट्टियां बिताने आया था पास किसी रिश्तेदार के घर में। जब कमाल को वापस जाना था अपने शहर को तब वो नई दोस्त बनी रसीली को मिलने आया था , बहुत उदास था। रसीली ने कहा था फिर कब आओगे कमाल यहां। वो बेहद निराशा भरे स्वर में बोला था , उसको नहीं मालूम कि अब कभी आ सकेगा भी या नहीं। उसकी इस बात से रसीली को जाने ऐसा क्या हुआ था जो उसने कह दिया था कमाल अगर तुम नहीं आओगे तो मैं जी नहीं सकूंगी तुम्हारे बिना अधिक दिनों तक , मर ही जाऊंगी। और फिर जो कुछ घटा वो कोई सपना ही था , कमाल का रसीली से शादी करने का वादा और रसीली का घर को छोड़ कमाल के साथ जाना उसके शहर में उसके घर।
                                    रसीली को अपने साथ लेकर जब कमाल अपने घर पहुंचा तब वहां हंगामा खड़ा हो गया , जैसे कोई भूचाल आ गया हो। एक चुपचाप हर बात पर जी हां कहने वाले बेटे से ऐसी अपेक्षा नहीं थी परिवार वालों को सपने में भी। कमाल को आदेश दिया गया कि रसीली को लेजाकर उसके घर छोड़ आये। लेकिन कमाल ने अपना घर ही छोड़ दिया था और रसीली का हाथ थाम इक कसम खाई थी कि अब चाहे सारा ज़माना सारी खुदाई भी उन दोनों के खिलाफ हो जाये वो हमेशा इक साथ ही रहेंगे। उन्होंने तय कर लिया था कि अब प्यार ही उनके लिए सब कुछ है , प्यार में जीना प्यार में मरना भी मंज़ूर है। बेशक लोग उनसे नफरत करें वो सब को प्यार का ही सबक सिखायेंगे उम्र भर। शायद किताबों कहानियों की तरह लोग भी बदल जायेंगे और उनसे प्यार करने लगेंगे। मगर किताबों और कहानियों केकिरदार  बदल जाते हैं वास्तविक जीवन में अक्सर ऐसा नहीं होता है। उन दोनों के लिये और विशेषकर रसीली के लिये अपनों की नफरत उसकी मौत भी कम नहीं कर सकी। रसीली को जब कमाल के घर में जगह नहीं मिली तब उसने प्रयास किया था अपने घर वालों से सहारा मिल जाये। रसीली ने अपनी इक सहेली को फोन किया था ताकि वो उसके परिवार वालों से पूछ सके कि अगर वो कमाल को लेकर आये वहां तो क्या उनको सवीकार करेंगे पति पत्नी के रूप में। शाम को सहेली ने बताया था कि जब वो रसीली के घर गई थी तब वो बातें कर रहे थे उन दोनों को तलाश करने और जान से मरने की। इसलिये उसने उनको ये पूछना ही उचित नहीं समझा और यही बताया कि वह तो रसीली से मिलने को आई थी और उसको रसीली की कोई जानकारी नहीं है। सहेली ने समझाया था तुम दोनों कहीं दूर चले जाओ और अपनी दुनिया वहां बसा लो जहां ये ज़ालिम नफरत करने वाले नहीं हों। रसीली और कमाल जैसे सपनों के आकाश से गिर कर दुनिया की पत्थरीली ज़मीन पर आ गये थे और उनको समझ नहीं आ रहा था प्यार करके ऐसा क्या गुनाह किया है उन लोगों ने। पूरा का पूरा समाज ही उनका दुश्मन क्यों बन गया है , क्या कोई जगह नहीं जहां प्यार करने वालों को शरण मिल सके। भटकते रहे बहुत दिन तक इधर उधर मगर नहीं मिली कोई भी जगह उनको रहने को। प्यार करने वाले दिल ज़िंदगी की जंग लड़ते रहे और दो वक़्त पेट भरना भी कठिन हो गया। न रहने को ठिकाना न पास कुछ भी पैसे , उस पर जहां किसी से सहायता मांगते , काम मांगते और कोई ठिकाना , हर जगह शिकारी वहशी दरिंदे ही मिलते। ये देख बहुत घबरा गये दोनों प्रेमी , मगर इक ज़िद ने ज़िंदा रखा कि अपने लिये नहीं अब साथी के लिये जीना है। ज़िंदगी की कशमकश में वे इक दूजे को प्यार करना तो भूल ही गये थे और बात बात पर आपस में उलझने लगे थे। ऐसे में हवस के भूखे भेड़ियों ने उनकी मज़बूरियों का फायदा उठा कर उनको अपनी राह पर चलने को विवश कर दिया था। बहुत जल्द इक प्रेम कहानी पाप कथा बन गई थी। समाज के एक शरीफ कहलाने वाले धनवान व्यक्ति  ने उनको दया करने का झांसा देकर ऐसा फंसाया कि उनको ऐसी बदनाम गलियों में पहुंचा दिया जहां से निकलने की कोई राह ही नहीं होती है। हर दिन पल पल ज़िंदगी की लड़ाई लड़ते लड़ते दोनों तंग आ गये थे और हार मान ली थी , अपने हालत को नियति स्वीकार कर लिया था। और ऐसे में वो दोनों नशे का शिकार हो गये थे। इक समाजसेवक ने शरण देकर उनका शोषण किया बहुत दिन तक , कमाल को कहीं अन्य जगह भेज काम से रसीली के साथ वो खुद और उसके साथी मिल कई दिन तक अनाचार करते रहे , जब ये सब कमाल ने देखा और विरोध किया तो उसको सज़ा दी गई अपाहिज बनाने की , उसको नपुंसक बना दिया गया। ऐसे इक प्रेमी अपनी ही प्रेमिका का सौदा करने वाला इक दलाल बना दिया गया। उनको इक बदनाम बस्ती में पहुंचा दिया कुछ शरीफ कहलाने वाले लोगों ने।
                          रसीली कभी भी बस्ती की बाकी औरतों जैसी नहीं बन पाई , उसका सवभाव तब भी सनेहपूर्ण ही रहा अपने पास आने वालों से प्रेम और अपनेपन से बातें करते उसके पास अपनी हवस मिटाने आये ग्राहक भी उसको चाहने लगते थे। उनको रसीली का जिस्म ही नहीं मिलता था और भी बहुत कुछ मिलता था जो बस्ती की दूसरी किसी औरत से नहीं मिलता था। एक पूरी तहर खुद को समर्पित करने वाली औरत जो उनसे उनके दुःख और परेशानियां भी जानना चाहती थी दोस्त  बन कर और उनसे सहानुभूति भी रखती थी। ऐसे में वो लोग भी रसीली के पास आकर रहने लगे जिनके पास उसको देने को पैसे नहीं भी होते थे। जीवन से निराश लोगों को अपनाना रसीली और कमाल की आदत बन गई थी , खाली पेट आते कई लोग तब उनको रसीली खुद खाना बना कर खिलाती थी और उनकी प्यास भी बुझाती थी , जिस बस्ती में सब कुछ पैसा हो वहां रसीली यूं रहती थी जैसे पैसे की कोई अहमियत ही नहीं हो। पैसा न होने से किसी को ठुकराया नहीं कभी रसीली ने , रसीली से सब को प्यार ही नहीं मीठे बोल भी मिलते थे और खाने को रोटी के साथ देसी शराब भी। जाने कितने लोग जिनको अपनों ने ठुकरा दिया था उनको रसीली की हमदर्दी ने फिर से जीना सीखा दिया था। प्यार रसीली के अंग अंग में उसके रोम रोम में बेशुमार भरा हुआ था।  हालात ने उसको वैश्या का नाम भले दे दिया था तब भी जिस्म बेचने वाली औरतों की तरह उसने पैसे को अपना सब कुछ नहीं समझा था। सब के प्यार की प्यास मिटा कर अपने और अपने साथी कमाल की पेट की भूख और बाकी ज़रूरतें पूरी करने का काम रसीली ने ऐसे किया उम्र भर जैसे कोई पूजा करता है , इबादत करता हो। वासना का कारोबार नहीं सीखा कभी भी रसीली ने , कमाल और रसीली ने कभी दुनिया वालों से कोई शिकायत नहीं की थी। मगर जब दोनों अकेले होते अपने घर में तब पूछा करते भगवान से ये सवाल कि उनको प्यार करने की ऐसी सज़ा क्यों मिली है। क्यों खुदा अपनी दुनिया में प्यार करने वालों की भी इक दुनिया बनाना भूल गया था।
      पिछले दो दिन से बस्ती गुमसुम सी है , सन्नाटा सा छाया हुआ है बस्ती में। जो बस्ती की औरतें ईर्ष्या किया करती थी रसीली से उनकी भी आंखे नम हैं चेहरे उदास हैं और घर में ग़म की गहरी छाया है। शायद उनको भी ख्याल आ रहा है कि किसी दिन उनका भी यही अंत होना है। पुलिस वाले चाहते थे किसी तरह कोई रसीली की लाश उनसे ले ले अंतिम संस्कार करने के लिये ताकि उनको रसीली का ये घर सील बंद नहीं करना पड़े और वे इसका कब्ज़ा किसी और जिस्म बेचने वाली औरत को देकर कुछ कमाई कर सकें। लगता है पापियों की बात भगवान भी जल्दी सुन लेता है , तभी तो पुलिस वाले अपनी गाड़ी में रसीली की लाश ले जाते उस से पहले ही इक अनजान व्यक्ति रसीली के घर के दरवाज़े पर आकर रुका था रिक्शा से उतरा था। जब उसको मालूम हुआ कि रसीली की मौत हो चुकी है तब वो फफक फफक कर रोने लगा था , पुलिस वालों को उसने बताया था कि जब भी इस शहर में आता है वो तब रसीली के घर ही मेहमान बन कर रुकता है। पिछली कई बार उसने रसीली को एक भी पैसा नहीं दिया था किसी काम के लिये भी , क्योंकि उसके पास थे ही नहीं तब देने को पैसे। आज ढेर सारे पैसे साथ लाया था ये सोचकर कि उसका सारा क़र्ज़ उतार देगा। जब पुलिस वालों ने बताया कि रसीली की देह को लेने को कोई उसका अपना तैयार नहीं है और अब उसका दाह संस्कार लावारिस घोषित कर उनको ही करना है तब उसने पुलिस वालों से पूछा था कि क्या वो उसका अपना बन उसकी लाश को ले जा सकता है ताकि रसीली का अंतिम संस्कार कर सके। पुलिस वाले कब से यही चाहते ही थे , उस व्यक्ति से कुछ कागज़ों पर लिखवा लिया है कि वो रसीली का अपना  है और उसकी लाश ले जाकर क्रियाकर्म करना चाहता है। शमशान भूमि का वाहन आ गया है और वो अकेला रसीली का शव लेकर जा रहा है , बस्ती वालों के साथ पुलिस वालों की भी आँखे नम हैं ये देख कर कि कोई है जो रसीली के प्यार की कीमत समझता है और उसका क़र्ज़ चुकाने आया है , चाहे रसीली की मौत के बाद ही।

   ( रसीली की ये कहानी यहां समाप्त होती है , मगर शायद मैं रसीली की सही छवि अभी भी नहीं बना पाया हूँ। तभी ये वास्तविक कहानी किसी पत्र पत्रिका ने छापना स्वीकार नहीं किया। यहां मुझे इक इंग्लैंड के मनोचिक्सक की याद आती है , उसने ये प्रचार कर रखा था कि जो भी कोई ख़ुदकुशी करना चाहता हो वो मरने से पहले एक बार उसको ज़रूर आकर मिले। लोग आते हर दिन और वो सब को ये मनाने को सफल हो जाता कि उनके पास अभी जीने की वजह है। मगर इक दिन वो ऐसा नहीं कर पाया और उसने इक व्यक्ति को ये कह दिया कि मैं भी आपको नहीं समझा सकता कि आपको क्यों जीना चाहिये। अब उस को मरना ही था ये सोच कर निकला तो उन मनोचिकित्स्क की सहायक जो केबिन के बाहर बैठी ये सब सुन रही थी , ने उसको रोक कर पूछा आप क्या करने जा रहे हो , जब उसने ख़ुदकुशी करने की बात कही तब उस सहायक ने पूछा था क्या आप मेरे साथ चल कर एक कप कॉफी पी सकते हैं मरने से पहले , वो मान गया था। तब थोड़ी ही देर में उसको अपना मित्र बना उस सहायक ने उसका ख़ुदकुशी का इरादा बदलवा दिया था। आज भी उस सहायक के नाम इक संस्था है जो निराश लोगों में जीवन की आशा जगाती है। दिल्ली में भी उसकी एक शाखा है सफदरजंग हवाई अड्डे के पास , बहुत साल पहले उसके लिये काम किया है मैंने। रसीली ने शायद कुछ ऐसा ही किया था उम्र भर। हो सके तो आप भी उसको समझना। )

             11      दो आज़ाद पंछी गगन के ( कहानी ) 

            महानगर के बस अड्डे पर अचानक प्रेम व प्रीति की मुलाकात हो गई। सालों बाद इस प्रकार कॉलेज का पुराना सहपाठी कभी कोई ऐसे मिल जाये तो यूं लगता है मानो गुज़रा हुआ ज़माना वापस लौट आया है। इत्तेफाक से दोनों को अपनी अपनी कंपनी के काम से एक ही नगर को जाना था। दो दिन के लंबे सफर में तो अजनबी सहयात्री भी अपने से लगने लगते हैं , ऐसे में पुराना सहपाठी मिल जाये तो मन झूमने लगता है। प्रेम और प्रीति दोनों को भी ऐसा ही प्रतीत हो रहा था। प्रेम ने बुकिंग विंडो पर जाकर दोनों की टिकट बुक करवा ली थी और बस में साथ साथ बैठ कर कॉलेज के दिनों की बातें करने लगे थे। कुछ ही पल में ऐसे घुल मिल कर बातें कर रहे थे जैसे वो कभी बिछुड़े ही नहीं थे। बातों बातों में दोनों ने इक दूजे से विवाह और जीवन साथी के बारे भी पूछा था जिसका जवाब दोनों ने ही इस प्रकार संक्षिप्त सा दिया था मानो उनको इस विषय पर बात करनी ही नहीं हो। मगर शायद दोनों को ही ये बात समझ आ गई थी कि मेरी तरह उसको भी ज़िंदगी की सच्ची खुशी हासिल नहीं हुई है और उसके सपने भी मेरी तरह टूट कर बिखर चुके हैं। दोनों जिधर ज़िंदगी ले जा रही थी जाते जा रहे हैं। कुछ ही घंटो में वे इक दूजे से इतना बेतकल्लुफ हो बात करने लगे थे जितना कॉलेज में चार साल साथ पढ़ते भी नहीं हो पाये थे। प्रीति को तब प्रेम की बातें अजीब लगती थी जब वो बहस में अपनी बात पर अड़ जाता था कि पैसा ही सब कुछ नहीं होता , और हमें सुंदरता को महत्व नहीं देकर व्यक्ति के सवभाव को देखना चाहिये। सुंदरता हमेशा नहीं रहती है , मधुर व्यवहार हमेशा साथ रहता है और सच्चा मित्र सुख दुःख दोनों में साथ देता है , जो वक़्त और ज़रूरत को दोस्त बनाता है वो दोस्ती का अर्थ नहीं जनता। प्रेम मानता था कि दोस्त बहुत मुश्किल से मिलता है हर किसी को दोस्त नहीं समझा जा सकता। जिसके बहुत दोस्त होते हैं वास्तव में उसका कोई दोस्त नहीं होता है। प्रीति का विचार था कि किसी को भी सीधा सरल नहीं होना चाहिये जैसा समय हो खुद को उसी तरह बदल लेना चाहिये। खुश रहने के लिये पैसा और दोस्त जितने भी बन सकें बनाना चाहिये। प्रेम की भावुकतापूर्ण बातें प्रीति को पसंद नहीं आती थी , उसको रमेश की बातें अच्छी लगती थी जो रोज़ नये नये दोस्तों के साथ कर्यक्रम बनाने और मौज मस्ती से जीने में यकीन रखता था। प्यार मुहब्बत को रमेश किस्से कहानियों की बातें समझता था और कहता था कि असली जीवन में ये सब फ़िज़ूल की बातें हैं। इसके बावजूद प्रीति के दिलोदिमाग पर रमेश ही छाया रहता था , उसको मालूम था कि प्रेम क्यों उसको चोरी चोरी अजीब सी नज़रों से देखता रहता है , जैसे कुछ कहना चाहती हों उसकी नज़रें प्रीति से। उसकी सहेली आशा कहती थी प्रेम तुमको बेहद चाहता है उसे अपना दोस्त बना लो मगर प्रीति को प्रेम का ऐसे उसको तिरछी नज़रों से तकना बिल्कुल पसंद नहीं था , वो सोचती रहती थी काश कभी रमेश उसको ऐसी नज़रों से देखे। उसने प्रेम को कभी कोई अहमियत नहीं दी थी , एक बार जब कॉलेज के वार्षिक समारोह में प्रेम ने कोई नाटक प्रस्तुत करना था और उससे पूछा था नायिका का किरदार निभाने के बारे तब प्रीति ने जैसे उसको डांट ही दिया था "तुमने ऐसा सोचा भी कैसे कि मैं तुम्हारी नायिका का अभिनय करने को मान जाउंगी"। मगर प्रेम ने तब इतना ही कहा था तुमको मेरी बात बुरी लगी है तो क्षमा चाहता हूं। प्रेम का चेहरा बुझ सा गया था और उसने नाटक का विचार ही छोड़ दिया था। प्रीति को ये समझना ज़रूरी नहीं लगा था कि किसलिये प्रेम ने उसकी जगह किसी और लड़की को अपने साथ नाटक में शामिल होने को नहीं कहा था। प्रीति के उपेक्षापूर्ण व्यवहार से प्रेम चुप चाप रहता था पर कभी कोई शिकायत नहीं करता था। जब भी परीक्षा नज़दीक होती प्रेम खुद उससे पूछता था किसी तरह की कोई ज़रूरत तो नहीं प्रीति को और तब प्रीति उसके नोट्स लिया करती अपनी कई प्रॉब्लम्स हल करवाती थी प्रेम से। मगर प्रीति रमेश के प्रति आकर्षित थी चाहे वो प्रीति को कभी भी विशेष महत्व नहीं देता था आशा ने कितनी बार समझाया था प्रीति को कि ये इकतरफा प्यार तुमको कुछ नहीं देगा , पर दिल पर किसी का बस नहीं होता है , जो आसानी से मिल रहा हो अक्सर हम उसकी कद्र नहीं करते और जो नहीं हासिल हो सके उसको पाने को तरसते रहते हैं। सभी कभी न कभी ऐसी मृगतृष्णा का शिकार हो जाते हैं। मगर प्रीति को वही प्रेम आज बेहद अच्छा लग रहा था और उसके मन में ये सवाल खुद ही आया था कि किसलिये उसने प्रेम से तब उपेक्षा का व्यवहार किया था जबकि उसने कभी कोई खराब हरकत नहीं की थी कोई गल्त बात न बोली थी , उसने तो अपने मन की बात तक भी प्रीति को नहीं कही थी। शायद आशा सही कहती थी कि ये भी उसके प्यार का ही इक रूप था , प्रीति खुद ही मानना नहीं चाहती थी कि वो प्रेम को भी चाह सकती है , आशा शायद उसको खुद से ज़्यादा समझती थी। बीते समय की बातें करते करते दोनों खो गये थे यादों में , और इक ख़ामोशी सी छा गई थी। जाने कब प्रीति प्रेम के कंधे पर सर रख कर गहरी नींद में सो गई थी। तभी इक हिल स्टेशन पर बस पहुंच कर रुकी थी , सभी यात्रियों से कहा गया था कि अब चार घंटे रुकना है यहां ताकि सब उस खूबसूरत जगह को देख सकें। शाम छह बजे तक सबको वहीं आना था आगे का सफर जारी रखने के लिये।

                             आज प्रेम और प्रीति दोनों को लग रहा था अब कुछ दिन खुश रह सकते हैं घर के तनाव भरे माहौल से दूर किसी दोस्त के साथ हंस कर जी सकेंगे। उनको लगता था जैसे उनकी ज़िंदगी में जहां पतझड़ ही पतझड़ थी , कोई खुशबू नहीं किसी फूल की उसमें अचानक बहार आ गई हो चार दिन को ही सही। प्रीति ने कुछ सोच कर प्रेम से कहा था क्यों न हम इस जगह की सैर करने की जगह कहीं चल कर बैठें ताकि अपना हल चाल बता सकें पूछ सकें। थोड़ा आराम भी मिलेगा और हम शायद इक दूसरे को करीब से समझना भी चाहते हैं। प्रेम ने कहा था प्रीति यही ठीक है घूमना तो कभी भी हो सकता है मगर हम जाने फिर कब यूं मिल सकें। वे अपने अपने बैग लेकर कुछ दूर इक पार्क में चले आये थे , प्रेम पास से कुछ खाने को और दो कप काफी ले आया था और प्रीति ने घास पर इक चादर बिछा दी थी ताकि बैंच पर न बैठ कर उसपर आराम से बैठा जा सके। काफी पीते पीते प्रीति ने कहा था प्रेम तुम कॉलेज में जो बातें किया करते थे मुझे तब उनकी समझ नहीं थी मगर अब उसको समझती हूं , जानती हूं तुम्हें किसी दोस्त की तलाश थी , शायद मुझे तुमने हमेशा अपनी मित्र ही समझा मगर मुझे ही नहीं पता था कि तुम मेरे लिये क्या हो। तुमने तब कभी कुछ नहीं कहा था और आज भी जब हम दोनों विवाहित हैं तब तो शायद बिल्कुल ही नहीं कह सकोगे , मगर मुझे आज अपनी भूल का सुधार करना ही है ,ये अवसर दोबारा मिलेगा ऐसी संभावना नहीं नज़र आती कहीं। इन कुछ ही पलों में हम जितना करीब हो गये हैं कॉलेज में चार साल में कहां हो सके थे। प्रेम मुझे कब से इक ऐसे सच्चे दोस्त की ज़रूरत महसूस होती रहती थी जिसको मैं अपना सब कुछ बिना झिझक बता सकूं पूर्ण विश्वास करके , मगर नहीं मिला एक भी , हम चाहे कॉलेज में अधिक करीब नहीं हुए हों तब भी इक दूजे को बहुत भली भांति समझते तो रहे हैं , इसलिये मुझे लगता है अब तुम और मैं चाहे दूर ही रहते हों दोस्ती का रिश्ता निभा सकते हैं। मैं तुम पर पूरा भरोसा करती हूं इसलिये अपनी हर बात तुम्हें बताना चाहती हूं ताकि जब भी मुझे ज़रूरत हो इक सच्चे दोस्त की सलाह मिल सके और तुम भी मुझे अपनी ऐसी ही दोस्त अभी भी समझ सको तो सच मैं भग्यशाली हूंगी तुम्हारी सच्ची दोस्त बन कर। प्रीति की बात सुन कर प्रेम ने कहा था जो तुमने आज कहा है वो शायद मेरा ही सपना है , ये तुमने जब कहा तब तुम भी जानती थी मैं भी यही चाहता रहा हूं और समझती भी हो कि ये कहने का साहस मैं आज भी नहीं कर पाउंगा। अब शायद नियति ने हमें इसलिये ही इस मोड़ पर फिर से मिलवा दिया है ताकि हम आपस में अपने जीवन की हर बात सांझी कर थोड़ा सुकून हासिल कर सकें। प्रीति अब तुम बता सकती हो तुम्हारे जीवन में जो भी कठिनाई हो , क्या तुम्हारी पति से या घर में किसी से कोई समस्या है जो हमेशा चहकने वाली प्रीति यूं गुमसुम हो गई है। प्रीति ने कहा प्रेम आज मुझे तुमसे सब बताना है अपने बारे जो कभी किसी को नहीं बता सकी। प्रेम ऐसा नहीं है कि मेरे पति कोई बुरे इंसान हैं , मगर अक्सर जो हम सोचते हैं वो वैसा मिलता नहीं ज़िंदगी से , मेरे पति को मेरे काम करने से जॉब करने से कोई ऐतराज़ तो नहीं है लेकिन वो मेरी क़ाबलियत को बिल्कुल महत्व नहीं देते। वही पुरानी सोच , औरत मर्द के पांव की जूती है , उसका अपमान करना मर्दानगी है , उसको प्रताड़ित करना पति का अधिकार। पत्नी को सर पर नहीं बिठाना चाहिये , उसको दबा कर रखना चाहिये , वो बस उपयोग की इक वस्तु मात्र है जब मन चाहा जैसे भी इस्तेमाल किया। इक ऐसा जीवन साथी जो भावनाशून्य हो , आदमी नहीं कोई मूरत हो पत्थर की , जो समझता हो औरत को खाना पीना गहने कपड़े मिल रहे तो और क्या चाहिये उसको। प्यार की दो बात के लिये समय नहीं हो जिसके पास , हर शाम थक कर आना घर और खा पी कर सो जाना , कुछ भी न पूछना न ही कुछ भी बताना। लगता है दो अजनबी इक साथ रहते मज़बूरी में। कभी शराब के नशे में प्यार की बात भी ऐसे करना जैसे पत्नी नहीं बाज़ार से खरीदी कोई वस्तु है जिसको चाहे इस्तेमाल किया चाहे रख छोड़ा कहीं। प्रेम लगता है ज़िंदगी की गाड़ी दो बेमेल पहियों पर घिसट कर चल रही है , जाने अनजाने , किधर जाना नहीं मालूम। कोई कारण नहीं कि अलग होने की बात कहें पर साथ रहने को मन चाहे ऐसा भी कुछ नहीं , इक नीरस सा जीवन जैसे कोई बोझ है जिसको ताउम्र ढोना है। प्रेम यही है मेरी ज़िंदगी की कहानी , खुद ही तुम्हें बतानी चाही है क्योंकि कभी कोई और मुझे तुमसा विश्वसनीय मिल ही नहीं सका। प्रेम तुम भी मुझे अपनी हर बात बताना चाहो ऐसा बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है , फिर भी अगर तुम भी मुझे ऐसे ही अपना सुख दुःख का साथी समझ कर अपने जीवन के बारे अपनी ख़ुशी अपने दर्द के बारे बता सको तो मुझे अच्छा भी लगेगा और ख़ुशी भी होगी। मुझे पता है मेरे पति जैसा व्यवहार तुम किसी भी महिला से नहीं कर सकते , तभी ये सब तुमको बताने से मुझे इक राहत सी मिली है।

                                              प्रीति की बात सुनने के बाद प्रेम ने कहा , प्रीति तुम्हारी ही तरह मैंने भी अपनी बात किसी से नहीं की आज तक , लेकिन तुम जानती हो तुमसे नहीं छिपा सकता। अब इसलिये भी बताना चाहता हूं ताकि तुम समझ सको कि तुम अकेली नहीं हो दुनिया में जिसके सपने टूट कर बिखर गये , मैं भी ऐसे लोगों में शामिल हूं और हम जैसे जाने और कितने लोग हैं जो ऐसे ही जीते हैं घुट घुट कर। सच कहूं तो मुझे कभी किसी से कोई भी शिकायत नहीं होती है , बस इतना नहीं समझ पाता कि सब से मुझे तिरस्कार किसलिये मिलता है हमेशा। अपनी पत्नी को मैं इस दुनिया का सब से नकारा और बेवकूफ व्यक्ति लगता हूं। हर दिन मुझे नाकाबिल होने के ताने देती है , आस पास के बाकी सभी पुरुष उसको काबिल और समझदार लगते हैं , वो अपनी किस्मत को कोसती है जो मुझ जैसा पति उसको मिला। वो कहती है वो कितना भी प्रयास कर ले मैं कभी नहीं सुधर सकता। ये बात सच भी है मैं जैसा भी हूं वैसा ही रहना चाहता हूं , बदलना नहीं चाहता। मुझे हमेशा यही एहसास रहता है कि मैं कभी किसी को भी प्यार के काबिल नहीं लग सकता। क्या मुझे शादी करनी ही नहीं चाहिये थी , और विवाह करके मैंने पत्नी का जीवन बर्बाद कर दिया है। मुझे कभी ये बात नहीं समझ आई कि अगर मैं उसको इतना बुरा लगता हूं तो वो मुझे छोड़ किसलिये नहीं देती , इतनी नफरत भरी है उसके मन में मेरे लिये तब भी कैसे मेरे साथ रहती है। मैं खुद उसको छोड़ कहीं नहीं जा सकता क्योंकि समझ नहीं आता कि जाऊं तो कहां , इक दोस्त तक नहीं मिला जिसको समझा सकता अपना हाल। मैंने हमेशा प्रयास किया उसको हर मुमकिन सुख सुविधा देने का , हर कदम साथ देता रहा हूं मगर उसकी हर अपेक्षा हर चाहत को नहीं कर पाया पूरा। कारोबार में बार बार असफल होने से मेरा आत्मविश्वास बिखर चुका है और मैं ज़िंदा हूं क्योंकि जीना है मरने तक। प्रेम की कहानी सुन प्रीति की आह निकल गई , वो बोली प्रेम लगता है तुम्हारी और खुद मेरी ज़िंदगी की बर्बादी का कारण मैं हूं , काश मैंने तभी तुमसे रिश्ता कायम किया होता और तुमको वो सब देती जो मुझे देना चाहिये था , और मुझे जो भी चाहिये था बिना मांगे ही मिल जाता। जाने क्यों प्रीति की बात सुन प्रेम की आंखें भर आई थी , ये देख प्रीति ने कहा था प्रेम अब मैं तुमको कभी रोने नहीं दूंगी , हम अब चाहे कहीं भी रहें इक दूसरे का साथ हर ख़ुशी हर दुःख में देते रहेंगे। जो बात आज मैं कहने जा रही हूं वो दुनिया को शायद कभी समझ नहीं आये मगर मेरा विश्वास है कि तुम मेरी भावना को समझोगे। हमारा अपराध क्या है ? हम प्यार के सम्मान के अपनेपन के भूखे हैं तो इसमें गलत क्या है , क्या हमें अपनी ज़िंदगी जीने का हक नहीं है।तमाम उम्र हम दोनों किसी और के अनुसार कैसे जी सकते हैं , और ऐसा करने के बाद भी हम दोनों से हमारे विवाहित जीवनसाथी खुश नहीं होने वाले न ही खुद हमको कभी कोई ख़ुशी देने वाले हैं , ये बात मैं भी जानती हूं और तुम भी प्रेम। शायद जीवन भर हमें ऐसे ही घुट घुट कर जीना होगा। अब जब किस्मत ने हमें एक सप्ताह के लिये साथ रहने का अवसर दिया है तो क्यों न हम इसको वैसे बितायें जैसा हम कॉलेज के दिनों में दोस्ती कर के बिता सकते थे। तुम्हारी इक तम्मना मैं पूरी कर सकूं और तुम भी मेरी इक आरज़ू और चाहत को पूरा कर सको। हम अगले सात दिन के लिये भूल जायें कि हमारी किसी से शादी हो चुकी है , मैं केवल प्रीति हूं किसी की पत्नी नहीं और तुम सिर्फ प्रेम हो किसी के पति नहीं। मेरी ये बात सुनकर कोई और मुझे बदचलन समझे मगर तुम मेरी भावना को समझना , हम दोनों तपती गर्मी में झुलसते रहे कुम्लाहे मुरझाये से पौधे हैं जिनको आने वाले सात दिनों की बरसात नया जीवन दे सकती है। मुझे पता है प्रेम तुम ये बात कभी नहीं कह सकते , मैं खुद लाज शर्म को छोड़ कर जाने कैसे ये कह रही हूं ताकि जो सच्चा प्यार मुझे नहीं मिला कभी मेरी ही भूल से उसको पा सकूं और शायद अपनी भूल का प्रायश्चित भी कर पाऊं। तुम तब भी बोले थे जब कोई बंधन नहीं था तो अब तो कभी नहीं बोलते लेकिन मुझे लगता है तुमने जितना प्यार मुझसे किया शायद कोई किसी से नहीं कर सकता। मैंने भी इक सपना देखा है कि काश कभी कोई मुझे भी मुहब्बत से प्यार से सम्मान से , मेरी इच्छाओं का आदर करते हुए अपना बनाये। एक पवत्र प्रेम न कि शारीरिक आकर्षण या केवल वासना , प्रेम क्या ऐसा मुमकिन है अब ये सात दिन हम इक दूजे के होकर जियें। जैसे सदा सदा से हम इक दूसरे के हैं और बाकी दुनिया से अपना कोई नाता नहीं है। प्रेम प्रीति की बातें सुनते सुनते जैसे किसी सपनों की दुनिया में खो गया था , बोला था प्रीति क्या ये सच है या मेरा सपना , कॉलेज के दिनों मैंने हमेशा यही ख्वाब देखा था कि इक दिन तुम खुद मेरे पास आओगी और अपने प्यार का इज़हार करोगी। अब दुनिया क्या सोचती है इस से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है , मेरी ज़िंदगी मेरी है और तुम्हें भी अपनी ज़िंदगी अपनी मर्ज़ी से जीने का पूरा अधिकार है। इसलिये तुम्हारा ये प्रस्ताव मुझे स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है। अगले सात दिन हम प्रेमी प्रेमिका बन कर ही जियेंगे ताकि इन दिनों का खुशनुमा एहसास उम्र भर हमें जीने की ऊर्जा प्रदान करता रहे। कहते हैं न ज़िंदगी प्यार की दो चार घड़ी होती है , चाहे थोड़ी भी हो ये उम्र बड़ी होती है। प्रेम ने पूछा था प्रीति मैंने कभी तुमको कोई उपहार देने को सोचा था मगर नहीं दिया ये सोच कर कि तुम स्वीकार न करोगी , क्या आज मैं कुछ देना चाहूं तो तुमको मंज़ूर होगा। "ज़रूर "प्रीति बोली थी आओ बाज़ार चलें हमें बस का समय होने से पहले वापस भी आना है। प्रीति ने प्रेम की पसंद की ड्रेस , चूड़ियां , बिंदी , लिपस्टिक ले ली थी , इक मंगल सूत्र को देख रुक गया तो प्रीति ने कहा था ले लो मुझे पसंद है। वक़्त गुज़रते पता ही नहीं चला था और जब तक बस स्टैंड पर पहुँचते उनकी बस निकल चुकी थी। लेकिन उनको बस छूटने का कोई अफ़सोस नहीं था , दूसरी कोई बस भी नहीं मिल सकती थी और उन्होंने तब वहीं किसी होटल में वो रात इक साथ गुज़ारने का तय कर लिया था। प्रेम ने पूछा था प्रीति क्या दो कमरे लेने हैं , प्रीत ने कहा था नहीं अब जब तक यहां हैं एक ही कमरे में रहेंगे। होटल के कमरे में आकर दोनों ने इक दूजे से उपहार में मिले कपड़े पहने थे , और इक दूजे को प्यार भरी नज़रों से निहारते रहे थे। प्रीति ने आज प्रेम को पति मान अपना श्रृंगार किया था और ये सोच खुद ही शरमा रही थी , फिर प्रेम के करीब जाकर बोली थी मेरा मंगलसूत्र कहां है प्रेम जी। प्रेम को लगा था मानो आज सारी दुनिया उसके कदम चूमने लगी है और उसने मंगलसूत्र प्रीति के गले में पहना दिया था। प्रीति ने झुक कर प्रेम के पांव छू लिये थे और पत्नी की तरह अपने हाथों को अपनी मांग पर फेरा था जैसे पति का आशिर्वाद लिया हो। ये प्यार वालों का अपना बंधन था जिसमें किसी तीसरे की कोई ज़रूरत नहीं थी , उन्होंने खुद को पति पत्नी मान लिया था। प्रेम जब सोफे पर सोने लगा तब प्रीति ने कहा था प्रेम दुनिया की नज़र में मेरा पति कोई भी हो मेरे लिये तुम ही मेरे पति हो सब कुछ हो , मैं आज खुद को तन मन से तुम्हें समर्पित करती हूं , मुझे अपना लो अपनी आगोश में ले लो , आज की रात अपनी सुहागरात है। मुझे अपना प्यार तुम पर बरसाना है और तुम भी मेरी जन्म जन्म की प्यास बुझा दो। ऐसे वो दोनों सुध बुध खो इक दूजे में समा गये थे , प्यार के सच्चे रिश्ते के लिये दुनिया के सब रिश्तों को भुलाकर।
     अगली सुबह उनको उठते ही जाना था बाकी सफर पूरा करने ताकि जिस काम को जाने को निकले थे वो पूरा कर सकें और अगले छह दिन साथ गुज़ार सकें ऐसे ही। टैक्सी मिल गई थी और सफर पूरा करने के बाद उन्होंने उस शहर में भी एक ही कमरा लिया था होटल में। सफर की थकान मिटाने को वो जल्दी ही सो गये थे।
   जब अगली सुबह जागे तो सुबह का अख़बार पढ़कर दंग रह गये थे , खबर छपी थी कि जिस बस में वो यात्रा कर रहे थे वो उसी रात खाई में गिर गई थी और उसमें जितने मुसाफिर थे सब मर गये थे। टूरिस्ट कंपनी ने उनका नाम भी दे रखा था मरने वालों की लिस्ट में। उनको समझ नहीं आ रहा था कि इस खबर का सन्देश क्या है। क्या वे अपने अपने घर सूचित कर दें कि हम ज़िंदा हैं या इस खबर को अपने लिये इक उपहार समझ जिस प्यार के रिश्ते को सात दिन को अपनाया था उसको उम्र भर का नाता मान लें। क्या अपने परिवार वालों को सच सच बता दें कि हम उस बस में नहीं थे और इक साथ पुराने सहपाठी के साथ थे दो दिन दो रात इक साथ। मुमकिन है तब वो कहते इससे तो अच्छा होता तुम मर ही जाते। काफी विचार विमर्श के बाद उन्होंने इसे तकदीर का फैसला समझने का निर्णय लिया है , और तय किया है कहीं और जाकर अपनी प्यार की नई दुनिया बसा लेंगे। अपना जीवन जीने का हक सभी को है , प्रेम प्रीति भी अपने सपने साकार करना चाहते हैं। घुट घुट कर मरने से अच्छा है दुनिया की नज़र में मर कर भी प्यार की दुनिया बसा कर ख़ुशी से जीना। ये सोच कर दोनों को लगा था वे अब किसी बंद पिंजरे के पंछी नहीं हैं , खुले गगन के दो आज़ाद पंछी हैं। "पंछी बनूं उड़ती फिरूं मस्त गगन में , आज मैं आज़ाद हूं दुनिया के चमन में "। प्रीति गुनगुना रही थी , उन दोनों के मन मयूर नाच रहे थे।
                                  

                          12    हिलती हुई दीवारें ( कहानी ) 

                                    

 भावना को तड़पता देख कर भी भावशून्य लग रही थी लाजो , जैसे उसका अपनी ही बेटी से कोई संबंध ही ना हो। आधी रात का सन्नाटा और घर के ऊपर की मंज़िल पर अकेले कमरे में वे दोनों। खुद लाजो ने ही तो ज़हर पिलाया है अपनी बेटी को। उसके पति बलबीर ने शाम को उसको आदेश दिया था , घर की इज्ज़त बचाने के नाम पर बेटी को जान से मार देने का। और अगर लाजो ने ऐसा नहीं किया तो वह मां बेटी दोनों को तड़पा तड़पा कर मरेगा बलबीर ने ये भी कहा था। लाजो जानती है अपने पति के स्वभाव को वो कुछ भी कर सकता है। ज़हर पिलाने के बाद लाजो इंतज़ार कर रही थी भावना के मरने का ताकि उसकी मौत के बाद वो खुद जाकर बलबीर और बाकी सभी सदस्यों को बता सके कि उसने वह कर दिया है जो करने का आदेश उसको दिया गया था। तड़प तड़प आखिरी सांसें गिनती भावना ने अपनी मां को इशारे से अपने पास बुलाया था , बेहद मुश्किल से धीमी धीमी आवाज़ में उसने कहा था , " मां तुमने मुझे ज़हर दिया है ना , कोई बात नहीं , अच्छा ही है , तुमने ही तो मुझे जन्म दिया था , तुम मेरी जान ले लो ये भी तुम्हें अधिकार है। मां तुम इस के लिये दुखी मत होना। मैंने शाम को ही सुन ली थी वो सारी बातें जो पिता जी ने तुमको कही थी छत पर बुलाकर। इसलिये रात को सोने से पहले ज़हर मिला दूध पीने से पहले मैंने सब कुछ बता दिया था और सोच लिया था कि अगर मुझे जन्म देने वाली मां को भी लगता हो कि मुझे इस जहां में ज़िंदा रहने का कोई हक नहीं है तो मुझे जी कर क्या करना है। मां तुम्हारे हाथ से ज़हर पी कर मरना तो मुझे एक सौगात लग रहा है। मुझे नहीं जीना इस समाज में तुम्हारी तरह हर दिन इक नई मौत मरते हुए। मां मेरी बात ध्यान पूर्वक सुन लो , मैंने अलमारी में अपने कपड़ों के नीचे इक पत्र लिख कर रख छोड़ा है , जिस में लिखा है कि मैं अपनी मर्ज़ी से आत्महत्या कर रही हूं। तुम वो पत्र पुलिस वालों को दे देना , और कभी किसी को ये मत बताना कि तुमने मुझे ज़हर पिलाया है दूध में मिलाकर , वरना दुनिया की बेटियों का भरोसा उठ जायेगा मां पर से "।

                          अचानक लाजो की नींद खुल गई थी , उस भयानक सपने से डरकर जाग गई थी लाजो , अपनी धड़कन उसको ज़ोर ज़ोर से सुनाई पड़ रही थी और पूरा बदन पसीने से तर हो गया था। अपनी दिमाग़ की नसें लाजो को फटती फड़फड़ाती सी लग रही थीं। भावना उसकी बगल में सोई पड़ी थी , बाहर से आ रही हल्की रौशनी में उसका प्यारा सा चेहरा मुरझाया हुआ लग रहा था। शायद बेटी भी कोई ऐसा बुरा सपना देख रही हो सोच कर लाजों की आंखों में आंसू भर आये थे। प्यार से ममता भरा हाथ उसने बेटी के माथे  पर रख दिया था और सहलाती रही थी। रात को बहुत देर तक भावना मां को दिल की हर बात बताती रही थी , और बेटी की अपनत्व भरी बातों ने लाजो को भीतर तक झकझोर कर रख दिया था। आज लाजो को एहसास हुआ था कि उसने बेटी के साथ अकारण कठोर व्यवहार  किया है आज तक , कभी प्यार से ममता भरी बातें की ही नहीं। आज उसको अपनी सोच पर ग्लानि हो रही थी कि क्यों भावना के जन्म लेने पर उसको लगा था कि उसकी कोख से बेटी जन्म ही नहीं लेती। अपना सारा प्यार सारी ममता लाजो अपने दोनों बेटों पर ही न्यौछावर करती रही है , आज तक कभी समझा ही नहीं कि बेटी को भी प्यार दुलार और अपनत्त्व की उतनी ही ज़रूरत है। शायद ऐसा उस समाज और उस परिवेश के कारण हुआ जिस में खुद लाजो पली बढ़ी थी। लेकिन आज भावना ने मन की सारी गांठे खोल कर रख दी थीं , बचपन से लेकर जवानी तक के सभी एहसास अपनी मां को बता दिये थे , जिनको सुन कर समझ कर दिल में महसूस कर के लाजो के मन में बेटी के लिये ममता का सागर छलक आया था। आज पहली बार लाजो को समझ आया था कि इस पूरे समाज में पूरी दुनिया में इक बेटी ही है जो अपनी मां की पीड़ा को उसके दर्द को समझ सकती है और चाहती भी है जैसे भी हो सके अपनी मां का आंचल खुशियों से भर दे। लाजो ने आज जाना था कि मां के लिये जो भाव कोई बेटी महसूस कर सकती है वो बेटे कभी नहीं कर सकते। आज पहली बार बेटी की मां होने पर लाजो को गर्व और प्रसन्नता की अनुभूति हुई थी वह भी ऐसे समय जब जब उसका सारा परिवार , पूरा समाज ही बेटी की जान का दुश्मन बन चुका है। मगर आज इक मां ने भी ठान लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाये वो अपनी बेटी पर कोई आंच नहीं आने देगी। बेटी की ख़ुशी उसके भविष्य उसके अधिकार के लिये वो अपनी जान तक की परवाह नहीं करेगी। समय आ गया है इक मां के अपनी बेटी के प्रति कर्तव्य निभाने और ममता की लाज रखने का।
               भावना ने स्नातक की शिक्षा में अच्छे अंक प्राप्त किये थे और उच्च शिक्षा से पूर्व की परीक्षा में भी अच्छा रैंक पाकर बड़े शहर के अच्छे कॉलेज में प्रवेश हासिल कर लिया था जबकि उसके दोनों भाई हमेशा मुश्किल से उत्तीर्ण होकर भी संतुष्ट हो जाते थे। दोनों आगे पढ़ाई करने में रुचि ही नहीं रखते थे। भावना को हॉस्टल में कमरा मिल गया था और वो मन लगा कर पूरी मेहनत करने लगी थी ताकि भविष्य में कुछ बन सके और अपना ही नहीं अपने गांव तक का नाम रौशन कर सके। कॉलेज में सहपाठी रंजना से उसकी मित्रता हो गई थी और दोनों काफी घुल मिल गई थी। रंजना का बड़ा भाई विवेक कई बार उसको छोड़ने आया करता था कॉलेज में और कभी कभी भावना से हाय हेल्लो नमस्ते हो जाती थी। हालांकि भावना अंतर्मुखी स्वभाव की सीधी सादी लड़की थी जो बहुत कम बातें करती थी और रंजना और उसका भाई विवेक सभी से खुलकर बातें करने वाले मिलनसार लोग थे , फिर भी उनसे भावना का तालमेल बन गया था। भावना और रंजना में घनिष्ठता हो गई थी और आपस में दोनों अपनी हर बात बिना झिझक बताने लगी थी। रंजना के पापा का अच्छा कारोबार था और विवेक किसी कंपनी में अच्छे पद पर जॉब करता था , खुश रहना मस्ती करना उसकी आदत थी और शहरी आम लड़कों की तरह बेपरवाह न होकर संवेदनशील था। पापा मम्मी जब भी शादी की बात करते तो वो कहता था जब कोई लड़की पसंद आई तो खुद ही लेकर मिलवा देगा उन से। औपचारिक मुलाकातों में ही विवेक और भावना कब इक दूजे को पसंद करने लगे दोनों को पता ही नहीं चला था , शुरू में थोड़ा संकोच से विवेक भावना को उसके मोबाइल पर फ़ोन करता , कभी रंजना का फोन बिज़ी होने पर तो कभी कॉलेज नहीं आ सकने का संदेशा देने को भावना को रंजना को बताने के बहाने से।  धीरे धीरे जान पहचान इक गहरे मधुर संबंध में बदल गई थी , एक दो बार भावना रंजना और विवेक सिनेमा गये थे साथ साथ और कभी किसी रेस्टोरेंट में खाना भी साथ खा लेते  थे।  जब उन दोनों को विश्वास हो गया कि हमें उम्र भर साथ रहना है तब भावना ने ही रंजना  से ये बात बताई थी , विवेक ने ही भावना से रंजना को बताने को कहा था ताकि ये जान सके कि उसकी क्या राय है। रंजना को भी कुछ कुछ आभास पहले से होने लगा था मगर भावना के मुंह से विवेक से प्यार की बार जान कर उसको और भी अच्छा लगा था। उसको भावना बहुत समझदार और काबिल लड़की लगती थी जो उसके भाई के लिये अच्छी जीवन साथी बन सकती थी। रंजना ने तभी घर जाकर मम्मी  को भावना और विवेक के प्यार की बात बता दी थी ,  उनको भी भावना का स्वभाव अच्छा लगता था जब भी रंजना के साथ मिली थी भावना उनको। विवेक के पिता को धर्मपत्नी ने बताया था भावना के बारे कि मधुर स्वभाव की अच्छे संस्कारों की सुशील लड़की है जो बड़ों का आदर सम्मान करना भली तरह जानती है। और उन्होंने हामी भर दी थी और विवेक से कहा था भावना से भी कहो अपने माता पिता से बात करे ताकि हम उनसे मिलकर रिश्ते की बात कर सकें।
                         जब विवेक ने बताया कि उसके माता पिता भावना के माता पिता से शादी की बात करना चाहते हैं तब वो खामोश हो गई थी। प्यार के रंगीन सपने देखते समय भावना इस वास्तविकता को भूल गई थी कि उसके पिता और परिवार के लोग बेहद रूढ़ीवादी मान्यताओं में जकड़े संकुचित सोच के लोग हैं जो किसी लड़की को अपनी मर्ज़ी से प्यार करने और शादी करने की स्वीकृति प्रदान नहीं करने वाले।  जब विवेक ने भावना से ख़ामोशी का कारण पूछा था तब भावना ने बताया था कि उसके समाज और परिवार में बेटियों को अपनी पसंद बताने का कोई अधिकार नहीं दिया जाता है , और अगर उसने ऐसा कुछ किया तो न जाने परिवार के लोग कैसा सलूक करेंगे उसके साथ। भावना ने बताया था विवेक को कि आज तक उसने अपने मन की बात किसी से की नहीं है , न कभी किसी ने जानना चाही है कि उसके दिल में क्या है। इतना तय है कि वो जब भी विवाह करेगी विवेक से ही करेगी अन्यथा किसी से भी नहीं करेगी।  विवेक ने भावना को तसल्ली दी थी कि हम हर हाल में साथ निभायेंगे तुम चिंता मत करो , भावना से उसके घर का पता और फोन नंबर ले लिया था ताकि उसके पिता से विवेक के पापा बात कर सकें। 

              रविवार का दिन था , विवेक के पापा ने भावना के पिता को फोन कर बात की थी। अपना परिचय दिया था , विवेक के बारे भी सब बता दिया था और रंजना से मित्रता और भावना को पसंद करने की बात कही थी और पूछा था कब कैसे मिल सकते हैं आगे की बात करने को।  जैसा भावना के पिता का स्वभाव था उन्होंने तल्खी से सवाल किया था आप किस काम के लिये हमसे मिलना चाहते हैं।  विवेक के पापा ने भावना और विवेक के एक दूसरे को पसंद करने की बात बताकर कहा था कि मिलकर उनका रिश्ता तय करना चाहते हैं। इस बात से बलबीर आग बबूला हो गया था और विवेक के पापा से गुस्से में बोला था हमें आपसे नहीं मिलना है न ही ऐसे रिश्ता करना हम कभी स्वीकार करेंगे , आप बेटे को समझ दें कि भविष्य में भावना से मिलने का प्रयास नहीं करे इसमें उसकी भलाई है , खुद अपनी बेटी को भी हम रोक देंगे।
     भावना के पिता से पापा की  हुई बातचीत विवेक ने फोन पर भावना को बता दी थी जिस को सुन कर भावना परेशान होकर रोने लगी थी। विवेक अब क्या होगा , रोते रोते इतना ही बोल सकी थी। विवेक ने दिलासा दिलाया था तुम घबराओ मत सब ठीक हो जायेगा , अभी शायद अचानक सुनकर उनकी ऐसी प्रतिक्रिया सामने आई है। तुम प्यार से आदर से अपनी ख़ुशी की बात कहोगी तो वो अवश्य समझेंगे बेटी की बात को। मगर भावना को किसी अनहोनी का अंदेशा होने लगा था जो विवेक को नहीं बता सकती थी क्योंकि खुद उसको नहीं मालूम था कल क्या होने वाला है। अगले दिन सुबह ही उसके पिता और दोनों भाई हॉस्टल आये थे और उसको ज़बरदस्ती घर को लेकर चल पड़े थे। किसी ने कोई बात नहीं की थी न ही कोई सवाल ही पूछा था , बस सब सामान उठा कर चल दिये थे।  उन सब के चेहरों पर इक कठोरता और तनाव साफ झलक रहा था जो भावना को भीतर तक डरा रहा था। घर पहुंचते ही जैसे इक पहाड़ टूट पड़ा था , मार पीट , बुरा भला कहना जाने क्या क्या हो गया था। सभी की निगाहों में नफरत ही नफरत थी भावना के लिये जैसे उसने कोई अक्षम्य अपराध कर दिया हो , मोबाइल छीन लिया गया था , ताने मारे जा रहे थे कि तुम वहां पढ़ाई करने गई थी या परिवार की इज्ज़त से खिलवाड़ करने को।  ऐसा लग रहा था  जैसे इक चिड़िया के पर कटकर उसको पिंजरे में कैद कर दिया गया हो। जाने क्या बात थी जो उसको ऐसे में भी कमज़ोर नहीं होने दे रही थी बल्कि और भी मज़बूत हो गई थी अपने इरादे में।  उसने सोच लिया था अपने प्यार की इस परीक्षा में उसने हर बात सहकर भी विचलित नहीं होना है , अडिग रहना है। शायद सच्चा प्रेम ही ये शक्ति प्रदान करता है।

                                     भावना को घर में सब से ऊपर की मंज़िल पर बने इक कमरे में कैद सा कर दिया था , कोई उस से बात तक नहीं करता था। रात तक कुछ भी खाने पीने को नहीं मिला था न ही भावना ने मांगा ही था।  रात को मां उसके लिये खाना लाई थी जो उसने चुप चाप खा लिया था।  लाजो को बेटी के चेहरे पर इक दृढ़ संकल्प दिखाई दिया था जो किसी आने वाले तूफ़ान का ईशारा करता लगा था।  भावना कहीं घर से भागने का प्रयास न करे इस डर से बलबीर ने लाजो को भावना के साथ ही सोने को कह दिया था।  मां बेटी दोनों ही किसी गहरी चिंता में डूबी हुई थीं इसलिये नींद कोसों दूर थी उसकी आंखों से।  लाजो ने प्रयास किया था भावना को समझाने का कि पिता ने तुम्हारे लिये इक लड़का पसंद किया है उस से चुप चाप विवाह कर लो।  माना लड़का पढ़ा लिखा नहीं है फिर भी हमारी तरह ज़मींदार परिवार है धन दौलत की कोई कमी नहीं है , हर सुख सुविधा मिलेगी तुम्हें वहां जाकर।  भावना ख़ामोशी से मां की बात सुनती रही थी , एक शब्द नहीं बोली थी , बस कुछ सोचती रही थी। थोड़ी देर रुक कर भावना बोली थी , " मां मेरा वादा है मैं बिना आपकी सहमति या आज्ञा के कोई कदम नहीं उठाऊंगी , आपको मेरे बेटी होने पर कभी शर्मसार नहीं होना पड़ेगा।  बस एक बार सिर्फ एक बार आज मेरी बात मेरी मां बनकर सुन लो , समझ लो कि तुम्हारी बेटी की भलाई किस में है।  मां मैं चाहती हूं कि अज तुम मुझे ही नहीं खुद अपने आप को भी ठीक से पहचान लो।  मुझे पता है तुमने पूरी उम्र कैसे दुःख सहकर अपमानित होकर रोते हुई बिताई है। मैंने हर दिन तुम्हारे दर्द को समझा है महसूस भी किया है , और चाहती हूं किसी तरह तुम्हारे दुखों का अंत कर तुम्हें ख़ुशी भरा जीवन दे सकूं मैं , मेरी मां।  मां तुम मेरा यकीन रखना तुम्हारी ये बेटी कभी भी तुम्हारे लिये कोई परेशानी नहीं खड़ी करेगी।  मेरी कोई ख़ुशी कोई चाहत कोई स्वार्थ इतना मेरे लिये इतना महत्वपूर्ण नहीं हो सकता जिस की खातिर मैं तुम्हारे दुःख दर्द और बढ़ा दूं।  फिर भी मेरी बात सुन कर इक बार विवेक के परिवार से मिल लोगी तो अच्छा होगा , बहुत ही सभ्य लोग हैं , इक दूजे को सम्मान देते हैं , प्यार से साथ साथ रहते हैं , सवतंत्र हैं किसी बंधन की कैद में कोई नहीं है।  मां कभी सोचा है तुमने , तुम भी इक इंसान हो , तुम्हारा भी कुछ स्वाभिमान होना चाहिए , सम्मान मिलना चाहिए। क्या क्या नहीं करती तुम दिन रात घर की खातिर , कोई कभी तो समझे तुम भी महत्वपूर्ण हो। तुम्हारी अपनी भी कोई सोच समझ है , पसंद नापसंद है , सही और गलत समझने का अपना निर्णय है।  कुछ कर दिखाने की काबलियत तुम में भी है।  तुम कोई पशु नहीं जिसको खरीद लाये और बांध दिया है खूंटे से , बचपन से देखती रही हूं तुम्हें पिता जी की अनुचित बातें सहते भी और उनकी हर बात को मानते भी।  क्या तुम कभी वास्तव में खुश रही हो , क्या हर दिन हर पल तुम इक डर इक दहशत में नहीं रहती रही हो।  क्या ऐसे जीने की कभी कल्पना की थी तुमने या करोगी मेरे लिये भी। 
 
                          भावना की बातें सुन लाजो को अपना बचपन याद आ गया था , जब उसकी मां लाजो को  प्यार से गोदी में लिटाकर समझाती थी कितनी बातें।  कैसे हर समस्या का समाधान साहस पूर्वक किया जा सकता है , कैसे प्यार से आपस में मिलकर रहना सब को अपना बनाना होता है।  लाजो को लगा जैसे आज भावना उसकी मां बन गई है जबकि आज उसको ज़रूरत है मां की।  तब लाजो की नम आंखों को अपने हाथों से पौंछ के भावना ने कहा था  , मां अब रोना नहीं है , मुझे अपने पैरों पर खड़ा होने दो , मैं तुम्हारी सभी परेशानियों का अंत कर दूंगी।  मां अब भले जो भी हो , हम कभी ऐसे मर मर कर नहीं जिएंगी।  मैंने सुन लिया था शाम को छत पर जो मेरे पिता जी ने तुम्हें कहा था कि अगर मैं उनकी पसंद की जगह शादी के लिये नहीं मानी तो तुम्हें मुझे ज़हर देना होगा।  मुझे मालूम है तुम ऐसा नहीं कर सकोगी , कोई भी मां नहीं कर सकती है ऐसा घिनोना कार्य।  हां कुछ कायर लोग विवश करते हैं ऐसा करने को।  अपने झूठे मान सम्मान की खातिर , अपने अहंकार की खातिर , महिलाओं को बलिवेदी पर चढ़ाना चाहते हैं , खुद अपनी आबरू की खातिर अपनी जान कभी नहीं लेते।  मां कितने ढोंगी हैं समाज के लोग , मीरा और राधा के मंदिर बनाते हैं , उनकी पूजा करते हैं और प्यार को अपराध बता कत्ल करते हैं।  अखिर कब तलक परम्पराओं के नाम पर महिलाओं पर अन्याय अत्याचार होगा उनका शोषण किया जाता रहेगा।  क्या हमने पूछा है हर युग में नारी ही अग्निपरीक्षा क्यों दे , आज तुम्हें इस अग्निपरीक्षा से नहीं गुज़रना पड़ेगा।  अगर तुम्हें लगेगा कि मुझे जीने का अधिकार नहीं है तो तुम ज़हर नहीं पिलाओगी , मैं खुद अपने हाथ से पी लूंगी ज़हर।  आज मैं अपने प्यार का अपने जीवन का हर निर्णय तुम पर छोड़ती हूं , मगर बस इतना चाहती हूं कि वो निर्णय तुम अपने विवेक से अपनी समझ से लो न कि किसी और द्वारा थोपे हुए निर्णय को बिना सोचे स्वीकार करो।  लाजो ने भावना को बाहों में भर लिया था , एक अश्रुधारा बह रही थी दोनों की आंखों से।  यूं ही लेटे लेटे दोनों जाने कब सो गईं थी। लाजो की नींद खुली तो उसे खिड़की से सुबह का उगता हुआ सूरज दिखाई दे रहा था , जो शायद इक संदेशा दे रहा था , नये उजाले का , नये जीवन का।
 
  लाजो ने प्यार से जगाया था भावना को और जगाकर कहा था , बेटी अब तुम कोई चिंता कोई डर अपने मन में न रखो , अब तुम अकेली नहीं हो , मैं तुम्हारी मां तुम्हारे साथ हूं  और ढाल बनकर तुम्हारी सुरक्षा करूंगी हर पल हर कदम। बस यही समझ लो कल इक घनी अंधेरी काली रात थी जो समाप्त हो चुकी है , आज की भौर लाई है तुम्हारे जीवन में नया उजाला नई रौशनी। और लाजो अपनी बेटी का हाथ थामे उसको नीचे घर के आंगन में वहां लाई थी जहां सभी बाकी सदस्य बैठे चाय पी रहे थे। और भावना का हाथ थम उन सभी को सामने जाकर खड़ी हो गई थी अपना सर ऊंचा किये जैसा शायद कभी किया नहीं था आज तक। सब समझ गये थे कि लाजो कुछ कहना चाहती है , और समझ रहे थे कि उसने भावना को समझा लिया है। मगर जो कुछ लाजो ने कहा था उसकी उम्मीद किसी को भी नहीं थी। लाजो ने जैसे एलान किया था , मैंने अपनी बेटी से सब कुछ जान लिया है और मुझे उस पर पूरा यकीन भी है। वह समझदार है परिपक्व भी है और अब इस काबिल हो चुकी है कि उचित अनुचित , सही और गलत में अंतर कर सके। मुझे लगता है कि हम किसी रिश्ते को सिर्फ इसलिये गलत नहीं मान सकते क्योंकि वो भावना की पसंद है , न ही कोई रिश्ता इसी लिये सही नहीं हो जाता क्योंकि वो हमने तय किया है। सवाल किसी के अहम का नहीं है , ये हमारी बेटी के जीवन का प्रश्न है , और अपनी बेटी की ख़ुशी को समझना हमारा कर्तव्य है। आज अपने अहम को दरकिनार कर हमें समझना होगा कि भावना की भलाई किस में है। मैं चाहती हूं कि हम सभी शांति से बातचीत करें आपस में और इक दूजे की भावनाओं का आदर करें। इसलिये हमें इक बार जाकर विवेक और उस के परिवार से मिलना चाहिये और अगर हमें उनमें वास्तव में कोई कमी नज़र आये तो हम भावना को समझा सकते हैं। और अगर कुछ भी ऐसा नहीं है तो हमें अपनी बेटी की बात को स्वीकार करना चाहिये। सब से पहले आज एक बात सभी समझ लें कि आज के बाद मेरे साथ , भावना के साथ अथवा परिवार की किसी महिला के साथ मार पीट , हिंसा कदापि सहन नहीं की जायेगी। जिस तरह से बेबाकी से लाजो ने ये बातें कहीं उसको सुन कर बलबीर सहित सभी दंग रह गये थे , ये रूप किसी ने पहले नहीं देखा था। एक ही रात में ऐसा बदलाव चकित करने की बात थी , फिर यहां तो वो नज़र आ रहा था जिसकी कल्पना तक किसी ने नहीं की थी। पूरे आत्मविश्वास से बुलंद आवाज़ में निडरता पूर्वक अपना पक्ष रख कर लाजो ने सभी को सकते में डाल दिया था , और किसी से भी जवाब देते नहीं  बन रहा था।

              थोड़ी देर में बलबीर उठ खड़ा हुआ था , और लाजो की तरफ देख कर बोला था , ये क्या हो गया है तुम्हें , जो तुम सारे समाज को चुनौती देने जैसे बातें कर रही हो। ऐसा कर के तुम कहीं की नहीं रह जाओगी। वास्तव में लाजो ने बलबीर को भीतर से हिला कर रख दिया था , और उसको लगने लगा था कि उसका शासन और मनमानी अब और नहीं चल सकेगी। फिर भी वो अपनी बेचैनी और घबराहट को छिपाने का प्रयास कर रहा था , ताकि सभी को मानसिक तौर से अपने अधीन रख सके। लाजो बलबीर की बात सुन कर ज़रा भी नहीं घबराई थी और उसी लहज़े में जवाब देते बोली थी , आज मुझे क्या मिला या क्या खोया है की बात नहीं करनी मुझे , मुझे बस भावना की बात करनी है।  उसकी शिक्षा को बीच में नहीं रोक सकता कोई भी , ये उसका अधिकार है अपना भविष्य बनाने का , जो किसी भी कारण वंचित नहीं किया जा सकता। मैं उसको हॉस्टल छोड़ने जा रही हूं और मुझे रोकने का प्रयास मत करना कोई भी।  कोई मां जब दुर्गा बन जाती है तो अपनी बेटी की खातिर सब कर गुज़रती है , आज मैं इक तूफान बन चुकी हूं जो रोकने वालों को तिनके की तरह हवा में उड़ा देता है। ये मत समझना कि मैं आप पर निर्भर हूं  मैं खुद आत्मनिर्भर हो सकती हूं  लेकिन आपने अभी शायद दूर तक नहीं सोचा है। अपनी बेटी या पत्नी को जान से मारने वाले को कौन अपनी बेटी देगा , हमें मार कर खुद आपका जीना भी दुश्वार हो जायेगा ये सोचना। अपने दोनों बेटों का ब्याह नहीं कर सकोगे ऐसा अपराध करने के बाद।  कैसी विडंबना है कि जो खुद अपराध करना चाहते हैं वही न्यायधीश बन कर फरमान जारी करते हैं। लेकिन हम मां बेटी फैसला कर चुकी हैं कि भले जो भी अंजाम हो अन्याय की इस अदालत के सामने हम अपना सर नहीं झुकायेंगी।
              
   तभी दरवाज़े की घंटी बजी थी , लाजो किवाड़ खोलने जाने लगी तो बलबीर ने उसको रोक दिया था , मैं देखता हूं इतनी सुबह कौन आया है। तुम दोनों चुप चाप कमरे के अंदर चली जाओ और ये ख्याल दिल से निकाल दो कि हम तुम्हें इस तरह कहीं भी जाने देंगे।  मुझे ऐसे ठोकर लगाकर नहीं जा सकती हो तुम। लाजो ने बलबीर की बात का कोई जवाब नहीं दिया था। घर की घंटी फिर से बजी थी और कोई बाहर से ऊंची आवाज़ में बोला था बलबीर दरवाज़ा खोलो। जैसे ही बलबीर ने किवाड़ खोला था कई लोग एक साथ भीतर आ गये थे , पुलिस , प्रशासनिक अधिकारी , महिला संगठन , मानवाधिकार कार्यकर्ता आदि। बलबीर और बाकी परिवार के सदस्य आवाक रह गये थे। आते ही अधिकारी ने पूछा था लाजो कौन है , और उनकी बेटी भावना कहां है। लाजो और भावना सामने आ गई थीं और कहा था हम दोनों हैं जिन्होंने आपसे यहां आने की गुहार लगाई थी।
हमने ही फोन किया था मीडिया को आप सभी को भी सूचित करने को , परिवार के लोग भावना को जान से मारना चाहते हैं और मुझे भी इनसे जान का खतरा है , लाजो ने बताया था। हम अपनी मर्ज़ी से घर को छोड़ कर जाना चाहती हैं , हम स्वतंत्र नागरिक हैं और अपनी इच्छा से जीने का हक हमें है। आप इन लोगों को समझा दें ताकि ये हम से अनुचित व्यवहार नहीं करें। 

           प्रशासन के अधिकारी और पुलिस अफ्सर ने परिवार के सभी सदस्यों को ताकीद कर दी थी कि आप लाजो और भावना की ज़िंदगी में कोई दखल नहीं दे सकते , हमारा दायित्व है उनको सुरक्षा देना और किसी को भी अपने मनमाने नियम बनाकर दूसरे पर थोपने का अधिकार नहीं है।  आप क़ानून को अपने हाथ में नहीं ले सकते हैं।  ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उस रूढ़ीवादी घर की सारी दीवारें खोखली होकर हिलने लगी हों और कभी भी गिर सकती हों।  लाजो और भावना इक दूसरे का हाथ मज़बूती से थाम कर घर से बाहर जाने लगी तो सभी खामोश देखते रह गये थे।  कोई उनको रोकने का साहस नहीं कर सका था , वो दोनों चली गईं थी और उनके जाने के बाद अधिकारी लोग भी। घर के बाकी सदस्य स्तब्ध खड़े घर के खुले दरवाज़े को देख रहे थे। 

                         13         वास्तविकता ( कहानी ) 

               रचना जब तक रोग-ग्रस्त रही , सुरेश रात-दिन उसके पास रहा देखभाल को , तभी इतनी गंभीर दशा से निकल कर फिर से पूरी तरह स्वस्थ हो सकी। आज दोबारा वही सवाल रचना के मन में आया और उसने सोचा आज साफ साफ पूछ ही लेती हूं। वो सुरेश से बोली क्या अभी भी तुमको नहीं लगता कि मैं ही वही लड़की हूं जिस से तुम्हें बहुत पहले ही विवाह कर लेना चाहिए था। सुरेश ने जवाब दिया , रचना मुझे तुमने इक बात कही थी बहुत साल पहले , मुझे आज भी याद है तुम भी भुला नहीं पाई होगी उस बात को। रचना ने कहा बिल्कुल याद है , मैंने यही कहा था सुरेश मैं तुम से अथाह प्रेम करती हूं , अगर शादी करूंगी तो सिर्फ तुम्हीं से। सुरेश ने याद दिलाया हां ये तो कहा था मगर इक बात और भी तुमने कही थी , कि अगर मैंने तुझे छोड़ किसी और लड़की से शादी की तो तुम जान दे दोगी। रचना बोली कही थी ये भी बात क्योंकि नहीं जी सकती तुमसे बिछुड़ कर , लेकिन तुमने नहीं बताया कि तुम मुझ से नहीं तो और किस से शादी करना चाहते हो। सुरेश ने कहा देखो रचना तब भी मैंने तुमसे यही कहा था कि हम बचपन के दोस्त हैं लेकिन मेरे मन में कभी तुम्हारे प्रति वो भावना नहीं आई कि मुझे तुम्हीं से विवाह करना चाहिये। बेशक मुझे और भी किसी लड़की से प्यार का कोई एहसास नहीं हुआ , मगर तुमने तब खुद कहा था कि तुम उस दिन का इंतज़ार करोगी जिस दिन मेरे दिल में भी वही भावना पनपेगी कि मुझे सिवा रचना के किसी से शादी नहीं करनी है। हम दोनों में कभी कोई झगड़ा नहीं हुआ , कोई अनबन नहीं मतभेद नहीं , तुम में कुछ भी कमी भी हर्गिज़ नहीं है , फिर भी मुझे नहीं पता क्यों मुझे उस तरह का एहसास हुआ नहीं जो तुम चाहती थी और चाहती हो आज भी। रचना आज जब हम दोनों पचास साल से अधिक आयु के हो चुके हैं , अकेले अलग अलग रहते भी अच्छे मित्र बने हुए हैं , तब मुझे फिर से पुराना सवाल अनावश्यक लगता है। मगर क्योंकि तुम्हें ये सवाल बेचैन करता रहता है तो हमें इसका उत्तर तो खोजना ही होगा। रचना क्यों न हम अपने गुरु जी से इस बारे चर्चा करें , वो इन दिनों यहीं आकर ठहरे हुए हैं थोड़े दिन को। रचना ने कहा सही बात है , तुम जाकर मिलो गुरु जी से और उन से अकेले में मिलने का समय ले सको तो मैं साथ साथ चल कर उन्हीं से पूछना चाहती हूं , शायद वही मेरी दुविधा को दूर कर सकते हैं।
                     सुरेश ने जब गुरु जी को बताया कि रचना तंदरुस्त नहीं है और आपसे मिलना भी चाहती है , तब वो स्वयं ही शिष्या से मिलने और उसका हालचाल पूछने चले आये रचना के घर। रचना की तबीयत की बात जानने के बाद गुरु जी बोले , बताओ बेटी आपको क्या पूछना है मुझ से। रचना ने तब अपने और सुरेश के बारे सब कुछ बताकर पूछा , गुरु जी मैंने इतने साल तक इंतज़ार किया है , तब भी सुरेश के दिल में अपने लिए प्यार क्यों नहीं जगा पाई। गुरु जी ने रचना से पूछा , बेटी क्या तुम मानती हो कि तुम सुरेश से सच्चा प्यार करती हो , जबकि सुरेश के मन में वो भावना नहीं है। रचना ने जवाब दिया गुरु जी मुझे तो यही लगता है। गुरु जी बोले बेटी तुम्हारा विचार सही नहीं है। मुझे लगता है सुरेश ही है जो तुम से सच्चा अटूट और अथाह प्यार करता है , तभी उस ने तुम्हारी ख़ुशी को समझ कहीं और विवाह की बात सोची तक नहीं , इस डर से कि तुम कुछ अनर्थ नहीं कर बैठो। तुम शायद आकर्षित रही हो सुरेश के प्रति , उसको पाना भी चाहती हो , मगर प्रेम कभी विवश कर हासिल नहीं किया जाता है। बहुत मुमकिन है अगर तुमने कोई शर्त नहीं रखी होती अपनी जान देने  की , और कहती सुरेश तुम्हें जिस किसी से भी शादी करनी हो कर लेना , मुझे किसी दूसरे से नहीं करनी फिर भी तुम्हारी ख़ुशी में खुश रह लूंगी अकेली रह के भी। तब मुझे लगता है सुरेश खुद ही तुम से कह देता मुझे तुम से अच्छी लड़की कोई नहीं मिल सकती। जैसा तुम मानती रही हो रचना , वास्तविकता उस के विपरीत है। जितना प्यार सुरेश के मन में है तुम्हारे लिए , तुम्हारा प्यार उसके लिए उसके सामने कुछ भी नहीं। रचना बेटी तुमने प्यार को समझा भी नहीं जाना भी नहीं , आज रचना को पहचान हो गई थी प्रेम  की। सुरेश ही नहीं रचना भी समझ गई थी वास्तविकता। 

                         14     फुर्सत नहीं ( लघुकथा ) 

बचपन के दोस्त भूल गये थे महानगर में रहते हुए। कभी अगर पुराने मित्र का फोन आ जाता तो हर बार व्यस्त हूं , बाद में बात करना कह कर टाल दिया करते। कहां बड़े शहर के नये दोस्तों के साथ मौज मस्ती , हंसना हंसाना और कहां छोटे शहर के दोस्त की वही पुरानी बातें , बोर करती हैं। लेकिन जिस दिन एक घटना ने बाहर भीतर से तोड़ डाला तब यहां कोई न था जो अपना बन कर बात सुनता और समझता। महानगर के सभी दोस्त कहां खो गये पता ही नहीं चला। तब याद आया बचपन का पुराना वही दोस्त। फोन किया पहली बार खुद उसे अपने दिल का दर्द बांटने के लिये। तब मालूम हुआ कि वो कब का इस दुनिया को अलविदा कह चुका है। पिछली बार जब उसका फोन आने पर व्यस्त हूं कहा था तब उसने जो कहे थे वो शब्द याद आ गये आज। बहुत उदास हो कर तब उसने इतनी ही बात कही थी
    "दोस्त शायद जब कभी तुम्हें फुर्सत मिले हमारे लिये तब हम ज़िंदा ही न रहें"।

    तब सच्चे मित्र को नहीं पहचाना न ही उसकी भावना को समझा , उसका हाल पूछा न उसका दर्द बांटना चाहा तो अब उसको याद कर के आंसू बहाने से क्या हासिल।


                    15     भूली बिसरी कहानी  ( लघुकथा ) 

       बनने को तो ये उनकी कहानी उपन्यास भी बन सकती थी , मगर अब ज़िंदगी शीर्षक से लघुकथा बनकर रह गई है। अभी कुछ दिन हुए उसी मेरी लिखी पुरानी कहानी के दूसरे पात्र से फिर से मुलाकात हो गई। पहले आशिक से बात होती थी उसकी महबूबा का इतना ही पता उसने बताया था कि उस नाम की फेसबुक किसी दोस्त के बनाई है मगर फेसबुक पर रहती नहीं है केवल नाम को बना रखी है। उसने मेरी कुछ रचनाओं को कॉपी पोस्ट किया हुआ था जो मुझे पसंद नहीं और मुझे उसको ब्लॉक करना ही उपाय लगा। मगर इक दिन राह चलते अजनबी व्यक्ति से सफर में बात हुई तो मेरा नाम सुनकर उसने बताया कि अभी जिस लड़की से मिलने गया हुआ था वो मेरी रचनाओं की पाठक है और प्रशंसक भी है। सफर में उसने अपनी प्रेम कहानी बताई और लिखने को भी कहा नाम बदलकर। फिर मुलाकात नहीं हुई मगर कुछ महीने फोन पर बात करता रहा और जो जो होता बताया मुझे। अभी अधूरी थी कहानी मगर बाद में पता चला उस लड़की की किसी सहेली ने उनको घर से भागकर शादी करने में सहयोग दिया। उस आशिक का नंबर बदल गया और सालों से फिर बात नहीं हुई। 
 
                                कुछ दिन पहले फेसबुक पर दोस्त बनाया तब पता चला ये वही है। मगर समझ नहीं आया माजरा क्या है। फेसबुक पर विवाहित पति पत्नी की तस्वीर देखी तो हैरान हुआ , ये कोई और है जो मुझे मिला वो तो नहीं है। अपने दुविधा मिटाने को मैसेज किया शायद आप वही हैं जिनकी बात मुझे बताई थी किसी ने। कुछ दिन बाद जवाब मिला आपको याद है , मैंने कहा आपने ही कहानी में अपनी पसंद का नाम प्रेमी का दिया था ये भी याद है। पता चला जिस से इश्क़ किया था और घर से भागकर बगावत कर साथ साथ रहे उससे निभी नहीं और वापस घर चली आई है और अब शादी किसी और से की है। वास्तव में आधुनिक युग में ऐसा ही इश्क़ होता है जो कब आशिक और महबूबा के दिमाग से इश्क़ वाला भूत उत्तर कर ज़िंदगी की असलियत को समझने लगता है और भावना की बात त्याग देता है कोई नहीं जनता। मुझे कहा है जो बातें आपको बताई थी उसके आशिक़ ने किसी को मत बताना।  क्या नहीं बताना मुझे नहीं पता कोई भी बात राज़ की रही नहीं और किसी और को मैंने उनका नाम भी नहीं बताया अभी तक।  राज़ को राज़ ही रहने तो दूं मगर राज़ है क्या मुझे समझ नहीं आया। विवाह की शुभकामनाएं और उन दोनों का साथ इस जन्म बना रहे यही दुआ है।  अगले जन्म में कौन क्या होगा भगवान जाने।

                   16      कहानी नहीं है ( बेबसी जुर्म है ) 

   ऐसा हुआ विश्वास करने में अभी भी समय लगेगा। किसी फ़िल्मी कहानी में भी इतना शायद ही देखा हो। जो टीवी पर सीआईडी की तरह के शो में कहानी होती है ये उस से ज़्यादा उलझी हुई है। इस की पटकथा किस ने लिखी कभी कोई नहीं समझ सकेगा। कुछ पड़े लिखे सभ्य दिखाई देने वाले और धर्म और धार्मिकता की बड़ी बड़ी बातों से खुद को समाज की भलाई के पैरोकार समझने वाले या फिर ऐसा होने का लबादा ओढ़े लोग लगता था कितने भले हैं लेकिन वास्तव में अपना जाल बुनकर बिछा चुके थे। और हम इक छोटे शहर के खुद को शिक्षित समझने वाले परिवार के सभी सदस्य इस कदर नासमझ थे कि सामने देख भी नहीं देख पाये कि कोई हमें अपने जाल में फ़ांस रहा है। हमारे ही बीच से किसी को अपनी बातों से प्रभावित कर लिया था इस हद तक कि वो अपनी ही ज़िंदगी को दांव पर लगाने को राज़ी हो गया। जैसे किसी ने सम्मोहित कर लिया हो और अपने इशारों पर नचाता हो फिर भी ज़हर पीने वाला चुपचाप जानते हुए ज़हर पी जाये। उसे अभी भी लगता है ये उसकी शराफत थी जो उसने पहले से बता दिया था कि हम तुम्हारी ज़िंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं। वो जनता था कुछ दिन बाद ये राज़ खुलना ही है और सबसे बड़ा दोषी वही ठहराया जायेगा , इस तरह उसने बड़ी चालाकी से खुद को बचाने का उपाय कर लिया था। अपने को सब से समझदार समझने वाले हमारे परिवार के सदस्य को अपनी समझ और काबलियत पर इतना भरोसा था कि उसने सब जानते हुए भी अपने ही घर में किसी को नहीं बताया कि हम सब को कैसे ज़हर देने का काम किया जा रहा है। आज भी हम नहीं जानते कि हमारे साथ क्या हुआ क्यों हुआ , और हम समाज की परम्पराओं और मर्यादा के नाम पर लब सी कर अपने ही कातिलों को मसीहा कहते हैं ये जानते हुए भी कि वो मसीहा होने का लबादा ओढ़े हुए वास्तव में इंसान भी नहीं हैं। शायद मेरी गलती या भूल ही नहीं हद दर्जे की मूर्खता है जो मैंने इस ज़माने में हर किसी पर भरोसा करना छोड़ा नहीं बार बार धोखे खाने के बाद भी। आखिरी वक़्त तक मुझे ये एहसास होता रहा था कहीं कोई गड़बड़ है कुछ खतरा है और अंतिम पल तक वापस लौट जाना चाहिए। ये इक कठिन फैसला था जो मेरे इलावा कोई नहीं ले सकता था , मगर शायद हमेशा की ही तरह मुझे में आत्मविश्वास की कमी भी थी और बाकी लोगों पर अपने से बढ़कर भरोसा करने की आदत भी। सब समझाते रहे जैसा मुझे लगता है उस तरह का नहीं है और सब सही हो जायेगा बस थोड़ा आपसी समझ का अंतर है। नहीं अब कुछ भी नहीं हो सकता , अभी भी साहस नहीं कोई निर्णय लेने का , अब कोई राह ही नहीं बची है। आज कोई फैसला जो जो गलत हुआ उसे फिर से सही नहीं कर सकता है। जीवन भर इक दर्द तड़पाएगा मुझे , किसी कांटों की सेज पर सोने जैसा जो चैन से नहीं जीने देगा। पता नहीं यहां भगवान की बात करनी चाहिए भी अथवा नहीं , क्योंकि भगवान कभी किसी का बुरा नहीं करता है , भगवान कभी बुरे लोगों का साथ नहीं दे सकता। मगर भगवान उस पर भरोसा रखने वालों को बचा तो सकता है। उसने शायद समझाना भी चाहा मगर मुझी को समझ नहीं आया तब क्या करना चाहिए लेकिन आज अब इतना तो सोचता ही हूं कि क्या वास्तव में भगवान ऐसे जालसाज़ी धोखा छल कपट करने वालों को माफ़ कर देगा। कुछ भी नहीं है मेरे हाथ में सिवा उस भगवान पर भरोसा करने के कि ये सब जो भी जैसे भी हुआ तुम्हें ही इसे ठीक भी करना है और हम सभी की ज़िंदगी की कहानी को सुलझाना भी है। इक बात अब तय करनी ही है कि मैं अपने कातिलों को अपराधियों को मुजरिमों को जीवन भर माफ़ कभी नहीं कर सकता , बेशक मैं बेबस हो गया हूं और लाचार भी। इस बात को भूल जाना संभव भी नहीं और भुलाना भी गुनाह है।

                   17      मौत महबूबा है मेरी ( व्यंग्य कथा ) 

         दिल कह रहा है यहीं कहीं आस पास ही हो , जानती हो कब से राह तक रहा हूं। फिर भी तड़पा रही हो इस कदर बेचैन हूं मैं तुम्हारे लिये कि इक इक लम्हा मुश्किल से गुज़रता है। आज फिर चाहता है दिल चुपके से आओ और मेरी आज की रात की सुबह को रोक लो। हर सुबह जागता हूं तो उदास हो जाता है दिल मेरा कि रात भर इंतज़ार किया सपने देखे अपनी खूबसूरत महबूबा से मिलन की घड़ी के और टूट गए रोज़। बस दबे पांव आना किसी को ज़रा भी आहत नहीं होने देना , कहीं कोई रोकने की नाकाम कोशिश नहीं करे। तुम जानती हो मैं कितनी बार खुद चलकर आना चाहता था तुमसे मिलने मगर बिना किसी के रोके भी रुक गया यही समझ कर कि मुझे नहीं जाने देगा कोई। ये ज़िंदगी कितनी ज़ालिम है जीने नहीं देती और साथ भी नहीं छोड़ती। ज़िंदगी नहीं चाहती कोई उस पर इल्ज़ाम लगाए मुझसे बेवफ़ाई का और मैं अपने पर तोहमत नहीं लगने देना चाहता कि उसे बीच राह छोड़ दिया। मगर इतना मुझे पता है ज़िंदगी को नहीं है मुझसे मुहब्बत तो क्या तुम तो मुझे चाहती हो और बहुत प्यार से साथ अपने ले जाओगी। लोग कविता ग़ज़ल कहानी लिखते हैं अपनी माशूका के नाम , मैंने तो सब तुम्हारे नाम किया है जो भी लिखा अभी तलक। इतनी शिद्दत से किसी ने किसी को नहीं चाहा दुनिया में। मांगने से ज़िंदगी नहीं मिलती न ही मौत ही आती है। मैंने दोनों की भीख नहीं मांगी है , ज़िंदगी ने कभी नहीं चाहा और कदम कदम ठोकर लगाई है फिर भी कोई गिला शिकवा शिकायत लब पर नहीं लाया मैं। तुम तो सबको अपनाती हो मुझे भी बना लो अपना अब तो। और नहीं होता इंतज़ार मुझसे। 
 
                               मैंने हमेशा तुम्हारी बड़ी सुंदर सी छवि मन में बनाई हुई है। अपने कोमल हाथों से बड़े आराम से छू कर मुझे प्यार से बुलाओगी कहकर कि आ गई मैं तुम बुला रहे थे कितने सालों से। माना आने में देरी हुई है मगर जब आई हूं तो तुम्हारे दिल की चाहत तुम्हारे अरमानों को सुकून तो मिला है अब। बस जितने दर्द थे जितनी परेशानियां थीं जो जो कठिनाइयां थी सब मुझे दे दो और तुम मेरी आगोश में आकर चैन की नींद सो जाओ। मौत तुम दुनिया की सबसे खूबसूरत रचना हो , कितनी दयालु हो कितनी नर्मदिल हो। ज़िंदगी तो केवल इक रास्ता है तुम तक जाने का तुम से मिलकर एकाकार हो जाने का , ज़िंदगी का हासिल और कुछ भी तो नहीं। ज़िंदगी होती ही है तुम से मिलने की खातिर। कोई भी नहीं है जो जीने से तंग आकर कभी न कभी तुम्हीं को नहीं पुकारता हो। जाने क्यों कुछ लोग जीना चाहते हैं और तुमसे बचना चाहते हैं , दूर भागते हैं मगर कितनी दूर तक भाग सकते हैं। नहीं जब भी तुम आओगी मुझे अपनी तरफ बाहें फैलाए पाओगी। शायद वही इक पल मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत पल होगा। जन्म जन्म का मिलन झूठ है वास्तविक मिलना तो वही होगा तुम्हारा और मेरा अटूट मिलन। 
                      मुझे लग रहा है जैसे मेरे बदन को जितने कांटे चुभ रहे हैं छलनी छलनी हुआ है मेरा बदन दुनिया के ज़हर भरे नफरत के तीरों से , ज़ख्म बेहिसाब जो नासूर बन चुके हैं इक तुम्हारे स्पर्श से सब गायब हो जाएंगे और मेरा बदन नाज़ुक फूलों की सेज पर रेशमी एहसास लिए आराम से सो रहा होगा। मेरा इक ख्वाब है जो मुमकिन नहीं पूरा हो मगर अगर ऐसा हो तो शायद मेरी हर आरज़ू दिल की हर तमन्ना पूरी हो जाएगी और मुझे फिर ज़िंदगी से दुनिया वालों से कोई गिला नहीं रहेगा। मेरे जीने का कोई हासिल मुझे नहीं हुआ शायद मारकर ही कुछ हासिल कर सकूंगा। तुम मुझे अपने सीने से लगा लेना उसी तरह जैसे कोई मां अपने बच्चे को लगाती है। जिनको ज़िंदगी से मुहब्बत है उन्हें ज़िंदगी मुबारक हो , हम तो आशिक़ हैं मौत तुम्हारे। मौत का दिन कितनी इंतज़ार के बाद आता है तभी तो और हसीं लगती है कयामत।

              18     चलो काम आ गई दीवानगी अपनी ( कथा कहानी ) 

      हर कहानी कहानी होती है मगर हर कहानी की भी कोई कहानी होती है। कोई कोई ग़ज़ल महफ़िल को सुनानी होती है , कोई होती है जो उनको समझानी होती है। कहानी की सफलता इसी में छुपी हुई है कि जो हक़ीक़त है सबको फ़साना लगती है। बात जाएगी बहुत पीछे भी और आगे भी मगर शुरुआत आज की बात से। थोड़ी हैरानी हुई जब उनका फोन आया मुझे कहने लगे ऐसी बेबाकी आपकी जान की दुश्मन नहीं बन जाये किसी दिन। आजकल सब डरते हैं आपको डर नहीं लगता , किस किस पर व्यंग्य बाण चलाते हो। शुभचिंतक हैं तभी आगाह कर रहे हैं सच कहें बहुत भाते हो। जी ये वही हैं जो दोस्त हैं मगर रकीब जैसे हैं , नहीं कोई इश्क़ विश्क की बात नहीं है लिखते हैं मगर खुद को जाने क्या समझते हैं , किसी को अपने बराबर नहीं मानते। किसी ने किसी और शहर से मेरे बारे पूछा था तो जवाब था कौन है ऐसे किसी लेखक को हम नहीं जानते। जी जानते हैं पहचानते हैं मेरे पास आते हैं बतियाते हैं , बस मानते नहीं हैं। मनवाना हमने भी ज़रूरी नहीं समझा।

     दो घंटे बाद खुद आ गए और राज़ बता गए , फोन किया नहीं करवाया गया था। वीआईपी जैसी शख्सियत है उनकी , उनका कहा मना कौन करता। इसको आप चेतावनी समझ सकते हैं मगर मेरा कोई लेना देना नहीं है। मैंने कहा जनाब उनको बता देना खुद हमारी यही चाहत है , कत्ल होने की आदत है। नहीं समझ आई उनको मेरी बात , लगा शायद मज़ाक कर रहा हूं। मैंने कहा देखो आप अकेले ही नहीं तमाम शहर वाले अपने पराये सब सोचते हैं मैं जो लिखता हूं किसी पर असर नहीं होता और मैं बेकार कलम घिसाता रहता हूं। अगर इतना बड़ा कोई शख्स मेरी सच्चाई से घबराता है और मुझे डराता है धमकाता है और सज़ा देने को आतुर है तो मेरा लिखना वास्तव में सार्थक है। देखो मरना तो एक बार सभी को है साहस से जीकर मरना बेहतर है कायरता से ज़िंदा रहने से कहीं।

            न जाने क्या सोचकर उन्होंने बात बदल दी। और शायरी की बात करने लगे। अचानक बोले आप निडर हैं तो फिर कभी न कभी किसी न किसी से इश्क़ किया होगा। मुझे उनसे ऐसा सबूत मांगने की उम्मीद कदापि नहीं थी। मैंने कहा जनाब इस उम्र में खुदा खुदा करते हैं आप क्या बेलज्ज़त गुनाह करते हैं। पर वो नहीं माने और कहने लगे प्रेम विवाह किया होगा आपने। जी नहीं मैंने उनको देखा ही नहीं था बताया। कोई तो कभी मिली होगी आपको जिसको देख कर दिल धड़कता होगा , इतनी अच्छी कविता ग़ज़ल यूं ही तो नहीं लिखते हैं आप। मैंने उनको सच बताना ही उचित समझा , मैंने बताया कि आपकी तरह कॉलेज का एक सहपाठी मुझे डरपोक बताया करता था और शर्त लगाता था मैं किसी से प्यार नहीं कर सकता क्योंकि मुझमें किसी लड़की से बात करने की हिम्मत ही नहीं है। मगर उसको भी बताया था मैं जैसी लड़की चाहता हूं अपने प्यार के लिए कोई नज़र नहीं आती मुझे। आपको कैसी महबूबा की तलाश थी यही बता दो भाई , उनकी ज़िद फिर उसी विषय पर अड़ी हुई थी , दिल की बात बतानी नहीं चाहिए अपने रकीब जैसे दोस्त को। मगर अब बताने में जाता कुछ भी नहीं। कोई सिलसिला ही नहीं , याद आई अपनी ग़ज़ल।

                 फिर नये सिलसिले क्या हुए , सब पुराने गिले क्या हुए।

    मैंने कहा , कोई होती कविता सी कोमल ग़ज़ल जैसे नाज़ुक। जिसे सोने चांदी के गहने नहीं मुहब्बत की चाहत हो। प्यार ही जिसको लगती सबसे बड़ी दौलत हो। मुझे जो ख्वाब में दिखाई देती है वही बिल्कुल वही हक़ीक़त हो। अब उनको लगा वास्तव में ऐसे दीवाने से कौन दिल लगाता और सपनों की असलियत कौन किसे समझाता। तो मिली कोई , आखिरी सवाल उठते उठते किया बेदिली से। मैंने कहा जी मिल गई है , मेरी शायरी मेरी कविता मेरी ग़ज़ल मेरी कहानी ये सब मेरा इश्क़ ही तो है मेरा जूनून है। हर पल यही साथ है और किसी के लिए दिल में जगह बची ही नहीं। ये आपकी दीवानगी आपको जाने कब ले डूबेगी कहकर बाहर निकल गए वो मुझे अकेला छोड़ कर। चलो काम आ गई दीवानगी अपनी।

                 19     तीसरा जहां ( अफ़साना ए मुहब्बत ) 

     खुदा ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु ईसामसीह जो भी नाम उसका है उसने दो जहान बनाये थे यही सब जानते हैं। इक जहां धरती आसमान नदियां समंदर पेड़ पौधे पशु पक्षी हवा पानी आग जाने कितना कुछ बनाया इस दुनिया में और खो गये सभी उसको खोजने में जो भी नहीं था उसे बनाने में। मगर यही भूल हुई कि विधाता की बनाई दुनिया में विधाता बनना संभव ही नहीं था। ये जिस का रचाया खेल है उसने ही तय किया हुआ है कि जब जो भी विधाता बनने की कोशिश करेगा उसका नामो निशान बाकी नहीं रहेगा। मगर इंसान के दिमाग में ये खलल हमेशा बनी रहे विधाता रुपी खिलाड़ी का खेल यही है। हमेशा से लोग जन्नत स्वर्ग वैकुंठ जैसे जहान की बातें कर अपना उल्लू सीधा करते रहे , खुद लोभ मोह लालच करने और दुनिया वालों को इन में नहीं फंसने की शिक्षा देकर। मगर कभी कभी इसी दुनिया में ऐसे भी लोग हुए जिनको ये दुनिया नहीं भाती थी और दूसरी दुनिया स्वर्ग नर्क जन्नत दोजख वाली की भी चाहत नहीं थी। उन्होंने हमेशा कल्पना की थी इक तीसरी दुनिया की जिस में प्यार हो मुहब्बत हो अपनापन हो फूल हों चांदनी हो और कुछ भी खराब नहीं हो। वो लोग किसी धर्म देश वर्ग भेद की बात नहीं करते थे और इश्क़ में अपनी अलग दुनिया बसाने की बात किया करते थे प्यार की मुहब्बत की दुनिया। आज आपको उस दुनिया की सैर करवाते हैं। 
 
           अभी अभी दो नये बशिंदे आये हैं फरिश्ता उनको लाया है और छोड़ गया है ठीक उसी तरह जैसे बाकी युगल आये हैं बारी बारी। परंपरा की तरह उनका अभिनंदन किया जा रहा है और बताया जा रहा है अब आप आज़ाद हैं सुरक्षित हैं और इस अपनी दुनिया में रह सकते हैं। शर्त केवल सच्चे प्यार को बनाये रखने की है सब इस जहान में सिर्फ और सिर्फ प्यार करते हैं कोई तकरार नहीं कोई झगड़ा लफड़ा हर्गिज़ नहीं। साथ मिलकर नाचने झूमने गाने के बाद सब पहले के बशिंदों ने उन से उनकी मुहब्बत की कहानी पूछी। ये भी पूछा कि क्या आजकल भी लोग उनकी तरह प्यार मुहब्बत इश्क़ करते हैं। इस पर नये आये दोनों ने सवाल किया ये बताओ इस दुनिया में इंटरनेट सोशल साइट्स स्मार्ट फोन की सुविधा किस तरह मिल सकती है। ये सब क्या होता है और आपको उसका करना क्या है। वो बता रहे हैं जिस समय आप ने प्यार मुहब्बत की बातें की तब क्या ख़ाक मज़ा हासिल हुआ होगा आजकल फेसबुक और व्हाट्सएप्प सोशल मीडिया के बिना कोई भी काम नहीं मुमकिन है। रात दिन संदेश विडिओ कालिंग और मौज मस्ती किया करते हैं सभी आशिक़। अब वो बात नहीं कि कोई छोड़ जाता है तो पागल बन ढूंढते रहो अगले पल कोई और सामने मिल जाता है। सात जन्म साथ की बात कोई नहीं करता सब जब तक निभती है साथ साथ होते हैं जब नहीं निभती तो अलविदा कहने में संकोच नहीं करते हैं। जान हो कहना ठीक है मगर जान कहने का मतलब जान से हाथ धोना नहीं है। पहली नज़र वाला प्यार अब नहीं होता है सोच समझ कर खूब हिसाब लगाकर चुनते हैं कौन सब से अच्छा विकल्प है। लड़का हो चाहे लड़की हो दोनों के पास और भी लोग रहते हैं किसी एक पर दिल आने की बात नहीं है। साल दो साल बाद भी किसी को लगता है अभी भी बंधन नहीं है विवाह करने से पहले कोई भी बहाना बना सकते हैं। घर वाले नहीं मानते हैं या कोई दूसरी मज़बूरी जता देते हैं। अधिकतर लोग समझदार हैं और उनको भी उस से बेहतर कोई दूसरा मिल जाता है। कभी कभी कोई सोचता है मैं इसको छोड़ दूंगा मगर दूजा उसके छोड़ने से पहले ही छोड़ जाता है। कोई तो कहता है बेवफाई करने से अच्छा है जुदा हो जाना। 
           आपके वक़्त कोई विरला आशिक़ महबूबा हुआ करते थे इधर कोई बचा नहीं जिसको कोई भी नहीं मिला हो। ऐसे ऐसे युगल मिलते हैं कि लोग हैरान होते हैं उनको इश्क़ हुआ किस तरह होगा। मगर इक खेल है और हर कोई खिलाड़ी है। वेलेनटाईन डे पर हर साल लोग पुराने को छोड़ नया बना लेते हैं अवसर मिलने की बात है। लेकिन पहले की तरह इश्क़ आसानी से नहीं हासिल होता है , मुहब्बत का भी बहुत बड़ा बाज़ार है और कारोबारी लोग करोड़ों की कमाई करते हैं। टीवी सीरियल और फिल्म वालों ने जो पहले वाला प्यार हुआ करता था उसका कबाड़ा कर दिया है और मुहब्बत में साज़िश से लेकर डर और बाज़ीगर तक क्या क्या नहीं शामिल कर दिया है। चर्चा होती है पहला प्यार आकर्षण होता है जो करीब आये उसी पर दिल फ़िदा हो जाता है। किस को कितनी बार इश्क़ हुआ कई लोग गिनती भी याद नहीं रखते हैं। ये सब सुनते कुछ की धड़कन बढ़ने लगी है तभी सबसे बज़ुर्ग आशिक़ ने चेतावनी देते हुए कहा कि ये सब कोई चाल है और भूले से उस दुनिया में फिर वापस जाने की बात मत सोचना। नये आशिकों का नशा कितने दिन बाकी रहेगा कोई नहीं जनता मगर नफरत की दुनिया की तरफ देखना भी गुनाह है। शायद अगर ये भूले से यहां चले आये हैं तो फरिश्ता देखता है इनको वापस ले जाएगा। हर चमकदार वस्तु सोना नहीं होती है , ज़रा इनकी भी परख होने देते हैं पीतल हैं या खालिस सोना हैं। अब आगे क्या हो सकता है आप भी सोचो तो समझ जाओगे। कई साल हो गये जो भी नये बाशिंदे फरिश्ता लेकर आता है कुछ ही देर में चुपचाप वापस लौट जाते हैं। जिन आशिकों को सोशल मीडिया की लत का रोग लग गया हो वो अपने आशिक़ महबूबा के बगैर जी सकते हैं फेसबुक ट्विटर व्हाट्सएप्प को छोड़ कर नहीं कभी भी नहीं। इसके बिना भी कोई जीना है , मरने का ग़म नहीं होता उनको जितना सोशल मीडिया से बिछुड़ने का दर्द होता है। प्यार की जुदाई सही जा सकती है सोशल साइट्स बिना जीवन सूना क्या मौत से बदतर लगता है। ऊपर वाला चाहे कहीं भेज दे मगर उस जहां में नहीं भेजे जिस में इंटरनेट की सुविधा नहीं हो फेसबुक की दुनिया न हो और व्हाट्सएप्प नहीं चलता हो।

                    20    राधा मीरा और सीता ( वार्तालाप ) 

      विधि ने तीनों को आमने सामने लाकर खड़ा कर दिया। गले मिल कर तीनों अपनी अपनी कहानी याद करने लगी। सीता जी बोलीं तुम दोनों को आज भी लोग प्यार की देवी मानते हैं पूजते हैं कोई लांछन लगाने  की बात नहीं करता कभी। मैं आज भी समाज से इंसाफ की आस लिए तड़पती रहती हूं। तुम्हें आज भी कोई भला बुरा नहीं कहता कि जिस से सामाजिक संबंध नहीं था उसको चाहती रही। उसके नाम की रट लगाती रही मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई। तुम रास रचाती रही कान्हा संग नाची झूमी उसकी सखी बन उसकी बांसुरी भी सुनती रही और बंसी को छीनती भी रही छेड़खानी भी की। कभी खुद को कृष्ण कन्हैया की दासी नहीं समझा तुमने। मैंने अपने राम के लिए महल छोड़ा बनवास झेला कभी सुख से नहीं रही फिर भी मुझे अग्नि परीक्षा के बाद भी त्याग दिया वो भी बिना अपराध बताए हुए ही। मेरा अस्तित्व आज भी अपने खुद का कोई नहीं समझता है और जिसने मुझे छोड़ा आज तक उसी की राम की पत्नी होना ही मेरी नियति है। राधा तुमने दूरी का दुःख झेला मीरा तुमने ज़हर का प्याला पी लिया मगर मुझे पल पल जिस विष को लांछन को चुप चाप सहना पड़ा और अपनी संतान को जन्म देने को इक राजा की बेटी इक राजा की पत्नी को इक वाल्मीकि की कुटिया में रहना पड़ा उसे जीना नहीं क्षण क्षण मरना कह सकते हैं। किसी राजा के लिए पत्नी कोई मूरत है जब यज्ञ में ज़रूरत तब सोने की सीता बनाकर काम चला लिया जिस में जीवन नहीं था निर्जीव पुतला था। शासक आज भी जीवित लोगों से अधिक मोह धातु के पुतलों से रखते हैं , जनता सीता की तरह बेबस भटकती है और शासक मनमानी करते हुए भी महानता का दम भरते हैं। आज की नारी अभी भी मेरी व्यथा को नहीं समझती है तभी पति से अलग अपना अस्तित्व नहीं खोजती है उसे आज भी सीता जो उनकी तरह इक महिला थी आदर्श नहीं लगती है और आज भी राम के मंदिर उसकी आरती की बात करती हैं। जो मुझे नहीं मिला इतने बड़े कुल की बेटी बहु को इनको मिल कैसे सकेगा उसी राह पर चल कर। मगर जानती हूं आजकल की महिलाओं को सीता राम की पत्नी को पूजना है और कुछ भी हो कितने अन्याय अत्याचार सहने पड़ें साथ रहना है अस्तित्वविहीन होकर मगर साहस से अधिकार अथवा खुद को अपने भरोसे न्याय को लड़ना नहीं है। रावण आज भी मनमानी करते हैं सज़ा आज भी उसी नारी को मिलती है जिसके साथ छल किया रावण ने साधु बनकर। महिलाओं को अभी भी रावण की पहचान नहीं है। राधा और मीरा दोनों ने इक साथ कहा कि हमने समझ लिया था जिसे चाहती हैं उसे पाना ज़रूरी नहीं है और खुद को मिटाकर तो हर्गिज़ नहीं। कोई हमें छोड़ता इसकी नौबत नहीं आने दी हमने प्यार की भीख नहीं मांगी उससे। हम हम हैं किसी के नाम के बिना भी हम खुद अपने दम पर रही हैं , दुनिया समाज कभी नारी को आज़ादी नहीं देती न कभी देगी ही जिस दिन महिलाओं को इतनी सी बात समझ आ गई वो अपने नाम को किसी के भी नाम से जोड़ना नहीं चाहेंगी वो चाहे पिता हो पति हो या संतान हो। मुझे लगता है मेरी बहन उर्मिला का दर्द मुझसे भी अधिक है मगर किसी ने उसकी चर्चा तक नहीं की। 

        शायद बहुत लोग सोचेंगे कौन उर्मिला। आपको बताना चाहता हूं राजा जनक की ही बेटी मिथिला की छोटी राजकुमारी सीता जी की छोटी बहन और लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला थी। जिनको उनकी कथा मालूम नहीं कुछ लोग समझते हैं सीता जी तो महल को छोड़ बनवास में पति के साथ गई और शायद लक्ष्मण की पत्नी महल में सुख पूर्वक रहती रही मगर ऐसा नहीं है। बड़ी बहन और पति दोनों ने उर्मिला को बनवास साथ जाने नहीं दिया और महल में सभी की सेवा करने का आदेश दिया और जब ससुर दशरथ की मृत्यु हुई तो वो अकेली थी मगर पिता के कहने पर भी मिथिला जाने को नहीं मानी। घर सभी का ध्यान रखने के साथ इक और भी समस्या थी उर्मिला की। लक्ष्मण ने वन में कुटिया बनाई भाई राम और माता सीता के लिए और खुद बाहर रखवाली को खड़ा रहा। जब नींद की देवी सामने आई तब नींद की देवी से लक्ष्मण ने वरदान मांगा था भाई राम की सेवा और सुरक्षा को जागते रहने का और देवी ने बदले में 14 साल तक अपनी नींद किसी और को देने को कहा तो लक्ष्मण ने अपनी पत्नी को दे दी अपने हिस्से की नींद। उर्मिला को सोते रहने पड़ा। और इतना ही नहीं बनवास के बाद जब राम का राजतिलक हुआ तब देवी के आदेश अनुसार लक्ष्मण की बारी थी अगले 14 साल सोते रहने की और उर्मिला की उसके बाद जागते रहने की। नवविवाहिता को पति से अलग रहना और दोबारा मिलने पर भी उस से कोई संवाद तक नहीं कर पाना इससे बड़ी सज़ा क्या हो सकती थी। रामायण लिखने वाले ने सब कथा अपने राम को ऊंचा बड़ा और महान बनाने के अनुसार समझाई है और जब राम को भगवान बना दिया तो उसके आचरण पर सवाल उठाने का कोई जतन भी नहीं कर सकता है। 
    आपको ऐसा रामराज्य पसंद हो सकता है जिस में पत्नी भाई सभी अपना सुख त्याग करें और तब भी गुणगान शासक का हो। जो अपनी पत्नी तक को न्याय नहीं दे सकता उसका न्याय कैसा होगा जिस में अपनी आलोचना ही निर्णय करने को विवश करती हो। 
 

                       21    खोकर पाना है ( व्यंग्य कहानी ) 

                          

      बेटा और बेटी मिलकर विचार कर रहे हैं। हम दोनों को भी आरक्षण मिल सकता है। भाई को नौकरी मिल सकती है और बहन को उच्च शिक्षा में दाखिला मिल सकता है। पिछले दिनों इक टीवी शो पर जीवन के दोराहे की कहानी भी ऐसी थी जिस में पिता के घर से अलमारी में रखे पैसे बच्चे चुरा लेते हैं जो पैसे पिता को जिसके पास नौकरी करता है उसने दिये थे बैंक में जमा करवाने को मगर बैंक बंद होने से जमा करवा नहीं पाया था। कोई चोर रात को घर में चोरी करने आता है और अलमारी से बैग चुरा ले जाता है , जिस के पैसे हैं वो शक करता है अपने पुराने मुलाज़िम पर और पुलिस थाने रपट दर्ज करवा देता है। इत्तेफाक से हवलदार इक चोर को पकड़ लाता है जिसने वो बैग चुराया था। लेकिन चोर कहता है कि उसने चोरी की थी मगर बैग को खोला तो खाली था उस में पैसे थे ही नहीं। आजकल बच्चे टीवी सीरियल से सबक बहुत अच्छी तरह सीख लिया करते हैं। शायद उनको ऐसे ही किसी टीवी सीरियल से या सोशल मीडिया से किसी वीडियो से ऐसी उल्टी शिक्षा मिली हो।

                        पिता से दोनों ने अपनी समस्या बताई थी , बेटे को नौकरी मिल सकती है कुछ लाख रिश्वत देने से और बेटी को किसी कॉलेज में दाखिला कुछ लाख देकर मिल सकता है। मगर पिता के पास इतने पैसे हैं ही नहीं और इक घर है जिसकी कीमत कुछ लाख हो गई है जो किसी समय कई हज़ार जमा पूंजी से खरीदा था ताकि किराये से बच सके। शाम को फिर से पिता के घर आने पर बात की थी और इस बार कोई घबराहट नहीं थी मन में। बताया कि अब हम उच्च जाति के लोगों को भी आरक्षण मिल सकता है क्योंकि आपकी आमदनी आठ लाख सालाना से कम ही है। मगर इक अड़चन है कि जिसके पास शहर में सौ ग़ज़ का मकान हो उसको इसका लाभ नहीं मिल सकता है। अभी तक आपको घर बेच कर भी बेटे की नौकरी और बेटी के दाखिले के लिए पैसे नहीं मिल सकते थे। अब आपको अपना घर बेच कर पैसे अपने पास ही रखने हैं ताकि हम आरक्षण पाने वालों में शामिल हो कर लाभ उठा सकें। घर बेच कर मिले पैसे किसी को देकर उसके बदले रहने को घर मिल सकता है ये हमने दलाल से बात की है। ख़ुशी की ऐसी लहर उठी जैसे कोई कोई जादू की छड़ी या कोई जिन मिल गया हो चिराग वाला।

                पत्नी को भी उचित लगा और घर बेच कर आरक्षण पाने के अधिकारी बन गये। कुछ खो कर पाना है कुछ पाकर खोना है। बात बन गई और सपना साकार हो गया था। बेटे को नौकरी मिली तो सरकारी मकान भी जिस शहर में नियुक्ति हुई मिल गया और बेटी भी उच्च शिक्षा पाकर नौकरी करने लगी और पिता के घर बेच रखे हुए पैसे दोनों के विवाह करने पर खर्च हो गये थे। अब पिता की मुश्किल है किस से हाथ फैला कर सहायता मांगे बेटे से या बेटी से जब भी आमदनी कम हो और कोई खर्चा अचानक सामने आ जाये। पिता को कोई लाभ आर्थिक आरक्षण से मिल नहीं सकता मगर जो पास था खत्म हो गया उसे हासिल करने में। कई बार ऐसा होता है वास्तविक कीमत बाद में चुकानी पड़ती है।

              किसी और के साथ दूसरे ढंग से हुआ। जितनी भी पांच छह एकड़ ज़मीन थी बेच कर बच्चों को आर्थिक आरक्षण पाने का हकदार बना दिया मगर अब खुद अपनी बेची हुई ज़मीन पर मज़दूरी का काम करता है। आरक्षण के मोहजाल में जाने किस किस की ज़िंदगी की वास्तविक कहानी टीवी सीरियल जैसी बन गई है। उस कहानी में बेटी दहेज के पैसे देकर ससुराल चली जाती है और बेटे को नौकरी मिल जाती है , लेकिन ईमानदार पिता चोरी के झूठे इल्ज़ाम में बंद बिना अपराध पकड़े चोर को छुड़वा खुद चोरी का इल्ज़ाम अपने सर ले लेता है। उसका मालिक सचाई जानकर अपना केस वापस लेकर उसको छुड़ा लेता है। मगर क्या असली जीवन में कोई भोलेपन और शराफत को समझ ऐसा करेगा , नहीं लगता है। शायद कभी कोई ख़ुदकुशी करेगा तब खोजने पर मालूम होगा कि आरक्षण पाने की खातिर जो पास था दे दिया और बाद में कुछ भी नहीं था चैन से रहने को। सरकार को भी कोई दोष नहीं दे सकता उसका हर कदम कहने को जनता की भलाई को होता है मगर सालों बाद नतीजा निकलता है कि ये नहीं करते तो अच्छा था। आरक्षण की वास्तविकता यही है काश इसकी शुरुआत कभी हुई नहीं होती। अब इसको इस तरह समझा जा सकता है। एलोपैथिक दवाओं में स्टीरॉइड्स नाम की ऐसी दवाएं भी होती हैं जिन से रोग ठीक नहीं होता है। डॉक्टर देते हैं और रोगी को चैन मिलता है दर्द नहीं मालूम पड़ता ज्वर उतर जाता है दमा के रोगी को सांस लेने में आसानी होती है , लेकिन असल में लक्षण पता नहीं चलते रोग बढ़ता जाता है। लगातार लेते रहने से और भी कई रोग दुष्प्रभाव से लग जाते हैं। ये ऐसी दवा है जो आपको लाईलाज रोग देती है जो मौत के साथ ही जाते हैं। सरकार भी देश की जनता को आराम देना चाहती है ताकि जनता को तकलीफ और लक्षणों से मुक्ति मिले और बदले में खुश होकर उसको वोट और सत्ता का अधिकार। सरकार को भी कुछ देकर कुछ पाना भी है। ये कहानी निरंतर चलने वाली है देखते हैं कब तक।

                       22      चाहत अपनो की ( कहानी ) 

             मन में तो ये बात से रही है। मगर कहूं किस से , कौन समझेगा। कितने साल हो गये हैं मुझे घर से दूर रहते , मगर किसी ने कभी मुझे घर आने को नहीं कहा। अपने ही घर जाने को भला बुलाता है कोई बेटे को बेटी को विवाह के बाद मायके आने को बुलाया जाता है। मगर जब भी हुई बात किसी ने पूछा ही नहीं घर आना है कब बस औपचारिकता निभाई सबने आप तो गांव छोड़ शहर में खुश रहते हो गांव आने की बात की नहीं किसी ने। यूं इसकी ज़रूरत भी नहीं है , मेरे घर जाने पर कोई रोक तो लगी नहीं है। बस इक एहसास रहता है कि जिस तरह मुझे घर अपनों की कमी लगती है उदास हो जाता याद करते कोई होता जिसको मेरे घर से दूर होने की कमी खलती नहीं मिलने पर उदास होता मेरी तरह कोई। माता पिता को बहनों से कितना लगाव है अपनापन है तीज त्यौहार पर हर अवसर पर याद किया जाता है कोई उपहार भेजते हैं कभी लिवाने को जाते हैं कभी आने को खत लिखते हैं। सभी बहनें आती हैं मिलती हैं सभी से गली की गांव की सखियों से और पुरानी यादें ताज़ा करने के साथ नई कुछ मधुर यादें साथ ले जाती हैं। 
        
      मेरा मन क्यों तरसता है ऐसे मोह को जैसे बेटी को लेकर चिंता रहती है कैसी होगी खुश तो है और सोचते हैं कितने दिन से मिलने नहीं आई न हम मिलने जा पाये। मेरे लिए भी होता नहीं पास होने का थोड़ा एहसास किसी को तो कभी। केवल इसी लिए कि मैं लड़का हूं और अपने घर गांव से दूर होना पड़ा है काम करने के लिए मुझे बेगाना बना दिया गया लगता है। घर जाकर भी परायापन लगता है जब पूछते हैं कैसे आना हुआ कब तक रहना है जैसे घर का सदस्य नहीं कोई बिन बुलाया महमान हो। नहीं जानता कोई नहीं महसूस करता कोई भी घर गांव के याद कर कितना उदास हो जाता हूं मैं। अपना सब कुछ रिश्तों का अपनापन खो कर पाया क्या है उदासी अजनबीपन का दर्द का अनुभव। अपने घर से मुझे पराया कर दिया गया है क्या पढ़ लिख शिक्षित होने की ये कीमत है चुकाने को ज़रूरी है। कितने दोस्त हैं जो बाहर रहते हैं वापस घर गांव आते हैं तो उल्लास का अनुभव होता है। मुमकिन है मेरा सफल नहीं होना मेरी कोई कमी हो मगर कोई अगर ऐसे में साथ देने का भरोसा देता और हौंसला बढ़ाता तो शायद सफलता पाना आसान होता मगर जब सभी नाकाबिल और जाने क्या क्या कहकर हीनभावना के भंवर में अकेला छोड़ देते हैं तो सफल होना असंभव हो जाता है। हर किसी ने मान लिया है कि मुझे इसी शहर में रहना है और उस अपने घर से मेरा कोई नाता नहीं है। मुझे जाने किस जुर्म की ये सज़ा मिली है कितने जन्मों के लिए। काश मैं लड़का नहीं लड़की बनकर जन्म लेता और बहनों की तरह अपनी उदासी की बात कह सकता भीगी आंखों से। मगर मेरे आंसू आना जैसे कोई कायरता ही नहीं अपराध भी है जिस पर ताने कसे जा सकते हैं। पुरुष की भावनाओं को क्या कोई नहीं समझता है। मेरी बहनों को लगता है पीहर पर उनका हक है अच्छा है मगर मुझे भी अधिकार अपनापन मिलता तो कितना अच्छा होता। 

     मुझे उच्च शिक्षा के लिए बचपन से ही बाहर रहना पड़ा , बाकी भाई बहन पढ़ने लिखने की रुचि नहीं रखने के कारण गांव और घर में रहे। ये बात कभी कभी खलती है कि मुझे याद दिलवाया जाता था मेरी पढ़ाई पर दो सौ रूपये महीना खर्च होता है और पांच साल का हिसाब पंद्रह हज़ार बना हुआ था कोई उधार था क़र्ज़ था जाने क्या था। शायद अच्छे अमीर परिवार में हर सदस्य को इतना नहीं इस से अधिक खर्च करने को मिलता था। जुआ शराब जाने क्या क्या सब मज़े से करते थे किसी का कोई हिसाब नहीं लिखा गया था। ये सब सोच कर लगता जैसे मैं उनकी दुनिया में अनचाही संतान की तरह हूं। जितना पढ़ता गया सब मुझसे दूर होते गये और आना जाना कम होता गया किसी अवसर पर जाना होता। शिक्षा का असर हुआ और सही गलत अच्छे बुरे की समझ आने लगी और सच कहने की आदत ने अनुचित को मंज़ूर नहीं करने दिया तो सब को बुरा लगने लगा मैं। 

         अभी तलक रिश्तों में कुछ बचा हुआ था लेकिन मुझसे इक गुनाह हो गया। मैंने परिवार वालों की मर्ज़ी से इक ऐसी लड़की से बिना कोई कारण शादी करने से इनकार कर दिया जो अपने साथ कई लाखों की जायदाद साथ लाती और मुझे और अमीर बना देती। डॉक्टर बेटे की इतनी कीमत की चाहत कोई हैरानी की बात नहीं थी जबकि हमारा परिवार कोई दहेज का लालची नहीं था बाकी भाइयों की शादी सामान्य ढंग से करते कोई मांग नहीं की थी। मगर घर आती लक्ष्मी को ठोकर लगाने वाले को नासमझ नहीं बेअक्ल माना जाता है। तुझे दुनियादारी नहीं आने वाली घोषणा के साथ बिना बताये घर निकाला हो गया। किसी और कम पढ़े लिखे भाई के लिए ऐसा रिश्ता नहीं आया था तो जिस बेटे की पढ़ाई पर निवेश किया था उस को मुनाफे सहित वसूल किया जा सकता था। मुझे अपनी कीमत लगना स्वीकार नहीं था और बिकने से मना करना ज़रूरी था। परिवार वाले समझ गये थे ये खोटा सिक्का दुनिया के बाज़ार में नहीं चलने वाला। सब ने बहुत समझाया मगर मुझे कोई समझ नहीं सका न समझा पाया ही। मैंने अपने काम में भी मूर्ख बनाकर धन कमाना और कमाई के सभी ढंग अपनाना मंज़ूर नहीं किया। ईमानदारी से जितनी आमदनी हुई उसी से खुश रहा और हमेशा आर्थिक तंगी को झेलता रहा मगर अपने असूल नहीं छोड़े। 

       संयुक्त परिवार में बड़े होने पर विवाहित बेटों को जायदाद और आमदनी का हिस्सा मिलने लगता है। सब को अपना अपना हिस्सा मिला मुझे नाम को मेरे नाम किया जायदाद पर मगर मुझे मिला नहीं कुछ भी कोई आमदनी का उचित बराबरी से भाग कभी भी। जाने क्यों मुझे महसूस ही नहीं हुआ घर की किसी चीज़ पर कोई अधिकार मेरा भी है। शादी के दस साल बाद शायद पिता जी को कुछ कारणों से समझ आया कि ठीक नहीं हुआ मेरे साथ तब खुद उन्होंने मुझे जायदाद बेचने को खुद ही कहा ताकि अपना घर करोबार की जगह बना सकूं। अपने मरने से तीन चार साल पहले मुझे जितना और जैसा हिस्सा उनको उचित लगा दे गये , नहीं उनकी अपनी विवशता रही मुझे समझ थी कोई गिला नहीं है। मिलने को सब कुछ मिला है मगर नहीं मिली कोई भी चाहत अपनो की कभी इसका अफ़सोस रहता है।

                    23      मनाना मान जाना ( कहानी )

    पति सभा हर शाम को पार्क में आयोजित होती है जब ठीक उसी समय पत्नियों का महिला मंच किसी और जगह विचार विमर्श करता रहता है। विषय बदलते रहते हैं मगर निर्णय बहुमत की ज़रूरत के बिना एकमत से होते हैं जब चिंतन पुरुष महिला की आपसी उलझनों को लेकर हो रहा हो। हालांकि नतीजे  हमेशा उलझन को और उलझाने का काम ही करते हैं। बस दोष अपना नहीं दूसरे पक्ष का समझा जाता है। आज चर्चा का विषय है वोट किसको देना है और कैसे इस राजनीति की लड़ाई को अपने अपने घर से बाहर रखना है। पति सभा का एकमत से फैसला ऐतहासिक है और अति गोपनीय रखा गया है। घटना एक समान है घर घर की बात है तथ्य नहीं बदलते हैं केवल नाम स्थान अपना अपना निवास है। एक ही घर को झांक कर देखते हैं , कोठे चढ़ के वेख फ़रीदा घर घर एहो हाल। 

              पत्नी को नाराज़ नहीं करना है हमने भी सोच लिया था। सुनते हो कल वोट डालना है किस को देना है आपको बताओ तो मुझे। मैंने कहा हज़ूर जिसको आप कहोगी उसी को दे देंगे अपना कोई चाचा ताऊ तो है नहीं और हैं भी सब एक थाली के चट्टे बट्टे। उनको यकीन नहीं आना था न आया , साफ बताओ ऐसे पहेलियां नहीं बनाओ। हमने कहा आप मोदी जी की समर्थक हो आये दिन का झगड़ा खत्म करते हैं अपने अपनी हर बात मनवाई है किसी न किसी ढंग से अब खुद ही मान लेते हैं। दोनों एक को देंगे तो दो वोट बढ़ते हैं किसी के और बंट गये एक एक तो बेकार जाएगा हमारा वोट गिनती को कम नहीं करेगा न बढ़ाएगा ही। खुश हो गई सरकार घर की , पहली बार अपने समझदारी की बात की है। कोई बहस की गुंजाईश बची ही नहीं। 

       पत्नी महिला मंच की साथियों के साथ और हम भी अपनी सभा के यारों संग वोट डालकर घर वापस आये और खुश से आज कोई विवाद नहीं हो सकता है। पत्नी ने चाय पेश की और पूछा वोट उसी को दिया है ना जिसको कह रहे थे। आपको कोई शक है जब जन्म जन्म का साथ है तो वोट की क्या बात है आपके लिए जान भी हाज़िर है। हमने उनसे नहीं पूछा किसे वोट दिया है क्योंकि बात पहले से निश्चित थी उनको मोदी जी पसंद हैं। यहां कोई गलतफहमी नहीं हो इसलिए बताना ज़रूरी है ये मोदी हमारे शहर के हैं और निर्दलीय हैं। कोई दलगत राजनीति नहीं है मामला मायके ससुराल के मुहल्ले का ही है। पत्नी के पेट में राज़ की बात दो घंटे से अधिक नहीं रहती है खाना खाते समय राज़ बाहर आना लाज़मी था। आपसे इक बात कहनी है वोट देते समय मुझसे गलती हो गई और वोट मोदी जी के खिलाफ डाला गया। कोई बात नहीं जिसको दिया है जीतेगा वही सब जानते हैं। पति पत्नी दोनों एक साथ खुश थे और मतलब साफ है ऐसा तभी संभव होता है जब झूठ बोला जाये और झूठ को सच समझा जाये। 

         पतियों की सभा की चालाकी सफल रही थी। सभी ने जिसको खुद समर्थन करते उसको नहीं जिसको पत्नी मंच समर्थन देना चाहता उसको वोट देने की घोषणा घर जाकर करनी थी। नतीजा अनुमान के अनुसार निकलना ही था। पत्नी को पति की हर बात का विरोध करने की आदत होती है भला हम जिसको अच्छा बताएं वो अच्छा कैसे हो सकता है। बस इसी तरह सोचने लगी तो मोदी जी की जितनी कमियां हमने गिनवाई थी सब वास्तव में सही लगने लगी। आपको चिंता करने की ज़रूरत नहीं है ये कुदरत का बनाया नियम है , क्या कहते हैं पति पत्नी एक गाड़ी के दो पहिये होते हैं साथ साथ चलते हैं मगर स्टेरिंग घुमाते हैं तब समझना पड़ता है आगे जाने को दाएं घूमाना ही बैक करते समय बाएं घुमाना हो जाता है। इस से सरल भाषा में पति पत्नी रेल की पटरी की तरह साथ साथ चलते हैं फासला रखना ज़रूरी है। मिलना संभव नहीं है पति पत्नी का सहमत होना असंभव बात है। हासिल यही आपको जो काम पत्नी से करवाना हो उसके विपरीत बात कहने से बात बन जाती है। लाख टके की बात है ध्यान रखना।

               24      ये कहां आ गए हम ( काल्पनिक कथा ) 



   ये तो अदालत है मगर खामोश सी है कोई बहस नहीं सुनवाई नहीं। अपनी किताब देखी और आदेश जारी कर दिया। सच में इंसाफ होता है सब साफ होता है। ऊपर वाले की अदालत अनोखी है वकील नहीं दलील की ज़रूरत ही नहीं। फैसला भी आखिरी है कोई चुनौती भी नहीं दी जा सकती है। स्वर्ग नर्क या कुछ और जन्म निर्णय सुना रहे हैं। अपनी भी बारी आनी थी थोड़ा सा इंतज़ार करना कठिन नहीं था बल्कि देख कर दिल को सुकून सा मिल रहा था। मुझे ही नहीं शायद किसी को भी कोई चिंता कोई घबराहट कोई डर नहीं महसूस हो रहा था। मेरा हिसाब पढ़कर बताया जा रहा जो मुझ को ही सुनाई दे रहा था मुझसे पहले किस को क्या कहा गया मुझे नहीं सुनाई दे रहा था। पढ़ने वाले ने बताया ये भी उसी तरह का बंदा है जिसको ऊपर वाले से कोई लगाव भक्ति भाव का नहीं था किसी दोस्त से नाते रिश्ते से मोह का धागा इतना अटूट नहीं था कि उन की खातिर सब करने को तैयार हो। देश और समाज को लेकर परेशानी में रहता और फिर भी आनंद का अनुभव करता था जनहित जनकल्याण की बात करते हुए। दोस्ती निभाने को उचित अनुचित की परवाह नहीं करना दुनिया वाला सबक सीखा नहीं कभी समझना नहीं चाहा , किसी को दुश्मन नहीं समझा मगर लोग इसको अपना दुश्मन मानते रहे। ज़ुल्म सहता रहा कोई बदला किसी से नहीं लिया दुश्मनी करने वालों से भी नफरत नहीं करना आता था। पागल लोग होते हैं जो घर अपना फूंक कर खुद ही बाहर खड़े तमाशा देखते हैं। कबीर की तरह हक सच की बात निडरता से निस्वार्थ कहते हैं। निर्णय सुना दिया वहीं ले जाओ उन लोगों के पास छोड़ आओ जो इस तरह के हुए हैं और मुझे दरबान कर्मचारी साथ लेकर चल पड़े थे।

     पहुंचा उस जगह तो गांधी जी सुभाष भगत सिंह नानक कबीर सभी महान लोग नज़र आये मगर किसी को मेरे आने से कोई ख़ुशी हुई न कोई ग़म का अनुभव ही। अभिवादन किया परिचय दिया तो सब ने पूछा अपने भारत देश का क्या हाल है। पहली ही मुलाकात में उनको सब हाल कैसे समझाता बस कहा कि आप सबने कितना किया वतन को स्वर्ग जैसा बनाने को मगर अभी भी बहुत करने को बाकी है मगर जाने क्यों आजकल के नायक कहलाने वालों को उसकी चिंता ही नहीं है। दिन पर दिन दशा लगता है सुधरने के बजाय बिगड़ती जा रही है। भारत शीर्षक से नई फिल्म की चर्चा है मैंने नहीं देखी मुमकिन है उस में वास्तविकता की कोई बात की गई हो अन्यथा तो हर तरफ झूठ का बोलबाला है। और तो और अभी पर्यावरण दिवस पर हमने पेड़ भी लगाए तो झूठ के ही असली पेड़ को उसकी छांव में बैठे सभी अपने अपने स्वार्थ की कुल्हाड़ी से काटने को लगे है। चोर चोर मौसेरे भाई की कहावत सब तरफ सच होती लगती है। मुझे कहा शायद आपको मुंह से बोलकर बताने में संकोच हो रहा मगर सुना है कोई लिखने वाले लेखक हो तो थोड़ा समय लेकर विस्तार से भारत फिल्म की नहीं देश की कहानी लिख कर दे देना हम पढ़ कर समझ सकेंगे और इक सबूत भी रहेगा। हम जानते हैं आप कड़वा सच लिखने में संकोच नहीं करने वाले।

       कहानी फ़िल्मी या नाटकीय नहीं है वास्तविक है देश की समाज की। पहले किस की बात करें किसकी नहीं करें जब सब की दशा साल दर साल बिगड़ती जा रही है। कहां वो ऊंचे आदर्श सादा जीवन उच्च विचार और कहां आधुनिकता की अंधी दौड़ जिस में शानदार आडंबर का जीवन बाहर से दिखाई देता है और विचार कुछ भी नहीं बस खोखली बातें हर कोई करता है। यहां हर कोई समझता है बताता है क्या क्या करना देश समाज के लिए अनुचित है मगर अपने आचरण में ऐसे ही खलनायक जैसे लोगों को पसंद भी करते हैं और उस जैसा बनना भी चाहते हैं। राजनीति की आलोचना बुराई करते हैं मगर अवसर मिलते ही खुद अच्छी राजनीति करने का साहस नहीं करते हैं और सत्ता मिलते ही उसी कीचड़ में स्नान करने को गंगा स्नान मानते हैं। सरकार का अर्थ ही कुर्सी मिलते ही खुद को दोषमुक्त और भला पुरुष मनवाना हो गया है। जो शिक्षक से ज्ञान का दान करते थे शिक्षा का व्यौपार कोचिंग क्लासेज या आधुनिक स्कूल धनवान लोगों के बच्चो के लिए खोलकर कारोबार करते करते लूट का धंधा करने लगे , जो अधिकारी देश की सेवा को नियुक्त हुए कर्तव्य की भावना छोड़ मनमानी करने  और अहंकार तथा लालच से राह से भटक गए हैं। कारोबार करने वालों ने ईमानदारी से उचित कमाई करना छोड़ अनुचित ढंग से पैसा कमाने को ईमान को बेचने लगे हैं हर चीज़ में मिलावट धोखा हेराफेरी की आदत ने इंसान और इंसानियत को भुला दिया है। डॉक्टर सबको स्वस्थ्य देने का मकसद भूलकर केवल पैसे की हवस की खातिर भगवान कहलाने की जगह अपने धर्म को भुलाकर धन दौलत सुख सुविधा की अंधी दौड़ में भागते हुए बदनाम हो रहे हैं। जैसे हर शाख पर उल्लू बैठा है बर्बादी को बढ़ाता हुआ सा। मगर असली कहानी सरकार की है जिसने सब कुछ ठीक करना था मगर किया सब कुछ गलत पर और भी गलत है। देश की समस्याओं का समाधान करने की जगह समस्याओं को बढ़ाने बुलाने का काम करती रही हैं और आज की सबसे विकट समस्या ही सरकार खुद ही है।

      सरकार की सत्ता की कहानी शुरू हुई तो थी जनकल्याण की भावना से मगर आज पहुंच गई है हद दर्जे की मतलब की स्वार्थ की पाप कथा तक। 71 साल पहले देश को आज़ादी दिलवाने को कितने शहीदों ने कुर्बानियां दी थी और इक संविधान रुपी नक्शा बनाकर देश को ऐसा गुलशन बनाने का रास्ता बताया था जिस में सभी नागरिक समान हों खुशहाल हों अम्न चैन से मिलकर साथ रह सकें और हर किसी को उसके हिस्से की रौशनी उसके हिस्से की ज़मीन भी आकाश भी खुली हवा में सांस लेने और सुरक्षित जीने के बुनियादी अधिकार भी हासिल हों। जैसे कोई बड़ा सा घर हो सभी को रहने को छत और सुख सुविधा मिले। ये नहीं है कि भारत देश में संसाधनों की कोई कमी है इतना है कि हर किसी की ज़रूरत पूरी की जा सकती है , जैसा गांधी जी और कई महान चिंतक बताते रहे हैं , लेकिन किसी की भी हवस लालच को पूरा करने को दुनिया का सब कुछ भी काफी नहीं है। सरकार बनाने का अर्थ था निर्माण की बात करना मगर यहां कुछ ही सालों बाद देश की आज़ादी की कीमत को भुलाकर हर कोई मतलबी और लोभी लालची बनता गया। देश सेवा समाज की भलाई को दरकिनार करते गए लोग। इक इमारत जो बहुत कम समय में बनाई जा सकती थी अभी भी उसको बनाना तो क्या उसकी बुनियाद को ही तोड़ने का काम करने लगे हैं। हर कोई सत्ता मिलते ही जो निर्माण हुआ उस से आगे और बनाने पर ध्यान देने की बजाय मैंने बनाया है इसका ख्याल रखते हुए पिछले बने को बदल अपने नाम का पत्थर लगवाना अपनी शोहरत बढ़ाने की देश के खज़ाने को उपयोग कर अपनी तस्वीर लगवाना जैसे फज़ूल के काम करने लगता है।

         इक सबक समझाया गया है कुछ महान जन-नायकों द्वारा कि आपको क्या करना है चाहते हैं अपने अंदर रखना चाहिए , क्या कर रहे हैं बताने की ज़रूरत नहीं सामने नज़र आना ही है , क्या नहीं करना चाहिए ये जानना ज़रूरी है और अपनी आलोचना अपना विरोध होने देना चाहिए और अपने आचरण को बदलना सुधारना बेहतर बनाना चाहिए कोई अहंकार नहीं करना चाहिए कि आपके पास सत्ता का अधिकार है तो आपकी हर बात उचित है। देश की तस्वीर और निर्माण की इमारत को ऊंचा ही नहीं बनाना चाहिए बल्कि पारदर्शी भी बनाया जाना चाहिए। सत्ता की हवेली की ऊंची दीवारें और बंद खिड़की दरवाज़े बाहर की आवाज़ को नहीं सुनाई देना जैसे काम कभी नहीं होने चाहिएं। मगर खुद को खुदा कहलाने का पागलपन तमाम राजनेताओं पर ऐसा सवार हुआ कि अपनी ऊंचाई के सामने बाकी सभी उनको बौने लगने लगे। ये किसी कवि की कविता से समझ सकते हैं जो लोग सत्ता के शिखर पर चढ़कर सोचते हैं उनका कद बढ़ गया है नहीं जानते कि शिखर से गिरने पर नमो निशान नहीं रहता है। सत्ता की ऊंचाई आपकी नहीं है पहाड़ की है और जो पहाड़ पर खड़ा होता है उसको नीचे वाले चींटी की तरह लगते हैं मगर नीचे से वो भी और भी बौना लगता है। आपको अपना कद बढ़ाना है तो लालबहादुर शास्त्री जैसे लोगों से सबक सीख सकते हैं बहुत थोड़े समय सत्ता पर रहे मगर आज भी जय जवान जय किसान और बेहद सादगी से रहने के बाद भी देश के गर्व और स्वाभिमान को ऊंचा रखने का कीर्तिमान स्थापित किया था। अब हालत ऐसी है लोग हर बार किसी पर भरोसा करने के बाद पछताते हैं कि हमने क्या समझा और ये कैसा निकला है।

     सरकार का अर्थ सत्ता पाकर अपने खुद की खातिर सब पाना नहीं है। चार साल तक सत्ता के मद में मनमानी करना फिर उसके बाद जनता को खुश करने को खिलौनों से बहलाना दोबारा सत्ता हासिल करने को देश की जनता संविधान और उन महान विचारकों भगत सिंह गांधी सुभाष के साथ छल करना है। राजनीति की विडंबना यही है जो विपक्ष में खराब लगता है सरकार खुद की बनाने पर अच्छा लगता है। दूसरे शब्दों में जिस बुराई को खत्म करना था जिस व्यवस्था को बदलना था उसी को अपनाने लगते हैं। कल कोई अपना गुणगान करवाता था आज आप भी वही करवाते हैं। देश से पहले कोई दल कोई संगठन कोई संस्था कोई परिवार कोई रिश्ता नहीं हो सकता है मगर जिसको देखते हैं देश की बात कहने को कहता है मकसद अपने ख़ास लोगों को बढ़ावा देना होता है। कोई विचारधारा नहीं है कल किसी दल का नेता था जिसकी सोच तानाशाही है आज किसी और दल में शामिल हो गया जिसकी सोच धार्मिक भेदभाव वाली है , कहीं कोई अच्छी विचारधारा की बात नहीं केवल सत्ता की गंदी दलगत राजनीति ही सभी को उचित लगती है। अंधे की रेवड़ियां बांटने का काम होता रहा है जिस से पांच दस फीसदी लोग रईस और अमीर बनते गए और देश की अधिकांश दौलत संपत्ति को हथिया लिया है बाकी के हिस्से कुछ भी नहीं बचने देना चाहते हैं। अगर यही देश भक्ति समाज सेवा और जनकल्याण कहलाता है तो कितनी गलत व्याख्या और उल्टा शब्दार्थ है। भला बनने की जगह बुराई को ही भलाई कहने लगे हैं। शुरू में इक नई फिल्म भारत की बात की थी उसकी किसी से कहानी सुनी है। सतर साल से कोई अटका हुआ है और बस पिछली घटनाओं इतिहास को याद करने में समय बर्बाद कर रहा है। विभाजन के बाद भटकता रहा है कभी कुछ कभी कुछ काम करता हुआ फिल्म की कहानी को चूं चूं का मुरब्बा बना दिया है मगर  क्या संदेश है कोई नहीं समझ पाया कोई स्वाद नहीं बेस्वाद है मगर मकसद बनाने वाले का कमाई करना है जो अवश्य हासिल किया जा सकता है और यही समानता भारत फिल्म की भारत देश की वास्तविकता से मेल खाती है। जनता को हासिल कुछ नहीं होता और राजनीति की हर दुकान हर शोरूम मुनाफा कमाता है उनके दोनों हाथ में लड्डू हैं , पांचों उंगलियां घी में सर कढ़ाई में हैं और बहती हुई सत्ता की गंगा में नाहाकर समझते हैं उनके पाप धुल गए हैं। अपराधी सांसद मंत्री बनकर समझते हैं जितने गंभीर अपराध किये करते रहे और अभी भी करने हैं उनको इजाज़त मिल गई है जनता ने चुना है तो गुनाह गुनाह नहीं अधिकार बन गए हैं। भारत की यही सच्ची कहानी है जो जनता की व्यथा कथा है और राजनीति की महाभारत की ऐसी किताब है जिस में धर्म की तरफ कोई भी नहीं है। 

          25        गुफ़्तगू पतझड़ की बहार से ( अनकही कहानी ) 

  चलते चलते थोड़ा थक गया हूं ज़रा देर आराम करना चाहता हूं आगे सफर पर जाने से पहले। खुद से कितनी बार कही कहानी अपनी बार बार दोहराने से बदलती नहीं है बस याद ताज़ा हो जाती है। आज लिखने लगा तो शुरू से लिखना चाहिए सब नहीं जितना याद है उतना सही। संक्षेप में जीवन भर की बात जैसे किसी गागर में सागर भरने की कोशिश करना। हर कोई ज़िंदगी की तलाश में है मगर ज़िंदगी कोई सामान तो नहीं जो मिलेगा तलाश करने से , ज़िंदगी मिलती है खुद को खोने से और हर कोई सब कुछ पाना चाहता है। मैंने ज़िंदगी को देखा है मगर करीब से नहीं थोड़ा फ़ासला रखकर , पास जाने से डरता हूं कहीं जिसको हक़ीक़त मानता रहा वो इक ख्वाब निकले छूते ही नींद खुले और सपना बिखर जाए। चलो शुरुआत करता हूं। 

मैं किसी पौधे की तरह इक तपते हुए रेगिस्तान में अपने आप उग आया था। हर तरफ प्यास ही प्यास थी और मुझे ख्याल आया कि मुझे इक प्यार का झरना बनकर बहना है सभी की प्यास को बुझाना है। हर किसी से मुहब्बत करने लगा मगर जाने क्यों लोग मुहब्बत को समझते ही नहीं थे। सबको दौलत शोहरत ताकत की चाहत थी और प्यार मुहब्बत की इस दुनिया में कोई कीमत ही नहीं थी। ये इक बाज़ार की तरह था जिस में कोई खरीदार था कोई बिकने का सामान , मेरी हैसियत खाली हाथ बाजार चले आए नासमझ की थी जिसको खरीदना कुछ भी नहीं था और बिकना भी नहीं था किसी कीमत पर भी। चमकती रेत को पानी समझ दौड़ रहे लोग प्यार के बहते झरने की ओर आये ही नहीं आवाज़ देता रहा मैं हर किसी को। भागते हुए कोई सुनता नहीं देखता ही नहीं मुड़कर दाएं बाएं बस सामने दिखाई देती है चमकती हुई रेत प्यास बुझाने को। प्यास किसी की बुझी नहीं सभी प्यासे ही रहे मरने तक। जिस तरफ प्यार मुहब्बत था किसी को उस तरफ आना ही ज़रूरी नहीं लगा कभी भी। 

ज़िंदगी की परिभाषा कोई समझता नहीं समझाता नहीं। जीना इक रास्ता है मंज़िल नहीं है मंज़िल है कोई इश्क़ कोई आशिक़ी ढूंढना इश्क़ करने को। मैंने यही समझा और चलता रहा ढूंढने को अपनी मंज़िल अपनी आशिक़ी अपनी मुहब्बत अपना जुनून। बचपन से दोस्ती की चाहत रही मगर दोस्ती की किताब किसी पाठशाला में पढ़ाई नहीं जाती थी। दोस्त बनते मगर दोस्ती नहीं करते सभी दोस्ती में कोई मतलब तलाश करते थे। दोस्तों की मेहरबानी है जो अरमानों की दौलत अपनी पूंजी बची हुई है सबने लौटा दी वापस उनको दोस्ती से बढ़कर दुनियादारी लगती थी। संगीत से प्यार हुआ मगर घर के बड़ों ने कहा कि ये गाना बजाना छोटे लोगों का काम है मिरासी लोग करते हैं , मुझे चाहत थी तो सबसे छुपकर संगीत सुनता गाया करता गुनगुनाया करता। किसी मंच पर चला गया तो संचालक को मेरा पहनावा देख कर लगा मंच पर आने से पहले लिबास बदलना होगा किसी से मांग कर पहन लो तब जाना मंच पर। पहला अनुभव ही ऐसा हुआ कि फिर कितने साल खामोश रहकर तनहाई में गुज़ार दिये मैंने। 

दर्द से जाने कब कैसे मुलाक़ात हुई और दर्द मेरा हमसफ़र बन गया। दर्द आंसू और आरज़ू कहीं कोई फूल खिलाने की और इक सपना अपनी इक नई दुनिया बसाने की जिस में सब अपने हों कोई बेगाना नहीं हो। कोई इक घर जो खुला रहता हो हर किसी की खातिर जिस में सिर्फ प्यार मुहब्बत भाईचारा हो अजनबी नहीं लगे कोई भी अनजान भी अपना लगता हो जिस जगह। बीच में कोई नदी आई तेज़ बहाव नफ़रत की जलती हुई आग और अंधेरी रात तेज़ तूफ़ान और गरजती बिजली हर कोई डरकर छुपकर बैठ गया। मल्लाह से कहा उस पार ले चलो तो उसने इनकार कर दिया समझाया भंवर है डूबने का खतरा भी है उस पार कोई जहां नहीं है। बहुत कहता रहा तुम माझी हो ले चलो पार उधर मेरे सपनों का जहां है चाहे नहीं भी मिले मुझे जाना है। नहीं मंज़ूर कोई भी बहाना मुझे तो आज भी है उस पार जाना। 

साल गुज़रते रहे मैं कभी राह से भटकता रहा कभी किसी और मंज़िल को अपनी मंज़िल समझता रहा। पर चैन नहीं मिला सुकून नहीं आया तो फिर चलने लगा। ग़ज़ल मिली कभी कविता कभी कहानी सबसे दिल लगाया सबको अपनाया। मगर लोग खुद को बाज़ार में बेचने को लिखते रहे किताब ईनाम नाम शोहरत तमगे पुरुस्कार और दौलत जमा करते रहे। मैंने सीखे नहीं ऐसे ज़माने वाले तौर तरीके अंदाज़ आज तलक। अपने ही अरमानों से इक कश्ती बनाई और जो भी मिला उसको उसकी मंज़िल तक पार पहुंचा आता जाता रहा। नाखुदा बनकर पता चला कि कश्ती का मल्लाह किसी किनारे नहीं लगता है उसको किसी न किसी दिन नदी की तेज़ धारा में हिचकोले खाते खाते सबको बचाते हुए डूबना ही है। कितनी बार डूबने के बाद मुझे लहरों ने ही फिर वापस किनारे लाकर फेंक डाला है। 

बहुत चिंतन करने के बाद ये बात समझ आई है कि ज़िंदगी किसको कहते हैं और जीने का हासिल क्या है। यूं ही बेमकसद जीना ज़िंदगी नहीं होता है ज़िंदगी उनकी सार्थक है जो कुछ कर गए। जिनका अपना कोई मकसद रहा था जुनून था जिसकी खातिर जिये भी मरे भी। देश समाज दुनिया को अच्छा और खूबसूरत बनाने को सभी को इंसानियत का पाठ पढ़ाने को आपस में मिलकर रहने और भाईचारा बढ़ाने को साहस पूर्वक सच का साथ देने अन्याय और झूठ का विरोध करने को जीवन भर कोशिशें करते रहे। कोई धन दौलत का अंबार जमा नहीं किया क्योंकि उनकी पूंजी लोगों का प्यार और भरोसा थी जो कायम है उनके बाद भी। ये समझ आने के बाद सोचता हूं अभी जीकर सार्थक किया क्या है। जब जागे तभी सवेरा समझते हैं कोशिश करनी होगी कुछ अच्छा करने की अन्यथा जिया नहीं जिया क्या अंतर है। कोई साथ चले कि नहीं चले मुझे चलना है इक मंज़िल की तलाश को , जो मेरे नहीं जाने कितने लोगों की ख्वाबों की ताबीर होगी। इस समाज से दुनिया की राह से कांटें चुनकर हटाने हैं और खिलाने हैं कुछ सदाबहार महकते फूलों के चमन।

पतझड़ ने कहा है फिर से बहार से मुझे अलविदा करने के बाद आओ अब मगर रहना हमेशा सभी के जीवन में हरियाली रंग और खुशबू बन कर। बहार ने वादा किया है मुझे आएगी और निभाएगी अपना वादा जो किया था सभी से। मौसम बदलेगा अभी शायद थोड़ा जतन और करना है मिलकर सबको अपने उजड़े हुए गुलशन को फिर से खिलाने को। हम आप अपने अपने स्वार्थ छोड़कर साथ साथ हाथ से हाथ मिलाते हुए क्या है जो नहीं कर सकते हैं। अबके बहार लाएंगे जो कोई पतझड़ का मौसम छीन नहीं सकेगा , नफरत की आंधी भी जिस को बर्बाद नहीं कर सकेगी हमने नफरत को मिटाना है मुहब्बत के  फूलों के गुलशन खिलाना है।

                     26      घर की दास्तान ( हक़ीक़त ) 

   हुआ करते थे घर गलियां चौबारे और लोग रहते ही नहीं थे जीते भी थे। अधिक पुरानी बात नहीं है आज भी ढूंढने से कहीं उनके बाकी निशान मिल जाते हैं। ये भी उन्हीं से एक घर की कहानी है जो थोड़ी थोड़ी ज़हन में याद है भूली हुई याद जैसे किसी दिन किसी बहाने आती है याद तो लगता है काश फिर से वही ज़माना वही लोग घर मिल सकते। घर था उसमें खिड़की रौशनदान दरवाज़ा हुआ करता था भौर होते ही सूरज की पहली किरण से घर उजला और खुली हवा के झौंके से ताज़गी भरता लगता था। तब कोई पर्दा नहीं लगाया जाता था बाहर से छिपाने को रौशनी भली लगती थी ठंडी मीठी भी अब नकली चकाचौंध बिजली की आंखों को चुभती लगती है। किवाड़ की सांकल बजाने की ज़रूरत कम हुआ करती थी दिन भर गली गांव के अपने बिना कोई ज़रूरत भी चले आते थे , घर पर हो क्या आवाज़ देते तो घर से जवाब आता भीतर चले आओ अपना ही घर है। घर की चौखट लांघते ही आंगन हुआ करता था कोई पेड़ छांव देने को कोई चारपाई बिछी रहती थी। दिन भर छहल पहल रहती थी दोपहर को मिल बैठती थी सखी सहेलियां बड़ी बूढ़ी दादी नानी हंसी ठिठोली और हाल चाल सुख दुःख का सांझा करती हुई। किसकी बिटिया की शादी है कौन बेटी ससुराल से आई है किस की बहु की ख़ुशी की खबर आने वाली है। घर लगता था महका हुआ बाग़ जैसा है खुशबू और चिड़ियों की चहकती हुई आवाज़ें सुनाई देती थी। हर मौसम सुहाना लगता था गर्मी की लू से बारिश की बौछार से सर्दी की ठंडक भी और धूप की तपिश साथ मिलकर गर्माहट को और बढ़ा देती थी।

         ये भी घर हैं जैसे ख़ामोशी छाई रहती है आवाज़ सुनाई नहीं देती इंसान की और बंद खिड़की दरवाज़ा कोई आकर आहट करता है तो ख़ुशी नहीं चिंता होती है बेवक़्त कौन आया है बिना बताये कोई नहीं आता। झांकते हैं कोई अजनबी तो नहीं और सामने के घर में रहने वाला भी पराया अनजान लगता है। बिना मतलब मिलना तो क्या बात करने की फुर्सत नहीं किसी को। आपके पड़ोस में कौन है नहीं नाम भी मालूम उसके दुःख सुख से सरोकार की बात ही क्या की जाये। खुद को अपने घर में बंद कर जैसे कैद में रहते हैं और सभी अकेलेपन के शिकार हैं। जुर्म क्या है किस बात की सज़ा खुद ही झेलते हैं भरोसा किसी को किसी पर नहीं रहा ये कैसा समाज बन गया है। मगर कहने को शहर क्या दुनिया भर से जान पहचान है दिखावे की जब भी कोई अवसर तीज त्यौहार शुभ दिन आता है मिलते हैं फ़ासला भी रखते हैं गले मिलते हैं हाथ मिलाते हैं दिल नहीं मिलते दिल की बात कोई नहीं जानता समझता। घर अब घर नहीं रहे खाली शीशे पत्थर से बनी इमारत में मकान हो गए हैं। ये महानगर की सभ्यता गांव शहर तक पहुंच गई है कभी बड़े शहर जाकर लोग खो जाते थे अब इन मकानों के जंगल में घर खो गए हैं। मुझे चाहिए इक घर चाहे छोटा ही हो अब नहीं चाहत इक बंगला बने न्यारा ।


                     27        गर्दिश में सितारे ( लघु कथा ) 

 साहिल की ज़िंदगी में पांच लड़कियां आईं मगर जाने क्यों किसी से भी बात जीवन भर को साथ निभाने तक नहीं पहुंची। पचास का होने पर भी अविवाहित ही है। अपनी डायरी से अपने नाकाम इश्क़ के किस्से पढ़ता रहता है। ऐसे में जब पहली बार इक महिला से कहानी अंजाम तक पहुंचने लगी तो उसने मालिनी को अपने अतीत की हर बात बताने को अपनी निजि डायरी जिसे कभी किसी को पढ़ने तो क्या छूने भी नहीं देता था दे दी और कहा शायद ये मेरा आखिरी इश्क़ है क्योंकि इस से पहले मैंने कभी किसी को ऐसे पागलपन की हद तक नहीं चाहा था। और जब भी जिसने रिश्ता नहीं निभाना चाहा मैंने स्वीकार कर लिया था कि शायद मेरे नसीब में मुहब्बत मिलना नहीं है। तुम मेरी डायरी पढ़ कर फिर सोच कर निर्णय करना कि क्या तुम भी वही पुरानी कहानी नहीं दोहरानी है। मालिनी भी साहिल को उतना ही चाहती है मगर फिर भी उसने सोचा कि यही अच्छा होगा साहिल की ज़िंदगी की वास्तविकता को जानकर ही विवाह का फैसला किया जाये। 

   अभी कॉलेज की पढ़ाई पूरी नहीं की थी जब बिंदु जो पड़ोस में रहती थी उसने खुद प्यार की बात करने को पहल की थी। मगर साहिल ने अभी सोचा ही नहीं था और पढ़ाई पूरी करने के बाद विचार करने को कहा था। हंसी मज़ाक की बात होती रहती थी मगर कुछ महीने बाद बिंदु की सगाई हो गई और विषय का अंत हो गया था। कुछ समय बाद किसी रिश्तेदार ने हंसिनी से उसके दफ्तर में साहिल को ले जाकर मुलाकात करवाई और कहा जब तक साहिल की नौकरी नहीं लगती खत लिख कर संबंध रख सकते हैं। फिर साल भर बाद हंसिनी के विवाह का निमंत्रण पाकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि खत का जवाब मिलना बंद होते ही आशंका होने लगी थी। अमृता से अचानक मिलना हुआ जब एक साथ इक जगह काम करने पर साथ आना जाना पड़ा और राह चलते बात होने लगी मगर दिल की बात कह नहीं सके दोनों ही। अचानक अमृता ने दफ्तर आना बंद कर दिया और जैसे कोई खो जाता है कुछ भी बताये बिना , मगर कोई वादा नहीं हुआ था दोनों में कभी। साहिल को थोड़ा एहसास हुआ जैसे कोई दोस्त नहीं मिले कुछ दिन तो याद आती है। फिर शायद पहली बार खुद किसी ने पसंद करती हूं कह कर हैरान कर दिया था। दो साल नाता रहा और लगता है जैसे बहाने बनाकर रचना इंतज़ार करती रही साहिल के और अच्छी नौकरी मिलने का मगर जब इंतज़ार नहीं किया गया तब इक कारोबारी से घरवालों की मर्ज़ी से शादी कर ली थी। साहिल अपनी नौकरी छोड़ दूर चला आया था और दस साल से अकेला रहने लगा मन से विवाह की बात ही भुला दी थी। उर्मिला से जान पहचान हुई तो उसने शर्त रखनी चाही जो साहिल ने मंज़ूर नहीं की थी। हर नाता कुछ दिन महीने या एक साल भर बाद टूट गया था। 
 

  मालिनी ने साहिल की डायरी से उसके जन्म की तारीख समय स्थान देख कर लिख लिया और अपने पंडित जी को जाकर कुछ भी नहीं बता कर ज्योतिष के अनुसार साहिल को लेकर कुंडली बनवाई। पंडित जी ने बताया कि साहिल का रिश्ता जिस भी लड़की से टूटता रहा वास्तव में ऐसी पांच लड़कियों की कुंडली में विधवा होने की संभावना रही है। मगर साहिल की आयु लंबी है तभी उन से विवाह तय नहीं हुआ और वो लड़कियां विवाह के कुछ साल बाद सुहागिन नहीं रही। वास्तव में साहिल के सितारे गर्दिश में कभी नहीं थे बल्कि खुशनसीबी है जो अविवाहित रहा अभी तक। मगर तुम उनसे अलग हो क्योंकि तुम सदा सुहागिन होने के सितारे पाकर आई हो साहिल के जीवन में। और ऐसे उनका विवाह हो गया था और अब दोनों साथ साथ ख़ुशी से रहते हैं। साहिल के सितारे अच्छे हैं तभी पांच पांच बार उन कश्तियों से किनारे लगने से पहले किसी मझधार में डूबने से बचता रहा है।

                  28      एक नई कहानी चाहत की ( लघु कथा ) 

 हर बार की तरह सत्ता पर बैठे शासक ने सपनों का नया जाल बनाया है। जनता को लुभाने को शानदार भविष्य की तस्वीर बना कर समझाया है कि जो पहले नहीं हुआ मुझसे और किसी से भी मुमकिन नहीं था इस बार अवश्य संभव होगा। शर्त इतनी सी है जैसा मुझे करना पसंद है उसका बिना सोचे समझे समर्थन करना होगा। जो मेरी बात नहीं मानेगा उसको बेवफ़ा समझा जाएगा। इस तरह से सरकार ने अपने बजट में जनता की वफ़ा और अपनी ज़फ़ा का खुला सौदा सरेआम रख दिया है। जनता को इक सदियों पुरानी मुहब्बत की कहानी याद आई है जिसको सत्ताधारी को सुनाना चाहती है मगर डर लग रहा है अंजाम को सोचकर। फिर भी साहस कर सुना रही है। शासक जी अपने पहले भी वादा किया था सेवक बनकर रहोगे मगर कभी भी ऐसा लगा नहीं। हमेशा मालिक बनकर देश का ख़ज़ाना अपने खुद पे लुटाते रहे और जब खज़ाना ख़ाली हुआ तब घर मकान सामान बेचकर सपनों की दुनिया बसाने के ख्वाब दिखला रहे हो। आपको दो आशिक़ों की बात बताते हैं। 

इक औरत के दो चाहने वाले थे और हर दिन उसको खुश करने को बहुत कुछ करते रहते थे। आखिर दोनों को इक इम्तिहान से गुज़रना पड़ा और क्या कर सकते हैं विवाह के बाद बताना था। इक आशिक़ ने बहुत खूबसूरत घर बनवा कर दिखलाया दूजे ने दौलत का अंबार लगा कर दिखलाया । उस औरत ने दोनों को इनकार कर दिया ये कहते हुए कि तुम मुझे प्यार नहीं करते पाना चाहते हो और मेरी कीमत सिक्कों में लगा मुझे खरीदना चाहते हो। मुझे उसकी तलाश है जो मुझे वास्तव में खुश रखना चाहता हो आज़ाद होकर अपनी मर्ज़ी से जीने देना चाहता हो। किसी की कविता है जिस में बेटी अपने बाबुल से अपना विवाह किसी लौहार से करने को कहती है जो उसकी जंज़ीरों को काट सके। और वो औरत अभी भी उसी की तलाश में है जो अपनी शर्तें नहीं थोपना चाहे और नारी को सम्मान से जीने देना चाहता हो अधिकार की तरह न कि किसी का उपकार समझ कर। आपने भी सत्ता पर आसीन होकर देश की जनता को अपनी शर्तों में बांधना चाहा है मगर इस युग की जनता और आधुनिक महिला सोने चांदी के गहनों और महल की चाह नहीं रखती है उसको अपने हक और समानता सुरक्षा और आदर का महत्व पता है। अब मीठी मीठी बातों से बहलती नहीं है और घबराती भी नहीं इस बात से कि किसी के बगैर कैसे रह सकेंगे। अपनी ताकत को पहचानती है जानती है अपने अधिकार भीख में नहीं मिलते हासिल करने होते हैं।

                             29     हां ( लघुकथा ) 

" बेटी तूं भाग्यशाली है जो इतने अमीर खानदान से तेरे लिए रिश्ता आया है। बिना किसी दहेज के ही उन्हें केवल दुल्हन ही चाहिये , फिर भी हम जैसे मध्यम वर्ग वाले घर से खुद मांग रहे हैं लड़की का हाथ। तुम नहीं जानती हम कब से इस चिंता में थे कि तुम दोनों बहनों के विवाह के लिये इतना पैसा कहां से लाएंगे दहेज देने के लिये। " माँ अपनी बेटी को समझा रही है। " मगर माँ ये उसकी दूसरी शादी है , मैंने सुना है कि उसकी पहली पत्नी  विवाह के साल भर बाद ही जल कर मर गई थी।  लोग आरोप लगाते हैं ससुराल के लोगों ने जला दिया था। कहीं मेरे साथ भी वही न हो जाये " डरी सहमी बेटी माँ को मन की बात कह रही है।

            " बेटी घबरा मत , ये डर अपने मन से निकल दे। भगवान जाने वो खुद जली थी या उन्होंने उसको जला कर मार डाला था , मगर उस केस से बहुत मुश्किल से उनकी जान बची है। अब भूल कर भी वे अपनी बहू को परेशान नहीं करेंगे। अब तो वे तुझे और अधिक लाड़ प्यार से रखेंगे ताकि उनपर कोई नया आरोप फिर न लग सके। उनका पूरा प्रयास होगा समाज में अपनी छवि को सुधारने का और पुराने इल्ज़ाम को झूठा साबित करने का। माँ की बातों से बेटी को पूरा विश्वास हो गया है अपनी सुरक्षा का। उसने हां कह दी है। 

                      30       भिखारी ( लघुकथा ) 

एक धनवान उस बस्ती में आया। ऊंची ऊंची आवाज़ में पुकारने लगा वहां रहने वालों को। आओ दान में मिलेंगे सभी को हीरे मोती , पैसा , कपड़े , खाने पीने का सामान। गली गली आवाज़ लगाई उसने मगर नहीं आया कोई भी उसके सामने हाथ फैलाने को। बहुत हैरान हुआ वो अपने धन पर अभिमान करने वाला। परेशान होकर उसने एक घर का दरवाज़ा खटखटाया। उस घर में रहने वाले से सवाल किया क्या यहां के लोगों को सुनाई नहीं देता , मैं कितनी देर से आवाज़ दे रहा हूं कोई भी बाहर नहीं निकला अपने घर से। क्या यहां किसी को भी धन कि ज़रूरत नहीं है। उस घर में रहने वालों ने कहा आप गलत जगह आ गये हैं। यहां पैसे की  ज़रूरत सब को होती है मगर सभी अपनी ज़रूरत खुद पूरी कर लेते हैं जैसे भी हो। इस बस्ती में हम सब स्वाभिमान पूर्वक रहते हैं , कोई भिखारी यहां नहीं रहता है। धनवान ने पूछा कि मैं भी चाहता हूं ऐसे नगर में रहना जहां कोई भी भिखारी नहीं हो। मुझे अगर घर चाहिये तो क्या करना होगा , मेरे पास बहुत धन दौलत है कितनी कीमत है यहां किसी घर की। जो भी मांगो देने को तैयार हूं। जवाब मिला अभी भी नहीं समझे यहां रहने के लिये दो बातों को छोड़ना पड़ता है , स्वार्थ को और अहंकार को। ये तो प्यार मुहब्बत की बस्ती है , इस में आकर रहना चाहो तो बड़े छोटे , अमीर गरीब के भेदभाव की बातें , अभिमान , अहंकार को छोड़ कर आओ। ये जो सब हीरे मोती पैसा जमा है उसे प्यार के सामने कंकर पत्थर समझना होगा। चाहे जैसे भी हालात हों , हर हाल में प्रसन्नता पूर्वक रह सकोगे , तभी यहां मिलेगा आपको इक घर इंसानियत की बस्ती में। खरीदना नहीं पड़ता घर , बनाना पड़ता है प्रेम और सदभाव से। धनवान वापस चल दिया था अपने उस नगर में जहां सब के सब भिखारी रहते हैं।